एक आँशू ही मेरे दर्द की पहचान क्यों है ?

टूट कर भी मेरे चेहरे पर मुस्कान क्यों है?

इस सवाल पर हर शख्स परेशान क्यों है ?

अक्सर रोता हूँ आशुओ को थाम कर मैं

एक आँशू ही मेरे दर्द की पहचान क्यों है ?

जमाने ने क्या कम सताया है मुझे,

उसे ही अपने दर्द पर अभिमान क्यों है ?

होता रहा हूँ बेगैरत , हर बार गैरत के लिए,

इस बात पर सब इतना हैरान क्यों है ?

जल रहा हूं धूप में जिनका घरौंदा बन कर,

मेरे पसीने से वही इतना परेशान क्यों है ?

कैद हो अगर तुम घर की दीवारों के बीच,

तो बेघर से पूछ दीवारों का अरमान क्यों है ?

दो गज जगह भी नहीं मिली धरती में मुझे,

तुम पूछते हो पिता फिर आसमान क्यों है ?

आनंद

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Author: admin

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