कबूतर के आँख बंद कर लेने से बिल्ली भाग नही जाएगी

एक कहावत है कि कबूतर के आँख बंद कर लेने से बिल्ली भाग नही जाएगी। हाल ही में यही हाल भारत का है और उसमे भी खासकर विरोधी दल और उनके समर्थको का जो राजनीतिक फायदे के लिए सरकार का इन मुद्दों पर ध्यान दिलाने और साथ देने की जगह उसके रास्ते मे कांटे बिछाने में इतने व्यस्त है कि अपनी ओर आ रही भविष्य के खतरों और चुनौतियों को देखने तक कि फुरसत नही है।

कूटनीतिक हित के लिए रूस को 1 अरब डॉलर के कर्ज देने की ख़बर मात्र पर हंगामा करने वाले जान ले कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते आजकल बेहद खराब है और इसकी उम्मीद बहुत कम है कि भविष्य के निकट में कभी ठीक होंगे, क्योकि भारत पाकिस्तान के खराब रिश्तों में परस्पर विरोधी चीन और अमेरिका दोनों का राजनीतिक और व्यापारिक हित है।

अफगानिस्तान समेत मध्य एशिया में अपनी पहुच बढ़ाने और व्यापार करने के लिए भारत ने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से महज 80 किलोमीटर दूर ईरान में चाबहार बंदरगाह को लीज पर लेकर उसे विकसित कर रहा है मग़र इसी बीच खबर आई कि चीन ईरान में ट्रांसपोर्ट और कच्चेतेल के खनन को विकसित करने के लिए 400 अरब डॉलर लाइन ऑफ क्रेडिट के तौर पर निवेश करने जा रहा है।

हो सकता ये खबर अपनी रोटी में व्यस्त लोगो के लिए कोई खास या चिंताजनक खबर न हो मगर इसे समझने के लिए ये समझना जरूरी है कि ये रकम कितनी बड़ी है? आप इस रकम को समझने के लिए ऐसे समझिये कि भारत के पास कुल रिज़र्व 417 अरब डॉलर के आस पास है और उतनी ही रकम चीन ईरान को कर्ज के तौर पर देने जा रहा है।

मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मध्य एशिया और यूरोप तक पहुचने के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण माध्यम है जो भारत के लिए अगले कुछ वर्षों में बंद होने वाला है। बात सिर्फ व्यापार तक ही खत्म नही होती, इस समझौते के तहत चीन ईरान में अपने 5000 फौजी भी रखेगा जो अगले कुछ सालों में 25 से 30 हजार तक भी हो सकते है।

इस बीच आपको पता होना चाहिए कि चीन भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में पहले ही अपनी आर्मी तैनात कर चुका है साथ ही दूसरे पड़ोसी मुल्क श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश में बंदरगाह में निवेश के जरिये उसकी फौज की दखल शुरू हो चुकी है। भारत, विस्तारवादी चीन द्वारा चारो तरफ से घिर चुका है और इसके पीछे मुख्य कारण है उसकी आर्थिक ताकत और पिछली सरकारों की कोताही। ये सचमुच चिंता का विषय है कि भारत, जहाँ आज भी व्यापार को महत्व देने की जगह यहाँ के तथाकथित नवयुवक नौकरी के लिए आंदोलन करने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देते हैं, ऐसे माहौल में भारत शायद ही कभी चीन का मुकाबला कर पाए।

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Author: admin

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