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कल रात जब दिल्ली के एक बड़े पत्रकार का मेरे पास फोन आया…

कल रात लगभग 11.35 पर दिल्ली के एक बड़े tv पत्रकार का मेरे पास फोन आया, और फ़ोन उठाते ही भड़क उठे, बोले “आनंद जी मुझे आप से ऐसी उम्मीद नही थी।”

मैं हैरान था कि ऐसा क्या कर दिया मैंने? मैं कुछ पलों के लिए सहमा, सांस लौटी तो पूछा -“सर ऐसा क्या कर दिया मैंने?” तो कहने लगे मैंने एक महाशय की पोस्ट में गांधी जी के बारे में आपका कमेंट पढ़ा। जिसमे आपने लिखा था कि आप गांधी को राष्ट्रपिता नही मानते। क्या सचमुच आपके अब भी यही विचार है?

“नही सर मेरा वह आशय नही था।” मैंने दबे आवाज में उत्तर दिया -“दरअसल पोस्ट लिखने वाले के शब्दों की बेअदबी के प्रत्युत्तर में मैंने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।”

“अच्छा, लेकिन इसका मतलब ये तो नही कि आप राष्ट्रपिता को सम्मान देने की बजाय नाथूराम को सम्मान दे।”

सच कहूँ मुझे उनका यह आरोप अच्छा नही लगा मग़र मैंने उनसे कोई बहस करने की बजाय अपनी सफ़ाई में बस इतना ही कहा -“सर, मैंने नाथूराम के द्वारा की गई हत्या का आज तक कभी अपने किसी वक्तव्य या लेख के जरिये बचाव नही किया। कम से कम आप मुझ पर ऐसे आरोप मत लगाइये। हाँ अगर आप ने कभी मेरे किसी लेख में ऐसा पढ़ा या मौखिक रूप से सुना हो तो बताइए।” मेरी इस बात पर वह हँस पड़े, बोले -“आनंद साहब आप लेखक है और मैं पत्रकार हूँ, हम दोनों शब्दो के दूसरी तरफ उन शब्दों को भी पढ़ लेते है जिन्हें लेखक नही लिखता। इसलिये आप कम से कम मुझसे मत छुपाइये। मैंने आपको फ़ोन ही इसलिए किया था कि मैं आज आपका मुद्दा समझू तो सही।”

“सर यकीन मानिए मेरा इस बारे में कोई छुपा मुद्दा नही है।” मैंने हँसने की कोशिश की -“हर मुद्दे पर मेरे अपने विचार है जिन्हें मैं खुल कर रखता हूँ। रही बात नाथूराम की तो उसने जो भी किया उसकी सजा उसे कानून ने दे दी है मगर मेरा गुस्सा उनके लिए है जिन पर कभी जुर्म तय ही नही किये है।”

“मतलब?” उन्होंने पूछा।

“मतलब ये सर…।” मेरे स्वर में अचानक थोड़ी तल्खी आ गई -“बंटवारा क्यो हुआ इस पर अगर मैं बात न भी करूँ तो क्या कोई मुझे इस बात पर संतुष्ट कर सकता है कि बटवारे के बाद सत्ता तो सत्ताधीशो ने लेली मग़र बंटवारे में जो लाखो लोग मारे गये… हजारो औरतो का बलात्कार हुआ… कितने बच्चे अनाथ हो गए, इसके बाद भी क्या इन सत्ताधीशो मे से किसी पर भी इस त्रासदी की जिम्मेदारी तय की गयी… और अगर ऐसा नही हुआ तो आप ही बताइये सर… मैं गांधी जी के लिए कैसे विचार रखू जिन्होंने खुलकर कहा था कि बटवारा होगा तो मेरी लाश पर होगा? फिर बंटवारा भी हुआ और गांधी जी जिंदा भी रहे? इसलिए मैं गांधी जी के कई फैसलो का आलोचक रहा हूँ, और वैसे भी सर गांधी जी के फैसलों पर सवाल उठाना नाथूराम का समर्थन करना नही होता।” अमूमन वह सामने को वाले की बात पूरी करने का मौका कम ही देते है मग़र पता नही क्यों, उन्होंने मुझे पूरी खामोसी से मुझे सुना। मैंने बोलना बंद किया तो पुचकारते हुए बोले -“आनंद जी एक बात कहूँ…?”

“जी सर।” मैंने पूरी अदब से कहा।

“हम लोग जितनी आसानी से सियासत के फैसलों पर सवाल खड़ा कर देते है दरअसल वह फैसले उतने आसान होते नही। मैं जानता हूँ तुम्हे इतिहास पर रुचि है और तुमने उस दौर के बवंडर को पढ़ा भी होगा । कई बार हालात इतने बिगड़ जाते है कि उसे सम्भलना सवाल करने वाले कि समझ से भी कई गुना जटिल होते है। और बटवारे की जटिलता भी कुछ ऐसी ही थी।”

“मैं इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ सर।” मैंने उनकी बात पर सहमति जताते हुए कहा -“लेकिन यही सवाल तो मेरा भी है कि नाथूराम के मुद्दे पर हम अपना नजरिया बदल क्यों लेते हैं? उसने गांधी जी की हत्या की…वह हत्यारा था मग़र उसके भी तो अपने तर्क रहें होंगे, वह गलत हो या सही ये बहस का मुद्दा है मग़र खुद को लिबरल कहने वाला ये समाज उस पर बहस तो छोड़िए…उसके पक्ष को सुनना तक नही चाहता।”

“नही ऐसा नही है। आजकल तो हर मुद्दे पर बहस होती है।”

“सचमुच?” मैंने सवाल किया तो कहने लगे अभी कुछ काम निकल आया है मैं आपसे बाद में बात करता हूँ।

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