राम के अस्तित्व पर भी खुलकर चर्चा करने वाला देश, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर चर्चा करने से क्यों भागता है?

निःसंदेह वह भारत की आजादी के आन्दोलन के शीर्ष प्रणेता थे, बड़े बड़े परिवर्तनों और सुधारो में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है मगर सीता की अग्नि परीक्षा के लिए राम पर उंगली उठाने वाले लोग भारत के बंटवारे समेत गांधी जी के कई अलोकप्रिय फैसलो पर चुप्पी कैसे साध सकते है?

उनके कई एकतरफ़ा फैसलों से क्षुब्ध एक हत्यारे ने उनकी हत्या कर दी, हम सब उस हत्या की निंदा करते हैं लेकिन हैरानी इस बात पर भी होनी चाहिए कि कोई इस बात पर चर्चा भी नही करना चाहता कि गांधी जी ने ऐसा क्या किया कि गोडसे ने उनकी हत्या करने का फैसला कर लिया? एक हत्या के दोषी, गोडसे को आतंकवादी बोलने से अगर आत्मा को तृप्ति मिलती है तो बोलना ही चाहिए, मग़र सवाल खुद से भी तो पूछिए कि आपने गांधी जी के लिए उन तमाम महापुरुषों को इतिहास के पन्नो में दफन क्यों कर दिया जिन्होंने गाँधी जी कि हत्या भी नही की थी।

आपने सावरकर पर बार बार सवाल उठाए, गालियां दी, कायर कहा, देशद्रोही बोला, सुभाष चन्द्र बोस को वॉर क्रिमिनल जैसे शब्दों से नवाजा, अम्बेडकर को सियासी रूप से विकलांग बना दिया, भगत सिंह और चंद्रशेखर को सरकारी दस्तावेजों में उग्रवादी और आतंकवादी तक लिख दिया मग़र किसी ने पलट कर आपको आतंकवादी घोषित करने की चेष्ठा नही की, जवाब में सिर्फ सावरकर का, सुभाष का, अम्बेडकर, भगतसिंह और चंद्रशेखर का पक्ष रखा।

गोडसे पर लिखने या बोलने वालो के खिलाफ मैंने कई बुद्धिजीवियों के लंबे लंबे पोस्ट पढ़े जिसमे वह गाँधी जी के साथ संवेदना न रखने वालों के लिए अपनी संवेदना जता रहे थे, हालांकि यह वह संवेदना नही थी जो वह आपसे गांधी जी के लिए उम्मीद करते हैं, यह तरस खाने वाली सम्वेदना थी। एक तरह से वह अच्छी भाषा मे गोडसे पर बहस करने की वकालत करने वालों को अज्ञानी और कट्टरवादी जानवर सिद्ध करने की कोशिश कर रहे होते हैं। इसलिए ऐसे मुद्दों पर लिखने की हिम्मत अक्सर मैं भी नही जुटा पाता। डरता हूँ, पता नही कौन नया नया इतिहासकार आकर दो चार पत्थर मुझ पर मारकर कर आगे निकल जाएगा और मैं आने घाव को अकेला लिए बैठा रहूँगा।

अपने लेखन के इतने समय के अनुभव के बाद एक बात पर पूरी तरह से सहमत हो चुका हूँ कि अगर मैं अपना जमीर मार सकता हूँ और बामपंथ के पक्ष तथा देश के खिलाफ (जो पढ़ने में ख़िलाफ़ न लगे) लिखने में अपनी कलम को साध सकता हूँ तो न तो मुझे फॉलो करने वालो की कमी रहेगी न ही बरखा और रविश जैसे बड़े हिमायतदारो की। और बात यही नही रुकेगी, ये लोग मेरी हर किताबो का रिव्यु भी फ्री ऑफ कॉस्ट करेगे जिससे उनकी विक्री भी बढ़ जाएगी।

आज मैं अपने उन रिश्तोदारो तक को पसंद नही आता जो परंपरागत इतिहास को पढ़ते आये है और उसमें एक भी शब्द और वाक्य को इधर उधर करके नही देखना चाहते। हालांकि ये लोग सिर्फ इतिहास के कारण ही नही खफा है मुझसे। इमसें राजनीतिक पसंद न पसंद का लफड़ा भी है। मैंने अभी कुछ समय पूर्व एक tv सीरियल लिखने के मौक़े को भी अपनी इसी विचारधारा की वजह से खो चुका हूँ। पता नही क्यों, मुझसे अपनी विचारधारा नही बदली जाती, वरना यकीन मानिए, देश के ख़िलाफ़ लिखी गयी मेरी एक पोस्ट पर बवाल होने की देरी होगी कि अगले ही दिन मैं आपको लल्लनटॉप, द वायर या ndtv जैसों के स्टूडियो में कही बैठा मिलूँगा।

राजदीप जैसे लोग मुझे पुचकार रहे होगें।इस देश में लेखन, पत्रकारिता और शोध (Ph. D) जैसे क्षेत्रों को घुसने और रोजीरोटी जुटाने के लिए पहली शर्त है कि आप देश के खिलाफ ‘लेकिन खिलाफ न लगने वाली भाषा’ लिख या बोल सकते हैं या नही। क्योंकि देश भक्ति वाली विचारधारा को सरकार फण्ड करने से रही और विदेशियों को इससे फायदा क्या जो आपको लाखो करोडो डॉलर मुफ्त में दें। देश को ख़िलाफ़ या उनके पक्ष में लिखो तो भी बात कुछ बने।

-राजेश आनंद

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Author: admin

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