ये हारने का सिलसिला तभी से बस शुरू हुआ

मस्त था मदमस्त था बस काम में व्यस्त था ।

हार से अंजान और नादान सा में शख्स था ।

खड़ा था मै जिस जगह वो आखिरी पायदान था

बेपरवाह थे कदम मेरे , नज़र में आसमान था

जिद की मिसाल थी कि अपनों से लड़ गया ।

थाम कर नयी डगर , मै घर से निकल गया ।

समाज के वो चार लोग क्या क्या नहीं कहा ।

मुश्किल भरी है राह वो , जा रहे हो तुम जहां ।

किसी को सुने बिना मै जीतता चला गया ।

इक अलग लकीर को मै , खींचता चला गया ।

‘मैं क्या नहीं कर सकता ‘ जब से सुना है मैने

ये हारने का सिलसिला तभी से बस शुरू हुआ

आनंद

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Author: admin

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