राष्ट्रपति शासन या बंगाल विभाजन? क्या है मोदी का प्लान?

पश्चिम बंगाल के चुनाव अभी खत्म ही हुए थे, बंगाल अपने पूर्ववर्ती स्वभाव के अनुरूप एकाएक हिंसक हो उठा। सत्ता की हनक ने एक लोकतांत्रिक सरकार को तानाशाह की तरह व्यवहार करने के लिए मजबूर कर दिया। हालात इस हद तक बिगड़ गए कि ये समझना मुश्किल हो गया कि बंगाल की भूमि में धार्मिक युद्ध छिड़ गया है या राजनीतिक? वहाँ हिन्दुओ के लिए जीना दूभर हो रहा है या विपक्षी राजनीतिक पार्टी, कार्यकर्ता और वोटर के लिए? कारण कुछ भी रहा हूँ, पीड़ित कोई भी हों मगर सच ये है कि रातोरात लाखों लोगों को जिसमे मुख्यतः दलित हिन्दू थे, को बंगाल छोड़ कर असम या आसपास के दूसरे राज्यों में शरण लेनी पड़ गयी।

बंगाल ने भाजपा पर अपना विश्वास दिखाया, जिसके चलते 3 सीट वाली भाजपा, बंगाल की मुख्य विपक्षी पार्टी बनी मग़र चुनाव के तुरंत बाद उसने अपने कार्यकर्ताओं और वोटरों को उनके हाल पर जिस तरह से बेसहारा छोड़ दिया था, ऐसे में भाजपा उस अपरिपक्व व्यक्ति की तरह दिखने लगी जिसने अपने उस घर को खुद ही लुटने के लिए छोड़ दिया हो जिसे सालों के परिश्रम के बाद उसने बनाया था।

पूरे देश मे भाजपा की आलोचना हुई, मोदी और शाह को कायर कहा गया और मजे की बात ये है कि सुर भले ही बहुत तेज न रहें हो मगर कहने वाले ज्यादातर उनके अपने समर्थक थे जो शीर्ष नेतृत्व की संवेदनहीनता से दुखी थे। अगर राज्यपाल को भाजपा का एजेंट मान लिया जाए जैसे ममता बनर्जी आरोप लगाती हैं तो उस बुरे दौर में भाजपा की तरफ से अकेले वही व्यक्ति थे जिन्होंने राज्य भर में कई दौरे किये, पीड़ितों से मिले, उन्हें सांत्वना दी लेकिन वह पर्याप्त नही था क्योकि आज के समय बंगाल के हालात इतने बुरे है जिन्हें कुछ दौरों य सांत्वनाओ से ठीक नही किया जा सकता, परिणामस्वरूप मांग ‘राष्ट्रपति शासन’ की उठी और देश भर से हिंदूवादी संगठन, राष्ट्रवादी और भाजपा के समर्थकों की तरफ से उम्मीद जताई जा रही है कि आज नही तो कल बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या मोदी या अमित शाह ऐसा फैसला लेंगे? और अगर उन्होंने दबाव में आकर ऐसे फैसला ले भी लिया तो क्या इसे कोर्ट में उनका ये फैसला टिक पायेगा?

मोदी का इतिहास बताता है कि वह एक मंझे हुए राजनेता है और उन्होंने शायद ही कभी ऐसे फैसले लिए हों जिन फैसलों को कोर्ट में चुनौती दी जा सके या दूसरे कारणों उन्हें वापस लेना पड़ा हो। यद्यपि उनकी इसी आदत की वजह से विरोधियों के बीच उन्हें अहंकारी या असंवेदनशील व्यक्ति की तरह देखा जाता है, मग़र प्रशंसको के बीच वह अपनी इसी छवि की वजह से एक मजबूत नेता की तरह देखें जाते है।

पिछले सात साल के शासन काल मे मोदी ने कई बड़े फैसले किये, कई चुनौतियों को स्वीकार किया और लंबित मसलों का स्थायी समाधान निकाला जिसमे सबसे बड़ा मसला था जम्मू कश्मीर में बढ़ता अलगाववाद, राजनीतिक अस्थिरता व जनता में भारत के प्रति अविश्वास। अगर 5 अगस्त 2019 से पहले के जम्मू कश्मीर से आज के बंगाल की तुलना करें तो उसमें बहुत अंतर नही मिलेगा, शिवाय इसके कि आज का बंगाल कश्मीर से 30 साल पीछे है। 80 के दशक का कश्मीर, अपने ही लोगों, जिन्हें दुनिया विशेषतः कश्मीरी पंडित के नाम से जानती हैं, पर सत्ता के संरक्षण में वही कर रहा था जो आज बंगाल, एक विशेष विचारधारा के बंगाली हिन्दुओ पर कर रहा है।

अब अगर मूल मुद्दे पर लौटे तो सवाल ये हैं कि क्या मोदी या शाह पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाएंगे? या इसका हल भी वैसे ही निकाला जाएगा जैसे जम्मू कश्मीर का हल निकाला गया था? अगर मोदी और शाह के विवेक और तौर तरीके से सोचा जाए तो राष्ट्रपति शासन, बंगाल में पैर जमा चुके कट्टरवाद या अलगाववाद का स्थायी समाधान नही है, क्योंकि कुछ समय बाद दोबारा चुनाव करवाना ही होगा, और ऐसे में बहुत संभावना है कि वहाँ दोबारा ममता बनर्जी चुनाव जीत जाएगी।

कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन में सालों से पैर जमा चुके कट्टरवाद को इतनी आसानी से न तो उखाड़ा जा सकेगा और न ही लोगों के मन से कट्टरपंथियों का डर मिटाया जा सकता है कि वह निडर होकर अपनी इच्छानुसार वोट कर सकें अतः देखा जाए तो अंत मे एक ही रास्ता बचता है जो केंद्र का विषेशाधिकार है और जिसे कोर्ट पर चुनौती नही दी जा सकती है और वह है राज्य का बंटवारा।

अगर ऐसा होता है तो संभवतः भविष्य में पश्चिम बंगाल नाम का कोई राज्य न बचे। बहुत संभावना है कि वर्तमान राज्य का सीमाई हिस्सा बिहार, उड़ीसा और असम में मिला दिया जाए और शेष कट्टरपंथी बहुल या संवेदनशील क्षेत्र को केंद्र शासित राज्य बना दिया जाए जिस पर सीधे केंद्र अपना नियंत्रण रख सके।

– राजेश आनंद

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Author: admin

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