अगर आप किसान नही है तो किसान को समझना आपके बस की बात नही है।

अगर आप किसान नही है तो किसान को समझना आपके बस की बात नही है। अपनी 33 साल की उम्र में अभी 2 दिन पहले ही तो मैंने भी किसान को समझा है। कैसे? आइये आपको भी समझाता हूँ। लेकिन आगे पढ़ने से पहले इस तस्बीर को गौर से देखिए फिर आगे समझने की कोशिश कीजिये।मैं बिज़नेस करता हूँ। अपनी तीन कंपनी में से दो कम्पनीज कुछ समय के लिए बंद करनी पड़ी क्योकि वो लगातार घाटे में चल रही थी। प्रोडक्शन का काम है तो कई बार क़्वालिटी में समस्या या कुछ और कारण… नुकसान हुआ। ब्रांड खड़ा किया तो डिस्ट्रीब्यूटर की समस्याये, और फिर एक झटके में ही लाखो का नुकसान। अगस्त 2015 में जब मैंने भारत की सबसे बड़ी कंपनी के फ़ोन लांचिंग की लिए गिफ्ट तैयार करवाने का आर्डर लिया और उस आर्डर को सफलता पूर्वक पूरा करने के वावजूद अब तक का सबसे बड़ा नुकसान 18 लाख रुपये एक ही बार मे डूब गए तब भी अगर क्षणिक तकलीफ को छोड़ दें तो कभी दुख नही हुआ। हमेशा लगा कि इतना कमाता हूँ तो थोड़ा बहुत नुकसान हुआ भी तो उसका गम क्या करे क्योकि ये बिज़नेस है… घाटा, मुनाफा चलता रहता है। और उस समय किसानों के बारे में भी मेरी राय यही थी कि किसानी एक व्यवसाय है, अब अगर इसे चुना है तो नुकसान होने पर कोई रोये क्यो? मग़र पिछले एक महीने ने मेरे सोचने के तरीके को ही बदल दिया।अपने घर की छत पर गमलो में मैंने कुछ सब्जियां और कुछ पौधे लगाये थे जो अब तक काफी बड़े हो चुके थे। यकीन मानिए मैं कभी कभी या यूं मानिए कि त्योहारों पर ही छत जाया करता था मगर इन 2-3 महीने में मैंने पौधों को बढ़ते हुए देखने के लिए शाम, रात और सुबह छत के इतने चक्कर लगाए जितना कि मैं पिछले 12 साल में कभी अपने आफिस भी नही गया। लेकिन बात यही खत्म नही होती… अभी 3-4 दिनों से महसूस हुआ कि अचानक कुछ पौधे बारिस की वजह से सड़ने लगे। कुछ की पत्तियां पीली हो गयी, जो शायद अब बच भी न पाए। पौधों की इस हालत नेे मेरे अंदर की बेचैनी को हद तक बढ़ा दिया कि शब्दो से खेलने वाले मेरे जैसा इंसान भी उसे बया नही कर सकता। ऐसे लग रहा था जैसे मैं उस बच्चे को धीरे धीरे खो रहा हूँ जिसे मैं अब तक पालता आया हूँ। और तब फसल और प्रोडक्ट के बीच का अंतर समझ आया। किसानी और व्यवसाय में फर्क महसूस हुआ। पहली बार एहसास हुआ कि किसान अपनी एक बीघे की फसल खराब होने पर इस लिए नही बेचैन होता कि उसके चंद हजार रुपये का नुकसान हो गया बल्कि इसलिए रोता है कि उसकी वह फसल बर्बाद हो गयी जिसे उसने बोया, सींचा, खाद डाली, कोई रोग हुआ तो बाजार दौड़ कर गया, उसके लिए दवा लायी और सबसे बड़ी बात कि पिछले 2 महीने से हर सुबह शाम अपनी खेत के चारो ओर घूम घूम करके एक एक पौधे को देखता रहा कि वह स्वस्थ तो है न? उसका विकास ठीक ठाक तो रहा है? उसकी पत्तियों में ताजगी तो है?कहने का मतलब इन 2-3 महीनों में एक एक दिन के गुजरने के साथ ही किसान अपनी फसल के साथ भावनात्मक रिश्ता बना लेता है जिसके लहलहाने पर उसका मन भी लहलहाने लगता है और उसके मुर्झाने पर उसका मन भी मुर्झा जाता है। दरअसल अपनी फसल के स्वास्थ्य पर अपना स्वास्थ्य टिका देने वाला ही किसान है।

Please follow and like us:

Author: admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *