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ये जो तेरा शहर है… बहुत मग़रूर है! मेरा शहर तो यूँ ही बदनाम था! -आनंद

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हौसला नहीं था मुझमे खुलकर जलने का

हौसला नहीं था मुझमे खुलकर जलने का इसलिए राख बन कर सुलगना पड़ा। बच कर निकलना मुश्किल था दुश्मनो से,इसलिए रौंद कर उन्हें आगे बढ़ना…

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ऊंगलियां झुलस गयी ज़ो पोछा तेरी आँखों का पानी,

ऊंगलियां झुलस गयी ज़ो पोछा तेरी आँखों का पानी, ऐसे खुदगर्ज निकले तेरे आंशू भी तेरी नीयत की तरह. -आनन्द

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मेरी कामयाबिया भी ज़रा ठहरने लगी हैं !

बड़ी लम्बी रात थी जो अब गुजरने लगी है ! मेरी कामयाबिया भी ज़रा ठहरने लगी हैं ! सूरज फिर चढने लगा है आसमाँ की…

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कटी पतंग का गम

चलो एक बार फिर बिखरे साहस को समेटा जाय। कटी पतंग का गम छोड़ अब मांझे को लपेटा जाय। -आनंद

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ठुकराया हमने भी बहुतों को हैं तेरी खातिर

ठुकराया हमने भी बहुतों को हैं तेरी खातिर, तुझ से फासला भी शायद उन की बद-दुआओं का असर हैं…

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पुराना दर्द

पुराना दर्द अभी थमा भी न था की दिल एक दर्द फिर सह रहा है। बिखरी है मुस्कराहट मेरे होठो पर सो खुश हु मै, नादान…

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जुर्रत

पास आने की जुर्रत भी होनी चाहिए किसी मिशाल के तौर पर। कब तक चलता रहेगा , यूँ सिलसिला-ए- अजनवी।

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दौलत

खूब दौलत बनाई है हमने अपने हुनर-ए-जूनून से। फिर भी खड़े है दूर कितने , आज भी सकून से।

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जमाना

जमाना क्या जाने किस तरह जिंदगी गुजरते है हम। जरा सी ख़ुशी को कहाँ – कहाँ तलाशते है हम।

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