हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप क्या है? मुझे न उसमें कोई रुचि है और न ही कोई आपत्ति।

हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप क्या है लोग समझने की कोशिश करते रहे लेकिन मुझे न उसमें कोई रुचि है और न ही कोई आपत्ति। मैं धर्म को जीने की पद्धति से ज्यादा सुरक्षा का कारण मानता हूँ। मेरी आपत्ति बस इतनी ही कि कुछ तथाकथित ज्ञानी और परम जातिवादी लोग अपनी जाति औऱ संख्याबल पर घमंड करते है मग़र विरोधाभाष ये है कि यही लोग खुद को हिन्दुओ से अलग दिखाकर अपने संख्याबल को निरर्थक बना देते है।क्या आप इस सत्य को समझ पाते है कि हिन्दू विरोधी मानसिकता इन तथाकथित जातिवादियों में आ नही रही है बल्कि देश के दुश्मनों द्वारा लायी जा रही है और इसके पीछे वो लोग है जिन्होंने 40 के दशक में मुस्लिम दलित एकता की बात पर जोर दिया था और जो सफल भी रहा। जिन्नाह ने पाकिस्तान ले लिया लेकिन दलितों को क्या मिला? आप मे से कितने लोग मंडल को जानते है? नही जानते तो चलिए मैं बताता हूँ… पाकिस्तान का पहला कानून मंत्री जिसने अविभाजित भारत मे अम्बेडर के विरोध के वावजूद जिन्नाह के पक्ष में दलितों को संगठित किया, पाकिस्तान की मांग और उसका समर्थन किया मगर पाकिस्तान के बनने के कुछ ही वर्षो में मंडल को अपनी जान बचाकर पाकिस्तान से भागना पड़ा। किसी समाज को जीतना मुश्किल है तो उसे टुकड़ो में तोड़ दो और ये कोई नया फार्मूला नही है जिसे दलित, पिछड़े या सवर्ण समझते नही है। दरअसल समाज को तोड़ने के तरीके बदले जाते है जिसे नई पीढ़िया इतिहास से भी नही सीख पाती। इन्हें लगता है कि वह तो अपने हक के लिए लड़ रहे है जो कई बार सत्य भी होता है लेकिन जुबानी बहस, विरोध और धरनों की लडाई में अचानक पत्थर किसने फेंक दिया जो खून खराबा का कारण बन गया? बस ये मासूम लोग उस पत्थर फेंकने वाले पर या तो ध्यान नही देते या उसे अपना हमदर्द समझ लेते है। इसका उत्तम उदाहरण समझना है तो तथाकथित भीम आर्मी के जुलूसों में सामिल पत्थरबाजो के धर्म और जाति का अध्ययन कीजिये।सत्ता के बिना आप अपनी बर्बादी की आलोचना तो कर सकते है लेकिन उसे रोक नही सकते। हिन्दुओ के वोट पर नज़र गड़ाए बैठी भाजपा वैचारिक रूप से हिन्दुओ के करीब है और सत्ता को पाने या उसमे बने रहने के लिए हिन्दू वोटों पर निर्भर है इसलिए वह हर हाल में हिन्दू एकता और राष्ट्रवाद की बात करती है। एक नए पाकिस्तान का ख्वाब देखने वाले पर्दे के पीछे बैठे कुछ मुट्ठी भर लोग, भाजपा को रोकने के लिए उभरते हुए जातिवादी नेताओ को आर्थिक, मानसिक और जन के रूप मे मदद देकर उन्हें मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। वह किसी भी कीमत में हिन्दू या राष्ट्रवादी लोगो में एकता नही होने देना चाहते। वह दलितों के घाव को जहाँ एक ओर सूखने नही देना चाहते तो वही दूसरी ओर अब विभाजनकारी नेताओ के सहारे पिछड़ो पर भी छुप कर तीर चला रहे है। उन्हें उन मुद्दों में उलझाते जा रहें जिनका असल मे महत्व ही नही है। आपको कभी ब्राह्मण के प्रति भड़काएँगे तो कभी हिन्दू धर्म के खिलाफ। वह अपने त्वरित हितों के लिए अपने भविष्य को नही देख पा रहें है। क्योंकि दुश्मन अभी उनसे दूर है और इसलिए अभी उनको अपने पड़ोसी से बेहतर घर और बाइक लेनी है। हालांकि संभव है कि उनके कुछ मुद्दे महत्व रखते हो मगर चिंता की बात ये है कि उनके लिए अविभाजित भारत महत्वपूर्ण नही है जिसके लिए उनकी पिछली पीढयों ने बलिदान दिया… उनके मन में उस जमीन की सुरक्षा के लिए कोई चिंता नही है जो भविष्य में भी उनकी कई पीढ़ियों का लालन पालन और भरण पोषण करेगी।मैं पूजा पद्धति… खास कर पाखंड और कर्मकांड पर भरोसा नही करता, मंदिरो और देवस्थानों पर कभी नही जाता परंतु हिंदुत्व या हिन्दू एकता की पैरवी करता हूँ… जिसका मतलब ये नही है कि मुझे मुसलमानों से बैर है। वो मेरे भाई है लेकिन क्योकि उनकी विचारधारा उन सरकारों को समर्पित है जिन्हें मैं विभाजन का जनक मानता हूँ, इसलिए मैं विचारधारा के स्तर पर खुद को उनमे सामिल नही कर पाता लेकिन जिन्होंने मेरी विचारधारा या राष्ट्रवाद को समर्थन दिया है मैं उनमे से एक हो जाता हूँ। मेरा अपना मत है कि हिंदुत्व मेरी पूजा पद्धति हो या न हो मगर वह मेरी सुरक्षा का आधार है। अपने हितों को समाज के हितों से ऊपर रखने की जिद, दूसरो की पूजा पद्धति के प्रति नफरत का अंगार, कतरो में विखरी हुई विचारधाराएं और टुकड़ो में बंटा हुआ समाज लंबे समय तक सुरक्षित भी नही रह पाता। और यही कारण है कि अपनी जातियों के हितों में जुड़े लोग उन हैवानो के लिए सिर्फ बकरे हैं जिन्हें अभी पाला पोसा और पुचकारा जा रहा है। वक़्त आएगा तो इन्हें काटने में वक्त नही लगेगा। और हाँ जातियों का उत्थान कैसे किया जाता है ये सीखना हो अम्बेडकर से सीखिए मंडल से नही। क्योकि आज कल हर तरफ मंडल घूम रहे है जिन्होंने चेहरे पर अम्बेडकर का मास्क पहना हुआ है।

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Author: admin

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