दलित मुस्लिम गठजोड़ में, मुस्लिम कभी भी दलितों का भला नहीं कर सकते : डॉ आंबेडकर

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद 1919 में अंग्रेजो ने वहां के खलीफा को गद्दी से हटा दिए अतः तुर्की के सुल्तान को उसकी गद्दी वापस दिलाने के लिए पहली बार भारत के आम मुसलमानो ने भी अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया और गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने इसका समर्थन किया। जिसने बाद में असहयोग आंदोलन का रूप धारण कर लिया। इस घटना के बाद डॉ भीमराव अम्बेडकर, मुस्लिमो को लेकर काफी असज हो गए थे। डॉ. अम्बेडकर सहित सब हैरान थे कि मुस्लिमो के लिए अपने देश से ज्यादा अपना धर्म महत्वपूर्ण है और ये सचमुच हैरानी की बात है कि असहयोग आंदोलन में गाँधी जी का साथ वो सिर्फ इसलिए साथ दे रहे है क्योकि उन्हें तुर्की के सुलतान की गद्दी अंग्रेजो से वापस दिलानी है और यही वजह थी कि मुसलमानो के सोचने के तरीको को लेकर डॉ आंबेडकर को ऐतराज था। जिसकी वजह से आजाद भारत में भी उन्होंने कांग्रेस को कभी पसंद नहीं किया। उनका मानना था कि कांग्रेस सब कुछ जानते हुए भी मुस्लिम तुस्टीकरण में लगी रहती है, उनकी हर माँग को मान लेती है जबकि हिन्दुओ में अछूत माने जाने वाले दलित समुदाय के साथ सौतेला व्यवहार करती है और दलितों के हक़ को छीन कर मुसलमानो को दे रही है।

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में डॉ भीम राव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था और जब ये बात हैदराबाद के निजाम को पता चली तो निजाम ने मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए न सिर्फ उन पर भावनात्मक दबाव बनाया बल्कि इसके एवज में करोडो रुपये देने की पेशकश भी की, क्यो कि उसे पता था कि अम्बेडकर के करोडो समर्थक है जो संभवतः उनके साथ वो भी मुस्लिम धर्म अपना लेंगे मगर अम्बेडकर ने मुस्लिम धर्म अपनाने से साफ इंकार कर दिया क्योकि उन्हें लगता था कि धर्म परिवर्तन जैसे व्यवसाय में मुस्लिम और दूसरे धर्म के लोगो के लिए हमेशा हिन्दुओ में दलित समुदाय ही निशाने पर रहता है, जो गलत है।

1947 में पाकिस्तान बनने के बाद वहां के अल्पसंख्यक हिन्दुओ पर अत्याचार किये जा रहे थे और ये अल्पसख्यक हिन्दू दलित थे। जिन्हे बंधक बना लिया गया था और पाकिस्तान से भारत नहीं आने दिया जा रहा था तब बाबा साहब ने एक लेख लिखा था जिसके जरिये उन्होंने पाकिस्तान में बंधक दलित हिन्दुओ को सलाह दिया था कि जबरन मुस्लिम बनाये जाने से बचने के लिए वो जैसे भी संभव हो भारत आ जाये। मुसलमानो पर सिर्फ इसलिए भरोषा न करे की उनकी सिर्फ सवर्ण हिन्दुओ से नाराजगी है क्योकि इतिहास बताता है कि मुसलमानो की हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार दलित हिन्दू ही हुए है।

बाबा साहब की किताब ‘पाकिस्तान एंड द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’ में उन्होंने लिखा था कि “पाकिस्तान के बारे में सोचना भारत में एक केंद्रीय सरकार बनाने के मूल विचार के खिलाफ है। इसलिए हमें भारत का संविधान बनाने से पहले पाकिस्तान के मुद्दे को पहले सुलझाना होगा तभी हम एक सशक्त संविधान की नीव रख पाएंगे।” उनके अनुसार- “मुस्लिम समुदाय भारत और पाकिस्तान में एक केंद्रीय सरकार नहीं चाहता, इसके पीछे मुस्लिमो के अपने तर्क है और उनके तर्कों को देख कर लगता है कि एक केंद्रीय सरकार बनाना भारत के मुसलमानो के आँखों का कांटा है। मुस्लिम नेता कभी भी धर्मनिरपेक्षता के महत्व को नहीं समझ सकते क्यों उनको लगता है कि उनकी लड़ाई हिन्दुओ से है और धर्मनिरपेक्ष रवैया अपनाने पर उनका अपना मुस्लिम समुदाय इस लड़ाई में कमजोर पड़ जायेगा।” बाबा साहब का मानना था कि -“गरीब मुस्लिम कभी भी धार्मिक लड़ाई के अलावा, ‘पूँजीवाद या अमीरो से हो रही लड़ाई में’ गरीब हिन्दुओ का साथ नहीं देंगे।”

डॉ भीम राव आंबेडकर हमेशा मुस्लिम और दलितों के गठजोड़ की राजनीती के खिलाफ थे। बाबा साहब ने अपने एक लेख में लिखा था कि – “मै मुस्लिम भारत और गैर मुस्लिम भारत का विभाजन बेहतर समझता हूँ क्यों कि ये दोनों देशो को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सबसे बेहतर और सुरक्षित तरीका है। अवश्य ही अन्य विकल्पों में ये सबसे अधिक सुरक्षित है।” आंबेडकर का मानना था की – “इस देश में मुसलमान हमेशा ही शाशक वर्ग रहा है और उनकी शाशको वाली इसी मानसिकता की वजह से मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूँ कि अगर दलित और मुस्लिम गठजोड़ होगा तो मुस्लिम कभी भी दलित का भला नहीं कर सकते और उनका शोषण ऐसे ही होता रहेगा।”

Please follow and like us:

Author: admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *