रेलवे की एक हिस्से को निजीकरण के फ़ैसले से आलोचक क्यों चिंतित है

रेलवे की एक हिस्से को निजीकरण करने के फ़ैसले के आलोचक क्या सचमुच जनता के लिए चिंतित है या उसके कर्मचारियों के लिए? या फिर यह उनकी राजनीतिक प्रतिशोध की व्याकुलता है।भारत मे लोग वर्तमान में इतने उलझे हुए हैं कि उन्हें भविष्य के बारे में सोचने का वक्त नही मिलता इसलिए चलिए आपको अतीत के कुछ यादो की सैर कराता हूँ। तब शायद आप बात को बेहतर तरीके से समझ पाए।किसी को BSNL का वह दौर याद है जब टेलीफोन के सैक्टर में उसका एकाधिकार था। उस वक्त अगर आपका फ़ोन खराब हो जाये, आपको नया कनेक्शन चाहिए या कनेक्शन कटवाना हो और आप BSNL के दफ्तर पहुचे तो वहाँ के कर्मचारियों का व्यवहार कैसा था? क्या आपको वह सर्विस मिलती थी जो आज प्राइवेट कंपनियों से मिलती है? यही हाल सरकारी हॉस्पिटल, बस सेवा और रेलवे का है। कर्मचारी आप से सीधे मुंह बात भी नही करता। और एक बात बताइये, आफिस के चक्कर काटने वाले, बात बात पर अपमानित होने वाले ये लोग कौन है? पूँजीपति? सरकारी कर्मचारी या आप और मैं? मैं अपनी कमाई में से टैक्स भरता हूँ, किसलिए? कि दफ्तर के अंदर बैठा वह कर्मचारी जिसे सरकार ने मेरी सेवा के लिए रखा हुआ है वह मेरी सेवा के बजाय मेरा अपमान करें… मुझे रोज रोज चक्कर कटवाए? सच ये है कि वह खुद को मेरा भाग्यविधाता समझता है। अब जरा थोड़ा ठहरिए और सोचिए… अगर उस कर्मचारी के पास जाने की बजाए मेरा काम थोड़ा महंगा ही सही कहीं और हो जाये और बोनस में खातिरदारी ऊपर से हो तो क्या मैं उस सरकारी कर्मचार के पास दोबारा जाना चाहूंगा? मुझे नही लगता कि इसमें कोई रॉकेट साइंस है, ये साधारण सी बात कोई भी समझ सकता है फिर ये बात सरकारी कर्मचारी को क्यो समझ नही आती? और अगर आती है तो मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने वाला वह कर्मचारी क्या खुद अपने भविष्य के बारे में चिंतित है? वह क्यों नही समझता कि रोगी है इसलिए डॉक्टर है। शिक्षार्थी हैं इसलिए शिक्षक है। यात्री है इसलिए रेलवे है ऐसे ही मैं उसकी सेवा लेता हूँ इसलिए उसकी नौकरी है… लेकिन सरकारी व्यवस्थाओ में बैठा उस कर्मी को कभी एहसास ही नही होता कि विकल्प होने की स्थिति में मैं उसकी सेवा लेने से मना कर सकता हूँ इसलिये वह इस बात को लेकर पूरी तरह आस्वस्त है कि वह ऐसा सरकारी दामाद है जिसे खुद भगवान भी तब तक नही हटा सकता जब तक कि वह बुड्ढा होकर रिटायर नही ही जाता।दर दर भटकने के बाद जनता का एक बड़ा हिस्सा अपमान और तिरस्कार को सरकारी सिस्टम का हिस्सा या अपनी किस्मत समझ कर घर मे बैठ जाता है और फिर कुछ ही लोग बचते हैं जो आवाज उठाना शुरू करते हैं। समय के साथ इस आवाज का जब शोर बढ़ता है तो सरकारे नींद से जागती है और सिस्टम को ठीक करने… सर्विस को बेहतर बनाने के लिए सरकारी कर्मचारियों से अपने रवैय्ये में बदलाव करने के लिए कहती है मगर बार बार कहने के बाद भी जब जनता की शिकायते कम नही होती तो जनता के लिए समर्पित सरकार के पास कौन सा कदम उठाने के लिए बचता है? क्या यह नही कि उन्हें नौकरी से निकाल दे या उसके समानांतर निजी क्षेत्र को आगे आने के लिए कहे ताकि प्रतिस्पर्धा बढ़े और आम जनता को वह सर्विस मिल सके जिसके लिए वह अपनी जेब ढीली कर रहा है। अगर सरकार कर्मचारी को निकालती है तो इसकी कोई गारंटी नही है कि उसकी जगह पर आने वाला दूसरा कर्मचारी बेहतर सेवा दे… परिणाम स्वरूप ये होता है कि सरकारे नए विकल्प की ओर सोचना शुरू कर देती हैं जो सरकार की आर्थिक नीति, रोजगार, और बेहतर सेवा तीनो क्षेत्रो पर लाभकारी हो। टेलीकॉम, बैंकिंग, डाक समेत ऐसे तमाम सेक्टर हैं जहाँ प्राइवेट सेक्टरों ने जनता को बेहतर सेवाएं बेहतरीन दामों में दिया है। और साहब याद रखने वाली बात ये है कि मुट्ठीभर सरकारी कर्मचारी सम्पूर्ण जनता नही है। जनता वह है जिन्हें ये लोग फिरकी की तरह हर उस सर्विस के लिए नचाते हैं जहाँ पर जनता के पास दूसरा और विकल्प नही होता। इसीलिए मैं पूरी शिद्दत से मानता हूँ कि कुछ सकारात्मक अंकुश के साथ अभी और कई सेक्टर में सरकार को निजी क्षेत्र के लिए दरवाजा खोलने की जरूरत है क्योंकि सही मायने में सरकारे वही होती हैं जो कर्मचारियों से ज्यादा जनता के हितों को ध्यान रखे।

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Author: admin

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