बलात्कार को रोकने के लिए कड़े कानून की मांग दरअसल आपकी गंभीरता कम, कायरता का प्रतीक ज्यादा है।

बलात्कार को रोकने के लिए कड़े कानून की मांग दरअसल आपकी गंभीरता कम, कायरता का प्रतीक ज्यादा है। समाज अपनी रोजी रोटी में इतना उलझ गया है कि उसे पता ही नही चला कि वह कब नपुंसक बन गया। हाँथो में मोमबत्तियां लेकर सरकार को घेरने वाले लोग वास्तव में समस्या के प्रति जवाबदेह कम राजनीति का हिस्सा ज्यादा है और यही कारण है कि देश के तथाकथित समाजसेवी लोग सरकारों की विचारधारा और पीड़िता की जाति या धर्म को देख कर विरोध प्रदर्शन करते हैं।

हालांकि वह ऐसा कर सकते हैं, क्योकि वास्तव में वह खुद को समाज का हिस्सा मानते ही नही हैं, और जिसका हिस्सा है उसके लिए अपना काम ईमानदारी से करते हैं मग़र इन सब मे समाज कहाँ खड़ा है? अपराधों को रोकने के लिए कठोर क़ानून बनाये जाने चाहिए और बनाये भी गए हैं मगर वावजूद इसके, अगर अपराध थम नही रहे हैं तो उस समाज को कानून से ज्यादा खुद में बदलाव करने की जरूरत है। समाज के बीचो बीच घूम रहे हैवानो को पहचानने की जरूरत है।

अक्सर हम जिन्हें दकियानूसी बातें समझ कर समाज से दूर रखने की कोशिश करते है वही पाप पुण्य की मान्यताएं और कड़े सामाजिक बंदिशे इंसान को जानवर बनने से रोकती है। उनके अंदर अपराध के उपरांत मिलने वाली सजा के लिए डर पैदा करती है लेकिन अगर उनके अंदर का वह डर ही मर जाये तो? वास्तव में कठोर कानून से अपराध रुक सकते तो निश्चित रूप से निर्भया केस के बाद से लेकर अब तक, बलात्कार जैसी घटनाओं से जुड़े कानून में किये गये भारी बदलाव के बाद बलात्कार की घटनाये थम गई होती, लेकिन क्या ऐसा हुआ? अगर नही तो एक बार खुद के अंदर झांकिए और हो सके तो अपने घरों और पड़ोस में बलात्कारियों को तलाशिये। क्योकि वास्तव में ये वही पल रहे है है आपकी नाक के नीचे। जिनकी नशों में एक बार खून भर गया तो कानून की धाराएं तो छोड़िए, इन्हें फांसी की गांठ की नाप तक याद नही रहती। जबकि निश्चित रूप से इन्हें भी पता है कि बालात्कार की घटना को अंजाम देने के बाद बालात्कारी 24 घंटे से ज्यादा ये पुलिस के हाँथ से नही बच सकते।इसलिए अपनी बेटियों को सुरक्षित माहौल में बढ़ने देना चाहते हैं तो बेटियों से ज्यादा बेटों पर बंदिशे बढ़ाइए। उन्हें सिखाइये की सड़क पर अकेले जा रही लड़की शिकार नही बल्कि उनकी जिम्मेदारी है। खतरे की स्थिति में उन्हें सुरक्षित होने तक सुरक्षा दीजिये। और साथ ही उस वर्ग को न सिर्फ पहचानिए बल्कि बलपूर्वक रोकिये जिसमे ऐसी हैवानियत की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। क्योकि सवाल आपकी बेटियों का है, सरकारें किसी की भी हो उनसे आप सिर्फ निंदा की ही उम्मीद कर सकते हैं। समाज की हवसी मानसिकता को अपराध से पहले दंडित करने का कानून हमारे संविधान में नही है। और जो है उसे कोर्ट में साबित करने का रास्ता नही है।

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Author: admin

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