मैं पहले बांग्लादेशी, फिर बंगाली और फिर मुसलमान हूँ।

1971 के पहले सिर्फ 9 महीने में पाकिस्तानी सेना और उनके रजाकारों द्वारा लगभग 4 लाख बंगाली औरतो का बलात्कार किया गया था और 30 लाख बंगालियों को मौत के घाट उतार दिया गया था। वो भी महज इसलिए कि बंगाली, उर्दू भाषा को अपनाने को तैयार नहीं हुए। एक मजहब, एक अल्ला, और एक खुदा, फिर इतनी दरिंदगी क्यों? ये सवाल पुछा जाना चाहिए खुदा के बन्दों से, पाकिस्तानी मुसलमानो से।

क्या भाषा के लिए? उन्हें बांग्ला पसंद थी तो बोलने देते, आप उर्दू बोल लेते। पर बात इतनी सरल नहीं थी । इस सवाल का असल जवाब 1947 से पहले की घटनाओ में कही छुप कर बैठा था।

1906 में ढाका में बनी आल इंडिया मुस्लिम लीग का 1913 में एक गुजराती ‘सेक्युलर’ मुसलमान सरबरा बन गया, और ब्रिटिश भारत के पूर्वी बंगाल की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी और उनके बगावती तेवर देख कर एक नए राष्ट्र का सपना देखने लगा। शुरुवाती सौदेबाजी में जब कांग्रेस उसके प्रस्ताव को अस्वीकार करती है तो सबसे पहले इन्ही बंगालियों को भड़का कर वह शख्स पूरे बंगाल को दंगे की आग में झोक देता है। फिर बंगाल से शुरू हो कर सीमाई और मध्य भारत में हो रहे खूनखराबे के बीच भारत का बटवारा हो गया।

बटवारे के बाद भारत से विस्थापित उत्तरप्रदेश के उर्दू बोलने मुसलमानो ने पाकिस्तान की सीमा के अंदर बोली जाने वाली सिंधी,पखश्तूनी, बलोच, पंजाबी, कश्मीरी जैसी तमाम भाषाओ कचरे के डिब्बे में डाल कर उत्तर प्रदेश की ‘बहुचर्चित’ उर्दू भाषा को न सिर्फ आधिकारिक और राष्ट्रीय भाषा बना दिया बल्कि खुद सरकारी महकमों के ऊँचे पदों में जम कर बैठ गए।

नए देश की खुशियों में डूबे सिंधी, पखश्तूनी, बलोच, पंजाबी जब तक जिन्ना के ‘जन्नत’ वाले सपनो से बाहर निकलते तब तक पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में पहले सत्ता और फिर भाषा के नाम पर आग लग गयी। भारत के बटवारे में सबसे पहले खून बहाने वाले बंगाली अब अपना ही खून बहता देख कर अचंभित थे। वो हैरान थे ‘क्या सचमुच हमने इन्ही उर्दू बोलने वाले मुसलमानो के लिए ही हिन्दुओ का खून बहाया था।’

दशकों तक पाकिस्तानी सेना की दरिंदगी के शिकार, इतनी बड़ी तादाद पर अपनों की लाशे और बहन बेटियों की इज्जत को तार तार होते हुए देख, डरे सहमे बांग्ला मुसलमान भारत की तरफ भागना शुरू किया और बड़ी सख्या में पश्चिम बंगाल में आ बसे। हालात से मजबूर इन मुसलमानो की भारत ने अपनी सीमा के अंदर न सिर्फ सुरक्षा और खातिरदारी की बल्कि पहले मुक्तिवाहिनी को मजबूत और फिर फौजी कार्यवाही करके ‘पूर्वी पाकिस्तान’ को ‘बांग्लादेश’ बना दिया। ये सचमुच सुखद अनुभव था भारत के लिए कि भारत के ‘एहसानो’ में लदा 1971 के उस ‘बांग्लादेश’ में हर ओर बस एक ही आवाज गूंजती – “मैं पहले बांग्लादेशी, फिर बंगाली और फिर मुसलमान हूँ।” फिर ये वक्त का कौन सा बहाव था कि एक तरफ दरिंदगी की हद तक दरिंदगी सहने वाले ‘बांग्ला मुसलमान’ चंद सालो में ही ‘बांग्ला हिन्दुओ’ के लिए खुद दरिंदा बन गये वही दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में कभी बेचारगी की हालात में शरणार्थी बन कर आये ‘बांग्ला मुसलमान’ कुछ ही सालो में खुद बादशाह कर यहाँ के ‘बांग्ला हिन्दुओ’ को उजाड़ना शुरू कर दिया।

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Author: admin

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