इमारतें बनानी है? हाँ कहिये लेकिन इंसानियत भूल जाइए

इमारतें बनानी है? हाँ कहिये लेकिन इंसानियत भूल जाइए।

इंसानियत को जिंदा रखना है तो इमारतें भूल जाइए। पानी और आग एक ही दरिया में नही बहा करते। खुद को जिंदा रखना है तो घर चाहिए और घरों के लिए जंगल काटे जाएंगे। लाखो करोड़ो पशु पक्षी बेघर होंगे। खतरनाक जानवर बस्तियों की तरफ आयेंगे, उन्हें या तो कैद करना पड़ेगा या मारना। इतना कुछ करने के बाद इंसान बने रह पाओगे?भारत की झुग्गियां घुसपैठियों से भरी हुई है, और ये झुग्गियां आपकी और मेरी जमीनों पर है। अपने बच्चों के लिए मुझे और घर चाहिए और शायद तुम्हे भी, तुम्हारे बच्चों के लिए। उसके लिए अपनी जमीन को खाली करवानी पड़ेगी। घुसपैठियों के अर्धनग्न, ठंडी से कपकपाते बच्चों को उनके आशियाने से हटाकर बाहर फेंकना पड़ेगा। उनके साथ ऐसी बेदर्दी दिखा कर इंसान बने रह पाओगे?तुम्हारी इंसानियत, शहर के बाहर जो कचरा इकट्ठा कर रही है वह कुछ वक्त के बाद दरिया बनेगा जो कभी न कभी शहर के अंदर घुसेगा। दरिया में दया नही होती। इसके प्रवाह में तुम्हारी आने वाली पीढियों को डूबना होगा। तो क्या तुम अब इंसानियत छोड़ दोगे?बिन पेंदी के लोटे की तरह किसी भी दिशा में लुढ़क जाने वाले लोगो विचार करके फैसला करो। मानवता को बचाने के लिए इंसान बने रहना है न? या खुद की अगली पीढ़ियों को बचाने के लिए इंसानियत को छोड़ना है।वैसे आपने इंसान को देखा है? मैने नही देखा। कैसा होता है? कहीं मिले उससे उसका घर मांग लूँ, दे देगा क्या?सुरक्षित भविष्य चाहिए? हाँ कहिये लेकिन इंसानियत भूल जाइये।रोजगार चाहिए? हाँ कहिये लेकिन इंसानियत भूल जाइये।कुल मिलाकर परोपकारी बनिये, अपनी जरूरत की चीजें इकट्ठा करते करते उनकी जरूरत का भी ध्यान रखिये जिसे इंसान बनना है? हाँ कहिये लेकिन भविष्य भूल जाइये।

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Author: admin

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