मैं अपने बेटे को क्या बताऊँ ?

मेरा बेटा कुछ महीनों में 5 साल का हो जाएगा। वह विषयों को तेजी से सीख रहा है।

मैं असमंजस हूँ कि क्या उसे बताऊँ कि भूत होता है, या उससे कहूँ कि यह मन का वहम है, #भूत_प्रेत नाम की कोई चीज का इस दुनिया मे नही है। लेकिन तभी अगला सवाल मेरी उलझन का कारक बन जाता है।अगर मैं उसे यकीन दिला पाया कि सचमुच इस दुनिया मे भूत नही होता तो साथ ही वह यकीन कर लेगा कि तब तो इस दुनिया में भगवान भी नही होगा।

“अरे ऐसे कैसे यकीन कर लेगा?” पूछने को पूछा जा सकता है लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि उत्तरी घ्रुव तो है मगर दक्षिणी ध्रुव नही है। अच्छाई तो है बुराई नही है। जोड़ तो सकते है लेकिन घटा नही सकते। दरअसल इसे ही अंग्रेजी में बैलेंस ऑफ पावर कहते है। ताकतवर है इसलिए दुनिया मे कमजोर भी हैं। ऊँचाई है, इसलिए गहराई है। सकारात्मकता है तभी नकारात्मकता भी है। और झूठ? सोचिये अगर दुनिया मे सच न होता तो क्या झूठ होता?परस्पर विरोधी अर्थ वाले गढ़े गए शब्द मानने या न मानने में ही निर्भर होते हैं। उसमे से एक हटा दीजिये दूसरा खुद ही बिलुप्त हो जायेगा, जैसे भगवान या हैवान (भूत) में से भगवान की अवधारणा को हटा दीजिये हैवान की अवधारणा खुद ही समाप्त हो जाएगी। अब इसे ही उल्टा कर लीजिए आपको भगवान के अस्तित्व की हकीकत भी समझ आ जायेगी।

अब सवाल है कि जब भूत के अस्तित्व को हटाना इतना आसान है कि आप भगवान को हटा दो, तो वह खुद हट जाएगा तो फिर हम हटाते क्यों नही? क्यों हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को इसके डर के साये में जीने देना चाहते है? इसका जवाब है -क्योंकि आग उतना जला नही कर सकती जितना पानी बुझा सकता है।कुछ सालों में मैं बूढ़ा हो जाऊँगा, मेरा बेटा मुझसे डरना छोड़ देगा फिर उसे मैं किसका डर दिखा कर कहूँगा कि “दूसरो के साथ अन्याय मत करो अगर तुम चाहते हो कि ईश्वर तुम्हारे साथ न्याय करे।”समय परिवर्तनशील है। मेरे मरने के बाद अगर कभी समय उसके खिलाफ हो गया। रिश्तो ने उसका साथ छोड़ दिया है, नाकामी उसे तोड़ने लगी हैं, उसका संघर्ष लगातार बढ़ने लगा और आत्मविश्वास ने इस हद तक उसका साथ छोड़ दिया कि रात इतनी लंबी हो गयी है जिसकी सुबह की उम्मीद भी अब वह नही कर पा रहा है। ऐसे समय में ईश्वर के अस्तित्व की अवधारणा डूबते हुए इंसान के लिए तिनके की तरह होता है।

आस्था के सहारे खुद को दरिया में निढाल छोड़ देने के बाद वह ईश्वर की बेजान मूर्तियों में कहीं न कही अपनी उम्मीदें पा लेता है। वह अपने जीवन मे किये गए कर्मो को याद करता है, खुद को इस बात का यकीन दिलाता है कि उसने अपने जीवन मे इतने पाप नही किये कि ईश्वर उसे इस अंधेरे से निकाले ही न। वह धीरे धीरे ही सही, आत्मविश्वास से एक बार फिर भरने लगता है फिर भले ही ही वह न समझ पा रहा हो कि उसका विश्वास, ईश्वर पर दृढ़ हुआ है या कर्मो पर।यह बिल्कुल ऐसे ही है जैसे आपके तर्क जहाँ से शुरू होते हैं ईश्वर का अस्तित्व वही से खत्म होना शुरू हो जाता है और जब प्राकृतिक संरचनाओ की जटिलता को समझने में तर्क ख़त्म होने लगते है तो पुनः ईश्वर पर आस्था लौटने लगती है।

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Author: admin

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