अवकात समझते हो न? जो हमे मिलता है वह हमारी अवकात है जो हम देते…

अवकात समझते हो न? जो हमे मिलता है वह हमारी अवकात है जो हम देते है वह पाने वाले कि अवकात है।

आपकी अवकात, आपकी जाति में नही आपके पुरुषार्थ से कमाए गए ताकत में निहित है। कैसे? चलिए समझते हैं।एक मंत्री जी जो कि जाति से पासी है उनके आफिस के बाहर फरियाद लेकर आये लोगो मे से एक पंडित जी जो बाहर पड़ी कुर्सी में बैठेने के लिए अपने सवर्ण होने पर टनटना रहे थे तभी दूसरे पंडित जी ने आकर उन्हें बताया कि हमारा कुल तुमसे ऊंचा है, इसलिए इस कुर्सी पर हमें बैठने देना चाहिए।

ऐसे ही एक कुर्मी ने यादव को भी बताया कि सरकारी रिकॉर्ड में हम पिछड़े तो दोनों है लेकिन हमारी जाति तुमसे ऊपर है फिर इससे पहले यादव जी पलट कर कुछ कह पाते कि पास खड़े एक जाटव ने उनसे कहा कि आप पासियो को हमसे मिला कर मत देखिए, हम तो उनका छुआ पानी भी नही पीते, वो हमसे बहुत नीचे है। और इसी बीच एक निषाद महोदय बीच मे ही बोल पड़े कि हम तो चमार और पासी दोनों के यहाँ का पानी नही पीते? तभी अचानक मंत्री जी आफिस से निकले तो सभी कुर्सी छोड़ कर उनकी ओर लपक पड़े… मंत्री जी की चरण वंदना के लिए।

भई काम भी तो करवाना है।अब कुछ समझ में आया? नही ? कोई बात नही, थोड़ा खुल कर समझाते हैं। जिस अवकात को अक्सर हम जाति के लबादे से ढकते है वह जाति नही दरअसल ताकत का लबादा है। एक थानेदार जब ट्रांसफर हो कर किसी थाने में जाता है तो वह पहले पता करता है कि इस क्षेत्र में रसूक वाले लोग कौन है, ताकि वह आने वाले मामले में तय कर सके कि उसे किसके खिलाफ रिपोर्ट लिखनी है और किसके नही।

वह कई बार अपने बड़े अधिकारियों की बात भी नही सुनता क्योकि उसे पता है,कि अधिकारियों के दम पर ज्यादा कानून झाड़ा या कानून का रौब दिखाया तो अधिकारियों का तो सिर्फ ट्रांसफर होगा, उसकी तो हत्या भी हो सकती है। हालांकि ये कहा जा सकता है कि रिपोर्ट न लिखने से ये कहाँ सिद्ध होता है कि थानेदार भी रसूक वालो के साथ खड़ा है?साहब! आग लगी हो तो तटस्थ रहने का मतलब ही यही होता है कि आप उनके साथ खड़े है जो आग लगा रहे हैं।

जो लोग जाति के नाम पर दुकान खोल चुके हैं दरअसल कुछ दिनों के बाद वह खुद समझ जाते है कि आगे कोई उम्मीद नही है मगर रुक नही सकते क्योंकि बहुत से लोग है जिन्हें वह आज तक फुसलाते रहे हैं और वही लोग अब उनसे उम्मीद लगाये हुए बैठे हैं। अब सच नही बोल सकते।चंद्रशेखर रावण को तो जानते ही होंगे? अगर उसे सही नही ठहरा सकते तो गलत ठहराने जैसा भी उसने कोई काम नही किया है।

वह चाहता था कि वह खुद को गर्व के साथ कह सके कि वह चमार है जैसे ठाकुर खुद को ठाकुर कहने में गर्व महसूस करता है। मायावती दलितों की देवी कही जाती हैं, रावण को लगा कि मायावती खुद दलित है और अपनी जाति के लिए कुछ करने की उनमे ताकत भी है। लेकिन मायावती ने जब दलितों के लिए ठोस कदम नही उठाये तो रावण को भी जल्दी ही एहसास हो गया कि ताकत की कुछ और ही जाति होती है या फिर होती ही नही है।

आंदोलनो से तुम सिस्टम और सरकारों को हिलाकर रख दो, देश मे आग लगा कर बता दो की तुम कितने ताकतवर हो मगर आग बुझते ही तुम्हे एहसास होगा कि समाज अब भी वैसा ही है, लाचार। आग लगाने वाली उस करोड़ो की भीड़ से कोई एक ही माया या मुलायम निकलेंगे। जो तुम्हे और तुम्हारी जाति को भूल कर ताकत वाली जाति में शामिल हो जायेगे। अब अगर तुम फिर भी उन पर इतरा सकते हो तो इतरा लो, खुद के लिए कुछ न मांगो। खुद के लिए चहिये तो खुद को ही ताकतवर बनाना होगा। और फिर समझिये कि दुनिया में मिलने वाला हर सम्मान अब तुम्हारा है।

#Rajesh_Aanand

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Author: admin

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