जरूरी नहीं हर संघर्ष सच और न्याय के साथ हो

जिंदगी एक रणभूमि है और राजनीती एक युद्ध – खुद को जिन्दा रखने का तरीका। 
जितनी भी कौमें और जिन्दगिया आज अस्तित्व में है……. जरा उनके इतिहास को पढ़िए और समझने की कोशिश करिये क्या सचमुच वो सच के साथ खड़ी थी इसलिए जिन्दा है या अपने अस्तिव को कायम रखने के लिए संघर्ष किया था फिर चाहे वह संघर्ष सच के साथ रहा हो या सच के बिना ?

सही क्या है और गलत क्या है ? ये सवाल तब बेमानी हो जाता है जब खुद को बचाने की जेद्दोजेहद हो रही होती है। वो कौमें जिन्दा नहीं रहती जो रणभूमि में रणनीति बनाते वक्त सिर्फ ये सोचती है कि उन्हें सच और न्याय के साथ खड़ा होना है। 

अंग्रेजी की ये कहावत जिंदगी को जीने का तरीका सिखाती है -“everything is fair in love and war”
‘भारतीय इतिहास का सबसे भीषण युद्ध महाभारत को याद करिये – पांडव सच के साथ खड़े होकर भी क्या उस युद्ध को जीत पाते अगर श्री कृष्ण सच और न्याय के विपरीत भीष्म पितामह को शस्त्र छोड़ने को विवश न करते, गुरुद्रोण के साथ छल न करते या दानबीर अजेय कर्ण पर तीर चलाने के लिए अर्जुन को उस वक्त विवश न करते जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धस गया था।’ 

यहूदी जब पूरी दुनिया में फलो की तरह काटे जा रहे थे, उनकी औरतो को सेक्स स्लेव (गुलाम) बनाया जा रहा था और पूरी यहूदी कौम का अस्तित्व खतरे में था तब उन्होंने अपने सबसे बड़े दुश्मन (मुस्लिम्स) के बीच अपने पैतृक स्थान जेरुसलम लौटने का फैसला किया, जहा से सदियों पहले उन्हें भगा दिया गया था। इस बार उन्होंने योजना के तहत वहां पर हर ४-५ मुस्लिम घरो के बाद अपना एक अपना घर ख़रीदा और जैसे जैसे वो पूरे शहर में हर ४-५ घरो के बीच एक घर की शक्ल में जाल की तरह काबिज हो गए, तो दुनिया में सिर्फ मार खाने के लिए जाने वाली यहूदी क़ौम अब मुस्लिम परिवारों को इस कदर परेशान करना शुरू कर दिया कि मजबूरन मुस्लिमो परिवारों को अपना घर या तो सस्ते दामों में बेंचना पड़ा या जान बचाने के लिए वैसे ही खाली करना पड़ा, जैसे अपनी सुरक्षा से निश्चिन्त, केसर के व्यवसाय के लिए जाने जाने वाले कश्मीरी पंडितो को ९० के दशक में अपनी बड़ी बड़ी कोठिया खाली करनी पड़ी थी और आज पश्चिम बंगाल, केरला, तेलंगाना और उत्तरप्रदेश के कुछ इलाको से हिन्दुओ को अपना घर खाली करना पड़ रहा है। वैसे यहूदियों का ये संघर्ष कभी भी न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता मगर हकीकत ये भी है कि अगर उस वक्त यहूदी सच और न्याय के साथ खड़े होते तो आज दुनिया में न इजराइल होता न यहूदी। 

बिलुप्तता के निकट खड़ी, जगह जगह से पलायन करने वाली कौम में सच और न्याय की मूर्ती को स्थापित करने वाले भारतीय राजनीतिक गिद्ध दरअसल उनकी ही कब्रों का इंतजाम कर रहे है। दौलत और व्यापार की चाह में अंधे पलायनवादी कौम हर रोज जीडीपी और नौकरियों के कुछ आंकड़े दिखा कर इन राजनीतिक गिद्धों को खुद को काटने के लिए तलवारे और कब्र खोदने के लिए फावड़ा दे कर खुश है।

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Author: admin

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