मेरी अर्द्धांगिनी, उसकी प्रेमिका

‘‘तुम्हे कैसी लड़कियाँ पसन्द है?’’ कालेज की कैन्टीन में अपने एक खास मित्र के साथ मैं बैठा हुआ था। मेरे मन में सवाल उठा। मैंने पूछ लिया।

सवाल उसके कानों से टकराया तो जैसे किसी ने उसे हैरानी से लबालब भरे हुए समुदर में फेंक दिया गया हो। वह कुछ देर तक मेरी ओर एकटक देखता रहा। शायद उसे अपने कानो पर यकीन नही हो पा रहा था। उसने अपने कान में ऊंगली डाली, तेजी से हिलाया फिर मेरी ओर झुकते हुए वेसब्र अंदाज में बोला –“क…क्या कहा तुमने? फिर से कहो।’’

‘‘तुमने सुना नही या…?’’ मुझे उसके इस अंदाज पर हॅसी आ गयी।

‘‘सुन तो लिया है मगर…?’’।’’ उसने मेरी आँखों में देखा।

‘‘मगर?’’ मेरी भौंहे चढ़ गयी।

‘‘जो सुना उस पर विश्वास नहीं हो पा रहा है।’’      

‘‘क्यों… मैने कोई गलत सवाल कर दिया?’’

’’अरे नहीं यार।’’ उसने मेरे हाँ थों को अपनी खुरदुरी हॅथेलियों में भर लिया -‘‘तुमने गलत तो कुछ नहीं कहा, परन्तु जो भी कहा वह सब तुम्हारे मुँह से सुनने के लिए मेरे कान तरस गये थे। सच कहॅू तो कई बार मुझे ऐसा भी लगा कि जैसे मैंने किसी अधेड़ से दोस्ती कर ली है।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि लड़कियों के बारे में छोड़कर तुम दुनिया के हर मुद्दे पर बात कर सकते हों। मसलन अमेरिका ने हिरोसिमा में परमाणु बम क्यों गिराया? हमारी गैलेक्सी में कौन सा तारा उसके केन्द्र से कितनी दूर है? वगैरह वगैरह।

‘‘अच्छा।’’

‘‘जी…।’’ वह धीरे से मुस्कुराया -‘‘मगर कोई नही मेरे दोस्त! इतने दिनो बाद ही सही, आज पहली बार तुम्हारे मुँह से लड़कियों का जिक्र सुनकर अच्छा लगा। अच्छा लगा कि मेरा यार लड़कियों के बारे में भी सोचता है।’’

मैं उसकी हैरानी को समझ सकता था। उसे मुझसे इस तरह के सवालो की उम्मीद नहीं थी, कम से कम मेरे पिछले कुछ सालो के बर्ताव को देख कर तो बिल्कुल नही। मैं अपनी सोच और संजीदगी की वजह से जिन्दगी के उस इक्कीस की उम्र में भी उसके सहित अपने तमाम दोस्तो के लिए एक अधेड़ उम्र की सोच रखने वाला उबाऊ इंसान था जिसे लड़कियों मे कुछ खास दिलचस्पी नही थी, जबकि व्यक्तिगत तौर पर मैं ऐसा नही था। मुझे दिलचस्पी थी मगर किसी लड़की के व्यक्तिगत जीवन, भावनाये और उसके निजी संबन्धों को मैं अपने दोस्तो के बीच बैठकर उपहास या चर्चा का विषय मुझे पसन्द नही था।

वह चंद पलों तक एकटक मेरी ओर देखता रहा।

‘‘संजू।’’ मैंने उसे आवाज दी। हालाकि उसका नाम संजय था मगर मैं उसे इसी नाम से पुकारता था। मैंने अपने सवाल को स्पष्ट करते हुए पूँछा -‘‘क्या गाँव की लड़कियाँ?’’

गाँव का नाम सुना तो वह घृणा से उछल पड़ा। मेरी ओर झुकते हुए बोला -‘‘क्या बकते हो यार? मैं मोटे मोटे चादर में ऊपर से नीचे तक लिपटी उन जिन्दा मूर्तियों को पसन्द करूँ गा? अल्हड़ बेवकूफ लड़कियाँ ।’’ उसने अपने आखिरी शब्दों में मेरे सामने अपनी सारी नफरत उलेड़कर रख दी।

उसकी इस प्रतिक्रिया में मुझे हॅसी आ गयी। हाँ लाकि मेरे लिए यह अस्वाभाविक नही था मगर उसका अंदाज ही कुछ ऐसा था कि मैं हॅसने से खुद को रोक नही पाया।

‘‘मैं बताऊ मुझे कैसी लड़कियाँ पसन्द है?’’ चुटकी बजाते हुए वह मेरी ओर झुका। उसकी आँखों मे एकाएक चमक आ गयी।

‘‘कैसी?’’ मेरे शब्दों मे भी अथाह उत्सुकता थी।

‘‘बडे़ बाप की बिगड़ी बेटियाँ ।’’

‘‘ओह… सचमुच!’’ मैं ठहाके मार कर हँस पड़ा -‘‘अच्छी पसन्द है तुम्हारी।’’

‘‘और क्या?’’ वह मुस्करा पड़ा।

अचानक मेरी निगाहें आसपास की मेज मे बैठे लोगो पर गयी तो मैं सहम गया। उनमे से ज्यादातर लोग हमें घूर रहे थे। शायद मेरी हॅसी ने उन्हें परेशान कर दिया था। मैंने अपनी नजरों को देर तक उन पर ठहरने नही दिया। संजू की ओर देखते हुए धीरे से पूँछा -‘‘और उनमें खासियत क्या होती है?’’

‘‘खासियत? उनमें?’’ कमलगट्टे की तरह उसकी आँ खे फैल गयी।

‘‘भइया, समोसे के लिए लाल चटनी नही है।’’ एकाएक कैन्टीन मे वेटर का काम करने वाला छोटू हमारी मेज के पास आकर खड़ा हो गया -‘‘समोसे के साथ हरी चटनी लगा दूँ?’’ उसने पूँछा।

‘‘हरी चटनी!’’ संजय के आँखों की चमक एकाएक गायब हो गयी। उसने छोटू की ओर घूर कर देखा और फिर डपटते हुए बोला -‘‘तुम जानते हो न कि लाल चटनी मुझे कितनी पसन्द है? जाकर लाल चटनी लेकर आओ, वरना समझो कि समोसे का आर्डर कैंसिल।’’

‘‘भइया।’’ छोटू ने लाचारी भरी नजरों से मेरी ओर देखा।

‘‘छोटू, तुम हरी चटनी ही ले आओ।’’ मैंने छोटू को हल्के हाँथसे धकेलते हुए कहा। चटनी की ऊहापोही मे मैं उस माहौल को बिगाड़ना नही चाहता था -‘‘संजू हरी चटनी के साथ समोसे खा लेगा। क्यों संजू?’’

‘‘क्या बकते हो यार। मुझे हरी चटनी खाते हुए तुमने कब देखा?’’ संजय ने मेरी ओर घूर कर देखा -‘‘तुम तो मुझे बहुत अच्छे से जानते हो। रहम खाओ मुझ पर।’’

‘‘तुम कुछ कह रहे थे?’’ मैं उसे देर तक चटनी पर केन्द्रित नही रहने देना चाहता था।

‘‘क्या?’’ उसने मुझे ऐसे देखा जैसे उसे पता ही न हो कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूँ ।

‘‘लड़कियों की खासियत के बारे मे?’’ मैंने कहा।

‘‘खासियत? ओह हाँ!’’ अचानक उसका चेहरा खिल उठा। लगभग मेरे कानो तक झुकते हुए बोला -‘‘उनके तंग कपड़ों से झाकते उभार, अधनंगी कमर, जाँघ तक खुली टाँगें तुम्हे नहीं लुभाती?’’

‘‘ओह तो तुम इसलिए पसन्द करते हो उन्हे?’’

‘‘क्यों… तुम्हे नही पसन्द?’’

‘‘बिल्कुल नहीं।’’ एकाएक चेहरा सख्त पड़ गया -‘‘मैं ऐसी लड़कियों को बिल्कुल नही पसन्द करता जो ऐसा सिर्फ इसलिए करती है कि वह आधुनिक नजर आये।’’

‘‘यार इसमे बुराई ही क्या है अगर छोटे कपड़ों में वह आधुनिक नजर आती है तो?’’

‘‘आधुनिकता छोटे कपड़ो मे नही, सोच मे होती है।’’

‘‘यार अब तुम ऐसे रंगीन मुद्दो पर भी अपनी बीसवीं शदी वाली फिलासफी मत घुसेड़ो।’’ वह नाक सिकोड़ते हुए मेरी ओर देखा -‘‘तुम उनके जैसे वाले आधुनिक नही बन सकते तो कम से कम उन्हे अपने जैसे वाला आधुनिक मत बनाओ। यह उम्र, जीवन मे एक बार ही मिलती है, उन्हे इसका मजा लेने दो… और उनका हमें।’’

‘‘भइया जी… आपके समोसे।’’ कैन्टीन में काम करने वाला छोटू एकाएक समोसे की दो प्लेट लाकर मेज पर रख दी। मैंने मुस्कुरा कर उसकी ओर देखा मगर नजरें छलांग लगाती हुई एक बार फिर संजय के चेहरे पर आ टिकी।

‘‘संजू मैं फिलासफी नही घुसेड़ रहा, बस अपना पक्ष रख रहा हॅू। और तुम्हे क्या लगता है कि जिन कपड़ो मे मैं दूसरी लड़कियो को देखना पसन्द करता हूँ… उन्ही कपड़ो मे मैं अपनी बहन को देखना पसन्द करूगा? यदि हाँ तो जरूर मैं खुद को तुम्हारा वाला आधुनिक कह सकता हूँ । मगर क्या ऐसा है?’’ मैंने संजय की आँखों मे देखा। उसने अपनी नजरें झुका ली। मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा -‘‘संजू, हम समाज और अपने लिए अलग अलग पैमाने सेट नही कर सकते। और मुझे सचमुच अफसोस है कि हमारे समाज मे ज्यादातर आधुनिक जानवर ऐसे ही है।’’

‘‘आधुनिक जानवर?’’ वह एक बार फिर मेरी ओर घूरने लगा -‘‘इस शब्द का मतलब?’’

‘‘क्या तुमने लोगो को कभी ये कहते हुए सुना है कि ‘छोटे कपड़े नही, तुम्हारी सोच है?’’

‘‘अक्सर।’’ वह मुस्कुरा पड़ा।

‘‘तो मैं उन्ही में से ज्यादातर लोगो को ‘आधुनिक जानवर’ कहता हॅू। समझे कुछ?’’ मैं समोसे को प्लेट पर मसलते हुए कहा।

‘‘लगता है छोटू ने समोसे को कढ़ाही से निकाल कर सीधे हमारी प्लेट पर रख दिया है। कितना गरम है… है न?’’ मेरी प्लेट की ओर देखते हुए संजय ने बड़ा सा मुँह बनाया। मैंने कोई प्रतिक्रिया नही दी।

‘‘हाँ तुम आधुनिक जानवर का मतलब समझाने वाले थे।’’ समोसे से न हटा तो वह मेरी ओर देखते हुए पॅूछा।

‘‘क्या?’’ मैं हॅस पड़ा -‘‘शायद तुमने सुना नही जो मैंने… खैर छोड़ो तुम नही समझोगे।’’

‘‘मैं नही समझूँगा? क्यों? तुम समझाओ तो।’’ वह फटी फटी नजरों से मेरी ओर देखने लगा।

मैंने कुछ नही कहा।

‘‘खैर छोड़ो तुम्हारी बातें तुम्ही जानो। मगर एक बात जान लो राज।’’ वह एकाएक गम्भीर हो गया, मेरी ओर झुकते हुए बोला -‘‘आज दुनिया बहुत आगे निकल गयी है। हो सकता है कि जीवन को जीने की तुम्हारी सोच सही हो मगर परिवर्तन के साथ परिवर्तित होना गलत नही है। मुझे न पुरानी सोच पसन्द है न ही पुराने तरीके, और राज देखना मैं शादी भी ऐसी ही लड़की से करूगा जो पुराने नियमो और बंधनो से बंधी न हो।’’

तभी…..

एकाएक अतीत की यादों के सितारे टूट कर मेरे सामने बिखर गये। मैं जब अतीत के पन्नो से निकल कर बाहर आया तो इधर उधर हैरानी से देखने लगा जैसे किसी ने मुझे अचानक आसमान से जमीन पर पटक दिया हो। मै अपने घर के बाँलकनी पर बैठा हुआ सुबह की चाय पीता हुआ अखबार पढ़ रहा था। अचानक मेरी निगाह अखबार मे छपी उस तश्बीर मे गयी जो अखबार में इस लिये छापी गयी थी क्योंकि पुलिस को उस सख्श की तलास थी।

‘‘ओह संजय!” मेरा बदन काँप उठा -‘ये क्या कर डाला तुमने? ऐसा घिनौना जुर्म?’’ मैं देर तक अखबार मे छपी अपने सबसे खास दोस्त की तश्बीर को गौर से देखता रहा। लड़कियों समेत कई मुद्दो पर हम दोनों के विचार अगल-अलग होते हुए भी हम हमेशा अच्छे दोस्त रहे है। 

अखबार की खबर की माने तो संजय पर उसकी ही बेटी के कत्ल के इल्जाम था जिसके लिए पुलिस उसकी तलास कर रही थी। हालाकि उस पर लगा इल्जाम घिनौना था परन्तु न जाने क्यों, मेरी अन्तरात्मा अखबार की खबर को स्वीकार नही कर पा रही थी। संजय खुली फिजाओ मे घूमती लड़कियों का दिवाना जरूर था मगर कुछ मामलो मे वह वह फरिस्ता था। वह अपनी बेटी का कत्ल सिर्फ इसलिये कभी नहीं कर सकता कि पत्नी से तलाक हो जाने के बाद उसकी बेटी पंखुड़ी भी माँ के साथ रहना चाहती है।

खबर पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखें अचानक भर आयी। दिमाग में एक साथ कई सवालो ने कोहराम मचा दिया। ‘वह इस वक्त कहाँ होगा? किस हाल मे होगा? न जाने कुछ खाया होगा या फिर भूखा ही खुद को सम्भालने की कोशिश कर रहा होगा?’ मेरी निगाहे देर तक अखबार मे छपी उसकी तश्बीर पर टिकी रही -‘‘मैं उसे ढूढू भी तो कहाँ?’’

‘‘शिवी।” मैने पुकारा। जी हाँ शिवी… मेरी शिवी, मेरी धर्मपत्नी। एक खूबसूरत ग्रामीण बाला। उसे मैं इसी नाम से पुकारता था। हालाकि उसका असली नाम शिवानी था। शिवानी ने बेशक शहर की खुली फिजाओं के बीच अपना यौवन सम्भाला था अपना मगर वह अपनी सादगी और रिश्तो की कीमत कभी नही भुला पायी।

‘‘जी आयी।’’ अन्दर से आवाज गूँजी और अगले ही पल वह मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। मुस्कुराते हुए बोली -‘‘आपने बुलाया मुझे?’’ उसके खूबसूरत चेहरे से टपकती भीनी भीनी सी मुस्कराहट का मैं दीवाना था। कोई और वक्त होता तो तेजी से उठकर मैं उसे अपनी बाँहों मे भर लेता।

‘‘हाँ ।’’ मैंने कहा। मेरा स्वर गम्भीर था -‘‘जरा फोन का रिसीवर उठा लाओगी? मुझे किसी से जरूरी बात करनी है।’’

न कोई सवाल न कोई जवाब वह अन्दर की ओर लौट गयी और अगले पल रिसीवर मेरे सामने था। हालाकि मेरे चेहरे को देख कर वह समझ गयी थी कि मैं परेशान हॅू और मुझे इस हाल मे देखकर वह कई सवाल कर सकती थी परन्तु उसने नही किया। कुछ मामले में वह कतई जल्दबाजी नहीं करती थी। किस वक्त क्या कहना चाहिए और क्या पॅूछना चाहिए इस पर जैसे उसे महारथ हासिल हो। वह खामोस खड़ी मेरे चेहरे पर हो रही उथल पुथल को एकटक देखती रही।

‘‘शिवी एक और चाय मिलेगी क्या? मैने पॅूछा।

‘‘हाँ लाती हॅू।’’ उसने कहा और अन्दर चली गयी।

मैने उस दौरान कई चुनिन्दा जगहों पर फोन किया जहाँ पर मैं संजय के होने की उम्मीद कर सकता था। मगर कही से कोई अच्छी खबर नही मिली। मैं कुछ और जगहो के बारे में फिर सोचने लगा।

‘‘आपकी चाय।’’ शिवी ने चाय का कप मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा। मैने चाय थाम ली। उसकी पारखी नजरें एक बार फिर उछल कर मेरे चेहरे पर टिक गयी।

‘‘आओ बैठो।” मैने सोफे की ओर इसारा करते हुए कहा।

‘‘मैं यहीं ठीक हूँ ।’’ वह भर्राई आवाज मे बोली।

‘‘अरे आओ तो।’’ मैने जोर दिया तो मेरे बगल मे आकर बैठ गयी। मेरे उसके बीच कोई एक-दो फिट की दूरी रही होगी मैं सरक कर उसके बिल्कुल नजदीक पहुँच गया। जानबूझकर की गयी मेरी इस हरकत पर वह लजा गयी।

मैं शिवी को अखबार की उन पंक्तियों को दिखाते हुए बोला -‘‘देखों यह जो कुछ लिखा गया है मेरे दोस्त के बारे में है। यह तश्वीर भी।” अखबार पर छपी तश्बीर की ओर मैंने इसारा किया।

उसने अखबार को मेरे हाँथसे ले लिया। खबर पढ़ते वक्त उसने कई बार मेरी ओर देखा।

‘‘ये वही संजय हैं न… जो काँलेज मे आपके साथ थे?’’ उसने हैरानी से मेरी ओर देखा। उसकी आँ खे डबडबा आई थी।

‘‘हाँ ।’’ मैंने धीरे से कहा।

‘‘लेकिन इनका जुर्म? ऐसे कैसे कर सकते हैं ये?’’ उसने अखबार को मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा।

‘‘नहीं शिवी।” मैंने उसकी ओर देखा -‘‘इस अखबार में जो कुछ लिखा है वह सच नहीं हो सकता। वह मेरा दोस्त है। मुझसे बेहतर उसे कोई नही जानता।’’ मेरी नजरों एक बार फिर उसकी तश्बीर पर जा टिकी।

‘‘लेकिन…।’’

‘‘शिवी।’’ मैंने उसकी ओर देखा -‘‘मै तुम्हारी आशंकाओ को समझ सकता हॅू। और यकीन मानो मैं उन्हे नजरअंदाज नही करना चाहता। इसलिए मैं खुद इस मामले की हकीकत तक पहुँचना चाहता हॅू।’’

‘‘तो क्या करने की सोच रहे हैं आप?’’ वह लगभग रूवासी हो गयी।

‘‘सोच रहा हॅू लखनऊ चला जाऊँ। तुम क्या कहती हो?’’

‘‘आज ही?’’

‘‘अभी इसी वक्त।’’ मैं उठकर खड़ा हो गया। वह थोडी देर तक मेरी ओर देखती रही, फिर कुछ सोच कर बोली -‘‘मुझे लगता है आपको पहले फोन करके सही स्थिति का पता कर लेना चाहिए।’’

‘‘शिवी, मैने फोन किया था। किसी ने ठीक ठाक उत्तर नहीं दिया। मेरा दिल कह रहा है कि वह अब भी लखनऊ में ही कही होगा। उसका घर तो नही पता मगर उसके कुछ ठिकाने जरूर जानता हॅू मैं।’’

वह चुप हो गयी।

‘‘शिवी!’’ मैनें अपनी बात जारी रखी -‘‘जिन लोगो से मेरी बात हुई है शायद उन्हें डर है कि मैं कहीं उनमें तो नहीं हॅू जो संजय को पकड़वाना चाहते हैं।’’

‘‘आपने अपना परिचय दिया तो होगा?” उसने पॅूछा।

‘‘दिया तो था पर शायद उन्हे मुझ पर फिर भी यकीन नहीं हुआ, फिर ऐसी बातों को फोन पर तर्क-वितर्क भी तो नहीं किया जा सकता।’’

मेरी बात के लिए उसकी खामोसी मे निःशब्द सहमति थी। मैं कपड़ा पहन ही रहा कि वह अन्दर चली गयी। कुछ देर बाद लौटी तो उसके हाँथमें अटैची थमी हुई थी। मेरी ओर थमाते हुए बोली -‘‘मैंने इसमे आपकी जरूरत की सारी वस्तुए डाल दी है।’’

‘‘ठीक है।’’ कहते हुए मैंने अपने सुष्क होंठो को उसके होंठों मे रख दिया। आज वह जरा भी नही लजाई। उसकी आँखें बरस पड़ी। हालाकि मेरे लिये यह नया अनुभव नहीं था। इसके पहले भी मैं घर से जितनी बार निकलता, वह बस यू ही मूर्ति बनकर खडी हो जाया करती थी। मै अपनी काँपती उगंलियों से उन मोतियों को समेटने का प्रयास करता हुआ घर से निकल गया।

‘‘वहाँ पहुँचकर एकबार मुझे फोन कर दीजिएगा।’’ उसने दूर से आवाज दी।

‘‘ठीक है।” मै ठहरा नही।

शाम ढलते-ढलते मैं लखनऊ पहुँच गया। यह एक ऐसा शहर था जहाँ पर काफी लोगों से मेरी जान पहचान थी। फिर यहाँ मेरे बड़े भइया भी तो थे जो सचिवालय में अफसर थे। मै स्टेशन से बाहर आया। मेरा मोबाइल डिस्चार्ज हो चुका था। मैंने इधर-उधर नजरें दौडाई तो वही पास ही मुझे एक पी0सी0ओ0 नजर आया। मैं उसकी ओर बढ़ गया।

‘‘तुम थोड़ी देर वही ठहरो, मैं ड्राइवर को फोन करता हॅू। वह जल्दी ही तुम तक पहुँच जायेगा।’’ फोन पर भइया ने कहा।

मुझे इन्तजार में वही रुकना पड़ा। मैं वही पास लगी एक पान की दुकान पर पहुँ चा, उससे सिगरेट मांगी, सुलगाई और पीने लगा।

तभी —

अचानक मेरे पीछे कुछ शोर सुनाई दिया तो मैने घूम कर उधर देखा। एक व्यक्ति उस पी0सी0ओ0 वाले से सिर्फ इस बात को लेकर बहस कर रहा था कि -‘उसने लोकल डिस्टेंस पर सिर्फ एक ही कॉल किया है तो उसके लिये उससे दो काँ ल्स के पैसे क्यों लिये जा रहे हैं?’ उसके इस सवाल पर पी0सी0ओ0 वाला हर बार चिल्लाकर-चिल्लाकर कह यही रहा था -‘‘कि वह सबके साथ ऐसा ही करता है।’’

‘‘क्यों?’’ इस सवाल पर थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद पी0 सी0 ओ0 वाले ने जरा सहम कर धीरे से बोला -‘‘मेरी मर्जी।’’

‘‘कैसी मर्जी।’’ वह व्यक्ति चिग्घाड पड़ा।

‘‘जी फोन मेरा है इस लिए।’’

‘‘देखिए तो साहब…।’’ अचानक वह व्यक्ति मेरी ओर मुड़ा -‘‘क्या जबरजस्ती है? अरे भाई खुदा से कुछ तो डरो। कही वह तुम पर बेरहम न हो जाय।” वह अपने आखिरी अल्फाजो को कहते समय एक बार फिर पी0सी0ओ0 वाले की ही ओर घूम गया।

‘‘जबरदस्ती… जबरदस्ती कर रहा हॅू मैं? कौन कहता मैं जबरदस्ती कर रहा हॅू?’’ पी0सी0ओ0 वाला पूरी तरह झल्ला उठा -‘‘अगर आपको फोन नहीं करना तो मत करिए, मैं आपसे इसके लिए जबरदस्ती तो नहीं करता। मुझे उसकी बात कुछ हद तक वाजिब भी लगी। सही ही तो है… वह जबरदस्ती कहाँ करता है। हाँ लोगो की मजबूरी जरूर है जिसका वह फायदा उठा रहा है। ऐसे ही थोड़ी दुनिया हमें अविश्वास की नजर से देखती है।

कुछ पलो बाद अचानक मुझे याद आया कि उसने मेरे साथ भी तो ऐसा ही किया होगा? ये बात और है कि मैं समझ नहीं पाया। मैंने उसे पचास का नोट थमाया, बदले मे उसने कुछ नोटो के साथ छुट्टा भी वापस किये थे जिन्हे बगैर गिने हुए मैंने अपनी जेब में डाल लिया था।

लगभग 20 मिनट हो गये। उस वक्त तक ऐसी कोई गाडी वहाँ  पर नही आयी जो मेरे लिए थी। हाँ  5 मिनट पहले एक लाल गाड़ी जरूर मेरे पास आकर खडी हुई थी मगर वह भइया की गाड़ी नहीं थी। उसे मैं अच्छे से पहचानता था। ऊबकर मैने दुकानदार से एक सिंगरेट और मांगी, जलाई और ज्यो ही होंठों पर लगाया, गाड़ी का ड्राइवर धीरे-धीरे चलता हुआ मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर तक मेरी ओर देखने के बाद वह झुक कर बोला -‘‘राज… राज साहब है आप?’’ उसके माथे से पसीना टपक रहा था।

‘‘जी हाँ ।’’ मैने हैरानी भरी नजरों से उसकी ओर देखा।

‘‘उफ! कब से मैं आपको देख रहा हॅू।’’ माथे का पसीना पोछते हुए उसने कहा।

‘‘आप कौन?’’ मैंने उसकी ओर पलटते हुए पूँछा।

‘‘मैं साहब का ड्राइवर हॅू… उन्होने आपको लाने के लिए भेजा है।’’

‘‘ड्राइवर?’’ मैंने हैरानी से गाड़ी की ओर देखा -‘‘मगर यह गाड़ी भइया की तो नहीं है?’’

‘‘वो हाँ …।’’ वह जोर से हॅस पड़ा -‘‘मैं तो इस बात पर दिमाग ही नहीं दौडाया, साहब ने बताया था कि जब से उन्होने नई गाड़ी खरीदी थी आप यहाँ आये ही नहीं। खैर- आइए।’’ उसने बढ़कर कार का बायां दरवाजा खोल दिया।

‘‘गाड़ी मे ए0सी0 ठीक नही है क्या?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘तुम पसीने से भीगे हुए हो।’’

‘‘ओह!’’ वह मेरे आसय को समझ गया। हो हो करके हॅसते हुए बोला -‘‘ऐसी बात नही है साहब। दरअसल बड़े साहब ने कहा है कि जब अकेले हो तो ए0सी0 मत चलाया करो।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पेट्रोल ज्यादा लगता है न।’’

‘‘ओह… अच्छा।’’ मैं मुस्कुरा पड़ा।

रोड पर उफान भरते हुए मैं उस घर तक पहुँच गया, जहाँ  पर मैंने फोन किया था। घर के लोग मुझे बेहद सभ्य नजर आये। उन्होंने जिस दरियादिली से मेरा स्वागत किया उसने मुझे लखनऊ की मेहमाननवाजी की याद दिला दी। मैं  लगभग आधे घन्टे तक वहाँ  ठहरा रहा मगर इस आधे घन्टे के दौरान उन्होने मुझे सिर्फ इतनी ही जानकारी दे पाये कि पत्नी से तलाक के बाद से लेकर बेटी के कत्ल तक की घटना के बारे मे संजय ने फोन करकें सिर्फ इतना कहा था कि इन सब मसलो पर उसे फसाया जा रहा है मगर वह हार नही मानेगा, और जल्दी ही घर आकर वह उनसे बात करेगा।’ यह कहते-कहते उस बुजुर्ग महिला की आँ खे ड़बड़बा आयी। महिला से मिलने के बाद मुझे समझने मे देर नही लगी कि ये लोग संजय के बेहद करीबियों में से है। मैने उनसे रिश्ते के बारे में ज्यादा जिक्र नहीं किया। चलते वक्त मेरे द्वारा यह पूछे जाने पर कि उसके बारे में सही जानकारी मैं कहाँ  से हासिल कर सकता हॅू? उन्होंने कहा -‘‘संजय कई बार आलमबाग के एक वकील के बारे मे हमसे जिक्र किया करता था। हो सकता है वह वकील उसका मददगार बन गया हो।’’

‘‘जी धन्यबाद।’’ वकील के बारे मे कुछ और जानकारी लेकर मैं वहाँ से निकल गया।

अगले 15-20 मिनटो मे मैं वकील के घर पहुँच गया। ड्राइवर को बाहर ही रहने का इसारा करके मैं ज्यों ही अन्दर घुसा हवा की गति से आ रही एक युवती अचानक मुझसे टकरा गयी।

‘‘आई ऐम सारी।’’ वह कब और किस हाल में कह गयी मैं समझ नहीं पाया। जब पलट कर उसकी ओर देखने का मौका मिला, वह आँ धी सी इठलाती हुई दरवाजे की ऊॅची सीढी लांघ रही थी।

मैं देर तक उसके बारे मे सोच कर अपना वक्त नही खराब करना चाहता था। मैं हाँ ल पार करके जैसे ही एक सॅकरी गैलरी मे दाखिल हुआ -एक दुबला पतला सा वृद्ध मेरे सामने आ गया।

‘‘क्या आप वकील अंसारी हैं?” मै जरा झेंपते हुए पूछा।

वह कुछ पलों तक मेरी ओर संदेहपूर्ण निगाहों से देखता रहा फिर अपने सूखे पतले होठों को लहराते हुए बोला -‘‘जी आपका परिचय।’’

‘‘राज… राज नाम है मेरा। संजय का दोस्त। संजय को तो जानते होंगे आप? मैं दिल्ली से आया हॅू और संजय के बारे में मुझे आपसे कुछ पूछना था। क्या आप मुझे उसके बारे मे कुछ बता सकते है?’’ मैं एक ही सांस मे सब कुछ कह गया। एक साथ इतने सवाल उसके कानों से टकराये तो उसकी आँखें जैसे बाहर निकल आयी हो। उसने नांक तक सरक आये अपने चश्में को सम्भाला और फिर लम्बी ढ़ाढी के बालो को सहलाते हुए बोला -‘‘महानुभाव मैं समझ गया आप संजय के मुकदमें के बारे में जानना चाहते हैं।’’

‘‘जी… जी ठीक समझा आपने।’’ मैं हकला पड़ा।

‘‘संजय साहब से मैं कई बार मिल चुका हूँ । बहुत इंसान अच्छे हैं। खुदा उन पर रहम करें।” लम्बी सांस खीचते हुए उसने ऊपर की ओर देखा -‘‘मुझे सचमुच खेद है कि अंसारी साहब उनसे नफरत करते है।’’

‘‘तो क्या आप…?’’ मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा।

‘‘नहीं।’’ उसने अपने दांत विहीन मुँह को खोल दिया -‘‘साहब उस सामने वाले कमरे में बैठे है। जाकर मिल लीजिए।’’ उसने सामने कमरे की ओर इसारा किया।

‘‘जी धन्यबाद।” मै एक बार फिर अर्थपूर्ण निगाहों से उस वृद्व की ओर देखा मगर वह आगे बढ़ गया।

‘‘महानुभाव सुनिए।’’ एकाएक वह पलट पड़ा। वह मेरे पास आकर धीरे से बोला -‘‘यदि आप मुझ पर विश्वास करे तो मैं कुछ बोलने की इजाजत चाहता हॅू।” उसने एक बार फिर अपने चश्मे को ऊपर की ओर सरकाया।

‘‘बोलिए।’’

‘‘मैं समझता हॅू कि संजय साहब के बारे में वकील साहब से कुछ भी जिक्र करना सिर्फ उनके लिए परेशानी खड़ा करना है।’’

‘‘क्यों?’’ सहसा मेरे होंठ लहराए -‘‘मैने तो सुना था कि संजय के वकील साहब से अच्छे सम्बन्ध है।’’

‘‘माफ करियेगा मैंने आपको अपना परिचय नही दिया।’’ उसने गलियारे में इधर उधर देखा, शायद उसने कोई आहट सुनी। फुसफुसाते हुए कहा -‘‘मैं वकील साहब के लिए ही काम करता हॅू। उससे भी पहले से जब पहली बार संजय साहब वकील साहब से मिलने यहाँ  आये थे । वो वहाँ …।’’ उसने थोड़ी दूर पर लगे एक पुराने दरवाजे की ओर इसारा किया -‘‘उसी दरवाजे के पास खड़े खड़े संजय साहब ने मुझे आवाज दी थी। मगर बुजुर्ग होकर भी मैंने अहंकार नही दिखाया। खुद उनके पास तक गया। उन्होने मुझसे वकील साहब के ऑफिस के बारे मे पूछा तो मैं खुद उन्हे वकील साहब के पास तक छोड़कर आया था। बोलिए आप ये सब मानेगें?’’

मैंने कुछ नही कहा। खामोशी से उसकी बातों को सुनता रहा… जो जरुरी थी उन्हे भी, और जो नही थी उन्हे भी। मुझे खामोस देखकर वृद्व कहने लगा -‘‘आप मेरे ऊपर यॅू ही विश्वास मत कर लीजिएगा… आप तसल्ली के लिए साहब से सम्पर्क करना चाहते है तो कर लीजिए। वैसी थोडी देर पहले इसी मुकदमे के लिए एक औरत भी आयी थी।

“औरत!’’ एकाएक मैं चैक पड़ा – ‘‘क्या वही औरत जो अभी अभी मुझसे टकराई थी?’’

‘‘जी…।’’

‘‘धन्यबाद।’’ मैं पीछे की ओर पलटा और बाहर की ओर तेजी से भागा। मुझे यकीन था, वह औरत संजय की करीबी है। फिर भले ही वह संजय के पक्ष में हो या विपक्ष में। मुझे यू पागलो-सा भागता देख रोड़ पर गाड़ी के पास खड़ा ड्राइवर हडबड़ाकर चीख पड़ा -‘‘क्या हुआ साहब?’’

‘‘कु… कुछ नहीं।’’ हडबडाहट में मेरी सांसे फूल आयी -‘‘क्या तुमने अभी यहाँ से किसी औरत को निकलते हुए देखा है?’’ 

‘‘हाँ … हाँ साहब। अभी अभी तो मेरे पास से गयी है।’’

‘‘किधर?’’

‘‘इस ओर।’’ उसने पश्चिम की ओर जाने वाली सड़क की ओर इसारा किया।

‘‘उसका अपना निजी साधन था? म…मेरा मतलब कार या कुछ…?’’

‘‘जी नहीं साहब… टैक्सी से गयी है।’’ ड्राइवर ने कहा।

‘‘अच्छा… तो चलो अपनी गाड़ी उस टैक्सी के पीेछे लगाओं।’’ मैं जैसे तैसे कार के अन्दर घुसते हुए बोला।

हमारी गाड़ी सडक पर दौड़ पड़ी।

‘‘वह मुझसे लिफ्ट मांगी थी, साहब।’’ फुरसत में ड्राइवर खुद बताने लगा -‘‘लेकिन मैंने इंकार कर दिया।’’

‘‘गाडी की रफ्तार बढ़ाओ और पीछा करो उसका।‘‘

तभी- !

अचानक जोर का झटका लगा, कार खड़ी हो गई।

‘‘क्या हुआ?’’ मैंने हैरानी से ड्राइवर की ओर देखा।

‘‘टैक्सी।’’

मैंने बायी ओर गर्दन घुमाई। टैक्सी मेरे सामने थी। ड्राइवर तेजी से भागता हुआ टैक्सी के पास पहुच गया।

“जी आप।” ड्राइवर को देख युवती चौंक पड़ी -‘‘अभी तो आप कहे थे कि आप दूसरी ओर जायेंगे।’’

‘‘हाँ पहले कुछ ऐसा ही प्लान था। आइए आपको घर तक छोड़ देता हॅू।’’

‘‘क्या मैं जान सकती हॅू कि यह मेहरबानी किस लिए?’’ वह टैक्सी से उतरते हुए बोली।

‘‘साहब को आपसे कुछ बात करनी है।’’

‘‘कौन साहब?’’ एकाएक वह मेरी कार की ओर लपकी -‘‘ओह….तो आप है।’’ आँखों पर पहने बड़े बड़े काले चश्में को नाक के आखिरी छोर तक सरकाकर वह कार के अन्दर झाँ कते हुए बोली -‘‘मैं जरा जल्दी मे थी। ठीक से मैं आपको सॉरी भी नही बोल पायी।’’

‘‘तो अब बोल दीजिए।’’ मै धीरे से मुस्कारा पड़ा।

‘‘क्या सचमुच आप दोबारा सॉरी सुनने आये हैं?’’ उसने अपने चश्में को निकाल कर सर पर रखते हुए गौर से मेरी ओर देखा।

‘‘यदि मैं कहूँ हाँ तो?’’

‘‘तो मैं दोबारा सॉरी बोल दूँ गी।’’ उसके होठों पर सरारत भरी मुस्कान बिखर पड़ी।

‘‘ओह…।’’ मैं हँस पड़ा -‘‘वैसे आपसे कुछ काम था। उम्मीद है आप मेरी सहायता करेंगी?’’

‘‘जी जरूर।’’ वह भी मुस्करा पड़ी। नटखट अंदाज मे बोली -‘‘मगर महापुरुष! क्या अब बतायेगे कि आपको हमसे काम क्या है?’’

‘‘अच्छा तो सब कुछ यहीं पूछ लेगी आप?’’ मेरे होठों में बिखरी मुस्कान गालो तक पहुच गयी।

वह थोड़ी देर तक मेरी आँखों मे कुछ खोजती रही। फिर एकाएक पीछे की ओर पलटते हुए कार का बैक डोर अपनी ओर खीची और उसके खुलते ही धम्म से मेरे बगल मे बैठ गई। लगभग 15 मिनट तक हमारी कार कई मोड लांघती हुई उसके घर के सामने जाकर खड़ी हो गई।

‘‘जी यही है मेरा घर।’’ गाड़ी से उतर कर घर की ओर इसारा करते हुए वह मुस्काराई।

मैंने गौर से देखा उस घर की ओर। वह घर नही एक हवेली थी। खूबसूरत हवेली।

‘‘आइए।’’ घर का मुख्य द्वार खोलते हुए उसने मेरी ओर देखा। 

‘‘जी।’’ मैं उसके पीछे पीछे चल दिया। हम बरामदे को पार करते हुए एक सीढ़ी का सहारा लेकर घर के दूसरे तल की पोर्च पर पहुँच गये। छोटी-सी इस पग चाल के दौरान वह युवती कई बार गर्दन घुमा-घुमा कर गुलाबी मुस्कान मेरी ओर उछालती रही। अपने उन कुछ मिनटो की यात्रा के दौरान मुझे मानने के लिए मजबूर होना पड़ा कि वह एक व्यवहार कुशल औरत थी मगर मैं जल्दबाजी मे कभी भी किसी नतीजे पर पहुचने का पक्षधर नही रहा।

‘‘क्या आप यहाँ बैठना पसन्द करेंगे?’’ उसने मेरी ओर देखकर कहा। फिर अचानक न जाने क्या हुआ, मैं कुछ उत्तर दे पाता उससे पहले वह खुद ही कहने लगी -‘‘आप यहाँ मत बैठिए। सड़क पर आ-जा रही गाड़ियों के कारण यहाँ शोर बहुत है। चलिए हम ड्राइंगरूम में बैठकर बाते करते हैं।’’

‘‘ठीक है।’’ मैं उठकर खड़ा हो गया।

कुछ कदम चलते ही हम ड्राइंगरूम पहुच गये। मेरी निगाह एकाएक दीवारो पर गयी तो उससे चिपक कर रह गयी। उस हाँ ल को बेहद सुव्यवस्थित तरीके से सजाया गया था। वहाँ की सबसे खास चीज जो मेरे दिल को छू गई -वो थी दीवालो पर लगी पेन्टिंग्स… खूबसूरत पेन्टिंग!

‘‘आप बैठिए यहाँ । मैं कुछ नाश्ता पानी लेकर आती हॅू।’’

हालाकि मेरा वहाँ नाश्ता पानी करने का कोई इरादा नही था मगर मैं मना भी नही कर पाया।

वह अन्दर चली गयी –

मैं दीवारो पर सजी पेंटिंग्स की ओर बढ़ गया -‘‘किस आर्टिस्ट की होगी ये पेंटिंग्स?

आर्ट राजेश सिंह ‘आनन्द’! यही लिखा था हर पेन्टिंग में। मैंने उन्हे छूकर देखा। सारी मूल पेंन्टिंग्स थी। मंहगी होगी। आर्टिस्ट का नाम भी तो काफी जाना पहचाना था।

‘संजय की तश्बीर!’ एकाएक मैं चौंक पड़ा। आलमारी पर रखे एक फूलदान को उठाकर देखने की लालसा में पता नहीं उसके किस हिस्से से छिटक कर वह तश्बीर फर्स पर गिर गयी। मेरे कान खड़े हो गये। उस घर से संजय का कुछ खास सम्बन्ध है मुझे यह समझने मे बहुत देर नही लगी।

सच कहॅू तो पलभर के लिये लगा कि वह खूबसूरत युवती संजय की… नहीं… नहीं।” मुझे अपने विचारों को वापस लेना पडा। इतनी हॅसमुख, सरल विंदास स्वभाव वाली औरत, तलाक सुदा कैसे हो सकती है? खासकर जिसने अभी अभी अपनी बेटी खोई हो… बिल्कुल नहीं।

‘‘हैलो..!’’ सहसा दरवाजे पर स्वर गूंजा। मैंने उधर देखा। एक दुबली पतली सी लड़की, होंठो में मुस्कान समेटे हुए मेरे सामने खड़ी थी।

‘‘जी।’’ मैंने कहा।

‘‘मैडम ने आपको नीचे गेस्ट रूम में बुलाया है” उसने कहा।

‘‘गेस्टरूम में? नीचे?’’

‘‘जी।’’

‘‘ठीक है… आता हॅू।’’

वह लौटते हुए आखिरी बार फिर मुस्करा कर तिलस्मी निगाहों से मेरी ओर देखी और लहराती हुई सीढ़ियो से नीचे उतर गयी।

क्या आशय हो सकता है उसकी बेवजह मुस्कान का? अर्थ… अनर्थ। सोचते हुए मैं भी उसके पीछे पीछे सीढ़िया उतरता चला गया। जैसे ही मैंने बरामदे पर कदम रखा अचानक वह लड़की मेरी ओर घूम कर खड़ी हो गयी। होंठोे पर वही कुछ कहती हुई मुस्कान…. निगाहों में वही तिलस्मीपन।

मेरे मन में कई अशुभ खयाल उठे मगर कुछ था कि मैं नजरअंदाज कर गया।

‘‘गेस्ट रूम इधर है।’’ मुझे विपरीत दिशा मे जाते हुए देखकर वह हँस पड़ी।

मैंने पलट कर उसकी ओर देखा -‘‘इधर?’’

‘‘हाँ ।’’ आँखों और भुजाओं का सहारा लेकर उसने दोबारा संकेत किया।

मैं शर्म से पानी पानी हो गया। अब तक मुझे उसके वहाँ खडे़ होने का कारण समझ आ गया।

‘‘आइए बैठिए।’’ मेरे ऊपर निगाह पड़ते ही सोफे से खड़ी होते हुए वह युवती जो हमारे साथ गाड़ी से आयी थी, मुस्कारा कर मेरा स्वागत किया।

मै बैठ गया-

पलभर हम एक दूसरे की ओर देखते रहे शायद इस आशा में कि बात सामने वाला शुरू करे मगर संजय की तश्बीर देख लेने के बाद मुझे सावधानी बरतना और भी जरूरी हो गया था। एकाएक उसके सामने संजय का दोस्त के रूप में जिक्र करना मुझे वाजिब नही लगा।

‘‘चाय ठण्ड पड़ जाएगी आपकी।’’ एकाकए उसे याद आया।

मैंने मुस्करा सामने मेज पर रखी चाय को हाँ थों मे उठा लिया।

‘‘आप भी उठाइए।’’ मैंने कहा।

‘‘जी धन्यबाद।’’ वह मुस्करा पड़ी -‘‘दर असल मुझे ठण्डी चाय पीने की आदत है।’’

उसके बात-बात पर हॅसने मुस्कराने से एक बात तो मालूम हो गयी थी कि वह बात कम और हॅसने की ज्यादा आदी है।

‘‘मेरा नाम राज है। दिल्ली से आया हॅू।’’ अपने परिचय के साथ मैंने बात की शुरुवात की।

‘‘राज।’’ उसने हैरानी से देखा मेरी ओर- मेरा दिल धड़क उठा।

‘‘मेरा नाम खुसबू है।’’

‘‘ख… खुशबू।’’ मैं एकाएक उठकर खड़ा हो गया।

‘‘क्या हुआ मिस्टर राज?’’ उसने हैरानी से मेरी ओर देखा -‘‘आप मेरा नाम सुन कर चौंक क्यों गये?’’

‘‘न… नही ऐसी कोई ब…बात नही है।’’ मैंने खुद को सम्भालते हुए कहा -‘‘दरअसल चाय बहुत गरम है।’’

‘‘चाय गरम है?’’ खुशबू एकाएक ठहाके मार कर हँस पड़ी -‘‘आप भी न मिस्टर राज।’’

‘‘अकेले घुटन नहीं होती इतने बडे घर में?’’ अपनी हरकत से उसका ध्यान हटाने की कोशिश करते हुए मैंने कहा।

‘‘आदत पड़ चुकी है।’’

‘‘आपका घर बहुत बड़ा हैं।’’ कहते हुए चंद क्षणो तक मै गेस्टरूम की चकाचैंध को निगाहों के जरिये उलट-पलट कर देखता रहा -‘‘बहुत अच्छा सजाया है आपने अपने पूरे घर को।’’

‘‘हाँ ।’’ वह खिलखिलाकर हँस पड़ी -‘‘मुझे घर सजाने का बहुत शौक है।’’

काफी देर हम दोनो इधर उधर की बातों मे उलझे रहे। मैं समझ नही पा रहा था कि मैं अभी तक यहाँ किस लिए रुका हूँ, जबकि वह घर उस औरत का है जिसकी वजह से मेरा दोस्त दर दर की ठोकरे खा रहा है? मगर एक बात और थी जो मुझे परेशान किये हुई थी। अखबार की खबर के अनुसार संजय और खुशबू की बेटी पंखुड़ी का कत्ल हुए अभी 10 दिन भी नही गुजरे थे मगर जिस अंदाज मे खुद को खुशबू होने का दावा करने वाली वह औरत खिलखिला रही थी उसे देख कर मेरे लिए यह यकीन करना मुश्किल था वह संजय की पत्नी है। मैंने हमेशा सुना है कि एक माँ कितना भी गिर जाये मगर वह इस हद तक कभी नही गिर सकती।

मैंने एकाएक संजय की तश्वीर उसकी ओर बढ़ा दी-‘‘ये आपके पति है क्या?’’

उसकी नजर जैसे ही तश्वीर पर पड़ी उसके होंठ कुछ कहने के लिये खुले मगर शब्द नही निकला। वह थोडी देर तक खामोस मेरी ओर देखती रही फिर भर्रायी आवाज मे बोली -‘‘आप कौन लगते है इस घटिया आदमी के? कही आप…? ओह।’’ अचानक उसे कुछ याद आया तो उसके स्वर की तीव्रता बढ़ गयी -‘‘आपने क्या नाम बताया था अपना? राज… है न?

‘‘जी मगर…।’’ मैंने बोलने की कोशिश की।

‘‘ओफ्फोह मैंने दिमाग क्यों नही लगाया?’’ उसने अपना माथा पकड़ लिया -‘‘इस घटिया आदमी ने मुझे बताया था आपके बारे मे। आप एक्सपोर्ट कम्पनी वाले हो न? मैं सबकुछ जानती हॅू आापके बारे में। आप यहाँ जासूसी करने आये हैं… है ना?’’ वह अचानक उठकर खड़ी हो गयी।

‘‘क… क्या कह रही हैं आप? जासूसी?’’ एकाएक मैं चिल्ला पड़ा -‘‘मैं जासूसी करने आया हॅू? हाँ मेरा नाम राज है और दिल्ली मे रहता हॅू मगर न तो मैं एक्सपोर्ट कम्पनी वाला हॅू और न ही इस सख्श को जानता हॅू। समझी आप।’’

‘‘तो… यह तश्वीर? इसे लिए हुए आप क्यों घूम रहे है?’’ वह मेरी ओर ऐसे देखी जैसे उसकी निगाहें मुझे नोच लेगीे।

‘‘यह तश्वीर?’’ मैंने अपने चेहरे के गुस्से को हटने नही दिया -‘‘यह तो मुझे आपके ड्राइंग रूम से मिली है।’’

‘‘ओह…!’’ लम्बी सांस खीचते हुए उसने एक अधूरी सी मुस्कान उछाला मेरी ओर -‘‘मै तो कुछ और ही समझ बैठी। सॉरी राज!’’ वह सोफे में बैठते हुए बोली -‘‘मुझे माफ कर दीजिए। पता नही उसकी तश्वीर देख कर मुझे क्या हो गया था?’’

‘‘कोई नही…।’’ मैंने हॅसने की कोशिश की मगर हॅसी नही आयी -‘‘ऐसा हो जाता हैं।’’

ठण्ढी हो चुकी चाय को एक ही घूट मे खत्म करके मैं खडा़ हो गया। अधूरी मुस्कान के साथ मैंने उसकी ओर देखा -‘‘मैं चलता हॅू, मुझे देर हो रही है।’’

‘‘क्या?’’ वह अचरज से मेरी ओर देखने लगी -‘‘आप कुछ काम से आये थे न?’’

‘‘जी काम से? हाँ… हाँ याद आया काम…काम से आया था।’’ मैं हड़बड़हट मे इधर उधर खाली-खाली निगाहो से गेस्टरूम की ऊॅची दीवारों को देखने लगा -‘‘बहुत खूबसूरत है आपका घर!’’

‘‘आप मेरा पूरा घर देखना चाहेंगे?’’ वह उठकर खड़ी हो गयी। उसके होंठों पर अजीब सी मुस्कान थी। मेरे जैसे संकोची इंसान उसके अनुरोध को टालने का साहस नही कर पाया, जबकि हकीकत यह थी कि इतना कुछ होने के बाद अब मै उस घर मे पलभर भी नहीं ठहरना चाहता था। मेरा उद्देश्य, संजय के प्रति उफान भरती उसकी नफरत के सामने टूट कर बिखर गया। मेरे लिए लौटना ही उचित था।

वह आगे आगे चलती रही और मैं फर्ज की डोर बधाँ हुआ उसके पीछे पीछे लुढ़कता रहा। उसे घर का जो हिस्सा अच्छा लगता मुझे दिखाती रही। उससे जुडी हुई कोई कहानी हुआ करती तो रूक कर सुना दिया करती। घर में घूमने के दौरान हम कई सीढ़िया कई दरवाजे पार करते चले गये।

‘‘यह मेरा बेडरूम है?’’ सहसा एक कमरे के सामने ठहर कर उसने कमरे की ओर इसारा करते हुए बोली।

मैं आधी अधूरी नजरे अन्दर की ओर दौड़ाई -‘‘अच्छा है… ब्यूटीफुल।’’ जबरदस्ती मुझे कहना पडा़।

‘‘अन्दर आकर देखना चाहेंगे?’’ उसने प्रस्ताव रखा तो इस बार मुझे मजबूरन खेद जाहिर करना पड़ा। अब हम दूसरे कमरे तक पहुँच चुके थे।

‘‘यह संजय का रिजर्व कमरा था।’’

‘‘संजय!’’ एकाएक मैं ऐसे चैंका जैसे किसी ने निद्रा से जगा दिया हो। मेरे चैकने पर वह हँस कर मेरी ओर देखी। फिर अफसोस जाहिर करते हुए बोली थी -‘‘ओह… मुझे सोचना चाहिए था कि आपको संजय के बारे में जानकारी नहीं है। फिर मैने बताया भी तो नहीं।’’

‘‘क्या आप उस इंसान की बात कर रही है जिसकी तश्वीर मैंने आपको दी थी।’’ अंजान बनने का अभिनय करते हुए कहा मैंने।

वह थोड़ी देर मेरी ओर देखती रही -‘‘हाँ वह तश्वीर जिसे आप पूछ रहे थे, मेरे पति की ही तश्बीर है।’’

मैं दरवाजे की ओर बढ़ कर सरसरी निगाहो से उस कमरे के अन्दर की ओर देखने लगा। अचानक मुझे एहसास हुआ कि इस वक्त का इतना उतावलापन ठीक नहीं है। मै तेजी से खुसबू की ओर पलटा।

अब हम घर के अगले छोर की बालकनी पर एक बार आ गये। उस समय रोड पर चीखती चिग्घाडती हुई गाड़ियाँ हमारी नजरों में पिस रही थी।

‘‘मिस्टर राज।’’ स्वर खुसबू का था।

‘‘जी।’’ मैंने उसकी ओर देखा।

‘‘मैं सचमुच उस वक्त किए गये अपने बर्ताव पर शर्मिन्दा हूँ लेकिन करू भी क्या?’’ एकाएक उसका स्वर रूवासा हो गया -‘‘उस व्यक्ति से मुझे नफरत ही कुछ इस कदर हो गयी है कि मेरे सामने कोई उसका जिक्र भी करता है तो मैं कुण्ठित हो उठती हॅू। मैं सचमुच सोचती हॅू भगवान उस पर कभी दया न करें। उसने बहुत दिल दुखाया है मेरा।’’

मैं चुप रहा।

‘‘मिस्टर राज। क्या आप यकीन करेगे कि…।’’ उसने कुछ कहना चाहा मगर उसकी आवाज गले मे ही फॅस कर रह गयी। आँखें छलक पड़ी।

‘‘अरे आप रो रही है?’’’ मैं हड़बड़ाकर उसकी ओर देखा -‘‘मुझे सचमुच अफसोस है कि मेरे खातिर आपका दिल दुखा।’’

‘‘नहीं नहीं राज आप ऐसा न कहिए। इसमे आपकी कोई गलती नही है।’’ एकाएक उसका सम्बोधन बदल गया -‘‘लेकिन एक बात कहूँ आपसे?’’ उसने अपनी हॅथेलियों मे मेरी हॅथेली भर ली।

‘‘कहिए?’’ मैंने कहा।

‘‘आज यहाँ ठहर सकते है आप?’’

‘‘जी!’’ मै चौंक पड़ा -‘‘आपका मतलब…?’’

‘‘अरे आप तो घबरा गये।’’ वह हॅस पडी़ मगर आँखें अब भी भरी रही -‘‘हम आपके साथ कुछ करने वाले थोड़े है। दरअसल मिस्टर राज।’’  अचानक गंभीर होते हुए वह बोली -‘‘संजय से तलाक का अफसोस मुझे भी है परन्तु मेरी भी कुछ मजबूरियाँ  थी। जिन्हे कुछ बंदिसे दूसरो से कहने सुनने से मुझे हमेशा रोकती रही । मै रूक भी गयी मगर अब वह मेरे मन के लिए एक बोझ बन गयी है। मुझे घुटन सी होने लगी है उससे। अब जब मैं उसे बता कर खुद के मन को हल्का करना चाहती हूँ तो कोई सुनने वाला नहीं।’’

‘‘मैं हूँ तो।’’ जी मे आया कि चिग्घाड कर कह दूँ, मगर मैं जानता था कि इतना उतावलापन मेरी मुस्किले बढ़ा सकता है। मैं चुप रहा।

‘‘हो सकता है मि0 राज।’’ वह अपनी बात जारी रखते हुए बोली -‘‘आपकी निगाहों में भी मैं ही गुनहगार ठहरू मगर फिर भी मै बताना चाहती हॅू।’’

‘‘ठीक है ठहर जाता हॅू।’’ मुझे काफी सोच विचार कर कहना पड़ा।

‘‘थैक्यू… थैक्यू मि0 राज।’’ हालाकि खुशी से एकाएक उसका यूँ चीख़ना पल भर के लिये मुझे आंशकित कर दिया मगर अपने दोस्त के लिए मैंने उसे नजरअंदाज कर दिया। मेरी जरा सी मसक्कत शायद कोई समाधान निकाल दे।

‘‘मीना।’’ अकस्मात ही वह पुकार पड़ी और अगले पल वह दुबली पतली सी लड़की हमारे सामने खड़ी थी।

‘‘जाओ, नीचे लान पर मि0 राज का ड्राइवर खड़ा है। उसे कहो कि वह साहब को लेने के लिए कल सुबह आ जाए। मि0 राज आज यही रुकेगे।’’

‘‘जी मैडम!’’ वह पलट पड़ी मगर उससे पहले एक बार फिर वह मेरी ओर चंचल मुस्कान उछाल दी। मैंने सकपका कर अपनी नजरे झुका ली।

‘‘मि0 राज।’’ खुसबू ने कहा -‘‘दूसरो का दर्द बाँ टने की आदत बहुत कम लोगो में होती है, मुझे खुसी है आप ऐसे चुनिन्दा लोगों में से है।’’

‘‘जी थैक्यू।’’

‘‘वैसे एक बात कहूँ आपसे?’’

मैं उसकी ओर प्रश्नसूचक नजरों से देखा।

‘‘आप सोचते बहुत है। लगता है आपको ज्यादा बात करने की आदत नहीं है।

‘‘जी नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।’’

‘‘आइए अन्दर चल कर बात करते है।’’ उसने कहा और मुड़कर चल पड़ी फिर पता नही क्या सोचकर वह एकाएक ठहर गयी। मेरी ओर देखते हुए हँस कर बोली -‘‘यकीन करिये आपको मेरा साथ पसंद आयेगा।’’

‘‘जी।’’ मैंने उसकी हॅसी मे अपनी हॅसी मिला दी।

हम ड्राइंग रूम में एक बार फिर दाखिल हो चुके थे।

‘‘आपके ड्राइंग रूम की पेन्टिग्स बहुत प्यारी है। कितना भी तारीफ करो कम है।’’ सोफे पर बैठते हुए मैनें कहा।

जवाब में उसके होंठो पर रूखी हॅस दौड़ पड़ी। उसके बर्ताव से मैं समझ सकता था कि उसे इस बारे में चर्चा करना फिलहाल अच्छा नहीं लगा।

‘‘राज!’’ उसने पुकारा -‘‘मैं आप से कुछ कहना चाहती थी।’’

               ‘‘कहिए।’’

‘‘मि0 राज! आप एक बात बताएगे मुझे?

‘‘उहॅू!’’

‘‘क्या बाहर जाकर दूसरी स्त्रियों के यौवन से खेलने का अधिकार सिर्फ मर्दो को होना चाहिए? और औरते सिर्फ रसोई सम्भलती रहे?’’

‘‘क्या… क्या मतलब?’’ मेरा दिल धड़क उठा।

‘‘हाँ  मि0 राज!’’ वह बिना मेरे किसी उत्तर की जरूरत समझे हुए खुद कहने लगी -‘‘शायद आपको आश्चर्य हो कि मैं एक प्रेस में काम करती हॅू। दस हजार तनख्वाह उठाती हॅू फिर भी जब मैं वहाँ  से लौटकर आती तो अक्सर चाय पानी की फरमाइस वह मुझसे ही करता था। मैं मानती हॅू।’’ बिना मेरी देखे हुए उसने अपनी बात जारी रखी -‘‘नौकरी वह भी करता था दस-बारह हजार रूपये वेतन उसका भी था परन्तु क्या मर्द होने के नाते सिर्फ उसे ही ये अधिकार है कि वह घर में राजाओ की तरह बैठ कर खाना खाए। नहीं मि0 राज!’’ उसके चेहरे पर तीक्ष्ण उत्तेजना थी -‘‘मै नहीं मानती ऐसा। मैने उससे कहा था कि कम से कम एक पहर का खाना उसे बनाना होगा मगर उसमें भी उसकी नानी मर जाती थी।’’

मेरा चेहरा बिल्कुल शान्त था मगर दिमाग गुस्से मे उबल रहा था। दिल कह रहा था कि अभी उठॅू और खीच कर दो-तीन थप्पड उसे जड़ दू और चिग्घाड कर कहूँ कि जिस इंसान को तू इस तरह के घटिया अल्फाजो से नवाज रही दरअसल वह मेरा अपना दोस्त है… मेरा यार। मगर वक्त को देखते हुए फिलहाल सुलझे हुए अंदाज में मैंने पॅूछा -‘‘क्या सिर्फ इतना ही कारण था आप लोगों के तलाक का?’’

‘‘नहीं।’’ वह इस अंदाज में बोली, जैसे वह सब कुछ उगल देना चाहती हो। शिकायत भरे लहजे मे कहने लगी -‘‘संजय अक्सर देर से आया करता था, अगर मैं पूछती तो दोस्तों की दुहाई दे देता, लेकिन मैंने उससे इस बात की कभी शिकायत नहीं की। फिर वह मुझसे इतनी पूँछतांछ क्यों किया करता था?’’ अंतिम शब्दो मे उसके स्वर का कम्पन्न बढ़ गया।

‘‘किस बात के लिये?’’ मैंने पूछा तो वह और भी जोश में आ गई। अपनी बात जारी रखते हुए बोली -‘‘जहाँ मैं काम करती थी वहाँ के सहयोगी कर्मचारी अधिकतर पुरुष थे। तो मि0 राज!’’  उसने मेरी ओर गौर से देखा -‘‘आप समझते होंगे कि जहाँ दो विपरीत सेक्स होंगे आकर्षण होना स्वाभाविक है, फिर इसमें कोई बुराई तो भी नहीं है। कुदरत ने हमे जीवन दिया है, खूबसूरती दी है, जवानी दी है, उस पर भी अपनी खुद की नौकरी है, और ऐसे हाल में जब हम किसी पर निर्भर नहीं है फिर हमे कोई रोके टोके, हमसे कहे कि तुम इससे न मिलो, उससे मिलो, ऐसा न करो वैसा न करों। तो क्या करू मैं? उसकी बात मान कर जीना छोड़ दूँ? ये मेरी जिन्दगी है इसे किस तरीके से जीना है यह मै सोचूगी या वह? आप ही बताइये।’’

‘‘जी आप।’’ जबरदस्ती मुझे अपने ही मन के खिलाफ बोलना पड़ा।

उसने मेरी बात सुनी तो उछल पड़ी -‘‘राज! वाकई आप आधुनिक जमाने के इंसान है मुझे सचमुच फक्र है आप पर।’’

मैं चुप था-

मै उससे क्या बताता? कैसे बताता कि उसकी हर बात शूल की तरह चुभ रही है मुझे?

‘‘जानते हैं राज?’’ वह फिर बोल पड़ी -‘‘संजय में वही कमी थी। वह पुराने ख्यालात से कभी बाहर निकल ही नही पाया और न ही कभी मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश की। मै जिस भी दिन देर से आती, वह अपने सवालो की पोटली खोल कर बैठ जाता। मैं काफी दिनों तक सहन करती रही मगर ऐसा कब तक चलता? एक दिन मुझे साफ तौर पर कहना पड़ा कि मैं  अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जीना चाहती हॅू,। अगर उसे आपत्ति है तो बेशक वह मुझे, तलाक दे सकता है। मुझे उसकी कोई जरूरत नहीं है। शारीरिक भूख के लिये बहुत मर्द हैं, मेरे आस पास।’’ हालाकि खुशबू के हर शब्द मे चुनौती थी मगर उसकी आखिरी पंक्ति मेरे मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया। ‘शारीरिक भूख के लिये बहुत मर्द हैं  , मेरे आस पास’ क्या आत्मनिर्भरता हमें यही स्वतंत्रता देती है या हर आत्मनिर्भर औरत, खुसबू की ही तरह सोचती है? देर तक यह सवाल मेरे दिमाग को झकझोरता रहा।

‘‘अब राज, आप ही बताइए।’’ वह पुनः कुछ सोच कर कहने लगी -‘‘हमारा समाज कब तक ऐसे ही रूढिवादिता को सर पर उठाये घूमता रहेगा? क्यों वह इस छोटी सी जिन्दगी को रीति रिवाजों की रस्सियों मे इतना जकड़ दिया है कि मेरी जैसी तमाम औरतो का उसमे दम घुटने लगे। स्त्री और पुरूष दोनों ही इंसान है फिर ये समाज उन्हें अलग-अलग निगाहों से क्यों देखता है?’’

जी किया कि उसके आखिरी सवाल पर कह दूँ कि आप ही सारे बच्चे अपने कोख से क्यों पैदा करती हैं? क्यों नहीं अपने पति से इस बात के लिये लड़ती हैं, कि कम से कम आधे बच्चे वे न सिर्फ खुद पैदा करें बल्कि अपना दूध भी पिलाये। परन्तु हँस कर मैने सिर्फ इतना ही कहा -‘‘भला इसमें मैं क्या कह सकता हॅू?’’

चंद पलो तक हम दोनो खामोश रहे-

‘‘मैने अखबार में आपकी बेटी के बारे में पढ़ा था। पंखुड़ी नाम था न उसका?’’ मेरे स्वर उसके कानो से टकराये, तो उसके चेहरे पर अचानक वेदना उभर आयी। पल भर के लिये लगा, कि जैंसे वह रो पडेगी। सिसक कर कहने लगी -‘‘वह मेरी इकलौती बेटी थी। बड़े प्यार से मैंने उसका नाम पंखुडी रखा था। मगर।’’ फिर इसके बाद उसने जो भी बताया, उसे मैं अखबार में पढ चुका था

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खाना-पीना करते -करते लगभग 11 बज चुका था।

‘‘अब मै सोना चाहता हॅूं।’’ मैने इच्छा जताई।

‘‘चलिये मैं आपका कमरा दिखा देती हॅू वहाँ आपका विस्तर लगा हुआ है।’’ खुशबू ने कहा।

‘‘जी बिल्कुल।’’

वह मुझे मेरे कमरे में छोड़ा, मुस्कुरा कर गुडनाइट कहा और लौट गयीं।

विस्तर पर पडे पड़े घन्टो गुजर गया। मुझे नींद नहीं आयी। वैसे भी मुझे अक्सर नींद की गोलियाँ लेने की आदत थी मगर आज नही ले पाया। अटैची गाड़ी मे ही रह गयी थी ।

जब मैं परेशान हो गया और नींद फिर भी नही आयी तो उठकर मैं अपनी पैंट की जेब को इस उम्मीद पर टटोलने लगा कि हो सकता है कि धोके से कभी रह गयी हो । नसीब अच्छा था मुझे गोली मिल गयी है मगर पानी?

मै सोचने लगा-

‘किसको पुकार ? मैं ऊबकर इधर-उधर टहलने लगा। शायद कोई स्विच, कोई ऐसा संकेत जो मेरे संदेश को वहाँ तक पहुँ चा सके। विस्तर के बगल में मुझे एक बेल स्विच नजर आयी। मैंने दबा दिया।

कुछ पल गुजरे मीना मेरे सामने खडी थी।

‘‘पानी की जरूरत थी।’’ बिना उसकी ओर देखे हुए मैंने कहा।

ठक्… दरवाजा बन्द हुआ। वह लौट गयी। थोडी देर बाद जब पुनः दस्तक हुई दरवाजा खुद व खुद खुल गया। मैने उधर देखा- सामने सिल्की गाउन में हाँथमें गिलास थामे हुए दरवाजे पर खुसबू खड़ी थी। मै कुछ कहता उससे पहले एक टांग की ओर जांघ तक कटे हुए गाउन मे से टांग निकाल कर आगे बढ़ते हुए बोली -‘‘राज, आपको नीद नहीं आ रही है क्या?’’

‘‘नहीं।’’ मैं उठकर बैठते हुए कहा।

‘‘हमको भी नही आ रही थी।’’ उसके स्वर मे शरारत और होठों पर अजीब सी मुस्कान बिखर गयी।

मैं उसकी बेवजह की मुस्कुराहत पर कोई प्रतिक्रिया देता उससे पहले वह मेरे बिल्कुल करीब आकर खड़ी हो गयी।

‘‘दरअसल नीद की गोली खानी थी, इसलिए मुझे पानी मंगवाना पड़ा।’’ मैंने गिलास की तरफ हाँथबढ़ाते हुए कहा -‘‘आपको डिस्टर्व करने के लिए मुझे सचमुच खेद है।’’

उसने पानी का गिलास मुझे नही दिया। अपने हाँथको पीछे खीचते हुए बोली -‘‘चलिये छोडिए इन औपचारिक बातों को… गोली इधर थमाइए।’’

मैने थमा दिया–

‘‘आज आपको गोली खाने की कोई जरुरत नही है।’’ उसने गोली को फर्स पर कही दूर झटक दिया और पास लगे सोफे पर धम्म से बैठ गयी।

‘‘अरे ये क्या किया आपने?’’ मै चिल्ला उठा -‘‘आपने मेरी गोली फेंक दी? आप नही जानती कि बिना नींद की गोली के मैं रात भर नहीं सो पाऊॅगा। मुझे आदत है इसकी।’’

‘‘तो मत सोइए।’’ उसने अपनी खुली टांग को दुसरी टांग पर रखते हुए बोली -‘‘क्या हर रात सोना जरूरी है? वैसे घबराइये नही आज हम हैं। बातों ही बातों मे ही रात कट जायेगी आपकी। लीजिए पानी पीजिए।’’

‘‘क्या मतलब? मेरे दिल की धड़कन एकाएक बढना शुरू हो गयी। मैंने एक ही घूंट में गिलास खाली कर दी और मैं विस्तर पर पुनः लेट गया।

‘‘राज, आप की शादी हो गयी?’’ उसने पॅूछा।

‘‘जी हाँ ।’’ मेरे स्वर में रूखापन था।

‘‘एक बात कहॅू आपसे?’’

‘‘कहिए?’’

‘‘आपकी पत्नी बहुत नसीब वाली है जिसे आप जैसा पति मिला है। वर्ना जिसके नसीब में संजय जैसा इंसान मिल जाए, उसकी जिन्दगी बंजर बन जाती है।’’

बात को अपने उद्देश्य की ओर मुड़ते देखा, तो मुझे अपना रूख बदलना पड़ा। मैंने हँस कर पूछा -‘‘क्या अब आप शादी नहीं करेंगी?’’

शादी का नाम सुनते ही एकाएक उसकी आँखों चमक आ गयी। तीखे स्वर में बोली -‘‘क्यो नहीं करूँ गी? मैं शादी करूँ गी और जरूर करूँ गी। संजय को यह दिखाकर रहूँ गी कि मैं उसके बगैर भी उसी हालात में रह सकती हॅू, जिस हालात में कभी उसके साथ रहा करती थी।’’

‘‘अगर आपका दूसरा पति भी आपको ऐसी पाबन्दियों में रखे तब?’’

पल भर वह मेरी ओर देखती रही फिर हॅस कर बोली -‘‘मिस्टर राज, आप मजाक कर रहे है न?’’

‘‘नही… मैं सचमुच पॅूछ रहा हॅू।’’

‘‘वो ऐसा नहीं करेगा।’’ अचानक उसके स्वर मे उत्तेजना आ गयी।

‘‘बेशक नहीं करेगा, मैं मान लेता हॅू परन्तु यदि किया तो?’’

‘‘तो उसे भी छोड़ दूँ गी।’’ उसके स्वर की उत्तेजना सातवे आसमान पहुच गयी -‘‘मैं अपनी आजादी से कभी समझौता नहीं करूँ गी।’’

हालाकि उस समय मैं चाहता तो उसे सवालो ही सवालो मे और भी भयानक बना सकता था परन्तु न जाने क्यो मुझे उस पर तरस आ गया।

‘‘क्या मैं आपके होने वाले पति का नाम जान सकता हॅू?’’ शायद ये मेरा आखिरी सवाल था।

‘‘बेशक।’’ वह मुस्करा पडी -‘‘बैरिस्टर इकबाल अंसारी।’’

‘‘इकबाल अंसारी।’’ यह नाम सुना तो जैसे किसी ने मेरे सर पर हथौड़ा मार दिया हो। मैं कुछ पलो तक बदहवास उसकी ओर फटी फटी नजरों से देखता रहा, होश सम्भला तो बोला -‘‘क्या आप उसी अंसारी की बात कर रही है जिससे आज आप मिलने गयी थी?’’

‘‘हाँ … बहुत अच्छा इंसान है वह। मार्डन परसन।’’ उसने अपने अग्रेजी शब्दों पर सारी उत्तेजना उलेड़ दी।

मैं उसके चेहरे पर तैर रहे हजारो सपनो को महसूस करने लगा।

‘‘राज!’’ उसने पुकारा -‘‘आप भी तो गये थे उससे मिलने। आपको कैसा लगा?’’

‘‘अच्छा हैं।’’

‘‘लगता है वह आपको पसन्द नही आया।’’ शायद उसने मेरे शब्दो मे छिपी नीरसता को भाँ प लिया था।

मैंने उसे कोई जवाब नही दिया जबकि वह देर तक मेरी ओर देखती रही।

‘‘एक बात पॅूछू आपसे?’’ थोड़ी देर बाद मैंने कहा।

‘‘पूछिये।’’

‘‘आप धर्म परिवर्तन से परहेज नहीं करती?’’

‘‘धर्म परिवर्तन!’’मेरी बात सुनी तो वह एकाएक जोर से हँस पडी -‘‘लगता है राज! इस मामले में आप भी पुराने ख्याल ही रखते है।’’

‘‘कह सकती है आप।’’ मैंने कहा -‘‘मगर मुझे लगता है कि धर्म हमारे पूर्वजो की जागीर है जिसके लिए उन्होने न जाने कितना बलिदान दिया होगा तब जाकर इसे अपने मूलस्वरूप मे इसे सहेज कर रख पायें हैं… और जो अब हमारी जिम्मेदारी है।’’

मेरे इस बात पर एकाएक उसकी खामोशी बता रही थी कि वह मेरी बात से सहमत नहीं है। मुझे उसका यह व्यवहार अच्छा नही लगा। मैने विस्तर पर लेट कर करवट ले ली।

चंद क्षणों तक, वह कुछ सोचती रही। फिर एकाएक अपने गाउन को सम्भालते हुए उठी और तीव्रता से आकर मेरे विस्तर में बैठ गयी। मुझे उसकी यह हरकत अच्छी नही लगी। मैं उठ कर बैठ गया।

‘‘क्या हुआ राज?’’ उसकी आँखों मे शरारत उतर आयी, बोली -‘‘लगता है आपको औरतें पसन्द नही है? या फिर उनसे डरते है?’’

‘‘ज्ज्…जी हाँ डरता हॅू मैं, बहुत डरता हॅू।’’ मैं हकला पड़ा -‘‘अ…आप मेरे विस्तर से हटिए स…सोफे पर बैठिए… दूर बैठिए मुझसे।’’

‘‘ठीक है, ठीक है।’’ वह हॅसते हुए बोली -‘‘मै उठी जा रही हॅू। आप घबराइए नहीं, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है मैं… मैं तो…।’’ वह विस्तर से उतर कर फर्स पर खड़ी हो गयी। फिर देर तक अजीब सी निगाहो से मेरी ओर देखती रही। उसके होंठो पर मुस्कान अब भी बरकरार थी।

‘‘राज।’’ वह एकाएक बोल पड़ी -‘‘क्या वाकई अभी तक आपको किसी चीज का कोई असर नहीं हुआ है?’’

‘‘क…क्या मतलब?’’ मेरा बदन झनझना उठा।

वह हँस कर कहने लगी -‘‘डाक्टर ने तो कहा था 15 मिनट में असर दिखाना शुरू कर देती है परन्तु आप तो।’’

‘‘मतलब?’’ मैंने संसय भरी निगाहो से उसकी ओर देखा।

‘‘ओह…।’’ अचानक उसे कुछ याद आया। वह तीव्रता से विस्तर पर चढ़ी और अपने गाउन के जल्दी-जल्दी ऊपरी तीन चार बटन खोल दिये। बटन खुलते ही चंद कपड़ो में सिमटी चांदनी मचलती उफान भरती हुई हवा में लहरा पड़ी। मैं उठकर वहाँ से हट पाता उससे पहले वह उत्तेजना में झुक आयी थी मेरी छाती तक।

रात कब और किस तरह गुजर गयी थी नशे में पता ही नही चला। जब नीद खुली तो सुबह का नौ बज रहा था। मैं विस्तर से जल्दी-जल्दी उठना चाहा तो एक बारगी लगा कि लड़खड़ा कर गिर जाऊॅगा। किसी तरह संभल कर उठा और विस्तर पर नजर गयी तो मुझे अपना सर पीटना पड़ा। रात मे विस्तर को बुरी तरह रौदा गया था जिसके निशान अब भी चीख चीख कर उसकी गवाहियाँ  दे रहे थे। मैं देर तक खाली-खाली नजरों से बिस्तर की ओर देखता रहा। उस वक्त विस्तर की हर भाषा मुझे समझ आ रही थी।

तभी….

अचानक दरवाजे पर मुझे किसी के कदमो की आहट महसूस हुई। मैंने पलट कर देखा। मेरे सामने खुशबू हाँथ में चाय का कप थामे हुए किसी अदाकारा की तरह मुस्कराती हुई खडी थी। मुझे अपनी ओर निहारता हुआ देखी तो उसके होंठो पर छायी मुस्कान का खिचाव बढ़ता चला गया। हँस कर बोली -‘‘मि0 राज! आपका ड्राइवर गेस्टरूम में आपका इन्तजार कर रहा है।’’

मै उसकी आधी-अधूरी बात सुनी भी कि नहीं, यकीन से नही कह सकता मगर अन्दर ही अन्दर कितना तड़पा उसका मुझे जरूर अनुमान था। वह लहराती हुई जैसे ही मेरे इतने करीब आयी कि मै उसे छू पाता, मेरा हाँथहवा मे लहराया – तड़ाक-तड़ाक! उसके गाल पर मेरे हाँ थो की तस्वीर छप गयी। चाय का कप उसके हाँथ से गिरा टूटा और फर्स पर विखर गया।

‘‘वैश्या कही की।’’ दाँ त भीचते हुए मैं चिग्घाड पड़ा। सच कहूँ तो उस वक्त मेरी आंखो में खून उतर आया था -‘‘तुझसे बेहतर तो बजारू औरतें है। वे कम से कम तुम्हारे जैसे सराफत का चोगा ओढकर नारी समाज को इस तरह बदनाम तो नहीं करती। अच्छा ही हुआ मेरा दोस्त आजाद हो गया तुम्हारे जाल से।’’

मै तेजी से हैंगर की ओर लपका था, शर्ट निकाली और उसे पहनता हुआ सीढ़िया उतरने लगा।

******

मुझे शीघ्र ही दिल्ली पहुँचना था। भइया के पास कुछ खास वक्त नही गुजार पाया। स्टेशन पहुँच कर मुझे लगा कि शिवी को फोन कर लेना चाहिए। शिवी मेरा इन्तजार कर रही होगी। फिर कल से उसे दो तीन कॉल से ज्यादा किया भी तो नहीं था। वह कितनी चिन्तित होगी? मैं पी0सी0ओ0 की ओर बढ़ गया। फोन पर शिवी ने जो कुछ बताया, उस पर पलभर के लिए तो मुझे विश्वास नही हुआ। मैं खुसी से हाँफते हुए चिल्लाया -‘‘शिवी क्या तुम सच बोल रही हो?’’

‘‘जी।’’ शिवी ने मुझे फोन पर बताया कि संजय हमारे घर आ गये है और मेरा इन्तजार कर रहे हैं।

‘‘मै आ रहा हॅू, संजय को घर पर ही रोक कर रखना।’’ मैने जैसे तैसे रिसीवर रखा। मीटर पर फोन का बिल देखा। उसमें दो रूपये अंकित था। मैंने हड़बडी में जेब से पाँच का सिक्का निकाला, दुकानदार को थमाया और आगे  बढ़ गया। उस दिन मुझे पहली बार ऐसा लग रहा था कि दिल्ली कितनी दूर है। मैं अपने दोस्त से मिलने के लिए पागल था। जैसे-तैसे शाम ढलते-ढलते मैं घर पहुँच गया। मुझे घर पर जनरेटर की आवाज सुनाई पडी -‘‘ओह ये लाइट भी।’’ मैं मन ही मन बड़बड़ाया।

अगले पल, मेरी उंगलिया लाइट बोर्ड पर थी।

अन्दर डोर बेल चिल्ला उठी-

कुछ ही पलों मे शिवी मेरे सामने थी। नजरे टकराई तो मेरे दिल पर सैलाब फट पडा। वह मुस्करा रही थी।

‘‘अब दरवाजा भी खुलेगा या यॅू ही शरमाती रहोगी?’’ मैं ने हॅसकर कहा।

‘‘वो… हाँ ।’’ जैसे उसे एकाएक याद आ गया हो। वह हँस पड़ी। दरवाजा खुलते ही, मैं उसे अपनी बाहों में झपट लिया।

‘‘संजू कहा है?’’ सहसा मुझे याद आया।

‘‘गेस्टरूम में बैठे हुए कुछ लिख रहे है।’’

‘‘लिख रहा है?’’ मैंने हैरानी से शिवी की ओर देखा। तभी अचानक मुझे याद आया कि वह क्या लिख रहा होगा? डायरी लिखने की उसे बचपन से ही आदत थी। मैं लम्बे कदमो से लांघता हुआ गेस्ट रूम की ओर बढ गया। दरवाजे पर कदम रखा तो एकाएक मेरी जान निकल गयी। एक दुबला पतला इंसान मेरी निगाहों के सामने बैठा हुआ था। मै हैरान हो उठा- ’क्या वह सचमुच संजय ही है?’ मैं चंद क्षणो तक एकटक उसकी ओर देखता रहा। 

‘‘संजू।’’ फिर अचानक मैने आवाज दी तो वह मुड़ कर मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मुझे जानता ही न हो। मुझे लगा कि डायरी लिखते लिखते वह अपने खयालों में डूब गया होगा परन्तु देर तक जब वह अपनी धसी-धसी निगाहों से मेरी ओर बस ताकता रहा तो मुझे बोलना पड़ा -‘‘यार संजू! मैं हूँ तुम्हारा दोस्त, राज… राज हॅू मैं।’’

‘‘आओ राज।’’ उसके सूखे हुए होंठो पर फीकी सी मुस्कान दौड़ पड़ी -‘‘मै पहचानता हॅू यार। तुम्हे अपना परिचय देने की जरूरत नही है।’’

उस समय उसका वह व्यवहार मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नही था। मैं सारी रास्ता सोचता आया था। जब हम इतने दिनों बाद मिलेंगे तो कालेज के जमाने की तरह वह झपट कर मुझसे लिपट जायेगा। पीठ पर तेजी से थपथपाएगा और फिर इतने दिनों से खबर न लेने के लिये शिकवा शिकायत करेगा, नाराज होने का अभिनय करेगा। लेकिन उसने? उसने क्या किया…? ठीक से बोला भी तो नहीं।

उस वक्त मैं अपने सारे सपने समेटकर वही दरवाजे पर दफन कर दिया और अपने गले में फसी टाई को ढीली करते हुए आगे बढ गया। मैं जैसे ही उसके इतना करीब पहुचा कि वह मुझे छू पाता वह तीव्रता से उठा और छलांग लगाकर मेरे बदन से लिपट गया। उसके मुँह से अचानक एक जोरदार चीख निकली और आँ खे पानी उलेडना शुरू कर दी।

‘‘ये सब कैसे हो गया संजू?’’ कहते हुए मेरा भी गला रुँध गया।

मेरे रूवासे स्वर सुने तो वह अपनी बाहों में मुझे और भी कस लिया और चिग्घाड कर रो पड़ा। कहने लगा -‘‘मुझ पर सारे झूठे आरोप लगाये गये हैं। मैने कुछ नहीं किया… कुछ नहीं किया मैने… नहीं किया राज मैंने कुछ …मुझे बचा लो राज… बचा लो मुझे।’’

‘‘संजय।’’ मेरी बांहो का कसाव बढ़ता चला गया -‘‘मै बचाऊगा यार तुम्हे… मैं बचाऊॅगा। तुम फिक्र मत करो।’’

कुछ देर की सांत्वना के बाद वह मुझसे अलग हो गया।

‘‘बैठो संजय।’’ उसका कंधा पकड़ कर मैने उसे सोफे पर बिठा दिया। उसकी दाहिनी हॅथेली चेहरे के सामने मुडी हुई थी। मैं उसकी आँ खो को देख नहीं पा रहा था। उसकी आँ खे शायद आँ शुओ को अब भी नही थाम पा रही थी।

‘‘संजय।’’ मै तड़प उठा -‘‘धर्य रखो। जिन्दगी के एक बार उजड़ जाने से जिन्दगी खत्म नही हो जाती।’’

‘‘राज! तुम सही कहा करते थे कि जिन्दगी को गम्भीरता से लो। अन्धे बन कर आधुनिकता के पीछे मत भागो वर्ना एक दिन यही जिन्दगी तुम्हे तबाह कर देगी। देखो न राज मेरी जिन्दगी ने मुझे सचमुच तबाह कर दिया।’’

मै खामोश रहा-

‘‘पंखुड़ी को बड़ी बेरहमी से मारा गया है और मैं जानता हॅू कि यह कत्ल किसने किया है मगर फिर भी उसका कुछ नही कर पा रहा हॅू। हद ये है कि कत्ल के चंद दिनो मे ही पीड़ित गुनहगार बना बैठा है और गुनहगार पीड़ित।’’

‘‘संजय तुम सचमुच जानते हो कि पंखुड़ी को किसने मारा हैं?’’

‘‘हाँ राज, मैं जानता हॅू।’’

‘‘कि… किसने?’’ मैं अचानक उत्तेजित हो उठा -‘‘बताओ संजय किसने मारा है?’’

‘‘इकबाल अंसारी।’’ लम्बी सांस भरते हुए उसने देखा मेरी ओर -‘‘हाँ, राज, उसी ने मारा है पंखुड़ी को। वही है हत्यारा….वही है।’’

‘‘इकबाल अंसारी!’’ उसका नाम सुनते ही मेरा माथा ठनक उठा। इकबाल अंसारी के लिए काम करने वाला उस वृद्व का वह वाक्य मेरी आँ खे के सामने नाचने लगा -‘‘महानुभाव! मै समझता हॅू साहब से मिलना संजय साहब के लिये और परेशानी खड़ा करने जैसा होगा।’’ हाँ यही तो कहा था उसने। उस वक्त मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था। मैंने उस जालिम की सूरत क्यों नहीं देखी?

‘‘संजय।’’ मैने उसे पुकारा -‘‘तुम कैसे कह सकते हो कि पंखुड़ी का कातिल वही है।’’

कुछ पलो तक संजय मेरी ओर एकटक देखता रहा। उसके चेहरे के भाव तीव्रता से बदल रहे थे। थोड़ी देर की खामोशी के बाद उसने कहा -‘‘उस दिन अंसारी खुद गया था मेरे पास, यह कहने कि वह लड़की मुझे जरा भी पसन्द नहीं है, चलकर उठा लाओ उसे वर्ना…।’’

‘‘अच्छा… तो तुम गये?’’

‘‘नहीं…मैं उस समय नहीं गया। उसने शाम को बुलाया था।’’

‘‘जब तुम पंखुडी के पास पहुचे थे तो क्या हुआ?’’

‘‘उस समय तक वह मर चुकी थी। मेरे ही बेडरूम मे।‘‘

‘‘उस वक्त खुशबू कहाँ थी?’’

‘‘पता नही… शायद ऑफिस मे थी। मैं इससे पहले अपनी बेटी को उठाकर उसके लाश पर अपने आँसू बहा पाता उसी समय एकाएक वहाँ पुलिस आ गयी।’’

फिर जो घटना क्रम उसने बताया उससे मैं इकबाल अंसारी की साजिस समझ गया -‘‘शिवी!’’ मैंने पुकारा।

‘‘आ रही हॅू।’’ अन्दर से आवाज आयी।

अगले पल हाँथ मे चाय की प्लेट थामे हुए शिवी मेरे सामने खड़ी थी। मैंने कुछ कहा नही मगर चाय की ही तो मुझे तमन्ना थी -‘‘ओह… शिवी…शिवी…शिवी! एक सांस में मैं उसके नाम को कई बार दोहरा गया। मुझे उस पर बहुत प्यार आया था।

‘‘संजय चाय!’’ मैंने चाय का कप उसकी ओर बढ़ाते कहा। वह चौंक कर देखा मेरी ओर… पलकें उठते ही पानी की चंद बूदें फर्स पर टपक पड़ी। इस बार मैंने कुछ नहीं कहा।

उसने चाय थाम ली-

नमकीन और विस्कुट की प्लेट मैने उसकी ओर सरका दी। प्लेट पर रखे हुए दूसरे कप को, शिवी ने मेरी ओर बढा दिया।

‘‘तुम्हारी चाय?’’ प्रश्नपूर्ण निगाहो से मैंने देखा उसकी ओर।

‘‘मेरा कप अन्दर कीचेन में है।’’

हालाकि मेरी इच्छा थी वह मेरे पास बैठ कर चाय पिये मगर संजय की वजह से उसके अन्दर हिचक थी। देर तक हम चाय पीते रहे। हमारे बीच कोई संवाद नहीं हुआ।

सिर्फ खामोसी… खामोसी… और खामोसी…

‘‘संजय!’’ मैने काफी देर बाद उसे पुकारा-‘‘आगे का क्या प्लान है?’’

‘‘मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मै क्या करू… कहाँ जाऊँ… कैसे बचाऊ खुद को। पुलिस मेरे पीछे पागल कुत्ते की तरह पड़ी हुई है। मेरे पास अब और क्षमता नहीं बची है भागने के लिये।’’

‘‘मेरे यार।’’ मेरी जुवां रो पड़ी -‘‘तुम्हे परेशान होने की जरुरत नही है और न ही कही जाने की जरूरत है। तुम यही रहो मेरे घर पर। अब मैं दौडूँगा, जो करना होगा मै करूँ गा। मैं कानून से तुम्हारे लिए खुद लडूगा।’’

मेरा इतना सा आश्वासन सुनते ही वह भावुक हो उठा। मेरे हाँ थों को अपनी हॅथेली में भरते हुए बोला -‘‘राज, आज भी तुम वैसे ही हो। जरा नहीं बदले। इतना दौलत मंद होते हुए भी।’’

‘‘संजय।’’ भरी भरी आँ खो से मैंने कहा -‘‘दौलत इंसान को नहीं बदलती… सिर्फ रहने के ढंग को बदल देती है।’’

वह मेरी ओर देखने लगा -‘‘राज! मैं कभी-कभी सोचता हॅू- कौन हो तुम? इंसान… गुरू या खुद भगवान… क्या कहॅू तुम्हें? मैं सचमुच बहुत नसीब वाला हॅू। काश! हर किसी को तुम्हारे जैसा दोस्त मिले।’’

उसकी उस वक्त की बातों पर मुझे रोना आ रहा था। मेरे जरा से आश्वासन पर उसने अपने सर पर कितने बड़े एहसान का पुलिन्दा रख लिया था।

‘‘संजय! मैं कानून से लड सकू… इसके लिये मुझे पूरी घटना के बारे में बिस्तार से जानने की आवश्यकता है। क्या तुम मुझे उसके बारे मे कुछ बता सकते हो?’’

वह पलभर लिए खाली खाली आँखों से मेरी ओर देखता रहा। उसकी आँ खे अब भी गीली थी। काँपते होंठो से बोला -‘‘राज मेरे होंठों में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि मैं तुम्हारे सामने उन भयानक पलों को दोबारा कह सकूं।’’

‘‘तो?’’ प्रश्नसूचक निगाहों से मैने उसकी ओर देखा तो उसने मेरी ओर अपनी डायरी बढा दी, बोला -‘‘हो सकता है कुछ परिस्थितियों के दबाव में आकर मैं तुम्हारे सामने झूठ बोल जाऊँ मगर यह डायरी मेरी जिन्दगी की घटनाओ का संग्रह है। यह झूठ नही बोलेगी, इसे पढ़ लो।’’

‘‘संजय!’’ मैं चौंक पड़ा -‘‘ये तुम्हारे जिन्दगी के व्यक्तिगत और सार्वजनिक घटनाओ का पुलिन्दा है इसे मैं कैसे पढ़ सकता हॅू?’’

‘‘राज, आज तक मैने कभी कोई बात छुपायी है तुमसे जो आज ऐसा कह रहे हो?’’ उसने भरी भरी नजरों से मेरी ओर देखा -‘‘तुम इसे पढ़ सकते हो।’’

मैने अपनी कांपती उॅगुलियों से डायरी थाम ली।

बातो ही बातो में घंटो गुजर गये थे उस दौरान शिवी एक बार भी बाहर नही आयी। मैं वेचैन हो उठा।

‘‘एक मिनट।’’ मैंने संजय से क्षमा मांगी और अन्दर चला गया -‘‘शिवी।’’ आगन पहुँच कर मैं ने आवाज दी।

‘‘जी…आती हॅू।’’ एक रुवासा सा स्वर मेरे कानो को छुआ तो मैं काँप उठा। मैं उसके रोने के कारण को समझ पाता उससे पहले वह आकर मेरे सामने खड़ी हो गयी। लाल आँखें…. मुरझाया हुआ चेहरा….भीगी भीगी पलके…शायद वह अभी अभी रोकर आयी थी।

‘‘तुम रो रही थी?’’ मैं ने पूछा तो वह एकदम से आकर मेरे बदन से चिपक गयी। किसी अनहोनी की आशंका पर मेरा बदन थर्रा उठा -‘‘शिवी, मुझसे कोई गलती हो गयी?’’ मैंने पूँछा।

‘‘आप ऐसा मत कहिए।’’ उसकी पकड़ और मजबूत हो गयी -‘‘ये मेरी खुशनसीबी है कि आप मेरे जिन्दगी मे आये।’’ मै उसे खुद से अलग करने की कोशिश की तो वह और मजबूती से मुझे जकड़ लिया। रोते हुए बोली -‘‘क्या इन सब में मेरे करने लायक कुछ भी नहीं है जिससे मै आपके आँसुओं को अपनी आँखों मे भर लू?’’ वह सिसक उठी -‘‘राज, मैं आपके आँ शुओ को नहीं देख पाती, यह आप जानते हैं न।’’

‘‘हाँ शिवी जानता हॅू।’’ मैं उसके रोने के कारण को समझ गया। वह दुखी थी संजय के हालात पर… मगर शायद उससे भी ज्यादा मेरी बेवसी पर।

‘वह क्यों इतनी अच्छी है?’ मैंने एक बार फिर उसे गले से लगा लिया। मेरी बाहों का कसाव बढा तो वह कसमसा उठी। यह कोई नया मौका नही था मेरे लिए। इसके पहले भी किसी बात को लेकर यदि मेरे आँ खो में पानी की एक बूंद भी आती तो शिवी की आँखें बरस पड़ती।

******

बातो ही बातो में कितना वक्त गुजर गया- पता ही नही चला।

लगभग ग्यारह बजे, खाना-पीना करके खाली हुए तो मैंने संजय को विस्तर पर जाने का आग्रह किया और मै संजय की उस डायरी को लेकर अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गया।

मैं कह नही सकता कि मैं उत्सुक था या परेशान। मैं उन पन्नो को पलटने जा रहा था जिसके गर्भ मे संजय की जिन्दगी का एक लम्बा दौर समाया हुआ है। जिसमें कैद थे उसके वो हालात जो उसके तलाक के कारण बन गये…. वो बेरहम पल जिन्होने उसकी बेटी पंखुड़ी की जिन्दगी की छीन ली। उस डायरी में संजय के उन लम्हो का भी जिक्र था जिसमें कालेज के खूबसूरत किस्से, सरारते और ऊलजलूल हरकते भरी हुई थी। प्रिया, नीतू समेत ऐसी बहुत सी लडकियाँ  जो उसकी विवाहित जिन्दगी में तो सामिल नहीं हो पायी मगर उसके अतीत का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं… उस डायरी के महत्वपूर्ण किरदार थे। हालाकि उसकी कालेज की जिन्दगी का एक महत्वपूर्ण किरदार मैं भी था इसलिए बहुत गुंजाइस है कि इस डायरी में ‘राज’ की भूमिका के रूप में मेरा भी जिक्र हो।

डायरी संजय की है इसलिए डायरी के प्रथम पेज से ही ‘मै’ शब्द का प्रयोग संजय के लिये निर्धारित होगा।

                                 =   डायरी =

जुलाई की सुबह। कालेज का प्रथम दिन। नये-नये चेहरो से मुलाकात। रैगिंग की भयावह तश्वीर। मै यानि कि संजय पाठक अंदर से डरा हुआ था। अपने  हर कदम पर मैं चैक पड़ता कि शायद कोई सीनियर छात्र मुझे रोकने की कोशिश कर रहा है। मै डरी सहमी तिरक्षी निगाहो से पीछे की ओर निहारता और किसी के न होने के एहसास पर सकून की सांस भरता। इससे पहले कि सांस उलट कर लौट पाती फिर वही डर… वही कॅपकपी। अब तक मैं कालेज के गेट को लांघ कर कालेज के कैम्पस के उस हिस्से में दाखिल हो चुका था जहाँ  से कालेज की ऊॅची इमारत शुरू हो रही थी। छात्र छात्राओं की चहल कदमी से भरा गलियारा… बीच-बीच एक दूसरे को छेड़ती अदाओं की चमकती बिजलियाँ ।

कालेज के आखिरी छोर की सीमाओं से विखरे बगीचे की गली को मैं अभी पार कर पाता उससे पहले जाने मुझे कैसी आहट का एहसास हुआ- बदन थरथरा कर रह गया। मै समझ नही पाया कि एकाएक मेरे पीछे आ रहे वे सीनियर छात्र कहाँ से टपक पडे़ थे?

‘‘ये मिस्टर!’’ स्वर मेरे पीछे से प्रस्फुटित हुआ। सच कहॅू तो उस वक्त मै इतना घबरा गया था कि यदि मेरे सामने धरती फट पड़ती तो, सीनियर छात्रों का सामना करने से बेहतर मैं उसमें समा जाना उचित समझता।

मैं पलट कर खड़ा हो गया। डरी सहमी निगाहों से उनकी ओर देखा -‘‘नीचे देखो।’’ उनमे से किसी ने कहा।

‘‘बेटा, अपनी नजरें तीसरी बटन पर रखो… अपने शर्ट की तीसरी बटन।’’ स्वर दूसरे छात्र का था।

‘‘रैगिंग!’’ मैं कपकपा उठा-

फिलहाल उस वक्त मेरे लिये ‘तीसरी बटन’ एक नया शब्द था फिर भी उनका तात्पर्य मैं समझ गया। सारे घेरा बना कर मेरे चारो ओर खड़े हो गये।

.‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ उन्होने पूँछा। सवाल किस छात्र ने किया, मुझे पता नही चला।

‘‘संजय पाठक।’’ मैंने उत्तर दिया।

‘‘बाप का नाम?’’

‘‘दिनेश पाठक!’’

‘‘माँ?’’

‘‘शशिप्रभा पाठक!’’

‘‘गुड! अच्छे नाम है।’’ उनमें से किसी एक ने कहा।

‘‘मै जाऊँ सर?’’ अगला सवाल न होने की तसल्ली पर मैंने पूछा।

‘‘अरे-अरे रूको! इतनी जल्दबाजी काहे मचाये पड़े हो?’’ वह तीव्र स्वर पीछे खड़े हुए किसी और सीनियर छात्र का था -‘‘जरा हमसे भी मिलते जाओ।’’

मुझे ठहरना पड़ा-

उसने अपने आगे खड़े लड़के को एक तरफ ढकेलकर आगे आते हुए बोला -‘‘सर से पूछो आपके बाल इतने लम्बे क्यों है?’’

मेरी निगाहें तीसरी बटन पर टिकी रही। सहमी हुई आवाज मे मैंने उनके द्वारा आदेश मे मिले सवाल को दोहरा दिया -‘‘सर आपके बाल इतने लम्बेक्यों है?’’

मेरे इस अंदाज पर सामने खड़ा एक छात्र भड़क गया, उसने बगैर किसी लिहाज के मेरी दाढ़ी पकड़ी और ऊपर उठाकर एक छात्र की ओर संकेत करते हुए कहा -‘‘अमे यार इधर देखो… इनसे पूँछना है।’’

चंद क्षणो तक मैं उसकी ओर हैरानी से देखता रहा। वाकई उसके बाल एक मध्यम लम्बाई के बाल रखने वाली किसी लड़की से कम नही रहे होंगे। वह उन चंद क्षणों के दौरान अपने वालो को कई बार सवारा।

‘‘सर, आपके बाल इतने बडे़ क्यों है?’’ मैं डरते हुए अपने सवाल को दोहरा दिया।

तड़ाक… तड़ाक! अकस्मात ही उस सीनियर का हाँथ उठा और मेरे गालो को खरोचता हुआ निकल गया।

मैं कुछ समझ पाता उससे पहले एक ने चिल्लाया -‘‘निगाहे नीचे, तीसरे बटन पर।’’

आप यकीन नहीं करेंगे कि वर्षो बाद आज किसी के हाँथ इतनी बेरहमी से मेरे गालो को छुए थे। मैं अन्दर ही अन्दर उबल पड़ा, जो जल्द ही आँ शुओ की शक्ल मे आँखों में छलछला पडे़। मैंने उन्हे रोकने की कोशिश मे अपनी पलके गिरा ली।

कालेज का दूसरा दिन- रैगिंग का दूसरा अंदाज।

उस दिन मुझे इतना जरूर मालूम हो गया था कि मेरी कक्षाए किधर है। उसके लिये सरलतम् मार्ग कौन-सा अपनाऊ, जो सीनियर छात्रों की निगाहे में न आ सके। मैं कालेज की लम्बी चैड़ी सीमाओं से लगी छोटी छोटी इमारतों की आड़ लेता हुआ तीव्रता से आगे बढ़ रहा था।

‘‘रुको।’’ मेरी कक्षा के सामने दम तोड़ती उन सीढ़ियों को अभी मैं छू पाता, एकाएक मेरे कानो पर एक तीखी आवाज गूँ ज पड़ी। मैं ठहर गया। पीछे मुड़ कर देखा तो बदन एक बार फिर झनझना उठा। मुझसे 10-12 मीटर की दूरी पर पथरीली दीवार से सटी एक लड़की जो लगभग मेरी ही उम्र की थी, बडी हसरत से मेरी ओर देखे जा रही थी।

‘‘इधर आओ!’’ हवा मे उसकी उॅगली लहराई तो थोड़ी देर तक मैं असमंजस की स्थिति मे एकटक उसे घूरता रहा। गोरा छहछरा बदन, तंग कपडे, उलझी उलझी-सी लटे, गुलाबी होंठों पर धूमिल किन्तु कातिल मुस्कान। मैं बदहवास सा उसके पास चला गया। मेरी निगाहे तंग कपडो की सीमाओं से सरकती हुई छलकती फिजाओ को पार कर अन्दर तक घुस जाना चाहती थी मगर एकाएक उसने रोक लिया। मुझे अपनी ओर यॅू टकटकी निगाहों से देखता हुआ देख वह चुटकी बजाते हुए बोली -‘‘ऐ मिस्टर अपनी नजरो को काबू मे रखो। मैं तुम्हारी सीनियर हॅू।’’

उफ! मेरी नजरे बिजली की गति से ऐसे झुकी कि पलभर के लिए लगा कि जमीन को चीर कर नीचे पताल तक धस जायेगी।

‘‘सॉरी मैडम!’’ मैं मुस्किल से कह पाया।

‘‘इट्स ओ0के!’’ वह तेवर ढ़ीले पड गये। छिपी निगाहो से मैंने उसके चेहरे को देखा। मुझे यॅू सहमा हुआ देख कर अचानक उसके चेहरे पर भीनी सी मुस्कुराहट दौड़ पड़ी, बोली -‘‘नाम?’’

‘‘जी?’’

‘‘मैंने पॅूछा… तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘संजय पाठक।’’

‘‘नाइस नेम… है न? संजय… पाठक।’’ उसके स्वर खनक उठा।

‘‘थैक्स।’’ मैंने आभार प्रकट किया तो वह खिलखिला पड़ीं। क्यों? मैं समझ नही पाया।

तभी एकाएक उसे कुछ याद आया। वह जरा गंभीर होते हुए बोली -‘‘संजय! क्या तुम्हे कालेज के नियमों के बारे में जानकारी कम है?’’

‘‘मतलब?’’ मेरी नजरें उसके चेहरे पर जा टिकी।

‘‘टाई इतनी ढीली क्यों है?’’ उसने टाई पकड़ कर मुझे अपनी ओर खीचा। इतने करीब… कि मैं जरा सा हिलता डुलता भी तो मेरा बदन उसके बदन को छू लेता। मेरा हाल ऐसा हो गया कि कुछ पलो के लिए जैसे मेरी सांसे ठहर गयी हों। मैं एकटक उसके के चेहरे की ओर देखे जा रहा था।

मेरी इस घबराहट से आप इस बात का कतई अनुमान न लगाइएगा कि मेरे दिमाग मे बर्फ जम गयी रही होगी। वक्त जरूर असहज था मगर मैं निगाहो की तृष्णा को शान्त कर लेना चाहता था। मांसलता की प्यासी मेरी निगाहे उसके चेहरे से सरकती हुई ज्यों ही बदन के नाजुक हिस्से में घुसने की कोशिश की वह मेरी ढोंढ़ी को अपनी उॅगलियों के सहारे से उठाते हुए बोली -‘‘मिस्टर संजय! अगर बदन की तपन से निगाहे सेंक गयी हो तो जरा हमारे चेहरे की ओर भी देख लीजिए, दोबारा पहचानने मे आसानी होगी।’’

उसके लफ्ज मेरे कानो से टकराये तो मैं घबराहट मे बर्फ बन गया। मेरी इस अकस्मात की घबराहट पर उसके होंठो पर एक बार फिर गुलाबी मुस्कान तैर पड़ी। वह मेरी ओर झुकते हुए बोली -‘‘संजय एक बात बताओगे।’’

‘‘क्या?’’ मैं पॅूछना चाहा मगर होठों ने साथ नही दिया। दरअसल वह मेरे इतने करीब आ गयी थी कि कुछ पलो मे ही मेरी गर्म इन्द्रियों पर दौड़ रहा लहू भी शायद गर्म लावा बनने वाला था।

उसने मेरी स्वीकृति की परवाह नहीं किया, शरारती अंदाज मे बोली -‘‘मै तुम्हें कैसी लगती हॅू?’’

‘‘मैडम।’’ मैंने अर्थपूर्ण निगाहो से उसकी ओर देखा। उस वक्त मुझे लगा- हो न हो, मगर मुझमें ऐसा कुछ तो है जो उसे भी मेरे नजदीक आने के लिये मजबूर कर रहा है। ‘मगर क्या?’ मेरे पास इसका जवाब नही था। मैंने उसके सवाल का कोई जवाब नही दिया।

‘‘संजय।’’ वह मेरी आँखों मे झाकते हुए बोली -‘‘कुछ बोलोगे?’’

’‘ख्… खूबसूरत है आप… खूबसूरत।’’ मेरे होंठ कपकपा उठे।

‘‘ओह रियली?’’

‘‘य…यस मैम।’’ मैंने पलके झुका ली मगर निगाहे जैसे बगावत पर उतर आयी हो। वह एक बार फिर उसके बदन के नाजुक हिस्सो तक फिसल जाना चाहती थी।

वह थोड़ी देर तक मेरे चेहरे की ओर देखती रही। शायद वह उसे पढ़ना चाह रही थी।

‘‘संजय!’’ सहसा वह बोल पड़ी। मैंने चौंककर उसकी ओर देखा। उसके होंठो पर अब भी मुस्कान विखरी हुई थी -‘‘क्या तुम इन्हे छूना चाहोगे?’’

‘‘क्या…क्या कहा आपने?’’ मैंने अंजान बनने की कोशिश की। हालाकि मैं स्कूल के जमाने से ही उन लड़को मे से था जिसे लड़कियों के दिल की बात समझने के लिए शब्दो की जरूरत नही थी।

‘‘मैंने पूछा… मेरे बदन को छूना चाहोगे?’’ बेफ्रिक अंदाज में उसने एक बार फिर अपनी बात को दोहरा दिया।

वक्त को बारीकी से परखने वाला शख्स आज अपनी भावनाओं को समेट नहीं पा रहा था। मैं अब तक ऐसी तमाम लड़कियों से मिल चुका था जो कई बार मुझे ऐसा ही आँ फर दे चुकी थी मगर इतनी छोटी सी मुलाकात मे मिला यह पहला आँ फर था। मैं हैरान था, खुद को रोकना चाहता था मगर रोक नही पा रहा था।

वह मुस्करा रही थी- उसकी नजरें एकटक मेरे चेहरे पर टिकी रही।

मैंने पल भर के लिये सहमी सहमी सी निगाहो से इधर-उधर देखा। कालेज का वह हिस्सा लगभग सूना था। मैंने अपने थरथराते हाँथ अभी उठाया ही था कि एक जोरदार थप्पड़ मेरे गालो को लाल कर दिया।

‘‘बद्तमीज कहीं के।’’ वह एकाएक बिफर पड़ी -‘‘तुम यहाँ  पढ़ने आये हो, या फिर ये सब करने?’’ एकाएक उसका स्वर कर्कस हो गया। उसके होंठो पर बिखरी मुस्कान कही गायब गयी, बोली -‘‘इस कालेज में तुम्हे बहुत सी यूँ  ही तंग कपड़ों में इशारा करती हुई लड़किया मिल जायेगी और उस दौरान हजारो बार तुम्हे ऐसे ही इम्तिहान से गुजरना पड़ सकता है मगर तुम?’’ उसकी आँखें फैल गयी -‘‘तुम तो एक वार भी नही झेल सकते। तुम्हे शायद मामलू नही कि हर बार ऐसी अदा पर इसारा करती हुई वह लड़की तुम्हारी सीनियर छात्रा नहीं होगी जो तुम्हें राह दिखाए। वह तुम्हारी सहपाठी भी हो सकती है मिस्टर पाठक।’’

वह मेरी जिन्दगी का ऐसा पहला दौर नही था – जब लडकियों के मामले मे मुझे ऐसी शर्मिन्दगी झेलने पड़ी हो। दरअसल लड़कियां मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी। जिनके सामने आते ही अक्सर मैं बेसब्र हो जाया करता था मगर यह सबक इकलौता है जिसे आगे शायद ही भूल पाऊ।

******

मै पसीने से तरबतर कक्षा की ओर भागा। कक्षा शुरू हो चुकी थी।

‘‘सर, मे आई कम इन।’’ दरवाजे पर पहुँच कर मैंने हाँफते हुए कहा। सारी कक्षा हँस पड़ी। हालाकि अध्यापक ने कोई टिप्पणी नहीं की। मैंने कक्षा की एक छोर से दूसरे छोर तक निगाहें दौड़ाइ्र्र। कक्षा में छात्र-छात्राएं, यहाँ  वहाँ  छितराए हुए बैठे थे। छात्र-छात्राओं का एक दूसरे के बीच यॅू बैठना मेरे लिये नया अनुभव था। इससे पहले छात्र-छात्राओं की कक्षाए य तो अलग-अलग स्वतंत्र रूप से चला करती थी या फिर एक ही कक्षा में बैठने की व्यवस्था अलग-अलग हुआ करती थी- ‘लेकिन मैं कहाँ  बैठू?’ मुद्दा ये था। मैं अपने लिए सीट तलासने लगा।

कक्षा के अंतिम पंक्ति मे मुझे खाली सीट नजर आयी, तो मैं तेजी से उस ओर पलटा।

‘‘ये सुनो।’’ अचानक अध्यापक ने आवाज दी। मुझे ठहरना पड़ा -‘‘पीछे कहाँ जा रहे हो? यहाँ आओ, इधर… देखो अगली पंक्ति में सीट खाली है।’’

मैंने गर्दन घुमाकर अगली पंक्ति मे खाली सीट की ओर देखा। मेरे बदन में झुनझुनी दौड़ गयी। उस पंक्ति में सारी लड़कियाँ ही थी जिसके सबसे किनारे में एक सीट खाली थी।

‘मैं लड़की के बगल मे बैठूगा?’ मैं परेशान हो उठा। जी में आया, अध्यापक से साफतौर पर मना कर दूँ मगर मैं ऐसा नहीं कर सका। क्योंकि मैं जानता था कि ऐसा करने पर मैं पूरी तरह मजाक का मुद्दा बन जाऊॅगा।

मै चुपचाप बैठ गया।

मैंने छिपी हुई नजरो से अपने बगल में बैठी हुई उस लड़की की ओर देखा। वह मुस्करा रही थी, ‘लेकिन क्यों?’

कक्षा लगभग खत्म होने ही वाली थी मगर इस सवाल ने मेरे मन को एकाग्र नहीं होने दिया। मैं इस डर से भी डरा हुआ था, कि मेरी जरा सी असावधानी पर मेरा हाँथ कहीं उसे छू न जाए। मगर उसी दौरान उस लड़की ने जानबूझ कर कई बार किसी न किसी बहाने मुझे छूने की कोशिश की।

किसी तरह कक्षा समाप्त हुई तो उसे इस बात का एहसास दिलाने के लिये कि मुझे उसकी वह हरकत बिल्कुल पसन्द नहीं आयी’ मैंने घूरती हुई निगाहों उसे देखा।

******

अगला दिन-

कक्षा में कदम रखते ही वह आफत एक बार फिर मेरे गले पड़ गयी। जी हाँ वही लडकी जो कल मेरे बगल बैठी थी, मुझे देखते ही खिलखिला पडी।

‘‘तुम पागल हो क्या?’’ गुस्से से सुलगते हुए मैंने उसकी ओर देखा।

‘‘हाँ ।’’ पूरी बेहयाई के साथ उसने कहा और आकर मेरे सामने खड़ी हो गयी। फड़फड़ाती नजरों से थोड़ी देर तक मुझे देखती रही फिर मेरी ओर हाँथ बढ़ाते हुए बोली -‘‘हाँ य!’’

‘‘हाय।’’ मुझे भी कहना पडा, परन्तु मैंने उसका हाँथ नही थामा। मैं पलट कर जैसे ही पीछे खाली पड़ी सीटो की ओर बढने की कोशिश की तो उसने मेरा रास्ता रोक लिया, बोली -‘‘हाँथ तो मिला लो।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘यार मैं तुमसे दोस्ती करना चाहती हॅू।’’

‘‘दोस्ती! मुझसे!’’

‘‘क्यों तुम दोस्त बनने के लायक नही हो?

‘‘हॅू… मेरे अलावा भी यहाँ और भी तमाम लड़के है फिर मैं ही क्यों?’’ मैंने ठहर कर पॅूछा।

‘‘पता नही।’’  

`हालाकि मैं स्कूल के जमाने से ही ऐसी दिलफेंक लड़कियों का दीवाना था मगर आज? आज क्या कर रहा था मैं? मुझे खुद नही पता। एक दिन पहले सीनियर लड़की द्वारा दिलाए गये वे गुरू वचन रह-रह कर मेरे मस्तिष्क पर कौंध रहे थे। वह लड़की मेरी ओर उस वक्त जिस हसरत से देखकर मुस्करा रही थी। मुझे लगने लगा कि मैं अब ज्यादा देर सख्त नही रह सकता।

मैं इन विचारों अविचारों में अभी भटक ही रहा था कि अचानक किसी बात को कहने के लिये वह मेरी मेज पर टेक लेते हुए झुक कर खड़ी हो गयी। उसकी दोनो हॅथेलियो ने उसके गालो को थाम रखा था और दुपट्टा सरक कर गले मे फँ स गया। काश! उस वक्त मैं अपनी नजरो को सम्भाल पाता।

`‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ उसने मुस्करा कर पूछा।

‘‘तुमसे मतलब?’’ एक बार मैंने फिर अपनी बेरुखी बरकरार रखने की कोशिश की।

‘‘यार क्यों लड़कियो की तरह भाव खा रहे हो?’’ वह रीझकर बोली -‘‘मुझे अच्छा नहीं लगता।’’

‘‘तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो?’’

‘‘पता नही।’’ उसने शरारत से अपनी नाजुक उॅगुलियां मेरे गालो पर छुआ दी।

‘‘पता नही का क्या मतलब होता है?’’ मैंने झल्लाकर उसकी ओर देखा।

‘‘पता नही।’’ वह जोर से हँस पड़ी।

‘‘ये तो कोई बात नही हुई।’’

‘‘तुम मुझे अच्छे लगते हो।’’ कहते हुए वह पलट पड़ी -‘‘अब खुश?’’

उसकी इस शरारत पर मैं बस खाली-खाली निगाहों से उसे देखता रहा। मेरे पास कोई जवाब नही था।

‘‘हाँ, तुमने नाम नहीं बताया?’’ वह चलते चलते अचानक ठहर गयी।

‘‘संजय पाठक।’’ मुझे बताना पड़ा।

‘‘गुड।’’ वह मेरी ओर बढ़ते हुए बोली -‘‘अच्छा नाम है… संजय पाठक।’’

‘‘अच्छा तुम बताओं?’’ उसने पूछा -‘‘मेरा नाम क्या है?’’

‘‘मुझे क्या मालूम?’’

‘‘तो फिर पूछो ना?’’ मटक कर कहा उसने -‘‘पूछो…पूछो।’’

‘‘तो बता दो?’’

‘‘बता दो।’’ वह फिर चमकी -‘‘यार अच्छा तरीका है नाम पूछने का। और खुसमिजाज? वह तो कमाल की है आपकी। बेरूखी तो कहीं आप पर नजर ही नहीं आती।’’

मैंने कोई प्रतिक्रिया नही दी।

‘‘अच्छा मि0 पाठक।’’ वह पुनः मेज पर झुक आयी -‘‘एक बात बताओगे?’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम मुझसे इतनी बेरूखी क्यों पेश आ रहे हो? लड़कियाँ तुम्हे पसन्द नहीं है क्या? या फिर… लड़को में दिलचस्पी है?’’

‘‘पागल हो तुम।’’

‘‘मेरा नाम नीतू है। नीतू जयसवाल… पागल नही। समझे मिस्टर पाठक। अगर दोस्ती पसन्द है तो बोलो वर्ना मैं चली।’’ इतना कह कर वह सचमुच पलट पड़ी।

‘‘अरे ठहरो।’’ मैंने आवाज दी। वह नही रुकी तो मैंने पुकारा -‘‘नीतू।’’

‘‘तुमने मेरा नाम लिया?’’ वह लगभग भागती हुई लौटी मेरी ओर -‘‘एक बार फिर से पुकारो।’’

‘‘मुझे तुम्हारी दोस्ती मंजूर है… क्या तुम्हे मंजूर है?’’

‘‘मंजूर है… मंजूर है।’’ वह ऐसे उछल पड़ी जैसे एकाएक उसकी सबसे प्रिय वस्तु को किसी ने उसके सामने रख दी हो। वह तीव्र गति से मेज का चक्कर काटती हुई मेरे बगल में आकर धम्म से बैठ गयी। उसकी उस छुअन से मैं सिहर उठा।

******

नीतू जिस तरह महज एक एक्सीडेन्टल मुलाकात में मेरे इतने करीब आ गयी थी, चंद दिनो मे वह उसी तरह दूर जाती हुई भी नजर आयी।

प्रयोगात्मक कार्यो के लिये कक्षा में पाँच-पाँच छात्र-छात्राओं के समूह बनाये गये और जिसमें मैं और नीतू न सिर्फ अलग-अलग समूह में बल्कि अलग-अलग लैब में भी बांट दिये गये थे।

            हम अपने समूह के पाँच विद्यार्थियों में से तीन लड़के थे जबकि दो लड़किया। फिलहाल यहाँ मैं अपने समूह के लड़को का जिक्र करना जरूरी नहीं समझता मगर लडकियों के जिक्र किये बगैर मैं रह भी नहीं सकता। जब लिस्ट पर मैंने शिवानी तथा प्रिया दोनो लड़कियां का नाम पढ़ा तो बेचैन हो उठा। नीतू पिछले कुछ दिनो मे ही मेरे काफी करीब आ गयी थी और मुझे लग रहा था कि इन दोनो मे से किसी एक की जगह पर नीतू को होना चाहिए था।

            प्रयोग के पहले दिन प्रयोगशाला में मैं कुछ जल्दी ही पहुँच गया। उस समय तक हमारे समूह का बस एक ही लड़का पहुँच पाया था ।

‘‘हाय! आइ एम संजय पाठक।’’ मैने मुस्करा कर उसे अपना परिचय दिया।

‘‘राज! राज मलहोत्रा।’’ गहरी मुस्कुराहट के साथ उसने मुझसे हाँथ मिलाया। उसके बाद कुछ क्षणों तक छिड़ी चर्चा मे प्रयोग से जुड़े हुए सवाल और कई समस्याओं का उसने जिस अंदाज मे बेहिचक जवाब दिया, उससे मुझे मानना पड़ा कि वह एक प्रखर वुद्वि का संजीदा इंसान है।

‘‘आपसे मिल कर बहुत खुशी हुई।’’ मैंने एक बार फिर उसकी ओर हाँथ बढ़ाया।

‘‘मुझे भी।’’

10 मिनट बाद- प्रयोगशाला मे दूसरे समूह के छात्र लगातार दाखिल हो रहे थे मगर हमारे समूह के एक लड़का और दोनो लड़कियां अब भी नदारत थी।

हम दोनो ने कुछ ही मिनटों मे प्रयोग शुरू कर दिया –

तभी एकाएक हवा की गति से दोनों लड़किया प्रयोगशाला मे दाखिल होते हुए प्रयोग की मेज के पास आ खड़ी हुई। मैंने उनकी तरफ नही देखा मगर उनके वहाँ होने के एहसास की वजह से मेरे दिल की धड़कन अचानक बढ गयी। क्यो? मैं नही जानता।

‘‘ये पीली वाली तार धन शिरे से जुडनी चाहिए।’’ उनमे से किसी एक लड़की ने टिप्पणी की तो मजबूरन मुझे अपनी नजरे उठानी पडी। निगाहे उसके बदन को छू पायी, तो मेरे दिल की धड़कन जैसे धकड़ना भूल गयी हो। तंग कपड़ो मे यहाँ- वहाँ ढ़की हुई वह खूबसूरत मल्लिका एकाएक बिना किसी दस्तक के मेरे दिल मे उतर गयी। मेरी बदसवास निगाहे जहाँ  की तहाँ  ठहर कर रह गयी।

मुझे अपनी ओर यू तल्लीनता से निहारता देख वह लडकी बजाये लजाने शर्माने के, मेरे ध्यान को खुद से हटाकर कही और आकृष्ट करने की कोशिश करती हुई बोली -‘‘आपने वो लाल वाली तार भी गलत जगह जोड़ रखी है।’’ उसकी यह आवाज बेशक मेरे मस्तिष्क की नशो को छेड़ा मगर मेरी नजरो की एकाग्रता नही भंग कर पायी। मेरी निगाहें अब भी उसकी गर्दन के आस पास दौड़ लगाती रही। फिर जैसे ही नजरें सरकती हुई ढलान को पार करती वह मुस्करा पड़ी, बोली -‘‘मिस्टर आपका सारा प्रयोग ही गलत है।’’

‘‘जी?’’ मैं ऐसे चैक पड़ा जैसे किसी ने सारा समुन्दर का पानी मेरे उपर उलेड़ दिया हो -‘‘क…कहाँ? कहाँ गलत है?’’

मेरे इस अकस्मात चैकने और फिर हकलाने पर उसके पीछे छुपी खड़ी दूसरी लडकी जोर से हँस पडी। मैं उस कातिल हॅसी को करीब से देखता उससे उसने शरमाकर दुपट्टे से अपना चेहरा ढाप लिया।

‘‘इन तारो को आप ही जोड़ दीजिए।’’ इस पूरे सियापा पर मैं कोई प्रतिक्रिया देता उससे पहले राज बोल पड़ा।’’

‘‘जी जी आप ही जोड़ दीजिए।’’ मैंने भी उसकी बात को दोहरा दिया।

‘‘ओ0 के0 श्योर।’’ मेज की ओर बढ़ते हुए उसने कहा और वह झुक कर तारो को पिरोने लगी। उस पल उन फिजाओं में कितनी बिजलियाँ तड़पी होगी मैं खुद अंदाजा नहीं लगा सका। बस पागलोसा चमकती निगाहो से उन्हें देखता रहा। निगाहो की तृष्णा पूर्णतः शान्त हो पाती उससे पहले एकाएक हमारे ग्रुप का एक लड़का न जाने कहाँ से आ टपका। बगैर हमारी तरफ ध्यान दिये वह सीधा उस झुकी हुई लड़की की ओर बढ़ा और लपक कर अपनी हथेलियों से उसकी आँ खो को ढ़क लिया।

‘‘क… कौन?’’ पल भर के लिये वह लड़की हड़बडाई। फिर खड़ी होते हुए मुस्कुरा पड़ी, बोली -‘‘ओह… गौरव तुम।’’

‘‘प्रिया!’’ गौरव उछल कर उसके सामने आ गया -‘‘तुमने कैसे जान लिया कि यह मैं ही हॅू?’’

‘‘गौरव! तुम्हारी ऐसी यह पहली सरारत थोड़े है जो हम पहचान नही पायेगे। शायद तुम्हे यकीन न हो मि0 गौरव मगर हम तुम्हारी आहट भी पहचान लेते हैं। समझे तुम।’’

‘‘ओह… ऐसा।’’ पल भर के लिये वह चैकने का अभिनय किया फिर हो हो करके जोर से हॅस पड़ा।

उस पल मुझे उसकी किस्मत से कितनी जलन हुई होगी, एक तरफा इश्क करने वाला कोई सिरफिरा आशिक ही यह समझ सकता था। राज और शिवानी दोनो प्रयोग मे व्यस्त हो गये जबकि गौरव और प्रिया आपसी नोक झोक मे। और मैं? मैं देर तक एकटक गौरव की ओर देखता रहा- पगडण्डियों की तरह डेढा-मेढा सा बने उस इंसान मे ऐसी कौन-सी खूबी थी जो प्रिया जैसी खूबसूरत लड़की को वह इतनी पसन्द आ गयी थी। आँ खो पर मोटा चश्मा, तिरक्षा लम्बा सर, छोटे घुघराले बाल। चेहरा इतना काला, जैसे उस पर कालिख पुती हो। खड़ा होते वक्त वह 160 अंश पर झुक जाया करता था।

इतनी सिद्वत से मुझे अपनी ओर देखते हुए देख गौरव जरा सकुचाते हुए बोला -‘‘क्षमा कीजिएगा मेरी वजह से आप लोगो के प्रयोग में बाधा पहुँ ची।’’

‘‘अरे नही यार। ऐसा होता रहता है।’’ मैंने जबरजस्ती मुस्कुराने की कोशिश की।

‘‘थैक्यू।’’ कहते हुए उसने नाक तक सरक आये अपने मोटे चश्में को ऊपर चढ़ाया और फिर खाली-खाली निगाहों से प्रयोग की मेज पर विखरे समान की ओर गौर से देखने लगा।

प्रयोग करते हुए लगभग आधा घंटा गुजर चुका था मगर एक भी रीडिंग ठीक-ठाक नहीं हो पायी थी -‘क्या कर रहे हम?’ मन ही मन मैंने अफसोस जताया और अन्ततः उकता कर मुझे वहाँ से हट जाने के लिये सोचना पड़ा।

मैं पलट कर वहाँ से कहीं जाने के लिये उद्यत होता, सहसा एक जानी पहचानी आवाज मेरे कानो को छेड़ गयी।

मैंने घूम कर उधर देखा।

मुस्कराती लहराती हुई नीतू मेरी ओर लपकी आ रही थी।

‘‘हाय! उसने दूर से ही हवा मे हाँथ लहराया।

‘‘हाय!’’ मैंने भी अपना हाँथ हिला दिया। पास आयी तो मैंने पॅूछा -‘‘कैसी हो?’’

‘‘ठीक हॅू।’’ उसने मेरे दोनो हाँथ को थाम लिया, बोली -‘‘तुम सुनाओ।’’

‘‘मै कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा था? कहाँ थी तुम?’’ मैंने शिकायत भरे लहजे मे पॅूछा।

‘‘क्या? उसने चौंक कर मेरी ओर देखा -‘‘तुम… और मेरा इन्तजार?’’

‘‘और नहीं तो क्या?’’ मेरे स्वर में शरारत थी। मगर नीतू मेरे उन लफ्जो से तार-तार हो गयी। चंद क्षणो तक मुस्कराती हुई वह मेरी आँ खो में कुछ खोजने का प्रयत्न करती रही। फिर हॅसकर बोली -‘‘लगता है आज कुछ ज्यादा मेहरबान है साहब हम पर।’’

‘‘नही यार ऐसा नही है।’’ मैं मुस्कराया -‘‘वैसे सच बताऊ तो तुम्हारे करीब रहते-रहते कभी पता ही नही चला दूर जाने का एहसास क्या होता है?’’

‘‘संजय।’’ वह अचानक भावुक हो उठी -‘‘दरअसल आज मेरा पहला प्रैक्टिकल था न इस लिये कुछ ज्यादा ही व्यस्त थी।’’

‘‘पूरा हुआ?’’

‘‘कहाँ हुआ यार।’’ वह धीरे से हँस पड़ी -‘‘तुम्हारे बिना मन ही नहीं लग रहा था। जी मे आया चलकर तुम्हारा हाल चाल ले लू… इसलिए चली आयी?’’ कहती हुई वह मेज की ओर लपकी, और प्रयोग की निगरानी करती हुई बोली -‘‘यार संजय, यही प्रयोग तो हम लोग भी कर रहे थे।’’

‘‘कोई रीडिंग आयी थी?’’

‘‘हाँ … तीन चार रीडिंग तो सही-सही निकाल ही ली थी हम लोगों ने।’’

‘‘कुल निकालनी कितनी थी?’’

‘‘हमारे सर ने तो 6-7 रीडिंग के लिये कहा था।’’ तभी अचानक उसकी नजर हाँथ पर लगी घड़ी की ओर गयी तो वह चौंक कर बोली -‘‘संजय मुझे जरा जरूरी काम है, मुझे जाना होगा। मैं जल्दी ही तुमसे मिलती हॅूँ ।’’

यू आंधी सी आकर उसी रफ्तार में उसके लौट जाने पर मुझे ठीक से याद नही है कि मेरी क्या प्रतिक्रिया थी? मगर प्रिया जिस अंदाज मे हम दोनो को घूर रही थी उसकी वजह से मैं कुछ ज्यादा ही उत्साहित था। क्यों? मैं नही जानता।

प्रिया नीतू के लौटते कदमों को तब तक निहारती रही जब तक कि वह उसके आँ खो के सामने से ओझल नहीं हो गयी। नीतू का पीछा करती प्रिया की थकी हारी निगाहे जब वापस लौटी तो मुझ पर बरस पड़ी। कहने लगी -‘‘मिस्टर संजय पाठक! यही नाम है न आपका? आपकी इस राशलीला की बदौलत हम सबका प्रैक्टिकल अधूरा रह सकता है। इस बारे में सोचा है आपने?’’

‘‘मैंने क्या किया?’’ मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा।

‘‘कुछ नही किया आपने?’’ वह लगभग खीझते हुए बोली -‘‘आपने तो… छोड़िए मुझे आपसे बहस नही करनी।’’ वह विफरी विफरी निगाहो से मेरी ओर देखी फिर गुस्से में सुलगती हुई, वहाँ से निकल गयी।

उसका यूँ मेरी ओर देखना, गुस्से से पांव पटकना लड़कियों की इस भाषा से मैं अच्छी तरह से वाकिफ था। उसके चले जाने के बाद मैंने गौरव की ओर देखा -‘‘तुम्हारी प्रिया तो रूठ कर चली गयी यार।’’

‘‘तो मैं क्या करू?’’ कहते हुए वह भी वहाँ से निकल गया।

मैंने पलट कर राज की ओर देखा। मेरे चेहरे की मुस्कुराहट बढ़ गयी -‘‘क्या किस्मत वाला इंसान है यार ये गौरव।’’

‘‘किस्मत वाला नही पैसे वाला है।’’ राज ने मेरी ओर देखा।

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब ये कि प्रिया गौरव के साथ उसकी किस्मत की वजह से नही, उसके पैसे की वजह से है। वैसे तुमने गौरव की बाइक देखी है?’’

‘‘नही।’’

‘‘तो तितलिया तो देखी होगी? हर रसीले फूल के इर्द गिर्द मडराते हुए मिल जायेगी।’’

‘‘तितलियाँ?’’

‘‘हाँ, लड़कियों और तितलियों मे कुछ खास फर्क नही होता। लड़कियों के पीछे पैसे उडाओं, खुद की गाड़ी में घुमाओं, रेस्टोरेन्ट में खाना खिलाओं फिर देखो इनका हाल। खूबसूरत से खूबसूरत लड़कियां भी तितलियों सी मडरायेगी तुम्हारे चारो ओर।’’

‘‘ओह… लेकिन अगर लड़का अमीर नही है तो?’’

‘‘तो पहले पैसे कमाना सीखो या फिर पैसे वाला बाप खोजो।’’

‘‘मतलब… अभी हमारा कोई चान्स नही है?’’

‘‘हा…हा…हा…।’’ वह जोर से हँस पड़ा -‘‘तुम उन्हे खोजो जिन्हे अमीर लड़के नही मिल पा रहे हैं या फिर उन्हे जो खुद अमीर हो।’’

‘‘वाह! तुम तो कमाल हो यार। तुम तो लड़कियो की फिजिक्स केमेस्ट्री सब जानते हो।’’

‘‘ऐसा नही है संजू… संसार मे इंसान की फितरत ही ऐसा अपवाद जहाँ न फिजिक्स काम करती है न केमेस्ट्री। मतलब इंसान की फितरत के सामने विज्ञान के सारे नियम फेल हो जाते हैं। कुछ मामलो मे तो दौलत और खूबसूरत लड़कियों की फितरत एक जैसी हुआ करती है। जितना ही इनके करीब जाने की कोशिश करो ये तुमसे उतना ही दूर भागती है।’’

‘‘तो कैसे पास आयेगी।’’

‘‘अगर इनसे दूर भागो तो?’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘क्योकि दुनिया की सबसे इनसेक्योर चीजो मे से लड़कियां भी एक है। और आप जब इनकी ओर भागते हैं, इनका पीछा करते हैं तो ऐसे मे यह अक्सर इनसेक्योर महसूस करती है। मगर इसके उलट जब आपको इनमे कुछ खास दिलचस्पी नही होती तो यही आप पर भरोषा करती हैं और आप पर दिलचस्पी लेने लगती है।’’

‘‘सचमुच?’’

‘‘हाँ ।’’ तभी एकाएक उसकी निगाहे घड़ी पर गयी तो चैककर मेरी ओर देखा, बोला -‘‘यहाँ हम फिजिक्स केमेस्ट्री की बात कर रहे हैं और वहाँ हमारी फिजिक्स की क्लास छूटने वाली है।

******

राज के जाने के वावजूद मैं वहाँ ठहरा रहा। मै जाता भी कैसे? राज, नीतू और गौरव ने मेरे लिए कई सवाल छोड़ गये थे जिनकी मुझे अभी खाक छाननी थी। मैं समझना चाहता था इंसानी दिमाग को खुद को। अभी कुछ घंटे पहले तक मैं नीतू के लिए पागल था… मगर क्यों? कुछ दिन पहले ही तो मिले थे हम। वह मेरे पास आयी और अचानक दोस्ती हो गयी। मगर क्या सचमुच वह दोस्ती ही थी? अगर हाँ तो फिर दूसरे दोस्तो के लिए वह पागलपन क्यों नही था? दोस्त तो मेरे दूसरे भी कई थे?

अक्सर लोग कहते हैं कि पहला प्यार आप कभी नही भूल सकते। मगर मुझे पहला प्यार कब हुआ? नीतू से मिला तब? या अभी अभी जब प्रिया से मिला? या पहले ही किसी और से हो चुका जो मुझे अब याद नही या फिर अभी तक हुआ ही नही? मेरे अंदर अजीब सी घुटन थी। नीतू आयी तो थी। कुछ कहा भी था मगर क्या? ठीक से याद नही आ रहा था और प्रिया… मेरे दिल और दिमाग मे ऐसे घुस गयी जैसे उसे मैं वर्षो से जानता हॅू। सच कहॅू तो पिछले कुछ घन्टो ने मेरे लिए इश्क की परिभाषा ही बदल डाली थी।

शाम को कालेज के छूटने का वक्त हो रहा था। मैं प्रयोगशाला से निकल कर जैसे ही गेट की तरफ मुड़ा, भाँय भाँय करती हुई एक बाइक मेरे बिल्कुल करीब आ कर ठहर गयी। इससे पहले मैं अपने सवालो से बाहर निकलता एक जानी पहचानी सी आवाज मेरे कानो से टकराई -‘‘बाय संजय!’’ स्वर गौरव का था।

’’बाय।’’ मैंने जवाब तो दिया मगर उससे पहले चीखती चिग्घाड़ती हुई उसकी बाइक आगे निकल गयी। मैंने सरपटी नजरों से उधर देखा। गौरव के बाइक की पिछली सीट पर प्रिया बैठी हुई थी। उसने कुछ नही कहा। तिरछी निगाहो से मेरी ओर तब तक देखती रही जब तक बाइक इतनी दूर नही चली गयी कि मैं ओझल हो जाता।

******

कालेज का अगला दिन –

नीतू गेट पर मेरा इन्तजार कर रही थी-

‘‘हाय संजय।’’ मेरे ऊपर निगाह पड़ते ही वह मुस्कुरा पड़ी।

‘‘हाय।’’ मुझे भी मुस्कराना पडा।

‘‘कल कालेज से कब निकल गये थे यार?’’ शिकायत करते हुए वह बोली -‘‘छुट्टी पर हम कितना ढूढ़े थे तुम्हे।’’

‘‘क्या कह रही हो?’’ मैं जोर से हँस पड़ा -‘‘मै यही गेट पर ही तो था। तुम ही नजर नहीं आयी।’’

‘‘संजय।’’ उसने तल्ख अंदाज मे गौर से देखा मेरी ओर-‘‘तुम मुझे बना रहे हो?’’

‘‘नहीं तो।’’

‘‘अच्छा तो अब तुम मुझसे झूठ भी बोलोगे?’’ अचानक उसकी आँखें फैल गयी -‘‘मुझे याद हैं, कल छुट्टी के बाद सीधे मैं यही… इसी जगह पर आयी थी और तुम यहाँ  पर नहीं थे, समझे।’’

‘‘नीतू।’’ मैं मुस्करा पड़ा -‘‘मेरा यकीन करो मैं यही था… गेट पर। तुम्हारा इंतजार कर रहा था।’’

उसकी चमचमाती आँखें देर तक मुझे घूरती रही। फिर मेरी बाँ हें पकड़ते हुए बोली -‘‘सच है या झूठ, मुझे नही पता… तुमने मेरा इन्तजार किया बस यही काफी है मेरे लिए।’’

हालाकि मुझे पता था कि उसे मेरी बात पर यकीन नही है मगर ‘मैं उसकी परवाह करता हॅू’ इस बात पर वह खुश थी। मेरा हाँथ अपने हाँ थो में लेकर वह देर तक न जाने मेरी आँखों मे क्या तलासती रही।

‘‘मिस्टर मेल मिलाप हो चुका हो तो प्रयोगशाला की तरफ भी आजाइयेगा।’’ अचानक एक जाना पहचाना सा स्वर मेरे कानो को छेड़ा। मैं बिजली की गति से उधर मुड़ा तो कुछ पलों तक आँखों पर यकीन नही हुआ। प्रिया बिल्कुल मेरे पीछे खड़ी थी।

‘‘जी?’’ मैंने हैरान होते हुए पॅूछा।

‘‘मेल मिलाप के बाद प्रयोगशाला की तरफ भी आजाइयेगा।’’

‘‘जी।’’

‘‘जीइइइइ। कल वैसे भी आप हमारे प्रयोग की ऐसी तैसी कर चुके है।’’ कहते हुए वह आगे बढ़ गयी।

मैं स्तब्ध उसे जाते हुए देखता रहा।

‘‘संजय, ये लड़की कौन है?’’ नीतू ने मुझे झकझोरा।

‘‘पता नही।’’

******–

उस सुबह जब मैं प्रयोगशाला पहुँचा उस समय तक वहाँ मेरे ग्रुप का प्रत्येक छात्र-छात्रा पहुँच चुके थे शिवाये प्रिया के। मेरा दिल जोर से धडक उठा। अभी अभी तो वह मुझे गेट के पास मिली थी। फिर अभी पहुँ ची क्यों नही? वह जब काँलेज के कैम्पस मे है तो लेट भी तो नही हो सकती है। मगर क्यों नही लेट हो सकती?’ चंद क्षणो के भीतर मुझे अपने ही सैकड़ो सवालो का सामना करना पड़ा।

वक्त जैसे जैसे रेंगता हुआ गुजरता जा रहा था, मेरे अन्दर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। हालात ऐसे थे कि मैं किसी से जिक्र भी नहीं कर पा रहा था। मैं बार बार दरवाजे की ओर देखता। हर आहट पर चौंक पड़ता। इस दौरान कई बार शिवानी की तिरछी निगाहों ने मुझे घूरा। मेरी बेचैनी परखने की कोशिश की। एकाध बार तो वह प्रयोग को लेकर हो रही मेरी झल्लाहट पर मुस्कराई भी जो मुझे पसन्द नही आया।

मै देर तक खुद को सम्भालता रहा। लग भगआधा घंटा गुजर चुके थे। हममे से किसी ने एक बार भी प्रिया की अनुपस्थिति का जिक्र नहीं किया। मेरे धर्य का बांध टूटने लगा। मैंनें घूरती नजरो से गौरव की ओर देखा। वह प्रयोग मे लगी तारों को जोड़ने में जुटा पड़ा था। एक पल के लिये लगा कि गौरव के मोटे चश्मे को छीनकर तोड़ दू या उसे अपने जूते तले कुचल डालू।

‘‘गौरव।’’ अचानक मेरा धैर्य टूट गया। मैंने उसे पुकारा तो वह मेरी ओर देखने लगा।

‘‘तुम कर क्या रहे हो?’’

‘‘वही जो तुम नही कर रहे हो।’’ उसने कहा और एकबार फिर उलझी हुई तारों को सुलझाने लगा।

‘‘अच्छा तो सब कुछ मैं अकेले ही करू? और आज प्रिया क्यों नही आयी? प्रयोग तो उसका भी है।’’

‘‘क्या?’’ अचानक उसके हाँथ रुक गये। फिर खड़ा होते हुए मेरी ओर ऐसे देखा जैसे वह या मेरे सवाल को समझ ही न पाया हो या फिर कुछ ज्यादा ही समझ गया।

‘‘संजय ने पॅूछा कि आज प्रिया क्यों नही आयी।’’ राज ने मेरे सवाल को दोहराते हुए मेरी ओर देखा। उसके चेहरे पर बिखरी मुस्कान कुछ पलो के लिए मुझे हैरत मे डाल दिया। मैं समझ नही पाया कि वह मेरी बंचैनी पर मेरे साथ खड़ा होने की कोशिश कर रहा है या मेरा मजाक उड़ा रहा है।

‘‘उसे आज घर लौटना पड़ा।’’ गौरव ने घूरती नजरो से राज की ओर देखते हुए बोला।

‘‘क्यों?’’ मेरा सवाल उसके कानो से टकराया तो राज के चेहरे पर ठहरी उसकी नजरे उछल कर मेरे चेहरे पर आ गिरी। बेरुखी भरे स्वर मे बोला -‘‘मुझे नही पता।’’

मैंने आगे कोई सवाल नहीं किया मगर प्रिया अब भी मेरे जेहन मे समायी हुई थी। मैं प्रिया के ख्याल से बाहर आ पाता उससे पहले हर रोज की तरह हॅसती खिलखिलाती हुई अचानक नीतू वहाँ आ धमकी।

‘‘कैसे हो संजय?’’ उसने पूछा। मैंने कोई जवाब नही दिया। बस मेरी निगाहे उससे कुछ कहती रही। कहना मुस्किल था कि मेरी निगाहों मे उसके वहाँ अचानक आ जाने के लिए शिकायत थी या फिर शुक्र गुजारी।

‘‘तुम इस तरह चुप क्यों हो?’’ वह मेरे विल्कुल करीब आ गयी। छेड़ते हुए बोली -‘‘प्रयोग परेशान कर रहा है क्या तुम्हे?’’

‘‘प्रयोग।’’ मैंने उसकी ओर देखा। मुझे बात का आधार मिल चुका था। मैंने हकलाते हुए कहा -‘‘हाँ तु… तुम सही कर रही हो। प्रयोग ने सचमुच परेशान करके रखा हुआ है मुझे।’’

हालाकि मैं प्रयोग से काफी दूर खड़ा था मगर याद आया तो मैं तीव्रता से मेज की ओर बढ़ा। तभी मेरी निगाह गौरव पर पड़ी। वह मुझे ऐसे घूर रहा था जैसे मुझसे पूँछ रहा हो- ‘कि साहब आप कौन सा प्रयोग कर रहे थे?’ झटपटाहट मे मैंने बारी बारी से राज और शिवानी की ओर देखा। शायद उनकी निगाहों में भी वही सवाल था।

नीतू जोर से हँस पडी। शर्मिन्दगी से बचने के लिए मैं उसे वहाँ से दूर ले जाना चाहा मगर वह मेज की ओर बढते हुए बोली -‘‘कौन सा प्रयोग है संजय? जरा हम भी तो देखें।’’

उस दौरान एक बार फिर मेरी निगाही शिवानी की ओर घूमी। उसने अपने चेहरे को दुपट्टे से ढक लिया था। शायद वह हँस रही थी।

‘‘इसको तो हम कालेज मे भी कर चुके है।’’ नीतू पलट कर मेरी ओर देखी-‘‘यार यह तो बहुत आसान है।’’

‘‘कब किया हैं   तुमने इस प्रयोग को?’’ गौरव ने बड़ी बड़ी आँखों से नीतू की ओर देखते हुए पूँछा।

‘‘पिछले साल… जब स्कूल मे थे।’’

‘‘स्कूल मे?’’ गौरव हैरानी से देखा मेरी ओर। उसे यकीन नही हो पा रहा था कि ऐसा प्रयोग स्कूल स्टैन्डर्ड कराया गया होगा

‘‘जी हाँ, स्कूल मे। क्या आपको…।’’ नीतू आगे कुछ कहती मैंने उसकी बात को काटते हुए बोला -‘‘आज क्या कर रही थी?’’

‘‘आज? आज तो खिलवाड के अलावा कुछ नहीं किया है हमने।’’ कहते हुए वह जोर से खिलखिला पड़ी।

‘‘क्यो?’’

‘‘यार आज का प्रयोग किसी को समझ ही नही आ रहा था और सर थे तो एक बार बताकर कही चले गये फिर दोबारा आकर दर्शन ही नहीं दिये।’’

‘‘तो क्या अब तुम कुछ नहीं करोगी?’’

‘‘कम से कम आज तो इरादा नहीं है।’’ वह मेरे करीब तक झुक आयी -‘‘आज तो तुम्हारे पास ही रहने का मन है।’’

‘‘क…क्या?’’ मेरी आँखें फैल गयी -‘‘नीतू!’’ मैं हकला पड़ा -‘‘द… देखो, मुझे लगता है कि तुम्हे प्रयोग नहीं छोड़ना चाहिए।’’

वह मेरी ओर देखने लगी। शायद वह मेरे आसय को समझ गयी थी। उसकी चमकती आँखों में एकाएक नमी आ गयी। रूखी आवाज में बोली -‘‘हाँ संजय तुम सही कह रहे हो। मुझे प्रयोग नहीं छोडना चाहिए, क्यो कि मेरे प्रयोग छोड़ने से तुम्हे तकलीफ होती है… है ना?’’

उसके जजबातो को समझकर मैं अपने अल्फाजो पर कुछ फेर बदल करता उससे पहले नीतू दौड़ती हुईं वहाँ से बाहर निकल गयी।

नीतू के एकाएक यूँ रूठकर चले जाने पर मुझे झटका तो लगा मगर पता नहीं क्यो, वह घुटन बहुत देर तक नही ठहरी। शायद इस लिये भी कि मुझे यकीन था कि वह देर तक मुझसे रूठ कर नहीं रह सकती। मैं पलट कर पूरी एकाग्रता के साथ प्रयोग की मेज की ओर मुड़ा।

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प्रयोग खत्म करके मैं कक्षा मे सामिल होने चला गया। इस बीच राज मेरे साथ ही था। आज हमने पहली बार आपस मे इतनी ढ़ेर सारी बातें की थी। हालाकि उस दौरान राज ने मेरे और नीतू के संबन्धो के बारे मे जानने की उत्सुकता जताई। प्रिया को लेकर मेरे अजीब से व्यवहार के बारे मे भी पूँछा मगर हम अभी इतने अच्छे दोस्त नही थे कि मैं अपनी हर फीलिंग्स को उससे शेयर कर पाता। हाँ शिवानी के प्रति बढ़ रहे अपने आकर्षण को उसने जरूर मुझसे शेयर किया।

शिवानी का नाम सुनते ही मैंने होठ भीच लिए -‘शिवानी भी कोई लड़की है? जिस पर आकर्षित हुआ जा सके। जब देखो ऊपर से लेकर नीचे तक चादर मे लिपटी रहती है। कुर्ते का गला, उसके गले तक कसा रहता है। और रही सही कसर उसका लम्बा सा दुपट्टा पूरा कर देता है। सच कहॅू तो लजाने शर्माने के अलावा उसमे आकर्षण वाली कुछ भी चीज नही थी। हालाकि उस वक्त मैंने राज से कुछ भी नही कहा।

शाम ढलान पर थी। कालेज छूटने पर मैं जैसे ही गेट पर पहुचा- अकस्मात ही नीतू भीड़ के किसी कोने से निकल कर मेरे सामने खड़ी हो गयी।

‘‘संजय!’’ पुराने अंदाज में ही वह ऐसे मुस्करायी जैसे कुछ हुआ ही नही था।

‘‘तुम!’’ मैं चैक पड़ा।

मैं जानता था कि वह बहुत देर तक रूठी नहीं रह पायेगी, किन्तु इतनी जल्दी मान जायेगी इसकी मुझे भी उम्मीद नही थी। मै आगे कोई बात छेड़ता, उसने मेरे होंठों पर उॅगली रख दीए बोली -‘‘छोड़ो न संजय उस मनहूस घड़ी को।’’ उसके आँखों में प्यार छलक पडा -‘‘मै उस घड़ी पर लौटकर एक बार फिर नहीं मुरझाना चाहती।’’

‘‘मगर तुम एकाएक…।’’

‘‘मै उस पर सचमुच शर्मिन्दा हॅू।’’ मेरी बात बीच में काटते हुए उसने कहा – फिर बातों के रूख को नया मोड देती हुई बोली -‘‘पढ़ाई कैसे चल रही है?’’

‘‘पढाई!’’ एकाएक उसके मुँह से अकल्पनीय बात सुनी तो मैं चौंक पड़ा -‘‘नीतू अभी-अभी तो कालेज शुरू हुआ है।’’

‘‘हाँ वो तो है।’’ अपनी ही बात पर वह लजा गयी।

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कालेज की अगली सुबह–

मैं जैसे ही अपनी कक्षा मे घुसा एकाएक प्रिया मेरे सामने आ गयी जो मुझसे लगभग टकराते टकराते बची -‘‘संजय!’’ मुझे सामने देख उसका मुँह फटा रह गया -‘‘तुम इस सेक्सन मे हो?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘ओह रियली!’’ वह उछल पड़ी -‘‘मैं भी इसी सेक्सन मे हॅू।’’ कहती हुई उत्तेजना मे वह मेरी तरफ अपना हाँथ बढ़ा दिया। मैंने थाम लिया। फिर वह देर तक कुछ कहती रही मगर मैं उसकी गर्म हॅथेलियों की गर्माहट मे पिघला जा रहा था। मुझे कुछ सुनाई नही दे रहा था बस उसके होठ हिलते रहे।

‘‘संजय।’’ एकाएक उसने मुझे झकझोरा -‘‘अच्छा चलो फिर अभी प्रयोगशाला मे मिलते हैं।’’

कालेज की वह सुबह भी रोज की ही तरह थी मगर मेरे लिए वह बिल्कुल नई थी। प्रिया के बदले हुए तेवरो ने जैसे मेरे अंदर ताजगी का तूफान भर दिया हो। मैं आसमान मे उड़ रहा था।

आज प्रयोगशाला का माहौल कुछ बदला बदला सा था। हॅसी ठहाको के बीच हम एक के बाद एक रीडिंग लिए जा रहे थे। गौरव तारो को सुलझाने मे तल्लीन था और मैं प्रिया के साथ रह रह कर ठहाके लगाने मे जबकि राज शिवानी से बात कर रहा था। प्रयोग लगभग आखिरी पड़ाव पर था। अचानक एहसास हुआ कि इस दौरान नीतू वहाँ  एक बार भी नही आयी। जबकि दूसरे दिन अब तक वह एक दो चक्कर तो मार ही जाया करती थी। मैंने प्रयोगशाला के चैड़े दरवाजे के पार दूर तक देखा- वह नजर नही आयी। कुछ वक्त और गुजरा तो अजीब सी बेचैनी होने लगी।

वह आज क्यों नही आयी? क्या किसी बात से वह नाराज है? मगर किस बात से? कल छुट्टी के वक्त तो वह मुझे मिली थी। खुश भी थी। मेरे दिमाग का घोड़ा जितना दौड़ लगाता मैं उतना ही परेशान होता जा रहा था। मैं समझ नही पा रहा था कि मेरी परेशानी का कारण कौन था? प्रिया… जिसके लिए मैं कल परेशान था या नीतू…. जिसके लिए मैं आज परेशान हॅू। प्रयोग का समय खत्म हो चुका था मगर बेचैन निगाहे दरवाजे पर अड़ी अब भी नीतू का इन्तजार कर रही थी।

‘‘संजय।’’ प्रिया ने आवाज दिया -‘‘दरवाजे पर किसे खोज रहे हो?’’

‘‘नही… किसी को नही।’’ मैंने प्रिया की ओर देख कर मुस्कुराने की कोशिश की, मगर हॅसी नही आयी।

‘‘लंच पर चल रहे हो? वह गौरव का हाँथ थामे हुए बाहर जाने के लिए तैयार खड़ी थी -‘‘हम लोग जा रहे हैं।’’

‘‘आप लोग चलिए, मैं आता हॅू।’’ मेरी नजरें एक बार फिर दरवाजे से जा टकराई।

‘‘किसी का इन्तजार कर रहे हो?’’ मेरी ओर घूरते हुए राज ने पॅूछा।

‘‘नही यार। बस ऐसे ही।’’

‘‘ठीक है फिर… हम लोग जा रहे हैं। अपना खयाल रखना।’’ राज मेरे कंधे को धीरे से दबाया और आगे बढ गया। शिवानी उसके साथ ही थी।

उनके जाने के बाद मैं काफी देर तक वहाँ ठहरा रहा मगर नीतू नही आयी। आखिर मे उकता कर मैं वहाँ से निकल गया।

******

लंच अपने आखिरी पड़ाव पर था, मैं नाश्ता करके कैन्टीन से वापस लौट ही रहा था कि एकाएक मुझे महसूस हुआ -कि किसी ने मुझे आवाज दी है। मैं ठहर कर इधर-उधर देखा। मुझे ऐसा कोई छात्र-छात्रा नही दिखई दिया जिसे देख कर मैं कह पाता कि वह मुझे बुलाना चाह रहा है।

मैं आगे बढ़ गया।

‘‘संजय!’’ फिर वही आवाज। मुझे पुनः ठहरना पडा। इस बार आवाज स्पष्ट थी। मैं इधर उधर प्रिया को खोजने लगा। दरअसल वह प्रिया ही थी जिसने मुझे पुकारा था। किस्मत आज सचमुच मुझ पर मेहरबान थी। मै पल भर ठहर कर कुछ सोचा फिर तेजी से उसकी ओर बढ़ गया था। प्रिया कैंम्पस की सीढियों के पास खड़ी थी।

मैं पास पहॅुचा तो उसका चेहरा खिल उठा। होठो पर गीली गीली सी मुस्कराहट थी। मैं उसका क्या अर्थ लगाता?

‘‘आओ बैठो!’’ पास की सीढियो की ओर इसारा करते हुए वह बोली। मेरी निगाहे उसके चेहरे पर टिकी रही।

मैं बैठ गया-

‘‘तुम खड़ी रहोगी?’’ मैंने पूँछा तो लजाकर पलके झुका ली और मेरा चक्कर काटते हुए मेरे बगल में आकर बैठ गयी। उफ! सचमुच आज मेरी किस्मत का कोई जवाब नही था। मैं इन्हीं क्षणों की प्रतीक्षा कर रहा था जो आज यॅू ही अचानक मुझे मिल गये।

‘‘तुम कल प्रयोगशाला गये थे?’’ पलभर की खामोसी के बाद वह बोली।

‘‘हाँ, गया था।’’

‘‘यार मैं कल नहीं पहुँच पायी थी।’’ सीढी के पास पड़े एक कंकण को उठाकर दूर फेंकती हुई वह बोली -‘‘मुझे अचानक घर जाना पड़ गया था।’’

‘‘हाँ … गौरव ने बताया था।’’ मैंने कहा तो एक बार फिर, उसकी निगाहे मेरे चेहरे की ओर लौटी।

‘‘शिवानी कह रही थी…।’’ भावनाओं में कोई उत्तेजना नही थी -‘‘कल तुम परेशान-परेशान सा नजर आ रहे थे।’’

‘‘क…क….क्या? किसने कहा?’’ मै चैक कर पूछा।

‘‘शिवानी ने।’’ वह मुस्काई ।

‘‘न…नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं थी।’’ मैं हकला पडा। उसके यह बात कहने का तात्पर्य मुझे थोड़ी देर बाद समझ आया मगर तब तक देर हो चुकी थी। पता नहीं ऐसी कमसिन लडकियों को देख कर मेरे दिमांग को क्या हो जाता है? मुझे कहना चाहिए था -‘‘हाँ प्रिया, मुझे तुम्हारी याद आ रही थी।’’ या फिर कहता -‘‘तुम्हें देखने की बहुत हसरत थी।’’ तब भी कुछ हद तक चल जाता है परन्तु मैंने तो उसकी बातो के बहाव को ही दरिया मे प्रवाह कर दिया।

वह चुप हो गयी-

उसकी खामोसी देखकर साफ नजर आया था मुझे – अब मेरा कुछ नहीं हो सकता। मैने सामने रखी पकवान की थाली वापस कर दी है।

‘‘शिवानी कह रही थी कि….।’’ वह ज्यादा देर तक खामोश नही रह पायी। मुस्कुराकर बोली-‘‘तुम मेरे जिक्र पर कुछ खास ही दिलचस्पी ले रहे थें।’’

‘‘तुम्हे क्या लगता है?’’

‘‘कह नही सकती मगर…।’’ कुछ कहते कहते वह अचानक चुप हो गयी। फिर मेरी आँखों मे झाकते हुए बोली -‘‘एक बात बताओंगे?’’

‘‘पूँ छो।’’

‘‘वह लडकी लगती कौन है तुम्हारी।’’

‘‘कौन?’’ मैं उसके इसारे को समझ नही पाया।

‘‘वही जो हर रोज प्रयोगशाला में तुमसे मिलने आती है।’’

‘‘तुम नीतू की बात कर रही हो?’’

‘‘हाँ शायद।’’

उसने जिस सरलता के साथ सवाल किया था, क्या जवाब उतना आसान था? दिल की मानू तो उस वक्त मैं किसी भी हाल में प्रिया को खोना नही चाहता था। मुझे नही पता कि उसके इस सवाल का मैं क्या जवाब दॅू। कुछ देर तक मैं सोचता रहा। इस दौरान उसकी नजरें एकटक मेरे चेहरे पर टिकी रही।

‘‘क्या हुआ… मैंने कोई मुस्किल सवाल तो नही पूँछ लिया?’’

‘‘नही।’’

‘‘तुम चाहो तो सवाल को स्किप कर सकते हो। यह विकल्प है तुम्हारे पास।’’

‘‘वही जो गौरव तुम्हारा लगता है।’’ मैंने चुटीले अंदाज ने कहा।

मेरी यह बात सुनते ही उम्मीद के खिलाफ वह जोर से खिलखिला पड़ी -‘‘अगर हम कहें कि गौरव हमारे लिये सिर्फ मौज मस्ती करने का माध्यम मात्र है तो…।’’

‘‘तो फिर कुछ ऐसा ही नीतू के बारे मे समझ लो… समझ लो वह हमारी सबसे अच्छी वाली दोस्त है।’’

‘‘मि0 संजय।’’ उसने शरारती नजरों से देखा मेरी ओर -‘‘काफी दिलचस्प इंसान मालूम पड़ते हैं आप। वैसे मुझे तुम्हारे जैसी आधुनिक सोच रखने वाले लड़के पसंद है। दोस्ती करोगे मुझसे?’’ सहसा उसने मेरी ओर अपना हाँथ बढा दिया। मैंने भी मुस्कुरा कर थाम लिया।’’

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वक्त तेजी से गुजर रहा था। अब तक प्रिया मेरे काफी करीब आ गयी थी। उस समय तक हम गौरव अथवा नीतू की कम ही परवाह किया करते थे।

एक बात के दौरान प्रिया ने मुझसे कहा -‘‘वह अभी कुछ दिनों तक गौरव से संबंध नहीं तोड़ पायेगी क्योकि अभी उसे गौरव की जरूरत हैं  ।’’ उसकी गाड़ी के सहारे आना जाना था उसका। मैंने बेहिचक उसकी इस अपील को स्वीकार कर लिया। मैं  जानता था- कि गौरव ही एक मात्र वह सख्स है  जो उसके आने जाने के लिये अपनी गाड़ी मुहैया कराता है। मै बेहद आधुनिक एवं खुले विचारो वाला इंसान था मुझे किसी पर पाबन्दिया पसन्द नहीं थी। फिर चाहे वह दोस्त हो, गर्लफ्रेण्ड हो या फिर पत्नी।

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उस दिन प्रिया बहुत खुस नजर आ रही थी- मुलाकात होते ही वह मेरा हाँथ पकड़ी और मुझे कैन्टीन लेकर चली गयी। मेज पर बैठते ही हॅसकर कहने लगी -‘‘संजय! तुम्हे एक रहस्य की बात बताऊॅ?’’

‘‘रहस्य!’’ मै चैंका तो वह हॅसकर कहने लगी- ‘‘तुम राज को जानते हो?’’

‘‘राज?’’ मैंने प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखा।

‘‘अरे वही जो हमारे साथ प्रैक्टिकल किया करता है।’’

‘‘क्या गौरव?’’ मैंने उसे छेड़ा।

‘‘अरे नहीं यार।’’ वह झेंपते हुए मेरी ओर देखा, बोली -‘‘गौरव के अलावा एक लड़का और रहा करता है ना। सीधा-साधा गंभीर सा लड़का।’’

‘‘ओह… राज की बात कर रही हो तुम?’’

‘‘और नहीं क्या?’’ वह हँस पड़ी।

इतने दिनों तक राज के साथ मैंने प्रैक्टिकल किया जरूर था मगर उस दौरान उसे एक बार भी कभी हॅसते या मुस्कराते हुए नहीं देखा। अगर कभी उसके होठ खुलते भी तो प्रैक्टिकल से जुड़े सवाल जवाब को लेकर वर्ना बस चुप्पी और चुप्पी। उसे दुनियादारी से कोई मतलब नही था। हालाकि वह भले ही मेरा बहुत खास दोस्त न रहा हो मगर अच्छा दोस्त जरूर था। कई बार मुझे भी उसकी ऐसी चुप्पी पर गुस्सा आता था।

‘‘जानते हो संजय!’’ एकाएक प्रिया का गंभीर चेहरा मेरे कानो तक झुक आया, फुसफुसाते हुए बोली -‘‘मि0 राज शिवानी को पसंद करने लगे है।’’

‘‘क्या?’’ उसकी बात कानों पर पड़ी तो मैंने चौंकने का अभिनय किया -‘‘तुम सच कह रही हो?’’

‘‘और नहीं क्या?’’ वह धीरे से मुस्करायी -‘‘मैने खुद अपनी निगाहों से कई बार राज को शिवानी की ओर छुपी-छुपी नजरों से निहारते हुए देखा हैं ।’’

‘‘तो क्या शिवानी भी…?’’

‘‘पता नहीं।’’ अपना नाखून कुदेरते हुए वह बोली -‘‘मैंने शिवानी से कभी इस बारे में पूछा तो नहीं, लेकिन उम्मीद तो यही है कि शिवानी भी उसे पसन्द करती है।’’

‘‘तुम्हारी तो वह दोस्त है… जरा पूँछना उससे?’’ मैंने मुद्दे पर दिलचस्पी दिखाते हुए कहा।

‘‘ठीक है… पॅूछ लूगी।’’

‘‘नहीं… नहीं…।’’ एकाएक न जाने दिमांग क्यो तड़फड़ा उठा -‘‘प्रिया यह ठीक नहीं है, तुम उससे ऐसा कुछ मत पूछना। उसे बुरा लग सकता है। मैं राज से पूछ लूगा ।’’

प्रिया अपने तर्जनी को मुह में दबाये हुए मेरी तरफ घूरने लगी।

******

अगले दिन जब मैंने राज को लंच साथ करने का प्रस्ताव रखा, तो बगैर किसी नानुकार के उसने स्वीकार कर लिया था।

हालाकि उसकी जिन्दगी मे मेरी इतनी दिलचस्पी को पागलपन ही कहा जा सकता है परन्तु वह दोस्त था मेरा। मै करता भी क्या? बगैर पूछे दिल को चैन ही नहीं मिल पा रहा था।

हम दोनो कैन्टीन के मेज पर थे-

मैं देर तक राज को इधर-उधर की बातो में उलझाए रखा। मैं नही चाहता था कि वह इस बात पर गौर कर सके कि उसे मैने सिर्फ इसी उद्देश्य से आंमत्रित किया था। इस दौरान मैंने उससे अपने और प्रिया के सम्बन्धों के बारे में भी ढ़ेर सारी बातें की। जब मैं पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि अब मैं उससे शिवानी के बारे मे पूछ सकता हॅू। मैंने कहा -‘‘राज मुझे तुम्हारी निजी जिन्दगी में दखलन्दाजी करने का कोई हक नहीं है लेकिन फिर भी दोस्त के नाते एक गुस्ताखी करना चाहता हॅू।’’

वह अर्थ पूर्ण निगाहों से मेरी ओर देखने लगा।

‘‘क्या तुम बताओगे?’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम शिवानी को अभी भी सिर्फ दोस्त ही समझते हो या बात आगे भी बढ़ी?’’ बिना बात को घुमाए-फिराए सीधे गुस्ताखी की मैने।

‘‘बात आगे भी बढ़ी का मतलब?’’ वह हैरान नजरों से मेरी ओर देखने लगा। शायद उसे कम से कम उस वक्त मुझसे ऐसे सवाल की उम्मीद नही थी।

‘‘मतलब कभी उसके साथ कुछ किया या…?’’

 मेरा सवाल उसके कानो पर पड़ा तो अनायास ही वह हॅस पडा -‘‘संजय! तुम क्या सच मे यही सवाल पूछना चाह रहे हो?’’

‘‘शायद हाँ ।’’

‘‘शायद?’’

‘‘तुम मुझे बता सकते हो कि यह सवाल तुम्हारे मन में आया कैसे?’’ एकाएक उसके चेहरे से हॅसी गायब हो गयी।

‘‘पता नही। बस यूँ ही जुबान पर आ गया।’’

‘‘मेरे दोस्त… ऐसे सवाल यॅू ही जुबान पर नही आते। क्या तुम्हे ऐसा नही सहता कि यह कुछ ज्यादा ही व्यक्तिगत सवाल है, खासकर एक लड़की के लिए जो मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी है।’’

‘‘नही राज… मेरा मतलब वह नही था।’’

‘‘मुझे सचमुच अफसोस है संजय तुम्हारे सवाल पर।’’ एकाएक वह उठकर खडा हो गया।

‘‘राज…।’’ उसकी ऐसी प्रतिक्रिया पर मैं हैरान हो उठा।

‘‘चलता हॅू।’’ मेरी बात बीच में ही काटते हुए वह तीव्रता से निकल गया। मैं असहाय सा उसके लौटते हुए कदमों को देखता रहा।

मैं भारी मन से मेज से उठने ही वाला था कि एकाएक सामने पड़ी कुर्सी सरकी और प्रिया धड़ाम से बैठ गयी -‘‘क्या हुआ मिस्टर?’’

उसके स्वर मेरे कानो से टकराये जरूर मगर मैं थोड़ी देर तक यही समझने की कोशिश करता रहा कि एकाएक यह तूफान आया किधर से?

‘‘तुम यही कही थी क्या? मैंने पूँछा -‘‘ऐसे तूफान सी अचानक कैसे आ धमकी?’’

‘‘वह सब छोड़ो- ये बताओ राज ने कुछ बताया?’’

मैंने प्रिया को उस घटना के बारे मे बताया तो जोर से हँस पडी -‘‘मुझे मालूम था कि राज कभी नहीं बताएगा। अरे उससे ज्यादा उम्मीद तो मैं शिवानी से करती हॅू।’’

‘‘फिर तुमने मुझे मना क्यों नहीं किया था? जबरजस्ती अपनी बेइज्जती करवा बैठा… और दोस्त जो नाराज हुआ वह अलग।’’

‘‘मैं कैसे मना करती यार? फिर तुम ही कहते कि मैं जिद कर रही हॅू। वैसे तुम कहो तो मैं अब भी शिवानी से पूछ सकती हॅू?’’

‘‘नहीं… तुम अब किसी से कुछ मत पूछो। न जाने वह भी इस बात को…. बाद में खुद-ब-खुद एक दिन सब कुछ सामने आ जायेगा।’’

‘‘नही आया तो?’’

‘‘नही आया तो नही आया।’’ कहते हुए मैं उठकर खड़ा हो गया।

******

कालेज छूटने पर ज्यो ही प्रिया मेरे पास से गयी सहसा नीतू मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। भरी-भरी आखे, सूखे होंठ, गालों पर पाउडर को धोती हुई बनी धारियां मुझे बता रही थी वह अभी अभी रोकर आयी हैं ।

‘‘तुम!!’’ एकाएक मेरे होंठ फडफड़ा उठे।

वह चंद क्षणो तक खामोस खड़ी मेरे चेहरे की ओर देखती रही। उसकी निगाहों मे शिकायत थी।

मैं भी चुप रहा- शायद अगले पल आने वाली उथल पुथल के लिए खुद को तैयार कर रहा था।

‘‘संजय!’’ सहसा उसके होठ खुले -‘‘आज तुम मेरे घर चल सकते हो?’’

‘‘क्यो? कोई खास वजह?’’

‘‘नही…. बस यूँ ही।’’ वह हॅसना चाही लेकिन उसके होंठो पर हँस नहीं आयी। आँखें पानी की बूंदों से भर गयी जिन्हे छुपाने की कोशिश में उसे पलके झुका ली। मेरा दिल ऐसे धड़का कि जैसे अभी सीने को चीर कर बाहर आ जायेगा। वह मुझसे आँ खे चुराते हुए अपनी स्कूटी की चाबी मरोड़ दी। स्कूटी स्टार्ट हुई तो उसने भरी-भरी निगाहों से मेरी ओर देखा। मैं उसकी नजरों की भाषा को समझ सकता था। मैं बिना कुछ कहे उसकी पिछली सीट पर बैठ गया। स्कूटी सड़क पर दौड़ पड़ी।

फिर तेज… तेज… और तेज! हर पल स्कूटी की रफ्तार बढ़ती जा रही थी।

लगभग 15 मिनट लगातार हवा की गति में दौड़ती हुई स्कूटी एक पतली सड़क की ओर मुड़ी। उसकी गति की तीव्रता एकाएक से कम हो गयी। गाड़ी खड़ी होते ही मैं स्कूटी से उतर गया। मैं अभी ठीक से खड़ा भी नही हो पाया कि लगभग 45-50 साल का एक अधेड़ इंसान हमारी ओर दौड़ पड़ा। तम्बाकू से पीले पडे़ दांतो को खोलते हुए वह बोला -‘‘नीतू बिटिया… यही है संजय बाबू?’’

नीतू ने कुछ नही कहा। उसने झुकी झुकी नजरों से मेरी तरफ देखा और फिर अधेड़ व्यक्ति की ओर मुड़ते हुए जबरजस्ती हॅसने की कोशिश की। हालाकि उस अधेड़ के मुँह से अपना जिक्र सुना तो मैं चौंक पड़ा। मुझे यह बात मानने के लिये विवश होना पड़ा कि जितनी साधारण बात समझ कर मैं नीतू के साथ चला आया हॅू दरअसल वह बात उतनी साधारण है नहीं।

‘‘संजय… अन्दर आ जाओ।’’ नीतू मेरी ओर देखकर बोली। ईश्वर का स्मरण करते हुए मैं अन्दर चला गया। इस वक्त मैं जब घर पर बैठा हुआ डायरी लिख रहा हॅू -अगर उसके घर की खूबसूरती को कागज पर उतारना भी चाहॅू तो असफल ही रहूँ गा। मैंने जैसे ही दरवाजा पार करते हुए घर के गलियारे मे दाखिल हुआ मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी। मुझे लगा जैसे मैं गलती से किसी राजा रजवाडे़ के घर पर घुस आया हॅू। मैंने खाली खाली नजरों से नीतू की ओर देखने लगा। आँखों को यकीन नही हो रहा था – ये साधारण सी दिखने वाली लड़की ऐसे घर मे रहती है?

‘‘आओ संजय।’’ नीतू पीछे मुड़ते हुए बोली।

 अब तक हम कई गलियारे और बरामदे पार करते हुए गेस्ट रूम में आ चुके थे। वहाँ मैने नाश्ता किया, चंद क्षणो तक ठहरे रहे, फिर नीतू बोली -‘‘चलो मेरे कमरे में चल कर बैठते हैं।’’

मुझे उसके साथ जाना पड़ा।

वहाँ देर तक खामोशी छायी रही। इस दौरान कई बार मेरी निगाहे नीतू के चेहरे को खराचती रही। वह बिल्कुल खामोश थी। वह अपने ही कमरें को ऐसे घूरती रही जैसे वहाँ पहली बार आयी हो। बीच-बीच कई बार उसकी आँ खे भर आयी थी, जिन्हें छिपाने की कोशिश में उसे हर बार अपनी पलके झुकाना पड़ा।

‘‘नीतू!’’ मैने साहस करके उसे पुकारा। वह पथराई नजरों से मेरी ओर देखने लगी।

‘‘तुम रो रही हो?’’ मैंने पॅूछा।

‘‘नही।’’

‘‘मैं जानता हॅू तुम रो रही हो। क्या मैं इसका कारण जान सकता हॅू?’’

‘‘कारण तुम खुद हो संजय।’’ वह अचानक बिफर पड़ी।

मैं सहम गया।

‘‘एक बात बताओग संजय?’’ वह मेरी ओर झुक आयी।

‘‘क्या?’’

‘‘मैंने कही पढ़ा था कि औरत प्यार पाने के लिए सेक्स करती है और पुरुष सेक्स करने के लिए प्यार। ये सच है क्या?’’

‘‘नही… मुझे नही पता।’’ उसके इस अजीब से सवाल पर एक बारगी तो मैं हड़बड़ा गया। सोचने समझने ही क्षमता लौटी तो बोला -‘‘ये झूठ है।’’

‘‘फिर प्रिया में ऐसा क्या है जो मुझमे नहीं है?’’

उसका अगला सवाल मेरे कान मे पड़ा तो मेरा शरीर एकाएक शून्य पड़ गया। मुझे यहाँ लाने का कारण अब मुझे समझ आया। मैंने खुद को सम्भालते हुए कहा -‘‘नीतू ये कैसा प्रश्न है? क्या तुम ये कहने की कोशिश कर रही हो कि मैं प्रिया के साथ…?’’

‘‘नही संजय मैं नही जानती मैं क्या कहने की कोशिश कर रही हॅू। बस तुम मुझे इतना बता दो कि प्रिया में ऐसा क्या है जो….?’’

‘‘ये सवाल उचित नही है नीतू?’’

‘‘क्यों संजय? उसके सूखे होंठो पर रूखी सी मुस्कान फूट पड़ी -‘‘तुम जवाब जानते नहीं या फिर देना नही चाहते?’’

मुझे सचमुच कुछ नही सूझ रहा था कि मैं उसके सवाल का क्या जवाब दॅू। मैं खामोस हो गया।

जब मैंने देर तक कोई जवाब नही दिया तो वह एकाएक तड़फड़ा कर सोफे से उठी, मैं कुछ समझ पाता उससे पहले बड़ी निर्दयता से उसने अपनी कमीज के निचले छोर को पकड़ा और उसे उतार कर फर्स पर फेंक दिया।

कुछ ही सेकेण्ड मे अचानक घटी इस घटना पर मैं काप उठा।

कल्पना कीजिए कोई लड़की अकेले कमरे में आपके सामने एकाएक कपडे़ उतारना शुरू कर दे वह भी ऐसे हालात पर… रोती हुई… क्या गुजरेगी आप पर? उस वक्त डर से मैं काँपने लगा। मेरा दिमाग अपाहिज और शरीर संवेदनहीन हो गया। मेरी नजरें जमीन पर धसी जा रही थीं

अनायास ही नीतू मेरे एकदम करीब आ गयी। मेरी ढोड़ी को अपनी उॅगलियों के सहारे ऊपर उठाते हुए बोली -‘‘संजय… इधर देखो मेरे बदन की ओर… क्या नहीं है मुझमें?

अगर जरा से कपड़ो को छोड़ दिया जाय तो लगभग वह अर्धनग्न थी। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली -‘‘तुम इन्ही नाजुक अंगो के दीवाने हो ना?’’ उसने अपने स्तनो की ओर इसारा किया। उसकी आँखों  से आँसू टपक पड़े -‘‘इन्हें छूकर देखो संजय। ये प्रिया से कम नरम नहीं है। हाँ  बस फर्क इतना है।’’ उसने अपनी पलके झुका ली -‘‘वो हर पल तुम्हारी नजरों के सामने होते हैं और इन्हे देखने के लिए तुम्हे परदा हटाना पड़ेगा क्योंकि ये परदे में होते है।’’ पीड़ा के मारे उसकी आवाज गले में फॅसने लगी। उसने जबरन मेरे हाँ थो को खीच कर उन पर रख दिया -‘‘छूकर देखो संजय।’’

ज्यो ही मैं बर्फीला स्पर्श महसूस कर पाया, मेरे मस्तिष्क का तार-तार झनझना उठा। मुझे लगा -उस स्पर्श ने जैसे एकाएक मुझे उस पागलपन के समुन्दर में फेंक दिया हो, जहाँ देर तक मैं डूबता उतराता रहा। सोचने समझने की क्षमता लौटी तो मैं तीव्रता से अपने हाँथ समेटता हुआ खड़ा हो गया -‘‘ये क्या पागलपन है नीतू?’’

‘‘संजय तुम्हे अब यह पागलपन लगता है? फिर प्रिया क्या किया करती है? उसे भी पागलपन कहोगे? पीड़ा और क्रोध का मिला-जुला भाव उसके चेहरे पर छा गया। उसकी आँ खे इतनी भर आयी कि शायद वह मुझे साफ-साफ देख भी नही पा रही होगी -‘‘तुम समझते हो मै अपने दामन की नुमाइस कर रही हॅू? तो हाँ संजय कर रही हॅू या फिर कहो कि करना पड़ रहा है।’’

‘‘नीतू।’’

‘‘संजय!’’ वह अपनी बात जारी रखते हुए बोली -‘‘मैं अथाह पैंसो के बीच पली-बढी जरूर हॅू मगर अपने माँ बाप के इस बडप्पन को मैं अपने दामन के बीच कभी नहीं आने दिया। मेरा दामन आज भी मेरे लिये ऊपर वाले का दिया हुआ सबसे कीमती तोहफा है… जिसे मैंने नुमाइस का सामान नही समझा। इसे आज तक सम्भाल कर रखा हुआ है। क्यो? शायद ये मैं तुम्हे समझा नही पाऊॅगी। मगर संजय कभी फुरसत मिले तो सोचना जरूर। मैं नही जानती कि तुम मेरी इस हरकत का क्या मतलब निकालोगे? शायद यह कि मैं तुम्हे रिझाने की कोशिश कर रही हॅू या फिर यह कि मैं बनावटी आसुओं और अल्फाजों का सहारा ले रही हॅू लेकिन संजय सफाई देने में कोई बुराई नहीं है। इस लिये बता रही हॅू- जिन्दगी में आज यह पहला मौका है जब मैं किसी को इस हद तक अपने करीब ले कर आयी हॅू। जानते हो क्यो?’’ उसने फर्स पर पड़े दुपट्टे को अपनी ओर खीचते हुए बोली -‘‘क्योंकि मैं तुम्हें बताना चाह रही थी कि मै भी वह सब कुछ दे सकती हॅू, जिसको पाने की लालसा में तुम प्रिया के आगे पीछे भाग रहे हो। तुम चाहो तो मैं भी प्रिया की तरह तंग कपड़ों का सहारा ले सकती हॅू।’’ उसने लम्बी सांस खीची -‘‘संजय मैं प्यार करती तुमसे।’’ कहते हुए वह उसी हाल में मुझसे चिपक गयी। उसके आँ खो से टपकती पानी की बूदें देर तक मेरे कंधो को भिगोती रही। उसके बदन की गर्माहट से मेरा बदन तपने लगा। 

‘‘नीतू।’’ मैंने आवाज दी -‘‘चलो अपनी कमीज पहन लो, ये सब अच्छा नहीं लगता। और वैसे भी काफी देर हो गयी है, कही तुम्हारे मम्मी-पापा न आ जाए यहाँ ।’’

नीतू धीरे से मुझसे अलग हुई, तिरछी झुकी निगाहो से मेरे ओर देखी और लपक कर उसने अपनी कमीज उठा ली। कमीज पहन कर वह बोली -‘‘मम्मी पापा घर पर नहीं है।’’ 

‘‘मम्मी पापा घर पर नही हैं?’’ मैं चौंक पड़ा -‘‘तो क्या तुम…?’’

‘‘नहीं संजय।’’ मेरी बात को बीच मे ही काट दी, बोली -‘‘तुम मुझे गलत मत समझना। मै पापा को फोन करके बता चुकी हूँ कि मैं संजय को लेकर घर आ रही हॅू। घूमने के बहाने मम्मी और पापा दोनो बाहर चले गये है।’’

‘‘मेरी खातिर…? मगर क्यो?’’

‘‘ताकि तुम मेरे घर मे असहज न महसूस करो।’’

किसी को भी हैरत में डाल देने वाले उसके ये शब्द मेरे कानों में टकराये तो मेरी हैरानी सातवें आसमान पर पहॅुच गयी। मैं देर तक उसके चेहरे की ओर निहारता रह गया। मुझे यकीन नही हो रहा था कि दुनिया में ऐसे भी मां- बाप हो सकते है जो अपनी जवान बेटी को इस हद तक छूट दे रखी हो जबकि उन्हे पता है कि मै उनके लिए अजनवी हॅू और मौका का फायदा उठाकर उनकी बेटी के साथ कुछ भी कर सकता हॅू। शायद जिन्दगी भर भार ढोने वाली घिनौनी हरकत भी। नीतू मुझे मना कर नही पाती।

इन तमाम पलो के बाद भी मैं लगभग आधा घंटा वहा ठहरा रहा उस दौरान नीतू कई बार मुझे कुदेरी, रिझायी,तेवर ढीला नही पड़ा तो समझाने लगी। अपने आखिरी सवाल पर आते-आते नीतू एक बार फिर रो पड़ी थी- गुस्सा और पीड़ा के मिले जुले स्वर में कहने लगी -‘‘चलो मान लेती हॅू कि तुमने मुझे कभी प्यार नहीं किया लेकिन मैं करती हॅू और बेपनाह करती हॅू उसका क्या? क्या उसके कोई मायने नही है।’’

मैंने कुछ नही कहा-

‘‘संजय… खामोश मत रहो… बोलो कुछ।’’ वह देर तक मेरी आँखों मे अपने लिए प्यार तलासती रही।

थोड़ी देर बाद… मै उठकर चल पड़ा तो वह भी मेरे पीछे-पीछे बाहर तक आ गयी। वह अंधेड अब भी गेट पर ही बैठा था। हमारे कदमो की आहट सुनकर खडा हो गया। इस बार उसने अपना गन्दा मॅुह नहीं खोला। बस फटी-फटी निगाहो से मेरी ओर देखता रहा।

‘‘चलता हॅू।’’ गेट के बाहर आकर मैंने कहा।

‘‘मैं चलू क्या तुम्हारे घर तक। तुम्हे छोड आऊ?’’ अपने सूख चुके होठो पर उसने हॅसी विखेरने की नाकाम कोशिश की।

‘‘नहीं मै चला जाऊॅगा।’’ इतना कह कर मैंने आखिरी बार उस हवेली की ओर देखा, जिसकी नीतू इकलौती वारिस थी।

******

अगले दिन जब मैं काँलेज पहुँ चा, मेरे अन्दर अजीब सी घबराहट थी। मैं क्या करूगा अगर सामने नीतू आ गयी। या फिर इसलिए कि लंच होने वाला है मगर अभी तक वह कही नजर नही आयी। कहाँ और किस हाल में वह होगी? एक दिन पहले उसके घर मे घटी घटना रह रह कर दिमाग की नशो में सावन की विजली की तरह कौंध रही थी। पता नही उसके घर से मेरे लौटने के बाद उसने खुद को कैसे सम्भाला होगा?

अध्यापक आये, लेक्चर दिया और चले गये मगर मैं अपनी उलझनो से बाहर नही निकल पाया। मुझे याद नही उस दिन प्रिया ने मुझे कितनी बार झकझोरा और फिर नाराज होकर चली क्यों गयी? आजकल वह मेरी कितनी परवाह किया करती है फिर मुझे क्या हुआ? मैंने उसकी परवाह क्यो नही की?

शाम के छुट्टी के वक्त मैं देर तक काँलेज के गेट पर नीतू का इन्तजार करता रहा कि शायद वह आयेगी मगर साथ ही इस बात पर परेशान था कि कही सामने आ गयी तो? घड़ी की दौड़ती सुइयों के साथ वक्त हवा की रफ्तार से बहता रहा। इस दौरान कइयो ने आकर मेरे कंधे पर हाँथ रखा, कुछ कहा फिर हाँथ मिलाया और कल मिलने के वादे के साथ वहाँ से चले गये। मुझे याद नही कि उन हाँथ मिलाने वालो मे प्रिया थी या नही। कुछ ही मिनटो में गेट पर कदमो की चहलकदमी धीरे धीरे थमने लगी और साथ ही मेरे दिल की घड़कन भी।

‘‘अरे संजय… इस वक्त तुम यहाँ?’’ अचानक किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाँथ मारा। मैंने पलट कर उधर देखा मगर उसका चेहरा नही पहचान पा रहा था। वह थोड़ी देर तक मेरी बदहवासी को एकटक देखता रहा, फिर हॅसकर बोला -‘‘आज घर नही जाना क्या?’’

‘‘नही।’’ मैंने कहा और एकबार फिर उसकी ओर पीठ करके खड़ा हो गया।

मेरी इस हरकत पर वह थोड़ी देर तक हैरान नजरों से मुझे देखता रहा फिर मेरा चक्कर लगाते हुए मेरे सामने आकर खड़ा हो गया, बोला -‘‘अमा यार तुम हमें पहचान नही पा रहे हो या कोई नशा वशा कर रखे हो? हम तुमसे कुछ पूँछ रहे हैं।’’

‘‘क्या पॅूछ रहे हो?’’ मैं उसे झिड़कते हुए दो कदम पीछे हटा मगर उस दौरान मेरी नजरें उसके पहरे पर जा टिकी। मेरे दिमाग की सिथिल पड़ चुकी नशों मे जैसे एकाएक चेतना लौट पड़ी हो, हैरान होते हुए बोला -‘‘जय सिंह तुम और यहाँ?’’

‘‘अच्छा पहचान गये?’’ वह ही ही करके हँस पड़ा।

‘‘हाँ, लेकिन तुम अभी यहाँ क्या कर रहे हो?’’

‘‘अमा, यही तो हम तुमसे पॅूछ रहे थे कि तुम अभी तक यहाँ क्या कर रहे हो? मेरा तो पैक्टिकल था जिसमे एक लड़की की वजह से देर लग गयी।’’

‘‘लड़की की वजह से?’’ मैंने यॅू ही पॅूछ लिया।

‘‘हाँ यार… प्रयोग मे वह मेरी ही टीम मे थी। सुना है उसने भी आज से काँलेज छोड़ दिया है और एक तो पहले से ही नही आ रहा था। अब ऐसे मे हम दो लोग ही बचे हैं जिससे प्रयोग मे देर लग गयी।’’

‘‘अच्छा।’’ मैंने उसकी कहानी पर कुछ खास दिलचस्पी नही दिखाई। उसकी ओर हाँथ बढाते हुए बोला -“जय सिंह, मैं निकलता हॅू अब।’’

‘‘ठीक है।’’ कहते हुए उसने मेरा हाँथ थाम लिया।

मैं उससे हाँथ मिलाकर अभी दो कदम भी आगे नही बढा था कि एकाएक मेरा दिमाग ठनक उठा। मैं तेजी से उसकी ओर पलटा। उसे आवाज दी तो वह ठहर गया।

‘‘उस लड़की का नाम क्या है?’’ मैंने घबराई आवाज मे पॅूछा।

‘‘कौन सी लड़की?’’ उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

‘‘अरे वही जिसने आज काँलेज छोड़ दिया है।’’

‘‘नीतू।’’

‘‘जयसवाल?’’

‘‘हाँ, नीतू जयसवाल।’’

‘‘अच्छा।’’ मैंने धीरे से कहा और जिस तेजी से पलट कर लौटा था उसी रफ्तार से पीछे घूम गया मगर दो कदम चलते ही ऐसे लगा जैसे किसी ने मेरे पैरों पर पत्थर बांध दिया हो, कदम इतने भारी हो गये।

‘‘संजय…।’’ उस दौरान जय सिंह ने मुझे कई बार आवाज दिया मगर मैं सुन नही पा रहा था। मैं रुका नही।

उस दिन बहुत मुस्किल से मैं अपने कमरे पहॅुचा, बैग मेज पर फेंका और बिस्तर पर निढाल लेट गया। मैं समझ नही पा रहा था कि इस हालात में मैं क्या करू? प्रिया मेरे जेहन मे इतने अन्दर तक समा चुकी थी कि मैं चाह कर भी उसमे नीतू के लिए जगह नही बना पा रहा था। हालाकि ये भी सच था कि मैंने उसका दिल तोड़ा मगर क्या ये न्यायसंगत है कि उसके दिल को सकून पहुचाने के लिए मैं अपना दिल तोड़ लू? हरगिज नही। अगर ये खुदगर्जी है तो यही सही।

मेरी आँखों के सामने सीलिंग पर लगा पंखा फर फर करता हुआ घूमे जा रहा था और मेरी भावनाए किसी फुटबाँ ल की तरह उसने टकरा टकरा कर खुद को लहूलुहान किए जा रही थी।

******

वक्त आहिस्ता आहिस्ता गुजरता गया और वक्त के साथ ही ‘नीतू ने मेरे लिए अपना भविष्य दाँव पर लगा दिया’ इस बात की चुभन धीरे धीरे कम होती चली गयी। और जो कसर बची उसे प्रिया के साथ ने पूरी कर दी।

उस दिन जब एक बार फिर प्रिया ने अपना टिफिन मुझे आँ फर किया तो मैं विफर गया। लाड जताते हुए बोला -‘‘प्रिया, क्या तुम्हे नहीं लगता कि हर रोज यॅू तुम्हारा टिफिन खाना मेरी बदनामी का कारण बन सकता है?’’

‘‘क्या… क्या कहा तुमने?’’ वह एकाएक घूर कर देखी मेरी ओर -‘‘जरा फिर से कहो।’’

मैं हँस पडा -‘‘मेरा मतलब था हर रोज तुम मेरे लिये यॅू टिफिन लाती रहोगी तब तो न जाने और कितने सीनियर छात्रों एवं टीचर्स की निगाहों में आ जाऊॅगा मैं? वैसे भी कुछ सीनियर छात्र मुझे पसंद नही करते। तुम ये जानती हो न?

‘‘नही। वैसे पसन्द क्यों नही करते?’’

‘‘तुम्हारे चक्कर मे।’’

‘‘मतलब?’’

‘‘उन्हे लगता है तुम्हारी जैसी खूबसूरत लड़की मेरे साथ नही होनी चाहिए।’’

‘‘ये सब तो ठीक है।’’ जानबूझ कर वह छोटी बच्ची सी अल्हड बनते हुए बोली -‘‘मगर टिफिन लाने से ऐसा कौन पहाड़ टूटने वाला है? अरे खाना ही तो ला रही हॅू… जो अपनी मेरी मर्जी है। इससे किसी को क्या मतलब?’’

‘‘बडी बुद्दू लड़की हो तुम। तुम्हारे समझ मे कुछ नहीं आता।’’ दुलार करते हुए मैंने कहा -‘‘प्रिया हर जगह हमारी ही मर्जी नही चलती है। हमारी व्यक्तिगत पहचान जरूर है मगर हम इस समाज का हिस्सा भी है। इसलिए उसके बारे मे भी सोचना पड़ता है। तुमने कभी गौर किया? जब मैं तुम्हारे साथ चलता हॅू तब पता नही कितनी घूरती हुई निगाहे हमारा पीछा करने लग जाती है।’’

‘‘इससे तुम्हे फर्क पड़ता है? मुझे तो नही पड़ता।’’ टिफिन का ढक्कन खोलते हुए वह बोली -‘‘मैं बस एक बात जानती हॅू कि यहाँ कमीज सबकी गन्दी है। इसलिए परवाह मत करो और लो तुम खाना खाओ।’’ जबरदस्ती उसने मेरी ओर टिफिन बढा दिया।

कई दिन गुजर गये, मै कैन्टीन नहीं गया। प्रिया ने चेतावनी दे रखी थी कि अब से कैन्टीन की सड़ी-गली चाऊमीन या डोसा बन्द… हर रोज मुझे उसके घर का ताजा खाना खाना होगा।

‘‘संजय!’’ खाते-खाते ही एकाएक उसे कुछ याद आया। मेरी ओर देखकर बोली -‘‘शायद मैं नें तुम्हे एक किस्सा नहीं बताया।’’

‘‘कौन सा?’’ रोटी चबाना बन्द करके प्रश्नसूचक निगाहों से मैंने उसकी ओर देखने लगा।

‘‘मैंने तुम्हे बताया था न… कि राज और शिवानी के बीच कुछ तो है… वह बात बिल्कुल सही थी।’’

‘‘क्या मतलब?’’ इतने दिनो बाद एकाएक उस पुरानी बात का जिक्र होते हुए देख, मैं चौंक पड़ा।

‘‘शायद तुमने गौर नहीं किया।’’ वह हँस पड़ी -‘‘जिस दिन तुमने राज को बुलाकर शिवानी के बारे में पूँछा था, उसके बाद से ही राज प्रयोगशाला आना बन्द कर दिया था। याद है न?’’

‘‘हाँ तो?’’ मैंने अर्थपूर्ण निगाहों से उसे देखा -‘‘मुझे पता है प्रिया… राज मेरी इसी हरकत की वजह से प्रयोगशाला आना बन्द कर दिया था।’’

‘‘ये बात मुझे भी पता हैं यार?’’ उसने झल्लाने का अभिनय किया -‘‘पता नहीं तुम कहाँ गुम रहते हो? पहले मेरी बात तो सुनो। मैं कुछ और बताना चाह रही हॅू।’’ सहसा वह गंभीर हो गयी, बोली -‘‘जिस दिन राज पहली बार अनुपस्थित हुए थे। उस दिन छुट्टी के बाद एक नोट्स के सिलसिले मे मैं शिवानी से बात करनी चाही। जब मैं उसके घर पर फोन किया तो लाइन पर उसकी माँ थी। मैं ने फोन पर शिवानी को बुलाने को कहा तो वह कहने लगी- प्रिया बेटी! आज कालेज में शिवानी से किसी का झगड़ा वगड़ा हो गया था क्या? ‘क्यो?’ मेरे इस सवाल पर रूवासी-सी होकर बोली -‘‘पता नहीं क्यों आज शिवानी जब से कालेज से लौट कर आयी है, बस अपने कमरे में पड़ी रोये जा रही है। पॅूछती हॅू तो कुछ बता भी नहीं रही है।’’

‘‘तो उसके रोने से तुम समझ गयी कि…।’’

‘‘संजय!’’ प्रिया ने बीच में ही मेरी बात काट दी। मुस्कुराते हुए बोली -‘‘तुम बुद्दू कहते तो मुझे, लेकिन वास्तव में हो तुम। जानते हो क्यों?’’ वह जोर से खिलखिलाई -‘‘क्या तुम अब भी नही समझ पा रहे हों कि उस दिन शिवानी कालेज से लौटकर घर पर क्यों रोयी? जबकि तुम्हे भी पता है और मैं भी जानती हॅू कि उस दिन राज की अनुपस्थित के अलावा उसके साथ और कोई अस्वाभाविक घटना कम से कम कालेज में तो नहीं ही घटी थी जिसके लिये वह घर जाकर यू बेहाल होकर रोती।’’

‘‘हो सकता है कुछ हुआ हो जिसकी हमें जानकारी न हो।’’

‘‘बुद्दू उस दिन वह लगभग पूरे दिन मेरे साथ थी। और दूसरी बात… अगर इसके अलावा और कोई बात होती तो क्या वह अपनी माँ से कह न देती।’’

उसकी बात सुनी तो मैं पल भर के लिये आवाक रह गया -‘‘तुम तो बड़ी इंटेलीजेन्ट हो यार।’’ मैंने कहा

‘‘और नही तो क्या।’’ एकाएक उसकी आँखों मे चमक आ गयी।

‘‘वैसे प्रिया! क्या तुम्हे पता है कि आज कल राज काँलेज क्यो नहीं आ रहा है? क्या सिर्फ वही वजह है जिससे वह प्रयोगशाला नही आ रहा है या बात कुछ और है?’’

‘‘तुमसे किसने कहा वह काँलेज नही आ रहा है?’’

‘‘मतलब?’’

‘‘राज कालेज आता है इनफैक्ट हर रोज आता है लेकिन वह अब हमारी ब्रान्च में नही।’’

‘‘तो?’’

‘‘सिविल में…। उस घटना के तीन चार दिनों बाद ही उसने अपनी ब्रांच बदलवा लिया था।’’ उसने खाना चबाना बन्द कर दिया, मेरी ओर झुक कर बोली -‘‘क्या तुम्हे सच मे पता नही था?’’

‘‘नही।’’ मैं अचाननक उठ कर खड़ा हो गया -‘‘प्रिया तुम्हे उसका सेक्सन पता है?’’

‘‘नही। मगर तुम यॅू उठ कर जा कहाँ रहे हो?’’

‘‘माँ फी मागने।’’

‘‘क्या? राज से? तुम पागल हो?’’

‘‘हाँ … नही… पता नही मगर मुझे अपनी गलती के लिए माँ फी मांगनी चीहिए। मुस्किल से हिम्मत जुटाई है, मुझे मत रोको।’’

‘‘ठीक है, पर खाना तो अपना खाते जाओं।’’

‘‘मेरा पेट भर गया है।’’ मैं जल्दी जल्दी अपना बैग समेटा और पैन्ट मे अपना हाँथ पोछते हुए वहाँ से निकल गया।

मेरी वजह से नीतू कालेज ही नहीं बल्कि पढाई ही छोड़ दी। राज अपना पूरा लक्ष्य बदल दिया और शिवानी? उफ! मैं अब और खुदगर्जी नही पाल सकता। मैं वहाँ से सीधे सिविल ब्रांच पहुँ चा गया। राज सामने ही था। मुझे दूर से देखते ही वह हाँथ उठाकर हवा मे लहराया। मैं लगभग दौड़ता हुआ जाकर उसके सामने खड़ा हो गया।

‘‘हाय संजय।’’ वह मुस्कुराया।

‘‘हाय।’’

‘‘कैसे हो?’’

‘‘ठीक हॅू।’’ मैंने जबरजस्ती मुस्कराने की कोशिश की।

‘‘आओं बैठो।’’ उसने कहा।

मैं बैठ गया-

देर तक हम खामोश रहे। शायद इस लिये भी, बात शुरू करने का हमारे पास कोई ठोस मुद्दा नही था।

‘‘राज।’’ जब देर तक खामोशी नही टूटी तो मजबूरन मुझे बात छेडनी पडी -‘‘मैं उस दिन के लिए माँ फी मागने आया था। अपनी उस गलती के लिए मैं शर्मिन्दा हॅू… मुझे माँ फ कर दो यार।’’

‘‘अरे नही यार… कोई दोस्त से भी माँ फी मॅागता है?’’

‘‘नही राज। मैं सचमुच शर्मिन्दा हॅू।’’

‘‘संजय।’’ वह उठकर खड़ा हो गया, बोला -‘‘इतना भावुक होने की जरूरत नही है। मैं उस बात को कब का भूल चुका हॅू और अब तुम भी भूल जाओ।’’

‘‘कैसे भूल जाऊँ यार?’’

‘‘ऐसे ही जैसे पुरानी रद्दी को तुम अपने घर से बाहर निकाल कर फेंक देते हों।’’

‘‘मेरी वजह से तुमने अपनी ब्रांच बदल ली?’’

‘‘रुको… रुको। क्या कहा तुमने?’’ वह एकाएक सूख गया। अपने दोनो हथेलियों को मेज पर रखते हुए लम्बी सांसे ली, बोला -‘‘संजय, मैंने ब्रांच तुम्हारी वजह से नही बदली।’’

‘‘तो?’’

‘‘उसके लिए दूसरी भी कई वजहें हैं जिन्हे शायद मैं तुमसे नही बांट पाऊॅगा।’’

‘‘नही उसकी जरूरत नही है राज।’’ मैंने राहत की सांस ली -‘‘तुम्हारी इतनी बात सुन कर ही मेरे सर का बोझ काफी हद तक हल्का हो गया। और सच कहॅू तो भूख भी जोर की लग गयी है। कैन्टीन चले?’’

‘‘ओ0के0।’’ वह मुस्कुरा पड़ा।

******

प्रिया और मेरी इतने दिनों की नजदीकिया एकाएक यूँ टूट कर विखर जायेगी मुझे यकीन नही हो रहा था। बात बहुत छोटी थी। अपनी ही कक्षा की एक लड़की ने मुझसे नोट्स मांग ली। वो भी उस दशा में जब हर ओर से निराश लौटकर वह भरी-भरी आँ खे लिये हुए मेरे सामने आकर खडी हो गयी थी। मैंने उस उसे नोट्स देने का वादा कर दिया। जब यह खबर प्रिया को लगी तो वह उखड़ गयी। कहने लगी -‘‘नहीं, तुम वह नोट्स किसी को नहीं दोगे।’’

 दरअसल वह नोट्स प्रिया की ही थी जिन्हे काफी दिनों से मै इस्तेमाल कर रहा था। जब मैं ने उसे अपने वादे के बारे में बताया था तो वह चिग्घाड पड़ी -‘‘भाड में जाय तुम्हारा वादा। मै इस मामले में जरा भी समझौता नहीं करूँ गी, समझे तुम। अगर तुम्हे इतना ही शौक है इन लडकियों की हमदर्दी बटोरने की तो पहले मेरे नोट्स मुझे वापस कर दो, फिर जो जी में आये करो। जहाँ पाओ पूरा करो अपना वादा।’’

उसके इस अनायास गुस्से पर पता नहीं क्यो मुझे हॅसी आ गयी थी -‘‘आखिर तुम एक नोट्स को लेकर क्यों इतना उखड़ रही हो?’’

‘‘अच्छा… मै उखड़ रही हॅू?’’ उसका स्वर और भी तीव्र हो गया -‘‘चलो मानती हॅू मैं उखड़ रही हॅू तो यही सही मगर संजय तुमसे बताए देती हॅू -‘‘तुम्हारी यूँ दूसरी लड़कियो से हमदर्दी, मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। तुम चुपचाप मेरे साथ चलो।’’ वह मेरा हाँथ पकड़ कर खीचने लगी।

‘‘कहाँ?’’

‘‘कैन्टीन ओैर कहाँ? मुझे भूख लगी है।’’

‘‘और तुम्हारा टिफिन?’’

‘‘नहीं लायी।’’

‘‘झूठ बोल रही हो?’’

‘‘हाँ झूठ बोलती हॅू, बस तुम चलो यहाँ से।’’

उस वक्त मुझे जाना पड़ा मगर अगले दिन वह लड़की तब एक बार फिर उसी हाल में मेरे सामने आ खडी हुई। मैं उसे मना नही कर पाया। उसे नोट्स दे दी। यह बात जैसे ही प्रिया के कानो तक पहुँची वह तूफान की रफ्तार से कक्षा मे दाखिल हुई, मेरे बगल वाली सीट पर रखे अपने बैग को उठाया और पीछे खाली पड़ी सीट्स की ओर बढ गयी।

हालाकि मुझे उम्मीद थी कि यह खबर सुनने के बाद वह मुझ पर चिल्लायेगी… शिकायत करेगी और फिर भूल जायेगी मगर यहाँ सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया। मैं थोड़ी देर तक बदहवास उसे देखता रहा मगर उसने एक बार भी मुझसे नजरें नही मिलाई। वह गुस्से मे थी।

थोड़ी देर बाद जब मुझसे रहा नही गया तो मैंने भी अपना बैग उठाया और जाकर उसके बगल वाली सीट पर बैठ गया। मेरे बैठते ही वह वहाँ से उठना चाही तो मैंने उसका हाँथ पकड़ लिया -‘‘प्रिया सुनो तो।’’

‘‘मुझसे बात मत करो।’’ उसने तेजी से मेरा हाँथ झटक दिया। चीखते हुए बोली -‘‘और हाँ अपनी गन्दी जुबान से दोबारा मेरा नाम मत लेना।’’

शोर सुन कर पूरी कक्षा हमारी ओर देखने लगी। मैं ने धीरे से अपना बैग उठाया और कक्षा से बाहर निकल गया।

******

उस दिन मैं बहुत परेशान था। छुट्टी के बाद भी घर जाने का मन नही कर रहा था। मैं टहलते हुए पास ही बने एक पार्क मे घुस गया।

दिसम्बर की शाम थी। सूरज ढलान पर था। चारो ओर हल्की हल्की सी धॅुन्ध छायी हुई थी। पार्क मे इक्के दुक्के इंसान ही इधर उधर टहल रहे थे। दिमाग मे प्रिया की चीखती हुई तेज आवाज अब भी मेरे कानों में गूँ ज रही थी। मैं किसी बदहवास की तरह लड़खड़ाते हुए कदमों से चलता हुआ पार्क के बीचो-बीच पहुँच गया। दिसम्बर की आखिरी सप्ताह की जोरदार ठण्ढ शाम मे भी मैं अजीब सी गर्मी महसूस कर रहा था। मैंने अपना जैकेट उतारा और गुस्से मे तेजी से पाछे की ओर झटक दिया।

‘‘ये क्या बद्तमीजी है?’’ किसी ने चिल्लाया।

‘‘साँरी…।’’ मैं तेजी से पीछे की ओर मुड़ा। मेरा जैकेट उसके चेहरे पर जा गिरा था।

‘‘आपको यॅू कपड़ो से फुँ टबाल खेलने का शौक है तो पीछे देख कर खेलना चाहिए।’’ कहती हुई उसने तेजी से अपने चेहरे पर पड़ी जैकेट को खीचा।

‘‘नीतू तुम…?’’ मेरे होठ फड़फड़ा उठे। सामने नीतू खड़ी थी।

मुझे सामने देखते ही अचानक उसका चेहरा पीला पड़ गया। हड़बड़ाहट मे बोली -‘‘सॉरी। मैंने आपको पहचाना नही।’’ कहती हुई वह तेजी से पीछे की ओर मुड़ी और लगभग दौड़ते हुए कदमों से वहाँ से निकल गयी।

‘‘नीतू….।’’ मैंने आवाज भी दी मगर वह हवा की रफ्तार से मेरी आँखों के सामने से ओझल हो गयी।

मैं कुछ नही कर पाया। लाचार घुटनो के बल वहीं जमीन पर बैठ गया। मैं गला फाड़ कर चिल्लाना चाहा परन्तु गले से आवाज नही निकली। बस मेरी आँखेंउबल पड़ी।

******

दिसम्बर अपने रेंगते कदमों से गुजरता हुआ लगभग आखिरी पडाव पर पहुँच गया। हमारी परीक्षाये शुरू हो चुकी थी। उस दिन परीक्षा हाल से निकल कर मैं जैसे ही बरामदे की ओर मुड़ा- एकाएक प्रिया मेरे सामने आ गयी। मेरा दिल जोर से धड़का। जी में आया नजरे घुमाकर निकल जाऊँ परन्तु कम्वक्त ये आँखों ने उस दिन धोखा दे दिया। नजर मिलते ही मैं मुस्कुरा पड़ा मगर उसके चेहरे मे रूखपन बना रहा। वह बिना ठहरे ही वहाँ से चली गयी।

 हालाकि इतने दिनो बाद अचानक उसे देख कर मेरे मुस्कुराने की वजह भी थी। मेरा पेपर काफी अच्छा हुआ था। मैं बेतहासा खुश था। मैं भूल सा गया था कि कुछ दिनो पहले ही उसने पूरी कक्षा के सामने मुझ पर चिल्लाया था और फिर माँ फी भी नही मागी। मैंने पीछे से आवाज दी -‘‘प्रिया।’’ शायद उसे इसी का इन्तजार था। आवाज उसके कानो में पडी तो वह ठहर गयी -‘‘पेपर कैसा हुआ है?’’ मैंने पूँछा।

‘‘ठीक ही हुआ है।’’ उसकी बेरूखी बनी रही। पॅूछा -‘‘तुम्हारा?’’

‘‘बहुत अच्छा।’’ मै उसके बिल्कुल करीब पहुँच गया।

‘‘अच्छी बात है।’’ कहती हुई वह एक कदम पीछे हट कर खड़ी हो गयी। शायद उसे मेरा इतना पास आना पसंद नही आया। उसकी निगाहें जमीन पर टिकी रही।

‘‘तुम अब भी नाराज हो?’’ मैंने हिम्मत करके पूछा।

‘‘क्यों अब क्या नया हो गया?’’ उसकी नजरें एकाएक छलांग लगाते हुए मेरे चेहरे पर आ टिकी।

‘‘नही नया कुछ नही हुआ। बहुत दिन हो चुके हैं न… इसलिए पूँछ लिया।’’

‘‘अच्छा।’’ कहकर वह चुप हो गयी।

‘‘कुछ कहो प्रिया।’’ मैंने कहा मगर उसने चुप्पी नही तोड़ी।

‘‘संजय।’’ इससे पहले मैं वहाँ से आगे बढ़ने के लिए सोचता उसने आवाज दी। मैंने हड़बड़ा कर उसकी ओर देखा -‘‘क्या तुम अब भी यही सोचते हो कि उस दिन तुमने जो कुछ भी किया वह सही था?’’

‘‘पता नही।’’

वह थोड़ी देर तक अर्थपूर्ण नजरो से मेरी ओर देखती रही फिर अचानक उसकी नजर घड़ी पर गयी तो हड़बड़ा कर बोली -‘‘मै चलती हॅू।’’

******

वह 31 दिसम्बर की दोपहर थी। पेपर छूटते ही एक बार फिर इत्तेफाकन प्रिया मेरे सामने आ गयी। मैं नजरें चुराने की कोशिश करता उससे पहले वह मेरी ओर बढ़ते हुए चिल्लाई -‘‘हाय संजय।

‘‘हाय!’’ मैं ठहर गया।

‘‘पेपर कैसा हुआ तुम्हारा?’’

‘‘ठीक हुआ है और तुम्हारा?’’ मेरे शब्दो मे कल के उसके शब्दो की तरह बेरुखी नही थी।

‘‘फाइन।’’ उसने कहा और हॅसती खिलखिलाती हुई एकदम मेरे करीब आ गयी। उतने ही जैसे पहले आया करती थी।

टचानक उसके व्यवहार मे आया हैरान करने वाला था। इस वक्त जब घर पर बैठा हुआ डायरी लिख रहा हॅू तो सोच रहा हॅू कि -‘प्रिया जैसी मगरूर लड़की सिर्फ एक रात में इतना कैसे इतना बदल सकती है?’ कल तो वह ठीक से बात भी नही कर रही थी। और आज महीनों से विखरी दूरी को चंद क्षणों मे समेटकर वह इतने करीब ले आयी।

उस दिन हम एक बार फिर अतीत की तरह देर तक इधर-उधर के बेफजूल बातें करते हुए हॅसते खिलखिलाते रहे। हम जब कालेज के गेट पहुँ चे तो एक बार फिर प्रिया ने गहरी नजरों से मेरी ओर देखा, लम्बी सांसे भरी और बोली -‘‘संजय अब मैं चलती हॅू।’’ 

‘‘पैदल?’’

‘‘नहीं टैक्सी से।’’

‘‘क्यों… तुम्हारा ट्रांस्पोर्ट कार्ड कहाँ है?’’

‘‘कौन? गौरव?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘मैं ने उससे बात करना बन्द कर दिया है।’’

‘‘क्यो?’’ मैं चौंक पड़ा।

‘‘अरे वह छोड़ो तुम… कुछ बात हो गयी है?’’

‘‘लेकिन बताओ तो।’’ मैंने जिद की -‘‘क्या बात हो गयी थी?’’

‘‘कुछ नही हुआ था।’’

‘‘अरे बताओ तो सही।’’

‘‘तुम मुझसे बात नहीं कर रहे थे इसलिए।’’ उसने शिकायत भरे अंदाज मे मेरी ओर देखा।

‘‘ओह प्रिया तुम सचमुच पागल हो।’’ मैंने लाड जताते हुए कहा -‘‘मुझ पर गुस्से की सजा तुमने उस वेचारे को दे डाली।’’

‘‘तब क्या करती।’’ अजीव सा मुँह बनाते हुए वह बोली -‘‘तुमसे दूरियां और थोड़ी बढ़ानी थी।’’

‘तुमसे दूरियां और थोडी बढ़ानी थी।’ उसके ये जरा से अल्फाज मेरे कानों से टकराये तो चीरते हुए सीधे दिल तक उतर गये। उस वक्त प्रिया को मैं आसमान मे बिठा देना चाहता था।

‘‘संजय।’’ मुझे खामोस देखकर वह बोल पडी -‘‘अब तुम कहाँ खो गये?’’

‘‘कहीं नहीं।’’

‘‘हैपी न्यू इयर इन एडवांस।’’ हॅाथ मिलाने के लिये अपना हाँथ बढाते हुए वह बोली। शायद रोड़ पर आती हुई टैक्सी उसने देख लिया था।

‘‘अरे रूको तो?’’ मैं लपक कर उसका हाँथ पकड़ लिया। उसने भी टैक्सी को आगे बढ़ जाने दिया।

‘‘क्या हुआ?’’ टैक्सी के झोके से चेहरे पर आ गयी लटो को सवांरते हुए मेरी ओर देखा। टैक्सी दूर निकल गयी।

‘‘तुम्हे मालूम होना चाहिए नया वर्ष आज नहीं कल से शुरू हो रहा है।’’

‘‘लेकिन मिस्टर! शायद तुम्हे नहीं मालूम है कि कल से काँलेज बन्द हो रहा है वो भी 18 दिनों के लिये।’’ दरअसल बात बात पर उसे मिस्टर कहने की आदत थी, मटकते हुए बोली -‘‘और जनाब के पास फोन तो है नही कि हम फोन पर ही शुभकामनाएं दे दे।’’

‘‘लेकिन तुम्हारे घर पर तो है।’’

‘‘हाँ मगर हमे ये भी पता है कि तुम तो हमारे घर पर फोन नही करोगे। मेरे भाई से इतना डरते जो हो।’’

‘‘तुम्हारे भाई से?’’

‘‘जी हाँ … मेरे भाई से। बोलो जो गलत कह रही हॅू।’’

‘‘हाँ।’’ मैंने मुस्कुराकर अपनी सहमति जताई।

‘‘अच्छा अब चलॅू?’’

‘‘तो तुम अब 18 दिनां के बाद मिलोगी?’’

‘‘जी… मजबूरी है।’’

‘‘क्या हम कल नही मिल सकते।’’

‘‘कल कालेज बन्द है मिस्टर।’’

‘‘कालेज में नहीं… कही बाहर।’’

‘‘बाहर? कदापि नहीं, मिस्टर संजय।’’ वह आँखें नचाते हुए बोली -‘‘मुझे घर से बनवास लेने का शौक थोड़े है।’’

‘‘क्यो?’’

‘‘अरे मम्मी पापा मुझे घर से निकाल देंगे यार। और मेरा भाई तो मुझे मार ही देगा।’’

‘‘अच्छा तो तुम भी अपने भाई से डरती हो?’’ मैं हँस पड़ा -‘‘वह सचमुच भाई ही है न? कहीं डाँ न वाला भाई तो नही है?’’

‘‘कभी मिलो उससे। पता चल जायेगा कि कौन सा भाई है? उसकी मर्जी के बगैर घर का एक पत्ता भी नही हिलता।’’

‘‘बस करो यार। अब क्या मुझे डरा कर ही दम लोगी। वैसे भी मैं लड़कियों के बाप से ज्यादा उनके भाइयों से डरता हॅू।’’

‘‘क्यों…. एक आध बार पिट चुके हो क्या?’’

‘‘न…नही यार।’’ मैं हकला पड़ा

‘‘अच्छा सुनो।’’ एकबार फिर उसने मेरी ओर हाँथ बढ़ाया -‘‘टैक्सी आ रही है। मुझे अब निकलना है। और हाँ… खुसबू के घर वाले नम्बर पर मुझे फोन करना।’’

‘‘ठीक है।’’

खुसबू एक कम्प्यूटर की छात्रा थी जो उसकी पड़ोसी होने के साथ साथ उसकी अच्छी दोस्त भी थी। उसका नम्बर वह काफी पहले से ही मुझे दे रखा था। कभी लेट अथवा न आ पाने की दशा में मैं उसके घर के फोन पर कॉल करने की बजाए उसकी सहेली खुसबू के यहाँ ही फोन किया करता था। खुसबू से अब तक मेरी भी अच्छी खासी जान पहचान हो चुकी थी।

******

नये वर्ष की वह ताजगी भरी सुबह थी। गलियों पर गुजर रहे लोगो के बीच – हैप्पी न्यू इयर की बधाइयाँ  मुझे बता रही थी कि नया वर्ष फिजाओ मे दस्तक दे चुका है। सब कुछ पहले जैसा होते हुए भी नया नया सा लग रहा था। फिर मैं अपने वादे को  कैसे भूलता। मैं रात भर सपने संजेाता रहा कि मै जाऊॅगा, वो आयेगी, हम मिलेंगे, मुस्कुरायेंगे, हॅसेगे और तब… एकाएक मेरा दिल धक्क से धड़क उठा। मैं उसे कैसे कहॅूगा कि मैं तुम्हे….। नही नहीं मैं पहले नहीं कहूँ गा। पहले उसे ही कहना होगा। लेकिन फूल तो पहले मैं ही दॅूगा। उफ! पता नही कौन पहले क्या करेगा? मैंने अपना सर पकड़ लिया।

घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे रेंगती आगे बढ़ रही थी। मैं अपने एक खास मित्र के साथ उस पार्क पर पहॅुच गया जहाँ पर आने के लिये उसने मुझसे वादा किया था।

मैं घड़ी की ओर एक बार फिर देखा- साढ़े ग्यारह बज रहा था। प्रिया का कहीं अता पता नही था। उसे ग्यारह बजे पहुँचना था। एक बार तो मेरी सारी उम्मीदे धूमिल होती हुई नजर आयी। परन्तु मैं इतना निराशावादी बिल्कुल नही था। ये असहज भाव जिस तरह एकाएक मेरे मन में उठे थे उसी तरह विलुप्त भी हो गये। मैं अभी भी उसकी प्रतीक्षा के लिये तैयार था।

एक बजे तक मैं वहाँ उसका इंतजार करता रहा जब वह नही आयी तो मन ही मन मैं तड़प उठा। एक बार तो लगा कि अपनी पाकेट से रखा फूल निकालू और उसे मसल कर फेंक दू। मैंने जेब से फूल निकाला और देर तक उसे घूरता रहा मगर मसलने की हिम्मत नही हुई -‘‘यार एक बार फोन मिलाओगे क्या प्रिया को?’’ मैं ने मित्र से कहा तो वह बगैर किसी देरी के अपना मोबाइल निकाला। मुझसे नम्बर पूछा और डायल कर दिया।

फोन लाइन पर खुशबू थी-

‘‘हैलो।’’ मैने कहा।

‘‘कौन… संजय जी?’’ उसकी आवाज की उत्तेजना बता रही थी कि शायद उसे मेरे ही फोन का इन्तजार था।

‘‘हाँ ।’’ मैंने धीरे से कहा।

मै आगे कुछ पूँछता उससे पहले वह कहने लगी -‘‘दरअसल प्रिया यही है।’’ उसने फोन प्रिया को थमा दिया।

‘‘हाय संजय।’’ फोन पर आते ही वह हँस पड़ी।

‘‘तुम आयी नही।’’ मेरे स्वर मे शिकायत थी।

‘‘मैने तुम्हे कल अपने भाई के बारे में बताया था, याद है?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘उसी की वजह से लेट हो गयी थी।’’

‘‘तो अब आ रही हो न? मैंने जरा झल्ला कर पूछा।

‘‘हाँ मिस्टर! आ रही हॅू।’’ वह हँस पडी। शायद उसे मेरी झल्लाहट का एहसास था -‘‘बस खुसबू के तैयार होने की देरी है।

‘‘उसको भी साथ लाने का इरादा है क्या?’’

‘‘तुम्हे क्या लगता है, मैं अकेले आऊॅगी उस भीड़-भाड़ में?’’ उसने फोन रख दिया।

हम थोड़ी देर इन्तजार करते रहे। तभी अचानक वह खूबसूरत परी पार्क के बड़े से गेट से दाखिल होते हुए हमारी ओर बढ़ी। उसके पीछे पीछे खुशबू थी। मेरे सीने की धकड़न एकाएक बढ़ गयी। मैंने जेब मे पड़े फूल को टटोला और फिर लम्बी सांस भरते हुए खड़ा हो गया।

‘‘हाय संजय।’’ मुस्कुराते हुए उसने दूर से ही हाँथ हिलाया। मैंने भी अपने हाँथ उठा दिए। उस दौरान मेरी निगाहें खुशबू पर भी गयी। हमेशा से मैंने सिर्फ उसकी आवाज ही सुनी थी आज वह पहली बार मेरे सामने आयी थी।

‘‘लो आ गये हम।’’ प्रिया मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी

‘‘हैपी न्यू इयर प्रिया।’’

‘‘सेम टू यू।’’ वह मुस्कुराई। फिर पीछे पलटते हुए बोली -‘‘संजय! इससे मिलो -हमारी सबसे अच्छी दोस्त खुशबू। आवाज तो कई बार सुनी है तुमने। आज मिल भी लो।’’

‘‘हेलो।’’ मैं उसकी ओर देखते हुए मुस्कुराया।

‘‘हेलों… कैसे हैं आप?’’

‘‘मैं ठीक हॅू और आप?’’ उसने होठो से कुछ नही कहा। बस सर को हिलाते हुए वह मुस्कुरा पड़ी। मैं थोड़ी देर इधर उधर देखता रहा फिर अचानक घुटनो के बल बैठते हुए अपनी जेब से फूल निकाला और प्रिया की ओर बढ़ा दिया।

‘‘तुम मुझे फूल दे रहे हो? क्यों?’’ उसने गहरी गहरी निगाहों से मेरी ओर देखा -‘‘रुको रुको…  संजय! पहले तुम खड़े हो जाओ।’’

मैं खड़ा हो गयाा।

‘‘हाँ अब बोलो… कही प्यार व्यार का चक्कर तो नही है न?’’

‘‘प्रिया।’’

‘‘हाँ संजय अगर ऐसा है तो प्लीज ये सब अपने दिमाग से निकाल दो।’’ उसने बिना मेरी बात सुने हुए अपनी बात जारी रखी -‘‘ऐसा कुछ नही होने वाला। मैं तुम्हारी दोस्त हूँ, यार… सिर्फ दोस्त।’’ कहती हुई वह मेरे चेहरे तक झुक आयी।

मैंने खाली खाली नजरों से उसकी आँखों मे देखा। वह चपमुच बीरान थी। मेरा दिल काँ च की तरह टूट कर बिखर गया। मैं लड़खड़ाते हुए पास की कुर्सी पर बैठ गया। इस दौरान मेरी नजरें खुशबू की ओर भी गयी। उसके चेहरे पर हैरानी थी।

‘‘संजय।’’ वह मेरी ओर बढ़ी, बोली -‘‘क्या तुम लड़कियों को सिर्फ प्रेमिका के रूप में ही देखना पसन्द करते हो? दोस्ती तुम्हारे लिये कोई मायने नहीं रखती है?’’

‘‘नही प्रिया?’’

‘‘तो फिर ये फूल? ये घुटनो पर बैठना…ये सब क्या है?’’ वह मेरे चेहरे तक झुक आयी, बोली -‘‘वैसे संजय, तुम एक बात बताओगे?

‘‘पूछो?’’

‘‘तुम्हारे अंदर ये सब कब से पल रहा था?’’

‘‘क्या?’’

‘‘ओह प्लीज संजय! तुम मुझे बनाने की कोशिश मत करो। तुम जानते हो मैं क्या पॅूछ रही हॅू।’’

‘‘मुझे याद नही है।’’ मैंने धीरे से कहा -‘‘मगर प्रिया।’’ एकाएक मेरी आवाज का कम्पन्न बढ़ गया। मैं कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया, बोला -‘‘तुम एक बात बताओगी?’’

वह मेरी ओर देखने लगी।

‘‘क्या तुम नहीं जानती थी कि नीतू और मेरे बीच क्या था? और उसे मैंने क्यों छोड़ा?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘प्रिया झूठ मत बोलो।’’ एकाएक मेरे स्वर मे तीखपन आ गया -‘‘तुम सब कुछ जानती थी। ये भी कि उसने मेरे खातिर काँलेज भी छोड़ दिया है।’’

‘‘हाँ जानती थी।’’ मुझे यॅू बिफरते देखा तो वह घबरा गयी।

‘‘फिर तुम ये भी जानती रही होगी कि मैंने उसे तुम्हारे लिए छोड़ा था। और तुमने सब कुछ जानते हुए भी मुझे मना भी नही किया। दोस्त तो तुम तब भी बनी रह सकती थी।’’

‘‘मैं क्यों मना करती?’’ एकाएक उसके स्वर मे जड़ता आ गयी।

‘‘सही कर रही हो तुम। तुम क्यों मना करती? तुम्हे ये वाली मुझसे दोस्ती जो करनी थी।’’ मैं बिफर पड़ा। मुझे यॅू बिफरते देख वह चुप हो गयी।

‘‘एक बात बताओंगी?’’ मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा -‘‘दोस्ती के लिये काँलेज मे तुम्हें कोई लड़की नहीं मिली? दोस्ती तो लड़की से भी हो सकती थी।’’

‘‘यार तुम मुझे अच्छे लगते हो।’’ अचानक वह मुस्कुरा पड़ी।

‘‘वाह प्रिया।’’ मेरे होठो पर एक रूखी सी मुस्कान तैर पडी – मैं तुम्हे अच्छा लगता हॅू? अच्छा लगने क्या खूबसूरत तोहफा दिया है मुझे।‘‘

‘‘यार सगाई हो गयी है मेरी।’’ एकाएक वह भावुक हो गयी, बोली -‘‘वर्ना गर्लफ्रेण्ड तो क्या… मैं शादी कर लेती तुमसे… कसम से। तुम मुझे सचमुच बहुत अच्छे लगते हो।’’

‘‘सगाई!’’ जैसे ही उसका यह शब्द मेरे कानों को छुआ, मै गिरते गिरते बचा, खीझकर बोला -‘‘तुम मजाक कर रही हो मुझसे?

‘‘नही यार। सच है ये। खुशबू से पॅूछ लो।’’

मैंने खुशबू की ओर देखा। उसने हाँ मे सर हिला दिया। मैंने आगे कुछ नही कह पाया। बस पथराई आँखों से उसे देर तक देखता रह गया।

******

मैं लगभग अपना होश खो चुका था। पार्क से लौटते वक्त सड़क पर मैं पैदल ही भाग रहा था। मुझे याद नही उस वक्त कितनी गाडियाँ पो पो करती हुई मेरे बगल से गुजरी होगी। तभी अचानक मेरे दोस्त ने पीछे से आकर मुझे झकझोरा। दिमाग पर जोर पड़ा तो देखा मैं एक कार के बिल्कुल आगे खड़ा था और कार चालक मुझ पर चिल्लाये जा रहा था -‘‘अबे अफीम पी रखी है क्या? मरना है तो कही बाहर जा कर मरो या नये साल के पहले दिन मुझे जेल भिजवाने का इरादा कर रखा है क्या?’’

‘‘संजय।’’ मेरा दोस्त दौड़ कर मेरे पास आया, मुझे झकझोरा मैं फिर भी वहाँ से नही हटा तो उसने मुझे खीच कर सड़क के किनारे ले आया। चीखते हुए कहा -‘‘अमे यार, तुम अपने प्यार के चक्कर मे हमारी इज्जत काहे उतार रहे हो? लोग घूर रहे हैं हमें।” उसने मेरे कंधे को जोर से दबाया -‘‘देखो अपने चारो तरफ।’’

मैंने इधर उधर नजरें दौड़ाई। आस पास खड़े तमाशबीन मुझे पागलो की तरह घूरे जा रहे थे।

‘‘साला हमें पता होता कि ये सब तमाशा होना है तो अपने बाबू जी की कसम हम तुम्हारे साथ इस नरक मे कभी नही आते।’’उसने एक बार फिर मुझे झकझोरा, बोला -‘‘अब चलो यहाँ से।

‘‘किसन…।’’ मैंने कुछ कहने की कोशिश की।

‘‘तुम तो अपनी जुबान बन्द ही रखो।’’ उसने अपनी लाल आँखों से देखा मुझे -‘‘कसम से हमारी खोपड़ी बहुत जोर से भन्ना रही है। साला एक साथ इतनी बेइज्जती हमने अपनी शादी मे भी नही महसूस की जब फेरे से पहले हमारी होने वाली बीबी अपने आशिक के साथ भाग गयी थी।’’

‘‘क्या?’’ मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा।

‘‘अब घूरो मत हमें। शादी का प्रस्ताव लेकर हम उसके पास नही गये थे। उसका बाप आया था हमारे दरवाजे मिन्नतें करने। और साला एक ये हैं- उसने मना क्या किया, साहब पागलो की तरह दौड़ पड़े सड़क के बीचो बीच। लड़की न हुई जिन्दगी हो गयी।’’

थोड़ी देर मे हम दोनो मेरे 12 बाई 12 फुट वाले किराये के कमरे पहुच गये।

‘‘अमे चाबी दो। ताला हम खोलते हैं। आज तुमसे ये भी नही हो पायेगा।’’ उसने मेरी तरफ देखा फिर कुछ सोच कर खुद ही मेरे जेब मे हाँथ डालते हुए बोला -‘‘ओहो… मैं खुद निकाल लेता हॅू। तुम्हे तो आज शायद अपनी जेब भी न मिले।’’

ताला खोलते ही उसने गुस्से मे दरवाजे पर जोर से लात मारी।

‘‘अबे कौन तोड़ रहा है मेरे दरवाजे को।’’ अचानक नीचे से आवाज आयी -‘‘किराये पर हो… तुम्हारे पापा का घर नही है ये।’’

‘‘सॅारी अंकल। गलती से दरवाजे मे टकरा गया था।’’ उसने हड़बड़ी मे कहा।

‘‘तो देख कर चला करो वर्ना एक दिन तुम अपना सर भी फोड़ लोगे और मेरा दरवाजा भी।’’

मैं कमरे मे घुसते ही सीधे बिस्तर पर लेट गया और वह वही चूल्हे के पास रखे बर्तनो मे सुबह की रोटियाँ टटोलने लगा।

मैंने रजाई से खुद को सर तक ढक लिया। आँखों के सामने जैसे ही अंधेरा हुआ प्रिया का चेहरा झिलमिला उठा। उसकी ठिठोलियाँ … उसकी चंचलता… उसके साथ गुजारे गये वो तमाम हसीन पल एक एक करके मेरी बन्द आँखों के सामने बिखरते चले गये। ‘मेरी सगाई हो गयी है यार’ उसका यह वाक्य एक बार फिर अचानक मेरे दिमाग मे गूँ जा तो मैं रजाई को झटकते हुए उठ कर बैठ गया।

‘‘अब क्या हुआ?’’ किसन पलट कर मेरी ओर देखा।

‘‘कु…कुछ नही।’’ मैंने खाली खाली नजरो से इधर उधर देखा।

‘‘इधर उधर क्या देख रहे हो बे? तुम्हारा ही कमरा है।’’

‘‘किसन।’’

‘‘उहॅू।’’

‘‘खुसबू को फोन लगा दोगे?’’

‘‘क्यो? अभी और बेइज्जती करवानी है क्या?’’

‘‘नही यार। उससे माँ फी मांगनी है।’’

‘‘अच्छा तो साहब को होश आ गया?’’ उसने जेब से मोबाइल निकाला फिर कुछ सोच कर मेरी तरफ देखने लगा -‘‘वैसे एक बात बताओ? तुम खुसबू से कौन से जुर्म की माँ फी मांगने वाले हो?’’

‘‘तुम फोन तो लगाओ पहले। बताता हॅू।’’

‘‘तुम कही फिर से तो नही प्रिया से गिड़गिड़ाने वाले हो? अमे अगर ऐसा है तो एक बात सुन लो हमारी- तुममे खुद्दारी हो या न हो मगर हममे बहुत है। और हम ये बिल्कुल बर्दास्त नही करेगे कि कोई हमारे दोस्त की बेइज्जती करे।’’

‘‘तुम फोन लगाओ। लेक्चर मत दो।’’ मैंने जोर देते हुए कहा।

‘‘बेइज्जती की भी कुछ इज्जत होती होगी यार….. तुम और कितना करवाओगे?’’

मैंने घूर कर देखा उसकी ओर।

‘‘अच्छा लगाता हॅू…. ऐसे घूरो मत।’’

उसने फोन लगा कर मोबाइल को मेरी ओर थमाते हुए बोला -‘‘लो गिड़गिड़ा लो।’’

मैंने फोन थाम लिया।

‘‘हेलो’’ उधर से आवाज आयी

‘‘संजय बोल रहा हॅू।’’

‘‘कैसे हैं आप?’’ उसने ऐसे पॅूछा जैसे कुछ हुआ ही न हो।

‘‘मैं ठीक हॅू… आप?’’

‘‘प्रिया को बुलाऊ?’’

‘‘जी।’’ मैंने कहा फिर अचानक न जाने दिमाग क्या आया, हड़बड़ा कर बोला -‘‘न… नही। उसकी जरुरत नही है।’’

‘‘जी?’’

‘‘मेरा मतलब… मैंने प्रिया के लिए फोन नही किया।’’

‘‘ओ0 के0एएएए।’’ अचानक उसके स्वर में खनक आ गयी।

‘‘कैसी हैं आप?’’

‘‘मैं ठीक हॅू… वैसे आप एक बार पॅूछ चुके हैं।’’

‘‘ओह सॉरी… अच्छा फोन रखू?

‘‘सुनिए…।’’ उसने पुकारा।

‘‘जी…।’’

‘‘आपने सिर्फ मेरा हाल चाल जानने के लिए फोन किया था?’’

‘‘ज्ज जी हाँ ।’’ मैं हकला पड़ा। मेरे पास कहने के लिए कुछ नही था। मैं जैसे ही फोन काटना चाहा वह बोल पड़ी -‘‘एक बात बोलू आपसे?’’

‘‘बोलिए।’’

‘‘आज जो कुछ भी पार्क मे हुआ अच्छा नही हुआ।’’

‘‘सॉरी उसके लिए।’’ मेरा दिल धड़क उठा -‘‘मैं उस घटना के लिए सचमुच शर्मिन्दा हॅू।’’

‘‘अरे नही… आप क्यों सॉरी बोल रहे हैं? वहाँ जो कुछ भी हुआ उसमे आपकी गलती नही थी। प्रिया को अपनी सगाई वाली बात आपसे पहले ही बता देनी चााहिए थी।’’

‘‘जी?’’ मुझे अपने कानों पर यकीन नही हुआ।

‘‘हाँ … वैसे अगर बुरा न माने तो एक बात पॅूछू आपसे।’’

‘‘जी पॅूछिएं’’

‘‘ये नीतू कौन है?’’

नीतू… ये नाम आते ही एक बार फिर अपने बेडरूम मे अर्धनग्न खड़ी उसका रोता हुआ चेहरा मेरी आँखों मे तैर पड़ा। मैंने फोन काट दिया।

******

रात के 10 बजे के आस पास का समय था। मैं खाना बना कर कमरे के बाहर बने सार्वजनिक बाथरूम मे हाँथ धोने निकला ही था कि सीढ़ियाँ लाँघता हुआ किसन दूर से ही चिल्लाया -‘‘संजय… संजय।’’

वह मेरे माकान के बगल वाले माकान मे किराये से रहता था जो छत के रास्ते भागते हुए आया था ‘‘कहाँ आग लग गयी यार? इतना हाँफ क्यो रहे हो?’’ हाँथ धोते हुए मैंने उसकी ओर देखा।

‘‘फोन।’’ फोन को मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला

‘‘किसका?’’

‘‘खुशबू।’’ बिना आवाज के होठ चला कर उसने इसारा किया।

‘‘क्या बोल रहे हो यार? तुम्हारी आवाज चली गयी क्या? किसका फोन है?’’

‘‘अमे यार खुद पूँछ लो।’’ वह झल्लाते हुए मेरी ओर बढ़ा, मुझे खीचा और मेरे गीले हाँथ मे मोबाइल थमा दिया।’’

‘‘ये क्या किया तुमने?’’ मैंने गुस्से से देखा उसकी ओर-‘‘मेरा हाँथ गीला है। फोन खराब हो जायेगा।’’

‘‘यार तुम बात करो… अपने फोन की फिकर हम कर लेंगे।’’

मैंने फोन कान से लगाया तो शरीर जैसे एकाएक बर्फ मे तब्दील हो गया हो -‘‘कैसी है आप?’’

‘‘हम ठीक हैं।’’ वह बोली -‘‘आपका हाल चाल जानने के लिए फोन किया था। आप कैसे हैं?’’

‘‘बेहतर हॅू, शुक्रिया।’’

किसन मेरे पास ही खड़ा रहा। मैंने उसकी ओर देखा तो वह इधर उधर ऐसे देखने लगा जैसे उसका ध्यान कही और हो। -‘‘तुम यहाँ खड़े खड़े क्या कर रहे हो?’’ मैंने कहा -‘‘तुम जाकर मेरे कमरे मे बैठो। मैं बात करके आ रहा हॅू।’’ कहते हुए मैं सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

‘‘हेलो।’’ उधर से आवाज आयी।

‘‘माफ कीजिएगा- दोस्त से बात करने लगा था। आप कुछ कह रही थी।’’

‘‘मैंने सुना, अभी आप कहाँ हैं?’’

‘‘छत आ गया हॅू।’’

‘‘आपके दोस्त को बुरा नही लगेगा?’’

‘‘नही… वह बहुत मोटी चमड़ी का इंसान है।’’ मैंने हँस पड़ा। बात को मोड़ते हुए पूँछा -‘‘खाना खा लिया आपने?’’

‘‘जी… और आपने?’’

‘‘नही… अभी नही खाया। बना कर रख दिया गया है, अभी जाकर खा लूँ गा।’’

‘‘ओह तो पहले खा लीजिए फिर फोन करती हॅू।’’

‘‘नही… नही। मैं बाद मे खा लॅूगा।’’

‘‘अच्छा…।’’

‘‘जी।’’

फिर हम दोनो चुप हो गये। शायद हमारे पास बात करने के लिए कुछ नही था या इतना ज्यादा था कि समझ नही आ रहा था -बात कैसे और कहाँ से शुरू करे।

‘‘हेलो…।’’ उकता कर वह बोली।

‘‘जी।’’

‘‘कुछ कहिए ना… आप तो बिल्कुल खामोश हो गये।’’

मैंने कुछ नही कहा।

‘‘संजय जी।” अचानक उसे कुछ याद आया -‘‘आपने सुधाकर जी को देखा है?’’

‘‘नही… कौन हैं ये?’’

‘‘अरे आप उन्हे जानते भी नही हैं? प्रिया के मंगेतर हैं। मैं मिल चुकी हॅू उनसे।’’

‘‘अच्छा।’’ मैंने उस पर जरा भी दिलचस्पी नही दिखाई।

‘‘आपको एक बात बताऊँ ।” वह बोली -‘‘प्रिया की जगह मैं होती तो सुधाकर जी से कभी शादी नही करती। वह बहुत भोले हैं। बात करना उन्हे बिल्कुल नही आता। वैसे इंसान अच्छे हैं। आपको पता है? प्रिया भी उनसे प्यार नही करती। भाई के कहने पर शादी कर रही है।’’

‘‘भाई के कहने पर…?’’

‘‘जी… वह अपने भाई से बहुत डरती हैं। उन्हे आप बहुत पसन्द हैं। आपकी बातें वह मुझसे अक्सर करती रहती हैं। पहले तो मुझे भी अजीब लगता था मगर जब आपको पहली बार पार्क मे देखा- तो बस देखती रह गयी। आपको कोई भी पसंद करेगा।’’

‘‘हेलो…हेलो।’’

‘‘जी…।’’

‘‘आप… आप चुप क्यों हैं? मुझे लगा फोन कट गया।’’

‘‘नही… मैं सुन रहा हॅू।’’ मैंने कहा।

‘‘प्रिया अक्सर कहती हैं कि आप बोलते बहुत हैं- फिर इतनी चुप्पी क्यों? मेरी बातों से बोर हो रहे हैं क्या?’’

‘‘नही ऐसा नही हैं… बस समझ नही पा रहा हॅू कि अपनी इतनी तारीफ पर प्रतिक्रिया कैसे दूँ?’’

‘‘नही मैं तारीफ नही कर रही हॅू। जानते हैं आप?’’ एकाएक उसकी आवाज मे खनक आ गयी, बोली -‘‘अगर आपने वह फूल मुझे दिया होता तो कसम से मैं उसे जिन्दगी भर नही मुर्झाने देती।’’

‘‘…जिन्दगी भर नही मुर्झाने देती।’ वह क्या कहने की कोशिश कर रही है? पहले इतनी तारीफ और अब…? मैं अपने दिमाग को बहुत नही चलने दिया। एक बार जल चुका हॅू, मैंने रूखे मन से कहा -‘‘प्रिया ने तो फूल भी नही लिया।’’

‘‘अब उसे क्या कहॅू मैं? वह कुछ भी करती मगर उसका बर्ताव… वह सचमुच मुझे अच्छा नही लगा। मैं आपसे इसीलिए बात करना चाहती थी। सोचा उसके उस बर्ताव लिए मैं आपसे माँ फी मांग लू मगर हिम्मत नही पड़ी। फिर आपका फोन आया तो…।’’ वह अचानक चुप हो गयी, चंद पलो की खामोशी के बाद बोली -‘‘वह दोस्त है मेरी। आप उससे खफा रहेगे मुझे अच्छा नही लगेगा।’’

‘‘जी…।’’ मैंने फोन काट दिया।

किसन कमरे मे मेरा इन्तजार कर रहा था। मैं जैसे ही कमरे मे घुसा वह बिस्तर से उठ कर खड़ा हो गया। मुस्कुराते हुए बोला -‘‘क्या कहा उसने?

‘‘कुछ खास नही। माफी मांग रही थी अपनी दोस्त के व्यवहार के लिए।’’

‘‘अच्छा!!’’ उसकी आँखें फैल गयी।

‘‘तुम क्यों इतना खुश हो रहे हो?’’

‘‘वो सब तुम छोड़ो- और जो हम कह रहे हैं वो सुनो…।’’

मैंने गौर से उसकी ओर देखा। उसके अन्दर कुछ तो था जो अंदर अंदर ही छलांग लगाये जा रहा था। बेसब्र होता हुआ बोला -‘‘तुम सुन रहे हो न?’’

‘‘हाँ … तुम बोलो।’’

‘‘पहले ये बताओ तुम्हे ये लड़की कैसी लगी?’’

‘‘कौन… खुशबू?

‘‘देखो तुम हमसे इस वक्त कॅमेडी मत करो। मैं खुशबू की ही बात कर रहा हॅू।’’

‘‘अच्छी है।’’

‘‘अच्छी है तो ऐसे क्यो बोल रहे हो जैसे किसी की मइयत से आ रहे हो। जरा खुश हो कर बोलो। और हमारी मानो तो कुछ देर के लिए प्रिया का भूत सर से उतार दो।

‘‘तुम बोलो।’’

‘‘तुमने गौर से खुशबू की ओर देखा है? मैं जानता हॅू, तुमने नही देखा। मैंने उसे देखा है… जब तुम दोनो की बीच महाभारत छिड़ी थी तब।’’

‘‘तो…।’’

‘‘यार खुशबू प्रिया से बहुत अच्छी है।’’

‘‘तो…।’’

‘‘तो क्या? प्रिया को छोड़ दो।’’

‘‘और?’’

‘‘और खुशबू से प्यार कर लो?’’

‘‘क्या?’’ मैंने फटी फटी आँखों से उसे घूरा -‘‘तुम पागल हो गये हो?’’

‘‘यार पागल तुम हो जो समझ नही पा रहे हो। खुशबू तुमसे प्यार करने लगी है।’’

‘‘और उसने ये सब तुमसे कब बताया है?’’

‘‘उसने नही बताया मगर अभी तुमसे पहले उससे मैंने बात की है। उसकी बातों मे ही तुम्हारे लिए प्यार झलक रहा था। और वैसे भी प्रिया की सगाई हो चुकी है। देवदास जरा समझो’’

‘‘किसन।’’ मैं पलटकर कुछ कहना चाहा।

‘‘भाई रात बहुत हो गयी। मैं जा रहा हॅू। मुझे जो कहना था मैंने कह दिया।’’

किसन चला गया मगर मेरे लिए हजारो सवाल छोड़ गया। मैं देर तक खाना चबाता रहा। उस समय खुशबू, प्रिया और नीतू मेरे दिमाग के इर्द गिर्द घूमती रही। मैं समझ नही पा रहा था, मेरे अंदर इतनी उलझन क्यों है? प्रिया ने मुझे छोड़ दिया इसलिए या फिर नीतू को मैंने छोड़ दिया या फिर इसलिए कि खुशबू आहिस्ता आहिस्ता मेरी ओर कदम बढ़ा रही है? उफ! मुझे क्या चाहिए?

******

ठक ठक… ठक ठक। मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई तो मैं उठ कर बैठ गया। आँ खे मलते हुए घड़ी की तरफ देखा- सुबह का 6 बज रहा था।

‘‘कौन।’’ बिस्तर पर बैठे बैठे ही मैंने आवाज दी।

‘‘तुम पहले दरवाजा खोलो फिर बताते है कि कौन है?’’

मैं आवाज पहचान गया -‘‘तुम!! इतनी सुबह!!

‘‘अब तुम बिस्तर से ही पॅूछ लो सारे सवाल।’’

‘‘खोल रहा हॅू यार।’’ कहते हुए मैंने दरवाजा खोल दिया, सामने किसन खड़ा था -‘‘अब किधर आग लगा कर आ रहे हो तुम?’’

‘‘आग तो तुमने हमारी जिन्दगी में लगा दी है। कल रात को तुमने हमारे फोन से किसे फोन किया था?’’

‘‘खुशबू को। क्यों?’’

‘‘देखो संजय हम अभी गालियाँ खा कर आ रहे हैं। गुस्से मे हमारा दिमाग अब भी भन्ना रहा है इसलिए हमसे कॅमेडी मत करो। बस सीधे सीधे बता दो। तुमने किसे फोन किया था?’’

‘‘खुशबू को यार। तुम्हारे सामने ही तो बात किये थे।’’

‘‘यार वो तो हम भी जानते हैं। उसके बाद किसे किया था? वो पॅूछ रहे हैं हम।’’

‘‘उसके बाद किसी से बात नही हुई।’’ मैं बिस्तर मे बैठते हुए बोला -‘‘क्यों पैसे कट गये हैं क्या?’’

‘‘पैसे की बात नही है यार। तुमने किसी का नम्बर डायल किया था?’’

‘‘हाँ … डायल किया था मगर बात नही हुई।’’

‘‘किसका नम्बर था वह?’’

‘‘नीतू।’’

‘‘अब ये नीतू कौन है?’’

‘‘लड़की।’’

‘‘फिर तुम हमसे कॅमेडी कर रहे हो?’’

‘‘यार ये लड़की मुझे प्यार करती है।’’

‘‘क्या? एक और लड़की?’’ वह मुझे ऐसे घूरा जैसे खा जायेगा, फिर मेरे बगल मे बैठते हुए कहा -‘‘अमे यार एक बात बताओ- किसन हमारा नाम है और इतनी ढ़ेर सारी गोपियाँ तुम घुमा रहे हो। चक्कर क्या है?’’

‘‘क्यों तुम्हे कोई आपत्ति हैं?’’

‘‘यार हमें कोई आपत्ति वापत्ति नही है मगर एक बात हमारी भी अपने दिमाग मे घुसेड़ लो। रिश्ता हमेशा एक से ही अच्छा लगता है। इतनी गोपियाँ पालोगे न… तो किसी दिन यही तुम्हे काट काट कर अपने अपने घरों के पिछवाड़े वाले नाले मे डाल देगी। फिर तुम ढ़ूढते रहना अपनी टांगे… अपना हाँथ।’’

‘‘एक को ही तो खोज रहा हॅू यार।’’ मैं मुस्कुरा पड़ा।

‘‘हाँ वह देख रहे हैं हम। तभी शाम को एक से बात होती है और सुबह दूसरी वाली का बाप मुझे संजय समझ कर गालियाँ देता है।’’

‘‘तुमने बताया कि फोन संजय ने किया था।’’

‘‘तुमने मुझे बताया कि उसे फोन तुमने किया था?’’

‘‘नही।’’

‘‘तो मैं उसे क्या बताता? उसने गालियाँ दी और अच्छे बच्चे की तरह हमने खा ली। काश! मुझे पता होता कि वो तुम थे तो बाबू जी की कसम! सारी की सारी गालियाँ तुम्हारी तरफ ट्रान्सफर कर देता।’’ वह अचानक बिस्तर से उठ कर खड़ा हो गया। झुकते हुए बोला -‘‘एक बात मानोगे हमारी? तुम एक फोन ले लो।’’

‘‘अच्छा तो तुम्हे फोन की तकलीफ है?’’

‘‘अमे यार तकलीफ वकलीफ कुछ नही है। बस थोड़ा डरपोक हैं इस मामले में । बता नही सकते कितनी हालत खराब हो गयी थी हमारी जब वह आदमी हम पर गालियाँ बरसा रहा था। तुम जानते हो कि हम किसान के बेटे हैं। जिन्दगी में कुछ बनना चाहते हैं।’’

‘‘अच्छा… तो क्या तुम्हे है कि कुछ बनने के लिए कुछ करना पड़ता है।’’

‘‘तुम ये सब छोड़ो। जो हम कह रहे हैं वो सुनो। तुम एक फोन लेलो। पैसे न हो तो हम दे देंगे। गन्ने की फसल अच्छी हुई है इस साल। तुम्हारे लिए हम बाबू जी से झूठ भी बोल लेंगे।’’

‘‘और कहोगे क्या अपने बाबू जी से?’’

‘‘कुछ किताबें लेनी हैं या कोई फाँ र्म भरने का बहाना बना देंगे।’’

‘‘अच्छा चलो तुम हमारे लिए अपने बाबू जी से झूठ मत बोलो। हम कल मोबाइल ले आयेगे।’’

‘‘सच!’’

‘‘मुच!’’ मैं मुस्कुरा पड़ा।

‘‘चलो जान बची।’’ लम्बी सांस भरते हुए वह चलने के लिए दरवाजे की ओर बढ़ा।

‘‘कहाँ जा रहे हो?’’

‘‘अमा यार कोचिंग जाना, जाकर खाना बना लॅू।

******

कालेज पुनः खुल चुका था। पढाई का अगला सत्र शुरू हो गया।

लंच का समय था। मैं और प्रिया कैम्पस में ही एक किनारे बैठ कर लंच कर रहे थे। हमारे बीच वही उत्साह था वही नजदीकी बरकरार रही। अगर कुछ नही था तो वो थी प्यार इश्क और मुहब्बत। हम दोनो जानते थे कि हमारे भविष्य के रास्ते अलग अलग हैं। इसलिए जितना सफर एक साथ कर सकते है हॅसते मुस्कुराते हुए कर ले।

            ‘‘प्रिया।’’ मैंने पुकारा।

            ‘‘हूँ ।’’ वह रोटी चबाना बन्द करके मेरी ओर देखने लगी।

            ‘‘एक बात पॅूछू तुमसे?’’

            उसकी नजरें मेरे चेहरे पर टिकी रही।

            ‘‘कालेज में किसी अपरिचित लड़के के साथ तुम इस कदर घुली मिली रहती हो। यह बात तुम्हारे मंगेतर को पता है?’’

मेरा सवाल सुनते ही उसकी हैरानी आसमान छूने लगी। मेरी ओर जरा झुक कर बोली -‘‘क्या कहा तुमने? जरा फिर से कहोगे?’’

मैंने बेहिचक अपने सवाल को पुनः दोहरा दिया। जवाब में वह कहने लगी -‘‘तुम्हे क्या लगता है मि0 संजय, मै चोरी चोरी तुम्हारे साथ घूमती हॅू? नहीं…।’’ वह उत्तेजित हो उठी -‘‘मै सुधाकर से तुम्हारे बारे में पहले ही सब कुछ बता चुकी हॅू।’’

‘‘उसको बुरा नहीं लगा?’’

‘‘विल्कुल नहीं…। वह इतनी भी पुरानी सोच का इंसान नही है। वह इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि शादी के पहले हर किसी का कुछ न कुछ गुजरा हुआ कल हुआ करता है। इसमे कुछ भी नया नही है।’’

मैं चुप हो गया।

‘‘जानते हो संजय?’’ वह अपनी बात जारी रखते हुए बोली -‘‘इस मामले में हमने एक दूसरे को पूरी तरह से आजाद कर रखा है और शादी के बाद भी हम ऐसे ही रहेगे।’’

‘‘वेरी गुड।’’ मैं मुस्कुरा पडा -‘‘काश ऐसी जीवन साथी भगवान सब को दे।’’

‘‘तुम चिन्ता मत करो संजय। तुम्हारी जीवन साथी भी ऐसे ही रहेगी।’’

‘‘अच्छा?’’

‘‘जी।’’ उसने रोटी का तुकड़ा मेरे मुँह मे डालने की कोशिश की लेकिन एकाएक फोन की घंटी बज उठी। मेरा मॅुह खुला रह गया। उसने रोटी के तुकड़े को वापस टिफिन में रखते हुए बोली -‘‘फोन की घंटी! तुमने फोन कब खरीदा? बताया भी नही।’’

मैंने कुछ नही कहा। उठ कर खड़ा हुआ और जेब से फोन निकालता हुआ मैंने वहाँ से हटने की कोशिश की। प्रिया ने मेरा हाँथ पकड़ लिया। मुस्कुराती नजरों से बोली -‘‘लगता है जीवन साथी का ही फोन आ गया है?’’

‘‘क्या?’’ मैंने चौंक कर उसकी ओर देखा। उसने मेरा हाँथ छोड़ दिया। मैंने फोन की स्क्रीन उसकी ओर घुमाते हुए बोला -‘‘खुशबू का फोन है। उसका नम्बर याद हो तो देख लो।’’

‘‘मैंने भी तो वही कहा।’’ उसके आँखों मे शरारत थी।

मैंने फोन उठा लिया और बात करते हुए वहाँ से दूर चला गया। उसकी नजरें मुझ पर टिकी रही।

******

रात के करीब 8 बज रहे थे। मैं कुर्सी पर बैठा था। सामने मेज में किताब खुली पड़ी थी । मैं हाल ही मे शुरू हुए सत्र के मिले प्रोजेक्ट को समझने की कोशिश कर रहा था तभी एकाएक मोबाइल पर घंटी टनटना पडी।

‘‘हाय संजय! उधर से आवाज आयी।

‘‘कौन?’’ जवाब मैंने कहा।

‘‘न हाय न हेलो… सीधा कौन, ये कौन सा तरीका है मि0 संजय?

‘‘प्रिया।’’ मेरी आँखों मे चमक आ गयी -‘‘ये कहाँ का नम्बर है? और तुम्हारी आवाज को क्या हुआ? कुछ अजीब सी है।’’

‘‘आपको प्रिया से प्यार व्यार तो नही हो गया? आज कल आपको हर किसी की आवाज प्रिया की ही लगने लगी है।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब ये कि मै प्रिया नही हॅू।’’

‘‘तो?’’

‘‘तो पॅहचानिये।’’

‘‘हेलो मिस… आप जो भी है, यहाँ मैं आइस पाइस खेलने नही बैठा हॅू। मैं फिरहाल पढ़ाई कर रहा हॅू। अगर कोई काम है तो बताइये वर्ना फोन रखिए।’’

‘‘अरे अरे…. इतना गुस्सा?’’

‘‘देखिए, आप इधर उधर बातों को मत घुमाइये। कोई काम है तो बताइये।

‘‘जी- एक काम है।’’

‘‘बोलिए।’’

‘‘आप कुर्सी से उठिए।’’

‘‘क्या? ये कौन सा काम हुआ?’’

‘‘मि0 पहले उठिए तो सही।’’

मै उठ कर खड़ा हो गया। -‘‘आगे बोलिए।’’

‘‘अब कीचेन जाइए।’’

‘‘मेरे यहाँ कीचेन नही है मिस… जहाँ खड़े हैं यही हमारा कीचेन है, यही बेडरूम और यही स्टडीरूम भी।’’

‘‘अच्छा?’’

‘‘जी।’’

‘‘तो सामने देखिए एक गिलास होगा। उसे उठाइए।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब ये…।’’ एकाएक वह हॅस पड़ी -‘‘उसमे पानी निकालिए और पी लीजिए… आपका गुस्सा ठण्ढ़ा हो जायेगा।’’

‘‘ये क्या बकवास है?’’ मैं झल्ला उठा -‘‘फोन रखो।’’

‘‘अरे …अरे…. इतनी जल्दी भी क्या है?

‘‘देखिए… मुझे इस तरह चलती फिरती लडकियों से बात करने की आदत नहीं है। समझी आप।’’ मैं फोन काटना चाहा तभी उसने मुझे पुकारा।

‘‘संजय।’’

मैंने एकबार फोन की तरफ देखा फिर कान से लगा लिया -‘‘आपको कुछ कहना है?’’

‘‘जी।’’

‘‘कहिये…।’’

‘‘आई लव यॅू।’’

‘‘क…क्या? क्या कहा आपने? ह…हेलो।’’

समने से कोई आवाज नही आयी। मैंने फोन की तरफ देखा। वह कट चुका था।

मैं आकर पुनः अपनी कुर्सी पर बैठ गया -‘‘ये लड़की कौन हो सकती?’’ फोन से फुरसत मिली तो मै सोचने लगा-‘क्या… नीतू?’ नहीं… नही। दिल ने इंकार कर दिया था। उसकी आवाज ऐसी नहीं है। फिर वह यू धृष्ट भी तो नहीं हो सकती-‘फिर कौन?’ शायद निशा, परन्तु वह ऐसा मजाक क्यों करेगी? उसे तो हँस कर बोलना भी मॅहगा पडता है -शिवानी तो हो ही नहीं सकती। अगर प्रिया नहीं है तो कौन?’’ काफी देर तक मैं अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाता रहा परन्तु एक बार भी ऐसा नाम मेरे दिमांग में नहीं आया जिससे मेरे दिल को तसल्ली मिल सकती।

काँलेज में अपनी परिचित लड़कियों के नाम ढूढते ढूढते जब मैं थक गया। और काँलेज के बाहर निगाहे दौडायी तो एकाएक मेरे मन में एक चेहरा उभर आया ‘शायद खुसबू?’ खुसबू की आवाज मैं सामने से ज्यादा फोन पर पहचानता हॅू। मैंने सबसे ज्यादा फोन पर उसी से तो बात की थी। जब कुछ समझ मे नही आया तो मैंने रिसीव किए गये नम्बर को डायल कर दिया। बात हुई तो पता चला कि वह नम्बर तो किसी पी0सी0ओ0 का है।

******

रविवार की दोपहर अभी ढल ही रही थी कि प्रिया का फोन आ गया। यह नम्बर गुजरी शाम को आये फोन के नम्बर से भिन्न था।

            ‘‘संजय, मैं प्रिया बोल रही हॅू।’’

‘‘ये नम्बर कहाँ का है?’’ कुछ और औपचारिता निभाने से पहले मैं सीधे अपने मुद्दे का सवाल कर बैठा।

‘‘मेरे घर का नम्बर है।’’ वह मेरे अजीब सवाल पर हँस पडी-‘‘तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो?’’

‘‘कल शाम किसी लड़की की कॉल आयी थी मुझे लगा तुम हो।’’

‘‘ओहो… तो फोन खरीदते ही लगता है लड़कियों के बीच तुम्हारी डिमाण्ड बढ़ गयी है?’’

‘‘क्या बकवास है यार? कल से मैं ठीक से सो भी नही पाया और तुम्हे मजाक सूझ रहा है।’’

मेरी झल्लाहट पर वह खिलखिला पडी -‘‘इसमे मजाक की क्या बात है यार? तुम खुद भी तो वही बता रहे हो। अच्छा सुनो।’’ वह बात को घुमाते हुए बोली -‘‘आज छुट्टी का दिन है मेरा भाई घर पर नहीं है। हम कही घूमने चले?’’

‘‘कहा?’’

‘‘कहीं भी … जहाँ तुम चाहो।’’

‘‘कम्पनी गार्डेन?’’

‘‘नही। उधर नही।’’

‘‘तो?’’

‘‘मिन्टो पार्क … कैसा रहेगा?’’

‘‘ठीक है तुम आओ मैं तुम्हे वही मिलता हॅू।’’

‘‘ठीक है पहुँच रही हॅू।’’ फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

आधे घंटे बाद- मैं पार्क पहुँच गया। प्रिया अब भी वहाँ नही पहुँच पायी थी।

            मैं बैठा हुआ उसका इन्तजार करता रहा मगर मेरा दिमाग अब भी उस लड़की पर ही अटका रहा -‘‘कौन हो सकती है?’’ एक बार फिर मैं एक एक करके उन्ही तमाम लड़कियों के बारे में सोचने लगा। फिर अचानक नीतू पर आकर अटक गया। ‘हो न हो वह नीतू ही थी…। मगर कैसे?’ इस सवाल पर मेरा दिमाग शून्य पड़ गया -‘नही नही… जितना उसे मैं जानता हॅू वह ऐसा नही कर सकती।’

‘‘संजय जी! आप आ गये?’’ अकस्मात ही मेरे कानों पर एक आवाज तैर पडी।

मैंने सर उठाया तो खुसबू सामने खड़ी थी।

‘‘हाँ, मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा -‘‘लेकिन तुम यहाँ से?’’

‘‘क्या मतलब? मेरे इस अस्वाभाविक सवाल पर वह कुछ चौंक सी गयी।

‘‘मेरा मतलब था- तुम अकेली ही हो क्या? कोई्र और नही आया?’’

‘‘नहीं, जीजू है ना साथ में।’’ वह मुस्करा पडी थी।

‘‘जीजू?

‘‘हाँ …प्रिया के मंगेतर! प्रिया ने बताया नही आपको?’’

‘‘कहाँ है वह?’’

‘‘उधर।’’ उसने संकेत किया।

‘मै उधर घूम कर देखा। मेरी ही उम्र का एक दुबला पतला युवक सामने लगी कुर्सी पर बैठा बडी उत्सुकता से हमारी ओर देखे जा रहा था -‘‘प्रिया कहाँ है?’’ मैंने पूँछा।

‘‘हम दोनों भी प्रिया के ही इंतजार में है।’’ पलभर चुप्पी के बाद वह बोली -‘‘अभी वह आयी नही शायद।’’

‘‘मगर ये तुम्हारे साथ?

‘‘हाँ … सुबह की ट्रेन से तो आये है।’’

‘‘ये सुबह से यही है?’’

‘‘नही नही… स्टेशन से सीधे मेरे घर आ गये थे। पार्क मे तो अभी अभी आंये हैं हम दोनो।’’

‘‘तुम्हारे घर पर… क्यो?’’ पता नही मुझे उसका खुशबू के घर मे रुकना अच्छा क्यों नही लगा।

‘‘प्रिया के भाई को पसन्द नही है शादी से पहले मिलना जुलना।’’ वह मेरे कोनो तक झुक आयी, बोली -‘‘इसलिए उसने इन्हे यही पार्क बुला लिया।’’

‘‘ओह।’’ मेरा दिमाग ठनक उठा -‘‘तो ये है प्रिया के मिन्टो पार्क आने की वजह।’’ मैं मन ही मन कुण्ठित हो उठा। मैं समझ चुका था कि मैं एक बार फिर प्रिया का मोहरा बन चुका था। मैंने पलटकर खुशबू से कुछ नही कहा।

‘‘हाय संजय!’’ एकाएक प्रिया की आवाज गॅूज पड़ी। मैं प्रत्युत्तर मे मैंने कुछ नही कहा। वह तेजी से मेरी ओर आयी, मेरे कंधो को छुआ और बिना रुके सुधाकर की ओर बढ़ गयी। उसका ये बर्ताव मेरे जख्मी मन को कुरेद गया। मैंने घूम कर थोड़ी दूर पर खड़ी खुशबू की ओर देखा। वह भी असहज थी। क्यों? पता नही।

प्रिया उसके पास पहुची तो वह कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया। उस समय मैंने सुधाकर के चेहरे को गौर से देखा। उसमे मुझे जरा भी उत्सुकता नही दिखी। प्रिया ने उसे गले से लगाया तो उसने आँखें नही बन्द की। उसकी फटी फटी आँ खे हमें घूरती रहीं।

मैंने अपनी नजरें झुका ली मगर दिल किसी आग की तपन में झुलसता रहा।

‘‘संजय।’’ प्रिया ने पुकारा।

मैंने नजरें उठाई। वह मेरे सामने खड़ी थी। उसके हाँथ अब भी सुधाकर की बाहों को थामे हुए थे। प्रिया का यौवन, सुधाकर और उसके बदन के बीच पिस रहा था। मेरी निगाहे देर तक वहाँ नही ठहरी और सरपट दौड़ती हुई प्रिया के चेहरे पर जा टिकी।

‘‘इनसे मिलों, यही है मेरे मंगेतर… डाँक्टर सुधाकर शर्मा।’’

‘‘हाय! संजय।’’ उसने मेरी ओर हाँथ बढ़ाते हुए कहा -‘‘दिल्ली से पी0वी0टी की ट्रेंनिंग कर रहा हॅू।’’

‘‘जानता हॅू।’’ मैने वेरूखी से उसका हाँथ थाम लिया -‘‘प्रिया आपके बारे मे पहले ही बता चुकी है।’’

‘‘अच्छा तो आप लोगों के बीच हमारी चर्चा पहले ही हो चुकी है?’’ वह हो हो करके हँस पडा। मुझे उसकी बेवजह की हॅसी अच्छी नही लगी।

‘‘संजय!’’ एक बार फिर प्रिया ने पुकारा -‘‘तुम फोन पर कुछ पूछ रहे थे?’’

‘‘क्या?’’ मैने प्रश्नसूचक निगाहो से प्रिया की ओर देखा। वह मुस्करा पड़ी।

‘‘तुमने पूछा था न… कि कल तुम्हे किसी लड़की ने फोन किया था?

‘‘तुम जानती हो उसे?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘कौन है?’’

‘‘ऐसे नहीं बताऊगी।’’ वह बच्चों सी खिलखिला पडी। सुधाकर उसकी शरारत को एकटक देखे जा रहा था -‘‘तुम्हे एक शर्त माननी पड़ेगी।’’

‘‘कैसी शर्त?’’ पार्क मे आज जो कुछ हुआ था उसके बाद मेरे अंदर उस बात के लिए कुछ खास उत्सुकता नही बची थी।

‘‘तुम उसे कुछ कहोगे नहीं।’’

मैंने खामोश नजरों से उसकी ओर देखा।

‘‘बोलो संजय। मंजूर है?’’

‘‘ठीक है।’’

‘‘प्रामिस।’’

‘‘हाँ प्रामिस।’’

‘‘तो फिर खड़े हो जाओ और सामने देखो।’’

मै खड़ा हो गया – दूर तक निगाहे डाली। एकदम खाली… वहाँ कोई नही था। मैंने घूम कर बुझी-बुझी सी निगाहो से प्रिया को देखा -‘‘तुम मजाक कर रही हो मेरे साथ? वहाँ कोई नही है।’’

‘‘नहीं दिखी?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘एक बार फिर देखो।’’ मै देखने लगा तो वह एकाएक हँस पड़ी, बोली -‘‘बुद्दू! तुम वहाँ दूर क्या देख रहे हो? अपने करीब देखो न।’’

निगाहे करीब आयी तो मेरा सारा बदन झनझना उठा। मेरे सामने खुसबू खड़ी थी। मै अर्थपूर्ण नजरो से प्रिया की ओर देखा -‘‘तुम कहीं खुसबू के बारे मे तो बात नहीं कह रही हो?’’

प्रिया मेरी ओर देखने लगी। उससे पहले कि उसके मुँह से कोई जवाब निकलता, खुसबू हॅसते हुए बोली -‘‘संजय जी, प्रिया आपको अपै्रल फूल बना रही है। आज एक अपै्रल है।’’

मैने दिमांग पर जोर डाला। वाकई आज एक अपै्रल है। मै शर्म से पानी-पानी हो गया। मैं बारी बारी से प्रिया और खुसबू की ओर देखता रहा। उनकी आँ खे देर तक एक दूसरे से इसारो मे बातें करती रही।

******

इधर कुछ दिनो से खुशबू बिना मुझसे फोन पर बात किये हुए शायद ही कभी सोई हो। रात के साढ़े 11 बजने वाले थे अब तक उसका फोन नही आया। मैं बेचैन होने लगा। सच कहूँ तो उससे बात किये बगैर मुझे भी नींद नही आने वाली थी। मुझसे रहा नही गया मैंने फोन लगा दिया -‘‘हेलो।’’ उधर से आवाज आयी।

            ‘‘हेलो।’’ मैंने कहा -‘‘कैसे हो?’’

            ‘‘ठीक हूँ और आप?’’

            ‘‘तुम्हारे फोन का इन्तजार कर रहा था। वैसे अब तक कहाँ थी?’’

            ’’मैं कहाँ जाऊॅगी?’’ उसने नीरस स्वर मे कहा -‘‘दरअसल जीजू यही ठहरे हुए है तो मुझे…।’’

            ‘‘क्या?’’ मैं चौंक पड़ा, उसकी बात बीच मे ही काटते हुए पॅूछा -‘‘सुधाकर वही है?’’

            ‘‘हाँ उन्ही के लेटने की व्यवस्था कर रही थी। वैसे आपके मोबाइल का बैलेन्स कट रहा होगा। आप 5 मिनट रुकिए, मै आपको वापस कॉल करती हॅू।’’

            उसने फोन काट दिया। मोबाइल की ओर देखने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नही था।

            अभी 4 मिनट ही गुजरे थे कि मोबाइल की घंटी बज उठी। मैं समझ नही पा रहा था कि क्या करू? तुरन्त फोन कर उठा कर अपनी बेचैनी जाहिर कर दॅू या थोड़ी देर तक घंटी बजने दॅू?

            मैंने फोन उठा लिया।

            ‘‘सॉरी।’’ फोन उठाते ही खुशबू ने कहा -‘‘आपको इन्तजार करना पड़ा। आप कुछ कह रहे थे उतनी देर?’’

            ‘‘नही कुछ खास नही। मैं बस पॅूछ रहा था कि सुधाकर वहाँ कब तक रुकने वाला है?’’

            ‘‘कल सुबह ही वो गंगा गोमती से लखनऊ जाने वाले हैं। फिर वही से दिल्ली चले जायेगे।’’

            ‘‘अच्छा।’’ मैंने लम्बी सांसे भरीं। मैं अब जब डायरी लिख रहा हॅू तो समझने की कोशिश कर रहा हॅू कि उस समय मेरे दिमाग मे कैसी उथल पुथल चल रही थी। सुधाकर प्रिया का मंगेतर था इसलिए वह मुझे नही अच्छा लग रहा था या फिर वह खुशबू के पास था इस बात पर जलन हो रही थी मुझे।

            ‘‘संजय जी।’’ उसने कहा -‘‘आप कुछ सोच रहे हे क्या?’’

            ‘‘नही।’’ मैंने अपनी भावनाये दिल के अंदर ही दफन कर दी। हॅसते हुए कहा -‘‘तुम्हे ऐसे क्यो लगा?’’

            ‘‘आपकी खामोशी देखकर।’’ वह हँस पड़ी -‘‘वैसे आप गलत भी नही है।’’ अचानक वह चुप हो गयी। फिर कुछ सोच कर बोली -‘‘जानते है संजय जी…..। उफ मुझे समझ नही आ रहा है कैसे कहॅू? आप कुछ गलत तो नही सोचेगे।’’

‘‘तुम कहो।’’

            ‘‘वैसे मैं ऐसी हॅू नही मगर पता नही क्यों आज मैं इतना बुरा मान गयी।’’

            ‘‘मैं कुछ समझा नही।’’  

वह चुप हो गयी।

‘‘खुशबू।’’ मैंने आवाज दी -‘‘तुम कुछ कह रही थी।’’

‘‘हाँ मगर बुरा मत मानिएगा। मैं बस आपसे अपनी फीलिग्स शेयर कर रही हॅू।’’

‘‘बिल्कुल नही। तुम्हारे मन मे जो है तुम बेहिचक कह सकती हो।’’

‘‘आपको याद है? पार्क मे प्रिया ने आपके कंधे को छुआ था।’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘प्रिया का आपको यूँ छूना मुझे अच्छा नही लगा।’’

‘‘खुशबू।’’ मैं कुछ कहना चाहा

‘‘जानते है संजय जी?’’ वह मेरी बात को बीच मे ही काट दी, बोली -‘‘मैं वहाँ से जब से लौटी हॅू बस घुट रही हॅू। एक बार मन किया कि आपको फोन करके कह दॅू लेकिन फिर डर गयी, कही आप बुरा न मान जाये और इसीलिए आज फोन भी नही किया।’’

‘‘खुशबू।’’

‘‘आपसे कह कर अब बहुत हल्का महसूस कर रही हॅू।’’

मैंने कुछ नही कहा। शायद इसलिए कि मैं भी खुशबू के लिए वही महसूस कर रहा था जो वह मेरे लिए कर रही थी या फिर इस लिए कि प्रिया के लिए मैं अपनी भावनाओ को समेट कर रखना चाहता था।

******

कालेज के आखिरी साल का पहला सत्र। सितम्बर माह की बादलों से घिरी दोपहर। मैं नयी मोटर साइकिल खरीदने के बाद पहली बार काँलेज गया था। उस दिन प्रिया बहुत खुश थी। लंच की घंटी बजते ही उसने मेरा हाँथ पकड़ा और काँलेज की इमारत के पीछे वाले सॅकरे बगीचे की ओर ले कर चली गयी। वह क्षेत्र अक्सर सूनसान हुआ करता था। ज्यादातर छात्र छात्राए कैन्टीन, प्लेग्राउण्ड या गेट और इमारत के बीच फैले बड़े से बगीचे मे ही टहलते हुए मिला करते थे।

प्रिया इमारत की ऊॅची दीवार से सॅटे रखे हुए ईटो की ओर बैठने के लिए बढ़ी तों मै चिल्ला उठा -‘‘अरे तुम उधर कहाँ जा रही हो? ये ईटें बहुत पुरानी है… देखना उनके नीचे साँ प या बिच्छू न हो।’’

वह रुकी नही और धड़ाम से जाकर उन पर बैठ गयी -‘‘कुछ नही है इनके नीचे।’’

‘‘मगर धूल तो है!’’

‘‘ओह तुम भी…।’’ वह अचानक तेजी से उठी और मुझे अपनी ओर खीच ली, बोली -‘‘आओ बैठो। और तुम धूल से कब से डरने लगे?’’

उसके बगल मे मैं भी बैठ गया। उसने मेरी बाँहों मे अपनी बाँ हें फॅसा ली। हम दोनो ने एक दूसरे की ओर नही देखा। हमारी नजरें देर तक एकटक सामने लहलहाती छोटी छोटी घास पर केन्द्रित रही। उस समय एक दूसरे की ओर देखकर हम एक दूसरे को शर्मिन्दा नही करना चाहते थे।

‘‘संजय।’’ थोड़ी देर बाद अपनी बाँ हे मुझसे अलग करती हुई शिकायत भरे स्वर मे बोली -‘‘साहब की आज नयी-नयी बाइक आयी है तो कोई पार्टी सार्टी मिलेगी?’’

‘‘क्यों नहीं जरूर मिलेगी।’’ मैंने हॅसकर कहा -‘‘बोलो क्या खाना चाहोगी?’’

‘‘अजी खाना-वाना कुछ नहीं है।’’ वह अजीब सा मुँह बनाते हुए बोली -‘‘बच्ची नही हॅू मैं। कुछ दिनो मे शादी होने वाली है।’’

‘‘तो…?’’

‘‘आज अपनी बाइक से ले चलो हमें कही और कोई फिल्म दिखाओं।’’

‘‘न …बाबा… ये हमारे बस का नहीं है।’’

‘‘क्यो?’’ वह एकाएक चैक पडी।

‘‘कही हमारे उन्हें पता चल गया तो बख्सेगी भी नही, शायद छुट्टी भी हो जाय हमारी?

‘‘उन्हें? उन्हें कैान? ओह…।’’ उसे याद आया तो खिलखिलाकर हॅस पडी -‘‘तो साहब उनके इतने दीवाने हो गये है कि उनकी खनकियों से भी डरना शुरू कर दिये है?’’

‘‘मजबूरी है…।’’ मैं हॅस पड़ा।

‘‘चलिए मान लेते हैं लेकिन इतना मत भूलिए मिस्टर संजय कि आपके इस प्यार का सारा ताना-बाना हमने ही बुना है वर्ना यहीं कालेज की नकचढी लड़कियों के आगे पीछे ही मक्खियाँ मारते नजर आते और हाँथ कुछ भी नही लगता।’’

‘‘हमारी शक्ल इतनी बुरी है क्या?’’

‘‘तब क्या तुम अपने आपको हीरो समझते हो?’’

‘‘पहले तो नहीं समझता था, मगर जब से इस कालेज में आया तब से जरूर समझने लगा हूँ ।’’

‘‘अच्छा।’’ वह हँस पड़ी -‘‘खैर छोड़ो इन बातों को… हम मजाक नही कर रहे हैं। तुम इतना बताओं। आज हमें फिल्म दिखाने लेकर चल रहे हो या नहीं?’’ उसके स्वर में बाकई रूखापन आ गया।

मैं उसे मना नही कर पाया। मैंने हाँ कर दी।

‘‘तो फिर चलो।’’ वह उठ कर खड़ी हो गयी।

‘‘अभी?’’

‘‘और कब?’’

‘‘दूसरी मीटिंग की कक्षाए नहीं करनी क्या?’’

‘‘हर रोज तो करते है यार। आज नहीं करेंगे तो पहाड़ नही टूटने वाला।’’

******

हम… यानी कि मैं और प्रिया सितम्बर की उस दोपहर में सिनेमा हाल की ओर जाने वाली सड़क पर दौड़ ही रहे थे कि एकाएक न जाने प्रिया को कौन सी धुन सवार हुई… वह चिल्ला कर बोली -‘‘संजय गाड़ी रोको।’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘अरे रोको तो।’’ उसने मेरे कंधे पर जोर से हाँथ मारा।

मैने मोटरसाइकिल रोक दी। वह गाडी से उतरी और आकर मेरे सामने खड़ी हो गयी।

‘‘क्या हुआ?’’ मैंने पॅूछा।

‘‘संजय।’’ वह अपने दोनो हाँ थों को कमर पर रखकर ख्ज्ञड़ी हो गयी, बोली -‘‘क्या वाकई हम फिल्म देखने जा रहे हैं?’’

‘‘क्या मतलब?’’ मैं चौंक पड़ा-‘‘तुम फिल्म देखने ही जाने वाली थी न?’’

‘‘हाँ ।’’ वह हॅस पड़ी -‘‘लेकिन अब मेरा मूड बदल गया।’’

‘‘तो अब क्या कह रहा है तुम्हारा मूड?’’

‘‘कही दूर घूमने चलते है।’’

‘‘घूमने?’’ मैंने आश्चर्यपूर्ण निगाहों से उसे देखा -‘‘तुम पागल हो गयी हो? देखती नहीं… बादल किस तरह घिर आये हैं। बारिस कब शुरू हो जाए कुछ पता नहीं है।’’

‘‘मै बारिस का ही तो इंतजार कर रही हॅू।’’ वह ऐसे झूम उठी जैसे अपनी इसी बात को कहने के लिये वह मुझे यहाँ तक लायी हो। अपनी बात जारी रखते हुए बोली -‘‘देखो ना संजय! कितना खूबसूरत मौसम है। बादल किस तरह आपस में अठखेलिया कर रहे है और तुम मुझे ले जा कर किसी टाकीज मे कोई फ्लाप फिल्म देखने के लिए बिठा दोगे।’’

‘‘प्रिया तुम…।’’

‘‘जानते हो संजय..?’’ वह मेरी बात को बीच मे ही काट दी, आसमान की ओर देखते हुए बोली -‘‘मुझे तो लग रहा हैं   कि आज मैं हवाओ को चीरते हुए इनके करीब तक पहुँच जाऊँ । इन्हें करीब से देखूँ । इनके बीच खेलूँ ।’’

‘‘प्रिया।’’

‘‘तुम्हे यह मौसम नहीं लुभाता?’’ वह मेरी ओर देखने लगी।

मैं देर तक उसे हैरान नजरों से देखता रहा -‘क्या यह वही प्रिया है जिसे मैं जानता था?’’ उसकी बहकी बहकी बातें मुझे डरा रही थी।

‘‘बोलो संजय।’’ वह मोटरसाइकिल का हैन्डिल पकड़ कर जोर से हिलाया।

‘‘ठीक है बैठो।’’ मैं उसकी भावनाये नही तोड़ पाया।

वह उछल कर बैठ गयी। गाड़ी अभी मुस्किल से एक किमी0 भी नही पार कर पायी कि बारिस की नन्ही नन्ही बूदें टपकना शुरू हो गयी। फिर तो बारिस…बारिस…तेज बारिस।

मैं भी पूरी तरह जोश में आ चुका था। सड़क पर बह़ रहे पानी को चीरते हुई बाइक हर पल अपनी गति तेज करती जा रही थी।

तभी एकाएक प्रिया ने आवाज दी -‘‘संजय बाइक रोको।’’

‘अब ‘क्या हुआ?’’ मैंने पॅूछा।

‘‘बैठने में तकलीफ हो रही है।’’ उसके स्वर में हल्की शरारत थी।

मैने बाइक रोक दी।

वह उतरी…मेरी ओर देखकर मुस्कराई और फिर बगैर कुछ बोले हुए अपनी टांगों को बाइक के दोनो तरह लटका कर पुरूषो की भंाति बैठ गयी।

‘‘चलो!’’ उसने मेरे कंधे पर हाँथ मारा।

मैने बाइक पुनः दौड़ा दी।

बाइक दौड़ते ही उसने अपने हाँ थो को एक बार हवा में लहराया और फिर पूर्ण समर्पण के साथ हाँ थो को मेरी बाँ हो के नीचे से घुमाकर कंधो में फॅसाती हुई पूरी मजबूती से मुझसे चिपक गयी। उस वक्त उसका गीला यौवन बड़ी बेरहमी से हमारे बदनों के बीच पिस रहा था।

सड़क मे बीच बीच उभरे छोटे-छोटे बे्रकर के कारण आती बाइक में हल्की उछाले, बीच-बीच बाइक की गति का त्वरित एवं मंदित होना… फिर उससे उठती तपन और खामोस धुआ… मैं बहुत देर तक बर्दास्त नही कर पाया। इससे पहले कि मेरे कदम बहकते, मजबूरन मुझे कड़ा रूख अपनाना पड़ा -‘‘प्रिया, ये बैठने का कौन सा तरीका है… मेरी कमर से अपने हाँथ निकालो।‘‘

वह पल था ही ऐसा- बारिस की हर बूद जैसे शराब बन कर गिर रही हो बदन में… उस नशे मे मेरी रूह भी तड़फड़ाने लगी। मुझे इस बात का पूरी तरह एहसास था कि अगर कुछ पल और मैं ऐसे ही आग मे तपता रहा तो मैं किसी भी सीमा का उंलघन कर जाऊॅगा। प्रिया शायद चाह कर भी मुझे रोक न पाये।

‘‘संजय!’’ अचानक उसका कसाव बढ़ गया। कपकॅपाते स्वर मे बोली -‘‘आज मत रोको मुझे। आज मै जी भर के डूब जाना चाहती हॅू इन बारिस की नाजुक फुहारों में… महसूस कर लेना चाहती हॅू उन तमाम लम्हो को जिनसे आज तक मैं अंजान थी।’’ कहते-कहते उसके भीगे होंठ मेरे गले तक झुक आये। उनके नाजुक छुअन का एहसास हुआ तो मैं तड़प उठा। खुद को सम्भालते हुए काँपते स्वर मे बोला -‘‘ये क्या पागलपन है प्रिया? दूर हटो।’’ हैडिल से मेरा हाथ छूटने वाला था। मैंने जोरदार बारिस के बीच वही बाइक रोक दी -‘‘उतरो गाड़ी से।’’

वह गाड़ी से उतर कर खड़ी हो गयी। मैंने वही सड़क पर अपनी गाड़ी को साइड स्टैड पर लगाई और उसकी ओर मुड़ते हुए भरपूर निगाहों से उसे देखा। वह सिर से पैर तक बारिस मे भीग चुकी थी। पानी की बॅूदें उसके माथे से सरकती हुई पलको पर ऐसे ठहर जाती कि वह पलको को ठीक से उठा भी नही पा रही थी।

‘‘प्रिया।’’ मैंने कहा। मेरी आवाज सुन कर जैसे ही उसने अपनी भारी पलको को उठाया, पानी की बॅूदें लुढ़कती हुई उसके गुलाबी होंठो मे ऐसे सज गयी जैसे गुलाब की पंखुड़ी मे ओस की बॅूदें ठहर गयी हो। मेरे बदन की शिराओ मे जमा लहू एकाएक पिघलने लगा। इससे पहले वह अनियंत्रित होता मैंने खुद को सम्भालते हुए कहा -‘‘तुम दोस्ती की शरहद को लांघ रही हो।’’

जवाब मे उसने कुछ नही कहा। अपने एक पैर के अॅगूठे से दूसरे पैर के अॅगूठे को रगड़ती हुई बस एकटक मेंरी ओर देखती रही। उसका बदन ठण्ड से काँप रहा था। मैं बाइक की ओर बढ़ते हुए बोला -‘‘चलो बैठो गाड़ी मे हमें शहर की तरफ लौटना है।’’

‘‘संजय!’’ उसने आवाज दी। इससे पहले मैं उसकी ओर पलट कर देखता वह बिजली की रफ्तार से आयी और पीछे से मुझे जकड़ लिया। सिसकतें हुए बोली -‘‘आज मुझे किसी शरहद की याद मत दिलाओं। आज मैं सिर्फ एक लड़की बनी रहना चाहती हॅू जिसे फिरहाल एक लड़के की जरुरत है।’’

‘‘प्रिया तुम पागल हो गयी हो।’’ मैंने खुद को छुड़ाने की कोशिश की। मगर उसकी पकड़ और भी मजबूत होती गयी। जैसे ही उसके बेचैन होंठो ने मेरे गले के पिछले हिस्से को छुआ मेरा धैर्य बिखरने लगा। मैंने टूटते स्वर मे कहा -‘‘मैं अपना संयम खो रहा हॅू प्रिया।’’

‘‘संजय।’’ वह तेजी से घूमते हुए मुझे आगे से जकड़ लिया। उसका सीना मेरे सीने को चुभने लगा। उसने मेरे सर को पकड़ कर अपनी ओर झुकाने की कोशिश की तो मैं चिग्घाड़ उठा -‘‘प्रिया तुम नहीं जानती तुम क्या कर रही हो? अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया तो जिन्दगी भर तुम मुझे कोसती रहोगी।’’

‘‘कभी नही कोसूगी संजय।’’ उसने पूरी दृढ़ता से मुझे अपनी ओर खीचा -‘‘जो हो रहा है उसे होने दो वर्ना पागल हो जाऊँगी मैं।’’

‘‘प्रिया ये सड़क है। यहाँ कभी भी कोई भी आ सकता है।’’

प्रिया ने एक पल के लिए इधर उधर देखा फिर थरथराते होंठो से बोली-‘‘यहाँ कोई नही आयेगा। हम शहर से इतने दूर हैं, सूनसान सड़क है उस पर भी तेज बारिस। कौन आयेगा यहाँ ?’’ कहते हुए वह एक एक कर मेरे शर्ट की बटन खोलती चली गयी। फिर हर पल के साथ मै एक भयानक आग का दरिया बनता चला गया।

देर तक बादल बरसते रहे। पानी भरी हवा की तेज बौछारे हमारे बदन से टकराती रही फिर एकाएक जोर से बिजली कड़की और मैं प्रिया के बदन से अलग हो गया। हर तरफ खामोशी छा गयी। चंद क्षणों तक वहाँ  बारिस की बूदों की झरझराहट के अलावा कोई आवाज नही हुई। मेरा हाँफता हुआ चेहरा आसमान की ओर था जिसे पानी की फुहारे नहला रही थी। प्रिया मेरे सामने बैठी हुई एकटक मुझे देखे जा रही थी। उसकी आँखों मे न तो कोई शर्म थी न ही पश्चाताप। मगर मैं चाहकर भी प्रिया से नजरे नहीं मिला पा रहा था।

‘‘संजय।’’ अचानक प्रिया ने आवाज दी। मैंने अपनी गर्दन घुमा कर उसकी ओर देखा। उसके होंठो मे अब भी मुस्कान बिखरी हुई थी। धीरे से बोली -‘‘क्या सोच रहे हो?’’

मैंने कोई जवाब नही दिया। मेरी नजरे जमीन के अंदर धसी जा रही थी।

‘‘तुम क्यों इस तरह गुनहगार बने बैठे हो? दस सब में तुम्हारी क्या गलती थी?’’

उस समय उसकी आवाज मुझे कील की तरह चुभ रही थी। मै उसका और सामना नही कर पा रहा था। मैं अपनी शर्ट की बटन बन्द करता हुआ लड़खड़ाते कदमो से उठा और मोटर साइकिल की ओर बढ़ गया। प्रिया वही बैठी अब भी मुझे लगातार घूरती रही।

मैंने गाड़ी को घुमाकर उसका मॅुह शहर की ओर कर दिया। प्रिया तब भी नही उठी तो मैंने खफा खफा नजरों से उसकी ओर देखा। वह मेरे इसारे को समझ गयी और लगभग दौड़ती हुई आकर मेरे सामने खड़ी हो गयी, बोली -‘‘संजय, गलती मेरी थी, मै बारिस में घूमने के लिये प्लानिंग करने से पहले यह भूल गयी थी कि तुम दोस्त के अलावा एक लड़के भी हो और मैं एक लड़की।’’

‘‘पहले तुम अपनी पैंट पहनो।’’

‘‘ओह… सॉरी।’’ अचानक उसे याद आया तो वह तेजी मेरे पीछे की ओर दौड़ी। कंधे मे टगें हुए पैंट को निकाला, पहना और शर्माते हुए मेरे सामने आकर एक बार फिर खड़ी हो गयी। इस बार मैंने उससे नजरें नही मिलायी।

‘‘संजय।’’ उसने मुझे पुकारा। मैंने अनसुना कर दिया तो वह मेरे हाँथ को पकड़ने की कोशिश की। मैंने जोर से उसका हाँथ झटक दिया। पीछे झुकते हुए बोला -‘‘प्लीज प्रिया, मुझे छुओं मत। तुम्हारी छुअन को मुझसे अब बर्दास्त नहीं हो रही है।’’

‘‘ठीक है। नहीं छुएगे।’’ उसने अपने हाँथ समेट लिए-‘‘लेकिन अपनी गाड़ी में तो ले चलोगे? या यही छोड जाने का इरादा है। टैक्सी भी नही मिलेगी यहाँ पर।’’

‘‘बैठो।’’ मैंने कहा

******-

उस घटना के बाद दो दिन गुजर गये। मैं कालेज नहीं गया।

यह जानते हुए भी कि मेरे और प्रिया के बीच उस दिन जो भी हुआ है उसमे कम से कम मेरी कोई गलती नही थी फिर भी मैं प्रिया का सामना करने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था। इस समय जब मैं डायरी लिख रहा हॅू तो समझने की कोशिश कर रहा हॅू -’’क्या वाकई वासना के समुंदर में उठी लहरें इतनी प्रबल होती है… इतनी अनियंत्रित, जिनके सामने मानव का अतुलनीय मस्तिष्क भी घुटने टेक देता है। प्रिया को जितना मैं जानता हॅू वह खुले मिजाज की जरूर थी मगर उसमे खुद को लेकर इतना नियंत्रण था कि वह इस हद तक गिरने से खुद को रोक सके। फिर रोका क्यो नही? ऐसे सैकड़ों सवाल मुझे कचोट रहे थे।’’

तभी-

ट्रिंग- ट्रिंग, ट्रिंग- ट्रिंग। मेरा फोन बज उठा।

“हेलो!’’ मोबाइल की टाकिंग स्विच आन करते हुए मैंने कहा।

“कहिए संजय साहब।’’ फोन पर खुशबू की आवाज तैर पड़ी -’’उस दिन के मौसम का मिजाज कैसा था?’’

“किस दिन?’’ एकाएक मेरा दिल धड़क उठा। आज पहली बार उसने मेरे लिए ‘साहब’ जैसे शब्द का प्रयोग किया था। इससे पहले यह शब्द अक्सर प्रिया ही इस्तेमाल करती आयी है।

“अरे जिस दिन नयी-नयी बाइक लेकर पहली बार बाहर फिजाओं में निकले थे।’’

“खुशबू।’’ मेरा दिल घड़क उठा।

“सुना था…।’’ उसने मेरी बात बीच में ही काट दी थी -‘‘साहब की पिछली सीट भी भरी थी। प्रिया थी साथ में?’’

उसकी जुबां में प्रिया का नाम आते ही मानो मोबाइल हाँथसे छूटकर गिर पड़ेगा। मैंने खुद को सम्भालते हुए पॅूछा -‘‘यह बात तुम्हें क…किसने बताई?’’ घबराहट से मेरी जुबां लड़खड़ा गयी। मुझे उसके पॅूछने के अंदाज से पूरी तरह एहसास हो गया कि वह भले ही बात को घुमा फिरा कर कहने की कोशिश कर रही हो मगर उस घटना के बारे में उसे पूरी जानकारी है।

फोन पर पल भर के लिए खामोशी छायी रही… उसने कोई जवाब नहीं दिया। शायद वह कुछ छुपाने की कोशिश कर रही थी।

“खुशबू।’’ मुझे ही बोलना पड़ा -’’मैं तुमसे इसी वक्त मिलना चाहता हूँ।’’ इससे पहले कि मामला आगे बढ़े मैं खुशबू के सामने उस दिन की हकीकत उगल देना चाहता था।

“कहाँ?’’ उसने पूछा।

“कहीं भी…. जहाँ तुम चाहो?’’

“मैं आपके कमरे आ जाऊॅ।’’

“ठीक है आ जाओ। मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूँ।’’

उसने फोन काट दिया।

अभी 10 मिनट भी न गुजरे रहे होगे कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। इससे पहले मैं दरवाजा खोलता मैं सोचने लगा -खुशबू यही आस पास थी क्या जो इतनी जल्दी आ गयी? लेकिन फोन तो उसने लैण्डलाइन से किया था।

ठक…ठक… दोबारा दस्तक हुई।

‘‘अरे थोडा़ रुको…।’’ मैं जरा झल्ला कर बोला -‘‘खोल रहा हॅू।’’

“हाय संजय।’’ दरवाजा खुलते ही एक जानी पहचानी सी आवाज गॅूज पड़ी।

“प्रिया तुम!’’ मेरे मुँह से अकस्मात ही चीख निकल गयी। बदन थर-थरा गया। जवाब में वह सिर्फ मुस्कुराई। कहा कुछ नही।

‘‘प्रिया…।’’

“मेरे यूं अचानक यहाँ आ जाने से तुम्हें बुरा तो नहीं लगा संजय।’’ वह मेरी बात बीच मे ही काटते हुए बोली -’’तुम दो दिन से काँलेज नहीं आये तो सोचा चलें हम खुद ही तुमसे मिल लें। तुम्हे तो हमारी याद आने से रही।’’

‘‘अंदर आ जाओ।’’ मैंने कहा।

“थैंक्यू!’’ सामने पड़ी कुर्सी खुद ही सरका कर वह बैठ गयी।

वह थोड़ी देर तक मेरे कमरे के चारो तरफ देखती रही। जैसे कुछ खोज रही हो। मेरी नजरें उसके चेहरे पर टिकी रही। मुझे उम्मीद थी शायद वह उस घटना के लिए माँफी मांगे मगर उसने देर तक कुछ नही कहा।

“प्रिया।’’ उसकी चुप्पी जब मुझसे बर्दास्त नही हुई तो मुझे बोलना पड़ा -‘‘कोई खास वजह यहाँ आने की?’’

‘‘क्यों?’’ वह मेरी ओर देखने लगी, बोली -‘‘तुम्हारे यहाँ आने के लिए भी मुझे वजह चाहिए?’’

‘‘नही मेरा वह मतलब नही था।’’

‘‘संजय मैं जानती हॅू कि तुम्हे मेरा यहाँ आना शायद अच्छा नही लगा मगर तुम 2 दिन से काँलेज नही आये तो मैं क्या करती?’’

‘‘दरअसल अभी यहाँ खुशबू आने वाली है इसलिए पूँछ रहा था।’’ मैंने धीरे से कहा।

“तो?’’ वह मेरी ओर ऐसे देखी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

“हम दोनों को इस तरह यहाँ पाकर वह उल्टा सीधा सोच सकती है।’’ मेरे स्वर उसके कानों पर पड़े तो वह हँस पड़ी, बोली -’’संजय हम दोनों आपस में सिर्फ दोस्त हैं। इस बात को वह बहुत अच्छे से जानती है। वह उल्टा सीधा कुछ नहीं सोचेने वाली।’’

मैं खामोश हो गया। मेरी नजरें एक बार फिर उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करने लगी -कितनी बदल चुकी है प्रिया। वह प्रिया जो कभी सिद्धान्तों की बातें किया करती थी, आज रिश्तो की सीमाये लांघने मे भी गुरेज नही कर रही है।

चंद पलों तक कमरे मे खामोशी छायी रही

“प्रिया।’’ मुझे बोलना पड़ा -’’तुम्हें उस घटना पर जरा भी अफसोस नहीं है? तुम अब किसी और की मंगेतर हो।’’

“संजय, क्या तुम मेरी बात को समझ सकते हो?’’ वह एकाएक गम्भीर हो गयी, वह बिना मेरी ओर देखे हुए कहने लगी -’’उस घटना के बाद हमने क्या गवाया है काश तुम समझ पाते?’’

‘‘प्रिया।’’

‘‘अगर तुम समझते तो ये सवाल तुम आज कम से कम हमसे तो नही करते।’’

‘‘मतलब!’’ मेरा थूक गले मे ही अटक गया।

‘‘संजय।’’ अचानक उसके होंठो मे एक रूखी सी मुस्कान उभर आयी। आँखों मे उबल रहे पानी को थामते हुए बोली -‘‘क्या तुम यकीन करोगे कि ये सब अचानक होकर भी अचानक नही हुआ। सच ये है कि वह सैकड़ो वेदनाओ और हजारों आँसुओ की कीमत थी। ये सब करने के बाद हमारे बारे मे तुम्हारी राय बदल जायेगी, हम जानते थे। फिर भी किया हमने।’’ उसकी आँखों से पानी की चंद बूँदे टपक पड़ी, रुधे हुए स्वर मे बोली -‘‘तुम बताओ, उससे पहले हम क्या थे तुम्हारे लिए? आज तुम हमसे किस तरह बात कर रहे हो?’’

‘‘प्रिया।’’ मैंने प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखा -‘‘कही तुम ये कहने की कोशिश तो नही कर रही हो कि हमारे बीच उस दिन जो कुछ भी हुआ उसमे मेरी गलती थी?’’

‘‘नही मैं ऐसा कुछ नही सोचती।’’ उसके स्वर मे अचानक दृढ़ता आ गयी -‘‘उस दिन जो कुछ भी हुआ उसमे हमारी मर्जी थी और… इसे अगर तुम गलती कहते हो तो वह गलती भी हमारी ही थी। मगर संजय, पूरे होशोहवास मे हमने अपनी नादानी की वह कीमत चुकाई है।’’

‘‘नदानी? कीमत?’’ मेरी आँखें फैल गयी, हड़बड़ा कर बोला -‘‘ये तुम किस भाषा मे बात कर रही हो प्रिया, मुझे कुछ समझ नही आ रहा है?’’

‘‘तुम्हे याद है संजय – उस दिन पार्क मे हमने तुम्हारे फूल को ठुकरा दिया था।’’

‘‘हाँ मगर मैं उसे कब का भूल…।’’

‘‘हाँ  संजय, यह उस नादानी की कीमत ही थी।’’ उसने बीच मे ही मेरी बात काट दी। मेरी ओर गहरी निगाहो से देखती हुई बोली -‘‘संजय, बच्ची नही हूँ  मैं। सब कुछ समझती हॅू। उस घटना के बाद तुम्हारे दिल पर क्या गुजरी होगी मुझे एहसास है। जानते हो…।’’ उसने एक बार फिर अपनी नजरें झुका ली -‘‘मैंने किसी वाहियात किताब मे पढ़ा था कि औरत अगर एक बार किसी मर्द के नीचे आ जाती है तो वह जिन्दगी भर फिर उससे ऊपर नही उठ पाती। अगर ये सच है न संजय… तो मैं अपने इस फैसले पर कभी अफसोस नही करूगी।’’

‘‘प्रिया।’’ मैं कुछ समछ नही पा रहा था मगर उसके आँ शुओ को देखकर मेरा गला भर आया -‘‘ये सब क्या पागलपन है? मैं कुछ समझ नही पा रहा हॅू।’’

‘‘संजय।’’ मेरी बात को अनसुना करते हुए वह बोली -‘‘जिन्दगी मे भले ही तुम्हे मुझसे लाख गुना बेहतर लड़कियां क्यों न मिल जाती मगर उस दिन अगर तुम मेरे शरीर को न पा लेते तो शायद नये वर्ष के पहले दिन जब तुम मुझसे मिलने पार्क मे आये थे, मेरे द्वारा फूल ठुकराने की उस घटना को… उस अपमान के एहसास को जिन्दगी भर न भूल पाते। इसलिए अच्छा है न संजय! कि यह दर्द जिन्दगी भर मैं ढ़ोती रहॅू।’’

सच कहॅू तो उस समय मैं कुछ समझ नही पा रहा था कि प्रिया क्या कहने की कोशिश कर रही है। मैं डरा हुआ था -खुशबू कभी भी आ सकती थी। मैं चाहता था कि प्रिया किसी भी तरह कम से कम उस वक्त वहाँ से चली जाये।

“मैं अन्दर आ सकती हूँ?’’ दरवाजे पर अकस्मात ही आवाज गॅूज उठी। आवाज खुशबू की थी।

“अरे आओ!’’ मैं झटके से कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया। वह अन्दर आ गयी -‘‘बैठो।’’ मैंने अपनी कुर्सी की ओर इसारा करते हुए कहा और खुद बिस्तर पर बैठ गया। दरअसल मेरे घर मे सिर्फ 2 ही कुर्सियां थी।

प्रिया एकटक मेरी ओर देखे जा रही थी। शायद उसे मेरा खुशबू के लिए विशिष्ट व्यवहार अच्छा नही लगा। उस दौरान प्रिया और खुशबू के बीच कोई संवाद नहीं हुआ। सिर्फ पल भर के लिए उनकी आपस मे निगाहें टकराई। खुशबू के होंठों पर फीकी सी मुस्कान बिखर गयी जबकि प्रिया के चेहरे पर सूनापन छाया रहा। उनके बीच की यह खामोशी, मुझे परेशान कर रही थी -‘कही खुशबू को प्रिया और मेरे बीच हुई उस हरकत का पता तो नही चल गया?’

इस ऊहापोही मे वहाँ देर तक खामोशी छायी रही-

“मुझे लगता है…।’’ खामोशी तोड़ते हुए मैंने कहा -‘‘प्रिया तुम्हे जाना चाहिए। वैसे भी काफी देर हो गयी है। तुम्हारे घरवाले परेशान हो रहे होगे।’’

मेरे ये अस्वाभाविक शब्द प्रिया के कानों पर पड़े तो वह बिना सवाल जवाब के उठ कर खड़ी हो गयी।

“अरे संजय जी…..आप प्रिया को क्यों भगा रहे हो?’’ खुशबू हैरान होकर मेरी ओर देखी।

मैंने कोई जवाब नही दिया।

“संजय, मुझे भगा नहीं रहा है, मैं खुद जा रही हूँ।’’ चलते-चलते प्रिया ने बेहद तीखे अंदाज मे मेरी ओर घूरा। मैंने नजरे नही मिलाई।

उसके जाने के बाद मैंने दरवाजा बन्द करके जैसे ही पलटा खुशबू मुस्कुराते हुए बोली -‘‘यहाँ भी प्रिया हमसे पहले पहॅुच गयी?’’

‘‘मतलब?’’ मेरी सांस अटकते अटकते बची।

‘‘अरे कुछ नही।’’ खुशबू ने मेरे चेहरे को गौर से देखा -‘‘तुम फोन पर कुछ कह रहे थे?’’

“ओह हाँ ।’’ थोड़ी देर सोचने के बाद मुझे याद आया -‘‘तुम्हें किसने बताया था कि उस दिन साथ में प्रिया भी थी?’’

“सिर्फ यही पूछने के लिए मुझें यहाँ बुलाया था?’’ खुशबू के चेहरे पर हॅंसी दौड़ गयी -‘‘और कुछ नहीं कहोगे?’’

‘‘क्या…?’’

‘‘मुझे लगा तुम गुलाब सुलाब दोगे… कुछ कहोगे कुछ सुनोगे मगर तुम तो…।’’ उसने अपने होंठ भीच लिए।

‘‘मैं समझा नही?’’ मैं प्रश्नसूचक नजरों से उसकी ओर देखने लगा।

‘‘ओह… संजय जी। वह जोर से हँस पड़ी -‘‘प्रिया अगर आपको बुद्दू कहती है तो गलत नही कहती।’’ कहती हुई वह कुर्सी से उठी और मचलती हुई मेरी गोदी मे समा गयी। मेरे गालो को अपनी उॅगलियों से छूते हुए बोली – ‘‘मैं कब से तुमसे मिलने के लिए उतावली थी। और तुम कहाँ अभी तक प्रिया की बातों मे उलझे हो।’’

‘‘मतलब?’’

‘‘शादी करोगे हमसे?’’

‘‘ये क्या बात हुई? मैं कुछ पॅूछ रहा हॅू तुमसे?’’

‘‘मैं भी तो पॅूछ ही रही हॅू कि शादी करोगे हमसे?’’

‘‘खुशबू।’’

******

अगले दिन-

शाम के लगभग 4 बज रहे थे। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। मेरा दिल धक्क मचा। हो न हो यह प्रिया ही है।

‘‘कौन है?’’ गोदी मे रखी हुई किताब को बिस्तर मे रखते हुए मैंने पूछा।

‘‘अमा यार हम हैं हम। तुम दरवाजा खोलो।’’

‘‘किसन!’’ मैंने फटाक से उठ कर दरवाजा खोल दिया -‘‘अच्छा हुआ तुम आ गये।’’

‘‘क्यों आज तुम्हारे घर मे आग लग गयी क्या?’’

‘‘आओ बैठो।’’ मैंने उसके चुटकुले पर ध्यान नही दिया।

‘‘बैठ तो हम जायेगे ही मगर पहले तुम बताओ आज कल तुमने अपने कमरे मे अण्डा वण्डा दे रखा है क्या?’’ वह इधर उधर देखने लगा -‘‘कहाँ रखे हैं?’’

‘‘क्या?’’

‘‘अण्डे। हमने सुना है कई दिनो से काँलेज भी नही जा रहे हो?’’

‘‘किसन!’’ मैंने पुकारा -‘‘तुम ये सब मजाक छोड़ो और हमारी बात सुनो।’’

‘‘अबे हम यहाँ तुम्हारी बात ही सुनने आये मगर पहले तुम हमारी सुनो।’’ वह कुर्सी का चक्कर काटते हुए मेरे बगल मे बैठ गया, आँ ख तरेरते हुए बोला -‘‘लड़की बाजी के चक्कर मे तुम अपनी पढ़ाई चैपट काहे करने मे लगेे हो। इंजीनियरिंग का अंतिम सत्र है इसे पास कर लो। उसके बाद कहीं नौकरी सौकरी मिल जायेगी… तो यार छोकरी भी खोज लेना।’’

‘‘बोल लिया?’’ वह चुप हुआ तो मैने कहा -‘‘मैं बोलू अब?’’

‘‘नही। अभी कहना तो बहुत कुछ था मगर कोई नही पहले तुम ही बोल लो।’’ वह मेरी ओर मुँह करके बैठ गया।

‘‘थैंक्यू।’’ मैंने कहा -‘‘तो सुनो- आज खुशबू आयी थी यहाँ ।’’

‘‘प्रिया भी आयी थी। और ये सब हम जानते है। कुछ नया हो तो बताओ।’’

‘‘लेकिन ये सब तुम्हे कैसे पता?’’

‘‘अरे तुम्हारे माकान मालिक कल उसी समय नीचे भन्ना रहे थे और क्या। वह तो ऊपर भी आ रहे थे कि तभी हम उधर से आ गये और उन्हे रोक लिए। हमने उनसे कहा कि आप रहने दीजिए हम समझायेगे अपने दोस्त को। फिर कल हम आ ही नही पाये। कोचिंग मे आज टेस्ट जो था। और तुम जानते हो हम किसान के बेटे है इसलिए पढ़ाई के साथ कोई बकैती नही कर सकते।’’

‘‘हाँ, हम जानते हैं कि तुम किसान के बेटे हो और इसे बार बार दोहराने की जरूरत नही है। समझे तुम। और देखो किसन हम बहुत परेशान हैं इसलिए प्लीज अभी कोई कमेडी नही। अंकल बक बक करते हैं तो उन्हे करने दो। उन्हे इतनी गम्भीरता से लेने  की जरूरत नही है। वैसे भी हम इस रूम को जल्दी ही छोड़ने वाले हैं।

‘‘कब?’’ अचानक उसके कान खड़े हो गये -‘‘और तुम जा कहाँ रहे हो?’’

‘‘तुम वह सब छोड़ो जब जायेगे तो बता देंगे फिरहाल अभी की सुनो।’’

‘‘मगर तुम…।’’

‘‘सुनो न यार।’’ एकाएक मैं उस पर चिल्ला पड़ा।

‘‘अच्छा बोलो।’’ उसने अपने हथियार डाल दिए।

‘‘खुशबू को तो तुम जानते ही हो। तुम्हारी निगाह मे वह कैसी लड़की है?

‘‘वह सब हम बता देगे लेकिन तुम बताओ- ये सब पॅूछ काहे रहे हो?’’

‘‘अमा यार शादी करना चाह रहे है उससे और काहे पॅूछेगे?’’

‘‘सच्ची?’’ अचानक वह कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया -‘‘हम कह रहे थे न कि खुशबू प्रिया से बेहतर है। वह तो तुम थे कि प्रिया को अपने कमरे मे घुसने दिया, हम होते तो बाबू जी की कसम- उसे दरवाजे से ही लौटा देते। उसने पार्क मे इतने लोगो के सामने फूल ठुकरा कर जो तुम्हारी इज्जत उतारी थी उसे हम अब तक भूल नही पाये। वैसे संजय… वह यहाँ आयी किसलिए थी?’’

‘‘उसी गलती की माफी मांगने।’’

‘‘क्या बात है यार? तुमने उसे घुटनो परे ला ही दिया। बहुत हवा मे उड़ रही थी।’’

‘‘छोड़ो न यार हम उसके बारे मे क्यो बात कर रहे है?’’ हालाकि मैं प्रिया से अब भी नाराज था मगर न जाने क्यों प्रिया के बारे में उसकी ऐसी बात सुन कर मुझे अच्छा नही लगा, मैंने कहा -‘‘वैसे भी वह यहाँ नही है।’’

तभी एकाएक उसके फोन की घंटी बज उठी। वह ‘फिर मिलने’ का संकेत करता हुआ वहाँ से चला गया। मैं दरवाजा बन्द करके जैसे ही लौटा मेरे फोन की घंटी घनघना उठी। नम्बर किसी पी0 सी0 ओ0 का था। मैंने फोन उठा लिया। लाइन पर प्रिया थी।

“संजय’’ उधर से आवाज आयी – ’’मेरी उस छोटी सी गलती का इतना बड़ा सिला दोगे….? तुम जानते नहीं जब तुम कालेज नहीं आते तो मैं कैसा महसूस करती हूँ। संजय तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो। इसलिए मेरे लिए तुम काँलेज मत छोड़ो। पीछे जो भी कुछ हुआ उसे गुजरा हुआ कल का एक हादसा समझ कर भूल जाओ न। तुम जानते हो मेरी सगाई हो चुकी है और चन्द दिनों में शादी भी होने वाली है फिर मैं दिल्ली चली जाऊँगी…तुम्हे कहाँ  मिलूगी फिर?’’ कहते-कहते अचानक उसका गला रूंध गया। रुवासी आवाज मे कहने लगी- ‘‘संजय तुम चाहो तो मुझे कोई सजा दे लो मुझे मगर भगवान के लिए तुम अपनी पढ़ाई मत खराब करो, तुम कालेज आया करो संजय… आया करो काँलेज।’’ अपने अंतिम शब्दों मे उसने मेरे सामने पीड़ा का सारा समुन्दर उलेड़ दिया। जिसे मैं समेट नही पा रहा था।

“आऊँगा।’’ एकाएक मेरी आंखें उबल पड़ी। फिर वह देर तक कुछ बोलती रही। मगर मैं कुछ भी नही सुन पा रहा था। इतना दर्द… इतनी वेदना… इतनी विरह… इतना पश्चाताप… सच कहूं तो उस पल मुझे ऐसा लगा – जैसे किसी ने एकाएक उसके लिए मेरे सारे शिकवे गिले, मन से निकाल कर कहीं दूर फेंक दिए हों। उसके फोन कटने के बाद भी मेरी आँखें रोती रही और मैं सकून के सागर मे समाता चला गया।

******

अगले दिन मैं कालेज गया मगर साइकिल से। बाइक ले जाने की हिम्मत नहीं पड़ी – दिल घबराया हुआ था – अपने पहले दिन ही इसी बाइक ने मुझे किस मोड़ पर ला खड़ा कर दिया था।

मैं ज्यों ही कालेज की सीमा में दाखिल हुआ एकाएक मुझे साइकिल रोकनी पड़ी। प्रिया आकर मेरे सामने खड़ी हो गयी।

‘‘प्रिया तुम और यहाँ गेट के पास। किसका इन्तजार कर रही हो?’’

‘‘तुम्हारा।’’ वह भरी भरी आँखों से मुझे ऐसे निहारा जैसे मैं वर्षो बाद किसी जंग से लौटा हॅू। फिर बेहद कमजोर स्वर मे बोली -’’सोच रही थी तुम आओगे भी कि नहीं।’’

प्रिया का यह एक नया रूप था, इससे पहले मैंने उसे इतना मायूस कभी नही देखा –“आओ चलो।’’ मैंने कहा तो वह अपने आँ शुओ को थामते हुए मेरे पीछे पीछे चल दी।

अभी हम 10 कदम ही चले थे कि अचानक वह ठिठक गयी -‘‘क्या हुआ?’’ मैंने पॅूछा।

“तुम अपनी साइकिल खड़ी करके आओ, मैं कक्षा में चलती हूँ।’’ कह कर वह एकाएक पलट पड़ी। मैंने गौर से देखा उसकी ओर। शायद वह अपने आँसू नही सम्भाल पा रही थी। वह उन्हे दुपट्टे में पोछते हुए अचानक कक्षा की ओर भागने लगी।

मैंने उसे नही रोका।

मैं कक्षा में पहुँचा तो एकाएक कई अवाज गूंज पड़ी थी। किसी ने कहा था’’- अरे, संजय भाई उस दिन की दोपहर के बाद गायब हुए तो तीन-चार दिन दिखे ही नहीं… कहां थे? तो कहीं से आवाज आयी -’’कहां खो गये थे संजय जी।’’ तो कुछ ने कहा -’’संजय उधर कहां जा रहे हो, जरा हमसे भी तो मिल लो।’’ इस तरह कइयों आवाजों को अनसुनी करता हुआ मैं सीधे प्रिया के पास पहुंच गया – एक मेज का सहारा लिए हुए वह खड़ी एकटक मेरी ओर देखे जा रही थी। उस वक्त हर किसी की निगाहें हम पर टिकी थी। इस बात का प्रिया को एहसास नही था। मैं हिचकते शर्माते हुए जाकर उसके पास खड़ा हो गया। फिर हम देर तक खामोश रहे।

’’संजय।’’ उसकी आवाज की खनक से अकस्मात ही हम दोनो के बीच की खामोशी टूट कर बिखर गयी। एक रूखी हॅसी के साथ वह बोली -’’एक शायरी पढ़ने का मूड है। पढॅू?’’

’’पढो।’’

‘‘संजय तुम्हे लगता हैं कि क्लास की इस शोर शायरी का माहौल है?’’

‘‘तो?’’

‘‘पीछे बगीचे मे चले? वैसे भी कक्षा शुरू होने मे अभी काफी वक्त हैं।’’

‘‘ठीक है।’’ हमने अपना बैग उठाया और काँ लेल की इमारत के पीछे बने बगीचे मे चले गये। पास लगी बेंच पर बैग रखकर मैंने उसकी ओर देखा -‘‘हाँ अब सुनाओ।’’

उसने भरपूर निगाह से मेरी ओर देखा, फिर बोली –

’’लम्हा, लम्हा वक्त गुजर जायेगा।

 हाथों से किसी का दामन छूट जायेगा।

 अभी वक्त है दो बातें कर लीजिए,

            हमें पता है आपकी जिन्दगी में कल कोई और आयेगा।’’

उसके ये अल्फाज मेरे कानों से टकराये तो मेरी आँखों में आंसू झलक पड़े। मैं थोड़ी देर तक बिना कुछ कहे उसकी आँ खो में एकटक देखता रहा।’’

‘‘तुम मेरी आँखों में क्या देख रहे हो?’’ वह शरमा गयी।

‘‘कुछ खोज रहा हॅू इनमें।’’

‘‘क्या?’’ वह असहज हो गयी। मैंने नजरें नही हटाई।

‘‘एक बात बताओगी प्रिया?’’ मैंने पॅूछा।

‘‘हॅू।’’ उसने अपनी गर्दन झुका ली।

‘‘तुम्हे मुझसे प्यार हो गया ना?’’

‘‘क्या… क्या कहा तुमने?’’ वह ऐसे पेश आयी जैसे उसने सुना ही न हो। मैंने अपने शब्दो को दोहराया नही। बस उसके चेहरे पर बनती बिगड़ती लकीरो को देखता रहा। वह थोड़ी देर तक खामोश बेंच पर अपनी उॅगलियों से कुछ लिखने का प्रयास करती रही फिर एकाएक लम्बी सांसे भरते हुए भावुक हो गयी, बोली -‘‘संजय अगर करते भी होगे तो अब उसका कोई मतलब नही है। जिन्दगी के दोनो छोर बहुत आगे निकल गये है।’’

‘‘प्रिया।’’ मैंने पुकारा। उसने नजरें नही उठाई।

‘‘एक काम करोगे संजय?’’ चंद पलो की खामोशी के बाद उसने मेरी ओर देखा -‘‘अगर हम तुम्हारे प्यार मे कभी कमजोर पड़ जाये, तुम्हारे सामने गिड़गिड़ाये, तुमसे अपना प्यार मांगे मगर तुम कमजोर मत पड़ना। खुशबू हमारी दोस्त है… अच्छी लड़की है उसे हमारे लिए कभी मत छोड़ना। हम जानते हैं वह तुमसे बहुत प्यार करती है शायद हमसे भी ज्यादा।’’

प्रिया की बातें वैसे भी मुझे कम समझ आती हैं। पता नही वह और मेरा दोस्त राज कौन सी किताबें पढ़ते हैं? उसकी बातें सुनकर कुछ देर के लिए मैं बदहवास उसकी ओर देखता रहा।

‘‘एक बात और कहें संजय बुरा तो नही मानोगे?’’ थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद वह पुनः कहने लगी -‘‘मुझे बचपन से ही उपन्यास पढने का शौक रहा है। मैंने बहुत से लेखकों को पढा़ है। प्यार के मसले मे सबने एक ही बात लिखी है -‘प्यार वह जजबात है जो आँखों से शुरू होकर दिल मे उतर जाता है।’ मैं बचपन से ही लड़को के साथ रही हॅू मगर मैंने आज तक किसी भी लड़के के साथ ऐसा महसूस नही किया जिसे मैं प्यार कह सकूँ । और सच कहॅू तो तुम भी उन्ही मे से एक थे। शायद इसीलिए मुझे कभी फर्क नही पड़ा कि मेरे घर वाले मेरी शादी कहाँ  कर रहे है। मैं सोचती थी कि जिन्दगी ही तो गुजारनी है, कही भी गुजार लेगे। और संजय, सच भी है… एक बार बच्चे हो गये फिर कहाँ  याद रहता है कि आपके बाप ने आपको किसके साथ बांध दिया है? जिन बच्चो को आपने अपने गर्भ से पैदा किया फिर वही आपकी पूरी दुनिया बन जाते हैं। फिर क्यों बिना वजह परिवार को दुखी करना।’’

मेरे पास उसकी बातों का कोई जवाब नही था। मैं चुप रहा।

‘‘मगर जानते हो संजय।’’ वह बिना रुके अपनी बात जारी रखी -‘‘मुझे प्यार का पहला एहसास कब हुआ? जब तुमने मेरे शरीर को छुआ… उसे झकझोरा, हर रिश्ते से दूर सिर्फ एक लड़का बन कर मुझे सिर्फ लड़की होने का एहसास कराया।’’

‘‘लेकिन प्रिया, तुमने तो कहा था कि वह तुम्हारी नादानी की कीमत थी?’’

‘‘हाँ, संजय वह सच था मगर आधा।’’ वह बेजान लाश की तरह धड़ाम से सीट पर बैठ गयी, बोली -‘‘बाकी आधा सच मुझे वह कीमत चुकाने के बाद पता चला। तब जब मुझे तुमसे प्यार हो गया।’’

‘‘प्रिया।’’ अचानक मेरे दिल की धड़कन बढ़ गयी, उसकी ओर झुकते हुए कहा -‘‘तुम जानती हो न कि मेरे और खुशबू के बीच क्या है? और उसे मैं दूसरी नीतू बनाने के लिए तैयार नही हॅू।’’

‘‘तुम घबराओ नही संजय। अब हम लौट कर तुम्हारे और खुशबू के बीच नही आने वाले है। सुधाकर से शादी करके हम दिल्ली चले जायेगे और फिर वही बस जायेगे।’’ उसकी आँखें एक बार फिर छलछला पड़ी -‘‘तुम चाहोगे तो हम तुम्हारे दोस्त बने रहेगे वर्ना उस हक को भी खुशी खुशी छोड़ देगे। यकीन मानो हमारा दिल बहुत बड़ा है।’’ आखिरी शब्दो मे उसके होंठो पर एक रूखी सी मुस्कान तैर पड़ी।

‘‘नही प्रिया दोस्ती का हक छोड़ने के लिए तुम्हे मैं कभी नही कहॅूगा।’’

“चलो अच्छा है संजय! इतना तो हक दे रहे हो हमें।’’

‘‘प्रिया।’’ मैं सिहर उठा। वे पल सचमुच अकल्पनीय थे। मैं अब जब डायरी लिख रहा हॅू तो समझने की कोशिश कर रहा हॅू कि उस वक्त मैं किसके बारे मे ज्यादा सोच रहा था – प्रिया के बारे में या फिर खुशबू? कौन था मेरे दिल के करीब? 

‘‘संजय।’’ प्रिया अचानक उठ कर खड़ी हो गयी। पुराने अंदाज में मेरा हाँथ पकड़ कर खींचते हुए बोली -‘‘चलो कहीं बाहर बैठते हैं।’’ फिर जैसे ही हमारी निगाहे टकरायी उसने झटके से मेरा हाँथ छोड़ दिया।

“क्या हुआ?’’ मैं चौंक पड़ा।

“कुछ नहीं।’’ उसने नजरें झुका ली, बोली -’’गलती से हमने तुम्हारा हाँथ पकड़ लिया। भूल गये थे कि हम सिर्फ दोस्त हैं।’’

“क्यों मुझे कुरेद कुरेद कर रूला रही हो प्रिया?’’ अचानक मेरी आँखें उबल पड़ी। मैंने उसकी हथेलियो को अपनी हथेलियों मे भर लिया, बोला -’’दोस्ती की सीमाएं इतनी भी सिमटी हुई नहीं होती, कि तुम मेरा हाँथ भी न पकड़ सको।’’ मेरी आवाज मेरे गले मे फॅसने लगी -‘‘कहीं तुम मुझे किसी बात का एहसास तो नही दिला रही हो?’’

“एहसास…?’’ वह रुवासी नजरों से मेरी ओर देखी, बोली -’’कैसी पागलपन की बातें कर रहे तुम संजय। हम तुम्हें कौन सा एहसास दिलायेगे? आज सच ये है कि हम खुद एक एहसास बन कर रह गये हैं।’’ उसकी आँखें आँसुओं को सम्भाल नही पायी। पानी नन्हा सा कतरा उसके गालो तक सरक आया, कहने लगी –“हम ठीक ही कह रहे हैं। लेकिन संजय? एक बात मानोगे हमारी?”

‘‘हाँ बोलो।’’ मैं अधीर हो उठा।

‘‘हम दोस्त हैं न? ये हक हमसे कभी मत छीनना।’’

‘‘नही प्रिया… कभी नही। और तुम्हे हाँथ पकड़ने का अधिकार भी है।’’

“नही संजय! हम इतने खुदगर्ज नही है। हम समझ रिश्ते की हद समझते हैं। कहते हैं…।’’ एकाएक उसके होंठों पर पीड़ा भरी मुस्कान तैर पड़ी। अपनी बात को जारी रखते हुए बोली –“प्यार इंसान को उतना ही सिखा देता है जितना नफरत उससे छीन लेती है। इसलिए अब हम समझदार हो गये हैं।’’

मैं समझ नहीं पा रहा था कि उस वक्त मैं क्या करू? खुद रोऊं या उसे समझाऊँ? वह कितनी पागल सी बन चुकी थी? दोस्ती की सीमाएं समेट कर उसने उसे कितना छोटा बना दिया? मैं एकाएक झटके से उसे अपनी ओर खींचा और अपनी छाती से चिपका लिया। फिर इतना दबाव…. इतना दबाव कि जैसे मैं उसे खुद में समा लेना चाहता हूँ। मेरे दिल में उस वक्त उसके लिए सिर्फ प्यार ही प्यार था। मैं उसे बता देना चाहता था कि ये सीमाएं कहाँ तक हो सकती है।

वह थोड़ी देर तक मेरी बाँ हो मे ऐसे पिसती रही जैसे उसे सारी दुनिया मिल गयी हो। फिर होश सम्भला तो छटपटा कर वह चीख पड़ी –“संजय हमें छोड़ो। किसी और की अमानत है हम।’’

बाहों का कसाव ढ़ीला पड़ा तो झटके से अलग हो गयी। कुछ पलो तक हम एक दूसरे की ओर देखते रहे फिर वह भरे मन से बोली -’’संजय अगर तुम हमें इतना अधिकार दे दोगे तो हमें मुहब्बत हो जाएंगी तुमसे फिर ये मत कहना कि हम खुशबू की जगह लेने की कोशिश कर रहे हैं।’’

“प्रिया…।’’ मन ही मन मैं तड़प उठा -’काश तुम्हारी सगाई न हुई होती। काश मैं उसके लिए एक और खुशबू को कुर्बान कर पाता।’’

******

कालेज से लौट कर मैं अपनी साइकिल खड़ी कर रहा था तभी मुझे एहसास हुआ मेरे पीछे कोई है। मुड़ कर देखा, पीछे खुशबू खड़ी थी।

“हाय।’’ नजर मिलते ही वह मुस्करा पड़ी।

“तुम! इस वक्त!’’ अचानक उसे वहाँ देखकर मैं चौंक पड़ा।

“क्यों? नहीं होना चाहिए था?’’

“नही मेरा वह मतलब नही था।’’ अपने शब्दो को मैंने समेट लिया। उसने आगे कुछ नही कहा।

“ऊपर आओ।’’ साइकिल पर ताला लगाकर सीढ़ियो की ओर बढ़ते हुए मैंने कहा।

“नहीं, मैं जरा जल्दी में हूँ, ऊपर नहीं आ पाऊंगी।’’

“ऊपर नही आ पाओगी।’’ मैं पलटकर उसकी ओर देखा -‘‘फिर क्यों आयी थी?’’

“मम्मी का संदेश लायी थी। उन्होंने आपको बुलाया है।’’

“ओह… तो इसके लिए तो तुम फोन भी कर सकती थी।’’- फिर अचानक जब उसकी शब्दों पर ध्यान गया किया तो हड़बड़ा उठा – ’’क्या… क्या कहा तुमने? तुम्हारी मम्मी बुलाया है? मुझे? क्यो?’’

“हाँ!’’ मेरे इस तरह हड़बड़ाने पर वह अपने हॅसते हुए होंठो को अपनी हॅथेलियों में छुपा लिया, बोली -‘‘आकर आप उन्ही से पॅूछ लेना।’’

“लेकिन यॅू अकस्मात?’’

“अब सारे सवाल आप यही कर लेगें? घर तो आइए।’’ कहती हुई वह बिजली की रफ्तार से पीछे की ओर मुड़ी -’’और हाँ ।’’ वह अचानक ठहर गयी -‘‘जरा जल्दी आइयेगा। अभी हम चलते हैं।’’

वह अपनी आदत के अनुसार हॅसती खिलखिलाती हुई चली गयी।

मैं ऊपर आया। नहाया, कपड़े बदले और खुशबू के घर के लिए निकल पड़ा।

उसके घर पर मैं कोई घंटा भर ठहरा होऊंगा। उस दौरान काँ फी बाते होती रहीं। कई सवाल भी उठे मसलन -’’आपके पिता जी क्या करते हैं? मैंने साफ तौर पर कह दिया -‘‘वे मेरे लिए मर चुके हैं। माँ मेरी बचपन मे ही गुजर गयी थी इसलिए समझिये अब मैं अकेला हूँ इस दुनिया में।’’

“पिता से नाराजगी का कारण?’’

मैंने बताने से साफ इंकार कर दिया। वे लोग क्षण भर मेरे जज्बातों को टटोलते रहे फिर मुद्दे को एक नया मोड़ देते हुए पॅूछा -‘‘सगाई कब की रख ले?’’

‘‘आप जब चाहे।’’ कहते हुए मैंने खुशबू की ओर देखा। वह धीरे से मुस्करा पड़ी।

******

सगाई की रश्म पूरी होते ही सबसे पहले मैंने यह खबर प्रिया को दी। यह खबर सुनते ही वह चिल्ला उठी -‘‘बधाई हो संजय… बधाई हो।’’ खुशी से उसका गला रूंध गया।

हमारी सगाई से प्रिया इस कदर खुश होगी- यह मेरे लिए विश्वास करने लायक बात तो बिल्कुल नही थी। अगर उस वक्त उसे अपनी माँ के द्वारा किसी जरूरी काम से पुकारा न गया होता तो देर तक वह खिलखिला-खिलखिला कर मुझसे बातें करती रहती। डायरी लिखते हुए अब जब मैं याद करने की कोशिश कर रहा हॅू तो याद आ रहा है कि शायद उसने यही कहा था? हाँ, बिल्कुल यही कहा था -‘‘संजय मम्मी मुझे पुकार रही हैं। इस वक्त मुझे जाना होगा। मैं अभी तुमसे बात नही कर सकती। वैसे भी मेरी तबियत भी कुछ ठीक नही है।’’

‘‘क्या हुआ?’’ मैंने पुछने की कोशिश की तो शायद फोन उसके हाँथ से गिर गया। फोन कटने से पहले जोर की आवाज आयी थी ऐसे जैसे किसी ने जानबूझ कर जोर से फोन पटक दिया हो।

वह अगले तीन-चार दिनों तक कालेज नहीं आ पायी। मैं फोन पर उससे बात करने की कोशिश की वह फोन पर पहले तो आयी नही। मैंने जिद की तो उसे आना पड़ा। उसने मुझसे ज्यादा बात नही की। रो कर बोली -‘‘संजय मुझे तेज बुखार है मैं अभी बात करने की स्थिति मे नही हॅू।’’ फोन कट गया।

ये कम्बख्त बुखार भी कितना कमजोर बना दिया है उसकी आवाज को। वह बिल्कुल बदल सी गयी थी। हालाकि मैं बाद मे सोच रहा हॅू कि क्या सचमुच उसे बुखार ही था या फिर मेरी सगाई की खबर ने उसे तोड़ दिया है।

******

“क्या यार संजू, सगाई कर ली और हमें बुलाया भी नहीं।’’ एकाएक फोन पर राज का ठहाका गूंज उठा।

“अरे राज तुम!’’ आश्चर्य से मेरा मुंह खुला रह गया -’’पूरे साल भर बाद याद आयी मेरी। कहां हो आजकल?’’ मैं कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया था।

’’दिल्ली से बोल रहा हूँ।’’

’’दिल्ली!! तुम दिल्ली में हो इस समय?’’

’’हाँ!’’ उसके हॅसने का स्वर सुनाई दिया।

‘‘राज एक बात पॅूछू? मुझसे ऐसा कौन सा गुनाह हो गया था?’’ अचानक मेरे मन में शिकायत का भाव आ गया -’’तुम चुपके से दिल्ली निकल गये और जाने से पहले एक बार मिलने की कोशिश भी नहीं की? कम से कम फोन पर ही बता दिया होता।’’

“सॉरी यार।’’ पल भर के लिए उसके स्वर में गम्भीरता आ गयी -’’दरअसल, सब कुछ अकस्मात ही हो गया था। शाम को मेरे चचेरे भइया का फोन आया और उन्होंने कहा था- मैं अगली सुबह ही दिल्ली के लिए निकल पड़ूं और जब वहाँ पहुंचा तो पता लगा- भइया मुझे वहाँ हमेशा रहने के लिए बुला लिया है।’’

“और तुमने उनकी बात मान भी लिया? अरे कम से कम अपनी पढ़ाई पूरी कर लेते, फिर चले जाते। दिल्ली थोड़े न कही जाने वाली थी।’’

“नही यार! सच कहॅू तो मेरा मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था- जाने कैसी घुटन सी महसूस होने लगी थी मुझे? और यह बात भइया भी जान चुके थे कि मैं पढ़ने का इरादा छोड़ चुका हूँ। तो उन्होने बुला लिया।’’

“क्या कर रहे हो इस समय वहाँ?’’

‘‘भइया की एक्सपोर्ट कम्पनी है… उसी की जिम्मेदारी आन पड़ी है मुझ पर… वही निभा रहा हूँ।’’

“एक्सपोर्ट कम्पनी तुम्हारी अपनी है?’’ आश्चर्य व्यक्त करते हुए मैंने कहा।

“कह सकते हो।’’ बेहद सधे अंदाज मे उसने कहा।

“फिर तो तुम बड़े आदमी बन चुके हो यार।’’

“हा…हा…हा ।’’ वह जोर से ठहाका मार कर हँस पड़ा -’’कैसी बाते करते हो यार? मैं अब भी वही राज हूँ।’’

उसके साथ साथ मैं भी हॅसने लगा। फिर अचानक कुछ याद आया तो मैं पूँछ पड़ा -’’वैसे राज तुम्हें मेरा फोन नम्बर कहाँ से मिला?’’ 

“शिवानी से मांग लिया था।’’ उसने सीधे कह दिया।

“तब तो सगाई के बारे में भी उसी ने बताया होगा?’’

“हाँ।’’ मेरे यूँ पूछने के आसय को समझा तो वह हँस पड़ा।

दो पिछड़े दोस्तों की अकस्मात मुलाकात इतनी छोटी कैसे हो सकती हम लोग फोन पर लगभग 45 मिनट तक बात करते रहे- उस दौरान मैंने उसे बताया था- कि मेरी सगाई इतनी जल्दबाजी मे हो गयी थी जिस पर किसी को बुला पाना मेरे लिए सम्भव नही हो पाया।

फोन कॉल के आखिरी मिनटों मे फोन करने की मुख्य वजह बताते हुए उसने कहा –“संजू, मैं शिवानी से शादी कर रहा हूँ।’’ 28 जून को हम दोनों की सगाई होनी है और उसमें तुम्हे आना है।’’

“शादी? शिवानी से?’’ मैं चौंक पड़ा।

‘‘शिवानी अच्छी लड़की हैं यार।’’ उसने मेरी हैरानी को पकड़ लिया, बोला -‘‘तुम ऐसे क्यों चौंक रहे हो?’’

‘‘अरे नही यार। मुझे गलत मत समझो। मेरा वह आसय नही था।’’

‘‘मैं मजाक कर रहा था।’’ मेरी सकपकाहट पर वह हँस पड़ा। -‘‘अच्छा सगाई की तारीख मत भूलना, आ जाना।

“ठीक है।’’ मैंने स्वीकार करते हुए कहा -’’उस तारीख पर अगर इम्तिहान न पड़ा तो जरूर आऊंगा।’’

‘‘ओह, इम्तिहान हुआ तो अपने दोस्त की शादी भी छोड़ दोगे?’’

‘‘यार अब हमारे पास तुम्हारी तरह एक्सपोर्ट कम्पनी थोड़े है। शादी कर रहा हूँ, नौकरी नही मिली तो परिवार कैसे पलेगा?’’

‘‘अच्छा।’’ वह हँस पड़ा -‘‘चिन्ता मत करो, इम्तिहान के समय शादी की तारीख नही रखने वालें। रही बात परिवार की तो चिन्ता मत करो तुम्हारे भाई की कम्पनी है। उससे दोनो लोगो के परिवार पल जायेगे।’’

******

मई की चिलचिलाती दोपहर पूरी तरह सबाब में थी हवाओं में अंगारे बरस रहे थे। उस घड़ी अगर हम सड़क पर घूमने का मन बना लें तो सचमुच हमसे पागल और कोई इंसान नही हो सकता। मगर उसी चिलचिलाती धूप मे जलता पिघलता वह सख्स मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। मैं थोड़ी देर तक उसे पहचानने की कोशिश करता रहा। उलझे उलझे बाल, चश्मे के पीछे से झाँ कती थकी थकी आँखें, पसीने से तरबतर चेहरा -‘‘कौन हो सकता है?’’ मैं अभी अपने दिमाग से लड़ ही रहा था कि उसने अपने सूख चुके होंठों पर जीभ घुमाते हुए बोला -‘‘कैसे हैं मिस्टर संजय?’’

उसकी आवाज मेरे कानो से टकराई तो जैसे मेरा दिमाग अचानक जाग उठा हो। मैं दरवाजे से बाहर निकल कर चौंकते हुए बोला -‘‘अरे सुधाकर बाबू, आप! इस वक्त!!’’ मैंने निगाहें इधर-उधर घुमाई, मुझे कोई साधन नही दिखा। शायद वह पैदल चल कर आया था -‘‘आइए आइए… अन्दर आइए।’’ मैंने पूरे सम्मान से उसका स्वागत किया। हालाकि जब वह मेरे कमरे के अंदर घुस रहा था उस वक्त मेरा दिल जोर जोर धड़क रहा था। क्यों? मैं नही जानता।

वह बिना कुछ बोले अन्दर आ गया।

मैं कूलर के सामने कुर्सी लगाता हुआ बोला -’’आप यहां बैठिए, बुरी तरह से पसीने से भीग चुके हैं आप। आपको थोड़ी राहत महसूस होगी।’’

“जी धन्यवाद।’’ उसने मेरी ओर भरपूर निगाहें डाली।

“मैं आपके लिए जलपान का प्रबन्ध करता हूँ।’’

“शुक्रिया!’’ उसके होंठ लहराए -’’इसकी कोई जरूरत नहीं है।’’

मैं रुका नही। चंद क्षणो तक उसकी नजरें मेरा पीछा करती रही। फिर पसीने से गीले हो गये चश्मे को उसने आँखों से उतारा और अपनी रूमाल से साफ करता हुआ बोला -‘‘मिस्टर संजय।’’

मैं ठहर कर उसकी ओकर देखने लगा।

‘‘सच कहॅू तो खातिरदारी मुझे आपकी करनी चाहिए।’’ वह कुर्सी मे बैठते हुए बोला -‘‘आपके पास इतना बड़ा काम जो लेकर आया हूँ।’’

मैं अर्थपूर्ण निगाहों से उसकी ओर देखा -’’कैसा काम?’’

“आइए आप भी बैठिए।’’ सामने पड़ी कुर्सी की ओर संकेत करते हुए उसने कहा।

“जी बिल्कुल।’’ मैंने उसकी निगाहों को परखने की कोशिश की -’’बैठता हूँ।’’ कहकर मैं सामने की आलमारी से कटोरी उठाई, उस पर क्रीम के चंद बिस्कुट रखे और अभी हाल ही मे खरीदी पुरानी फ्रिज से ठण्डी बोतल निकाल कर उसके सामने रख दिया।

‘‘बैठिए।’’ उसने एक बार फिर कहा।

‘‘ठीक है।’’ मैं उसके बग लमे पड़ी दूसरी खाली कुर्सी पर बैठ गया।

सुधाकर थोड़ी देर तक कटोरी पर पड़े बिस्कुट की ओर देखता रहा। फिर मेरी ओर घूमते हुए मुस्कुराया –“मैंने आपको बेवजह तकलीफ दी… है ना मिस्टर संजय?’’

“कैसी बातें करते हैं आप?’’ मैं मुस्कुराया और कटोरी की ओर संकेत करता हुआ बोला -‘‘बिस्कुट लीजिए।’’

‘‘जी बिल्कुल।’’ उसने उठा कर मुँह मे डाल लिया और फिर देर तक उसी बिस्कुट को चबाता हुआ कुछ सोचता रहा।

“सुधाकर बाबू कैसे खाते हैं आप?’’ मैंने हँस कर कहा -‘‘अभी तक एक बिस्कुट भी खत्म नहीं कर पाये।’’

मेरी इस बात पर उसने हॅसने की कोशिश भी की मगर होंठों ने साथ नहीं दिया। उस समय उसके मन मे कोई तूफान है जो अंदर ही अंदर तबाही मचा रहा है।

“आप तो खा ही नहीं रहे हैं।’’ काफी देर बाद उसके होंठ खुले।

“अभी आप किसी काम की बात कर रहे थे?’’ मजबूरन बात मुझे छेड़नी पड़ी।

“वो, हाँ।’’ पानी की गिलास को उठाते हुए वह बोला -’’मिस्टर संजय! जहाँ तक मैं जानता हूँ- आप प्रिया के अच्छे दोस्तों में से एक हैं। है न?’’

“हाँ, आप ऐसा कह सकते हैं।’’ मेरा दिल एक बार फिर धड़क उठा। अब तक मैं समझ चुका था कि जल्दी ही मै प्रिया के साथ की गयी दोस्ती की कीमत चुकाने वाला हॅू। मैंने एक बार फिर अपनी पारखी निगाहों से उसे देखा। सुधाकर ने मुझसे नजरें नही मिलायी।

“क्या आप मुझे बता सकते है कि प्रिया किस लड़के से प्यार करती है?’’ पानी पीने के बाद उसने मेरे सामने सवाल रख दिया। सवाल सुना तो पल भर के लिए लगा कि जैसे मेरे पैरों तले से जमीन खिसकने वाली है। खुद को सम्भालते हुए मैंने कहा -‘‘ये किसने कहा आपसे?’’

‘‘मै जानता हॅू।’’ उसने अपने चश्मे को ऊपर सरकाते हुए बोला -‘‘और इसीलिए आपके पास आया हॅू। प्लीज मुझे निराश मत कीजिएगा।’’

‘‘लेकिन मेरे ही पास क्यों?’’ मैं डरते हुए पॅूछा।

“क्यों कि उसके सारे दोस्तों में से मैं सिर्फ आपको ही जानता हूँ… खुशबू के अलावा।’’ उसने अपने आखिरी शब्दों को कुछ पलों बाद कहा।

‘‘आपने खुशबू से पॅूछा?’’

‘‘नही मिस्टर संजय। मैं कोई तमाशा नही चाहता। वैसे भी लड़किया बातें बहुत देर तक अपने पास नही रख पाती।’’

उस वक्त मैं समझ नही पा रहा था कि मेरे सामने बैठा वह मासूम इंसान, क्या वाकई मासूम है या फिर मेरे साथ कोई खेल खेल रहा है? मैंने एक बार फिर अपनी बिखर चुकी हिम्मत समेटी और हॅसने की कोशिश करते हुए कहा -’’प्रिया आपसे प्यार करती है सुधाकर बाबू…. आपसे।’’

‘‘हा… हा… हा…।’’ वह ठहाका मारकर हॅस पड़ा -’’आपने भी खूब कहा, मिस्टर संजय। प्रिया हमसे प्यार करती है… हमसे?’’ उसके स्वर में अजीब पागलपन था। आँखों मे आँसू छलक आये। उसने पलकें झुका ली, धीरे से बोला -‘‘क्या वाकई आप उस लड़के को नहीं जानते? मुझे सचमुच आपसे बहुत उम्मीद थी।’’ वह उठकर खड़ा हो गया –“उम्मीद थी कि अगर वह मिल गया तो मैं उससे जाकर निवेदन करूगा। शायद वह लड़का मुझ पर तरस खाकर मुझे मेरी जिन्दगी वापस लौटा दे।’’

“अरे बैठिए।’’ उसके रुवासे चेहरे पर मुझे सचमुच तरस आ गया -’’आप इतना परेशान मत होइए।’’

“आप नहीं जानते मिस्टर संजय।’’ कुर्सी में बैठते हुए वह बोला -‘‘प्रिया मुझसे शादी करने से इंकार कर दिया है।’’

“क्या… कब?’’ मेरे पैरो के नीचे से सचमुच जमीन खिसक गयी।

“कल शाम को फोन किया था उसने। और मेरे फोन उठाते ही कहने लगी कि वह किसी और से प्यार करती है इसलिए अब वह मुझसे शादी नही करना चाहती।’’ हालाकि सुधाकर यही नही रुका वह आगे भी कुछ कहता रहा… मगर यह खबर सुनकर मैं पत्थर बन गया। मेरी पथराई आखें उसके हिलते हुए होंठो को देर तक देखती रही मगर कान कुछ नही शुन्य पड़ गयेे। कुछ पलो बाद जब होश सम्भला, तो वह कह रहा था -’’आप सोच रहे होगे कि मैं एक डाक्टर होकर भी प्रिया को पाने के लिए कितना लाचार दिख रहा हूँ। यहाँ  वहाँ  जाकर लोगो से गिड़गिड़ा रहा हॅू… तो यह सच नही है मिस्टर संजय। मेरी पढ़ाई खत्म होने वाली है और जल्दी ही मैं सरकारी डाँक्टर बनने वाला हॅू। आप नही जानते कि एक सरकारी डाँक्टर की तनख्वाह कितनी होती है? मैं चाहूँ तो प्रिया जैसी कितनी लड़कियों को अपना दीवाना बना कर छोड़ सकता हूँ। जिससे चाहू उससे शादी कर सकता हॅू मगर आज आकर ऐसे मोड़ पर खड़ा हो गया हॅू कि कुछ नहीं कर पा रहा हॅू। जानते हैं क्यों?’’ उसने भरी भरी आँखों से मेरी ओर देखा।

मैंने कुछ नही कहा।

‘‘क्योंकि…।’’ वह अपनी बात जारी रखते हुए बोला -‘‘प्रिया के साथ मेरी सगाई हो चुकी है शादी के कार्ड न सिर्फ छप चुके है बल्कि बांटे भी जा चुके है। अब आप ही सोचिए अगर इस समय यह शादी टूटती है तो लोग कैसे कैसे सवाल करेगे मुझसे? और मैं किस किस को जबाव देता फिरूंगा? फिर जबाव भी क्या दूंगा? क्या यह कि मेरी होने वाली बीबी किसी और से प्यार करती है या फिर यह कि वह किसी और के साथ भाग गयी है।’’ कहते कहते उसने एक लम्बी सांस भरी -‘‘लोग हॅसी उड़ायेगे मेरी।’’ एकबार फिर उसकी आँखें छलछला पड़ी। उसने उन्हे छुपाने की कोशिश मे पलके झुका लिया।

“मैं प्रिया को समझाने की कोशिश करूंगा?’’

“आप! आप समझा सकते हैं उसे?’’ एकाएक उसने पलके उठायी तो पानी की चंद बॅूदें लुढ़कती हुई उसके गालो पर छितरा गयी। उसने उन्हे छुपाने की कोशिश नही की। खड़ा होते हुए बोला –“आप ही समझाइए उसे। वह आपकी दोस्त है…. अच्छी दोस्त। आपकी बात पर जरूर मानेगी।’’ कहते हुए वह बिना मेरी ओर देखे हुए तेजी से दरवाजे की ओर पलटा और बाहर निकल कर गली की भीड़ मे कही खो गया।

******

सुधाकर के जाते ही मैंने थके मन से दरवाजा बन्द किया और बिस्तर पर औंधे मुह लेट गया। उस समय मेरे दिल और दिमाग मे कितना तूफान था उसे मेरे अलावा शायद ही कोई नही देख पाता शिवाए मेरी माँ के। सच कहॅू तो उस वक्त मैं अपनी माँ को बहुत मिस कर रहा था। काश! वह जिन्दा होती।

अचानक मेरी निगाह बिस्तर पर पड़े मोबाइल पर पड़ी तो पता नही क्या सोचा? मैं उठकर बैठ गया। मोबाइल को उठाया और नम्बर डायल कर दिया।

फोन लग गया-

लाइन पर कोई और था- मैंने उससे प्रिया को बुलाने को कहा। वह आ गयी।

“प्रिया मेरे घर आ सकती हो?’’ मैंने पूछा।

“कब?’’

“आज… अभी।’’

“नहीं संजय!’’ उसने रूखे स्वर मे कहा -’’मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इस समय मैं कहीं भी आने जाने की स्थिति मे नही हॅू।

“तो मैं आ जाऊँ?’’

“नहीं… नहीं!’’ अकस्मात ही वह घबड़ा गयी –“तुम यहाँ मत आओ… मेरे भाई को तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगेगा।’’

“क्यों? अब तो तुम्हारी शादी भी तय हो गयी है फिर भी?’’

“हाँ फिर भी।’’

“ठीक है… चलो नही आते। तुम कालेज कब आओगी?’’

“कोई निश्चित नहीं है… अगर तबियत ठीक हो गयी तो जरूर आऊंगी।’’

“वैसे, तुम्हें हुआ क्या है?’’

“तुम नहीं समझोगे संजय…. यह औरतों की निजी बात है।’’

“क्या नहीं समझूंगा प्रिया? क्या निजी बात है तुम्हारी?’’ एकाएक मैं भड़क उठा।

“संजय, हम पर गुस्सा मत करो।’’ अचानक उसका गला रुँध गया –“सच बताऊं तो मुझे खुद नहीं मालूम कि मुझे क्या हुआ है।’’

“कुछ नहीं हुआ तुम्हें।’’ मेरे स्वर का कम्पन्न और भी बढ़ गया –“नौटंकी कर रही हो तुम…हर किसी से अपनी बात मनवा लेने का अच्छा तरीका है यह तुम्हारा।’’

“संजय… चलो यही सही।’’ सहसा वह सिसक पड़ी -‘‘हम तुम्हें मना भी नहीं कर सकते ऐसा सोचने से।’’

मैं खामोश हो गया, मेरे पास और कुछ नही था कहने के लिए । मैं मोबाइल को देर तक कान पर इस उम्मीद मे लगाये रखा कि वह कुछ कहेगी।

‘‘अच्छा फोन रखूं?’’ थोड़ी देर बाद धीरे से उसने कहा।

“बेशक रख सकती हो।’’ मैं एकाएक उबल पड़ा -‘‘मैं कौन होता हूँ तुम्हें रोकने वाला। तुम तो वही करोगी न जो तुम चाहोगी। कोई क्या सोचता? क्यों सोचता है? इससे तो तुम्हे कोई फर्क पड़ता नही… है न प्रिया?’’

“संजय!’’ वह रो पड़ी -‘‘आती हॅू…. बोलो कहाँ आना है?’’

“कहीं भी?’’

“अपने घर में ही रूको मैं आ रही हूँ।’’

******

उस दिन मेरी बेसब्री कुछ ऐसी थी कि मैंने दरवाजा खुला छोड़ दिया। दरवाजे पर बस पर्दा टॅगा रहा। जो पंखे की हवा मे लहरा रहा था। प्रिया के आने में 20 मिनट से ज्यादा वक्त नहीं लगने वाला।

मेरी निगाहें… दीवार पर लगी घड़ी पर टिकी रही। जो टिक् टिक् करती हुई दौड़ रही थी।

तभी-

एकाएक पर्दे पर मुझे एक परछाई नजर आयी। मैं बिस्तर से उठ कर बैठ गया।

“प्रिया।’’ उसने जैसे ही परदे को सामने से हटाया मेरी भरपूर निगाहें पड़ी उसके चेहरे पर। मेरे दिल की धड़कने जैसे एकाएक ठहर गयी हो। सूखे होंठ, धूमिल सा चेहरा, उलझे-उलझे बाल, पूरी तरह से तबाह कर चुके थे उसकी खुबसूरती को।

उसका ये हाल देख कर मेरा गुस्सा एकाएक हवा मे उड़ गया। जी मे आया चीख चीख कर रो पडॅ़ू। मैंने खुद को सम्भाला।

वह डगमगाते कदमो से चलती हुई मेरे बिस्तर से करीब डेढ़ मीटर की दूरी पर आकर ठहर गयी। बिल्कुल खामोश! झुकी हुई पलकें। मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा- आज उसके बदन में वैसे कपड़े नही थे जिन्हें मैं वर्षों से देखता आया हॅू। वह सिर से पांव तक एक साधारण सी दिखने वाली लिबास से ढकी हुई थी। महज 5-7 दिनो मे वह इतनी बदल जायेगी यह मेरे लिए यकीन करना मुस्किल था।

“आओ बैठो।’’ बिस्तर में किनारे की ओर सरकते हुए मैंने कहा।

उसने झुकी झुकी निगाहो से मेरे चेहरे की ओर देखा। फिर धीरे से बोली –किसलिए बुलाए हो?’’

“बैठो तो।’’ मैंने मुस्कुरा कर कहा।

“हमें खड़ा ही रहने दो संजय। हमारा स्थान यहीं हैं। इसी के काबिल हैं हम।’’

“प्रिया।’’ मैं सिहर उठा -‘‘ये क्या पागलपन है?’’

“ठीक ही तो कह रहें हैं। तुम्हें बुरा क्यों लग रहा है? अच्छा तुम्हीं बताओ और कहाँ है हमारा स्थान।’’

“यहाँ मेरे करीब!’’ मैं बिस्तर पर हाँथ ठोकते हुए बोला।

’’चलो चलो। अब रहने भी दो… और एहसान अब मत करो हम पर। संजय तुम्हारे एहसानो का हम और बोझ उठा नहीं पायेंगें। सीधा बताओ- किसलिए बुलाए हो हमें?’’ उसके स्वर में पीड़ा और आक्रोश का मिला जुला भाव था।

“प्रिया, क्या तुम रास्ते भर यही सोचती आयी हो कि जाते ही टूट पड़ेंगें संजय पर।’’

“हम तुम पर टूट रहे हैं? कहां टूट रहे हैं हम तुम पर संजय?’’ एकाएक उसके स्वर मे पीड़ा घुल गयी, रुवासी आवाज मे बोली –“नहीं टूट रहे हैं हम तुम पर।’’

‘‘तो ये क्या था?’’ मैंने उसे बहलाने की कोशिश की।

‘‘हम तो बस ये चाह रहे थे कि सिर्फ मुद्दे पर बात करें। बेवजह इधर उधर की बातें हमें पीड़ा देती है, जिसे अब और सह पाना हमारे लिए मुमकिन नही है। वैसे भी हमारी तबियत आज कल ठीक नहीं रहती है।

“ठीक है, नहीं करते इधर उधर की बातें, मगर तुम बैठ तो सकती हो।’’ वह खामोश नजरों से मेरी ओर देखने लगी –“या मैं ही खड़ा हो जाऊॅ?’’ मैंने कहा।

“नहीं… नहीं रहने दो। तुम खुद को तकलीफ मत दो- अच्छा बताओ हम कहाँ बैठे जिससे तुम्हें तसल्ली हो। यहाँ?’’ कहते हुए वह कुर्सी की ओर लपकी।

“यहाँ? इधर मेरे पास, बिस्तर पर बैठो।’’

“लो बैठ गये।’’ वह पलटी और धम्म से मेरे बगल मे बिस्तर पर बैठ गयी -‘‘हो गयी तसल्ली?’ अब बोलो?’’

मैं कुछ देर तक खामोश निगाहों से उसे देखता रहा। वह शरमा गयी। होंठों पर रूखी मुस्कान लिए हुए बोली -‘‘अब बोलोगे भी या फिर यॅू ही हमारे चेहरे की ओर ताकते रहोगे?’’

किसी बात को कब और किस तरीके शुरू करनी चाहिए इस काम मे मुझे महारथ हासिल थी। मैं देर तक उसके अन्दर हो रही उथल-पुथल को देखता रहा… सोचता रहा… समझता रहा। जब मुझे पूरी तरह से तसल्ली हुई तो मैंने उसे पुकारा –“प्रिया।’’

‘‘हॅू।’’

“हमने सगाई कर ली है।’’

“जानती हूँ।’’

“बधाई नहीं दोगी।’’ मैं जरा हँस कर बोला।

“तुमने मौका दिया है इसके लिए? सगाई मे बुलाया तक नही हमें। फोन पर तुमने बताया तो हमने भी फोन पर बधाई देदी। याद है न तुम्हे?’’

‘’हाँ याद है?’’ मैंने उसकी ओर देखा।

‘‘और सगाई मे बुलाया क्यों नही।’’

“खुशबू ने मना कर दिया था।’’

“क्यों?’’ वह घूर कर देखी मेरी ओर -’’हम कहीं उसकी सौतन न बन जाएं, वह इस बात से डर रही थी?’’

“नहीं! दरअसल उसका ख्याल था कि जब हमने किसी को नहीं बुलाया तो…।’’

“तो मुझे क्यों बुलाएंगें?’’ उसने मेरी बात बीच में ही काट दी -’’संजय उसने तुम्हें तो बुला लिया ना?’’

मैं चुप हो गया। मैं उसे और नही उकसाना चाहता था।

थोड़ी देर तक वहाँ खामोशी छायी रही। फिर एकाएक मेरी निगाहें उछलती कूदती हुई प्रिया के बदन जा पड़ी –“प्रिया!’’ मैं कुछ कहना चाहा, उससे पहले वह उसी हाल में पलके झुकाए हुए बोली- ’’इस ड्रेस को मेरे भाई ने मेरे जन्म दिन पर दिया था।’’

मैं चौंक पड़ा। उसे कैसे मालूम कि मैं उसकी ड्रेस का जिक्र करने वाला हूँ। मैंने हॅसने की कोशिश करते हुए कहा –“बहुत अच्छी लगती है तुम पर। तुम अब ऐसे ही कपड़ा पहना करो।’’

“हम जान सकते हैं कि हमें किस रिश्ते से यह सलाह दी जा रही है?’’ एकाएक उसकी अर्थपूर्ण निगाहें उछलकर मेरे चेहरे पर टिक गयी।

जिसे वह इतनी सहजता से पूछ गयी, वह सचमुच मेरे लिए बेहद मुस्किल सवाल था। मैं क्या जवाब दॅू, अभी सोच ही रहा था कि वह धीरे से हँस पडी –“हमारी बात का बुरा मान गये क्या? अरे हम तो यूँ ही पूछ लिए थे।’’

“नहीं तो।’’ मैंने भी मुस्करा दिया।

उस पल प्रिया का मुस्कराना, अपनी गलती पर खेद जाहिर करना, मेरे लिए सकून की बात थी। मुझे यकीन हो गया कि अब मैं मुद्दे की बात कर सकता हॅू।

“प्रिया।’’ मैंने धीरे से कहा।’’

“हूँ।’’

“तुमने कल शाम को सुधाकर को फोन किया था?’’

“हाँ।’’

“तुमने कुछ कहा था उनसे?’’

“हाँ… हमने कहा था कि हम आपसे शादी नहीं करना चाहते।’’ कहते हुए वह एकाएक पलटी मेरी ओर -‘‘मगर संजय हमारा इरादा ऐसा बिल्कुल नहीं है। हम शादी सुधाकर से करेंगें… करेंगें हम शादी।’’ एकाएक उसकी आवाज रूवांसी हो गयी।

“वो आज हमारे पास आये थे।’’ मैंने कहा।

“यहाँ आये थे? दिल्ली से?’’ एकाएक वह चौंक पड़ी।

“हाँ, बहुत दुःखी थे। तुम्हें इस तरह उनका दिल नहीं दुखाना चाहिए था।’’

“हाँ, हम जानते हैं संजय कि हमने गलत किया मगर क्या करते? उस वक्त हम इतना रो लिए थे कि हमारा दिमाग अस्थिर हो गया था। हम समझ नहीं पा रहे थे कि हमें क्या करना चाहिए? हमारे बगल मे ही फोन रखा हुआ था- हमने लगा दिया। मगर संजय।’’ उसकी आंखों में आसूं तैर पड़े। बच्चे की तरह शिकायत करते हुए बोली –“उन्होंने भी तो हमारा दिल दुखाया था। हमने उनसे कहा था कि हम इस समय इलाहाबाद में नहीं रहना चाहते। ये शहर हमें काटने को दौड़ता है। हमें आकर दिल्ली ले जाओ मगर वह माने ही नहीं। कहने लगे- शादी से पहले ऐसा ठीक नहीं है।’’

“ठीक ही तो कहा था उन्होंने। तुम बेवजह उनकी बात का बुरा मान गयी।’’

“अच्छा तो तुम भी उन्हीं का पक्ष लेने लगे?’’ वह सिसक उठी -‘‘कोई हमारा पक्ष क्यों नहीं लेता? क्या सचमुच हम इतने बुरे हैं? इतनी बुरी सोच रखते हैं हम?’’

“प्रिया।’’ उसकी पीड़ा पर मैं भी रुवासा हो गया। उसके हाँथको अपनी हथेली में भरते हुए बोला -‘‘तुम बुरी नहीं हो प्रिया। तुम बहुत अच्छी हो… बहुत अच्छी। कौन कहता है तुम्हारी सोच बुरी है? हम तो कहते हैं तुम्हारे इरादे… तुम्हारी सोच सब बहुत अच्छे है… बहुत अच्छे।’’

“चलो… चलो बस करो संजय। अब इतना भी अच्छा मत बना दो हमें कि हमारे पांव जमीं पर ही न पड़े। हवा में उड़ने लगे। हम जानते हैं तुम झूठ बोल रहे हो। अब बच्चे नही हैं हम।’’

“प्रिया, चाँद को चाँद कहना, झूठ बोलना नही होता है।’’

“संजय, कम से कम अब तो द्विअर्थी बाते करना छोड़ दो।’’ उसके स्वर में वेदना ठूस-ठूस कर भरी हुई थी –“तुम जानते हो हम तुम्हारी इन्ही बातों का अर्थ अपने ढंग से निकालना शुरू कर देते हैं। जबकि हमने हर बार एहसास किया हैं कि अक्सर तुमने कुछ और कहा होता है फिर जब हम तुम्हारा अभिप्राय समझ पाते हैं तो… हमे दुःखी होना पड़ता है। बहुत रो लिए हम। अब तुम और मत रूलाओ।’’

“प्रिया, हम तुम्हें कब रूलाते हैं।’’ मैं तड़प उठा।

“अभी हम कहेंगें तो फिर तुम कहोगे कि हम ऐसा कहते हैं- संजय जब हम तुम्हें दोस्त समझते थे तुम्हें प्यार नहीं करते थे तब तुम्हें शिकायत थी कि हम तुम्हें प्यार नहीं करते। और फिर जब करने लगे तो तुमने…।’’ वह एकाएक रो पड़ी –“क्या किया तुमने… बताओ संजय। तुमने मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिय हमें अपनी जिन्दगी से। अब इससे भी ज्यादा और कुछ करने का इरादा था क्या तुम्हारा?’’

उस पल मुझे ऐसा लगा कि मैं अभी सारी रश्में… सारे बंधन तोड़ कर रख दूँ । मैं तेजी से बिस्तर से उठा और सामने बनी आलमारियों मे कुछ ढूंढ रहा था। मुझे कुछ न मिला तो लौट कर एक बार फिर बिस्तर पर बैठ गया।

प्रिया की निगाहें एकटक मुझ पर टिकी रही। वह एकाएक मेरे यूं खड़े हो जाने पर घबड़ाई हुई थी।

“प्रिया।’’ मैंने पुकारा तो एकाएक बच्चों सी बिलखती हुई झपटकर मुझसे चिपक गयी। मैं उसके सर पर हाँथफेरते हुए कहा –“पिछले कुछ दिनो मे बने हालात के सामने मैं सचमुच बहुत मजबूर हॅू।’’

“हम भी बहुत मजबूर हैं संजय… अपने दिल से। सच कहें तो, हम जरा भी नहीं चाहते कि हमें तुमसे प्यार हो मगर पता नहीं क्यों? हम खुद को रोक ही नहीं पाते। हर बार तुम्हारी ओर खिंचते चले आते हैं। हम आँखें बन्द करते हैं तो तुम… खोलते हैं तो तुम। दिन रात हमारी आँखों के इर्द गिर्द बस तुम ही तुम रहते हो तो बताओ हम क्या करें? तुमसे कैसे पीछा छुड़ाए? क्या तुम मानोगे संजय कि तुमसे पीछा छुड़ाने के लिए हम अक्सर सुधाकर को याद करने की कोशिश करते हैं मगर पता नही क्यों? उसकी जगह आँखों में तुम झिलमिला पड़ते हो।’’

“लेकिन प्रिया अब ऐसे खयाल ठीक भी तो नहीं हैं। तुम्हारी सगाई हो चुकी है सुधाकर से।’’

“हम जानते हैं कि हम बुरा कर रहे हैं मगर तुम्ही बताओ क्या करे हम? कैसे करे? कैसे दूर जाये तुम्हारी यादों से?’’ उसका चेहरा पूरी तरह से आँ सुओं से भीग गया -’’अब देखो न।’’ वह अपनी बात जारी रखते हुए बोली- अक्सर क्या होता है? क्या यह नहीं है कि लोग दिल के जरिए जिस्म तक पहुँचतेहैं परन्तु तुम? तुम तो जिस्म के जरिए दिल तक आ गये।’’

“प्रिया, ये क्या पागलपन की बातें है?’’ मैं उस बात को वहीं थाम लेना चाहा।

“सच को सच कहने में क्या बुराई है संजय? जो सच है हम वही तो कह रहे हैं।’’ सहसा उसके स्वर में तीखपन आ गया। फिर अचानक रो कर कहने लगी -‘‘संजय तुम सुधाकर को कह दो कि वह जल्दी से हमसे शादी कर लें। हम उनके साथ दिल्ली चले जायेगे। और तुम भी शादी कर लो जिससे तुम्हे याद करने के सारे दरवाजे बन्द हो जाएं हमारे लिए।

“और अगर तब भी याद आये हम तो?’’

“कैसे याद आओगे?’’ अकस्मात ही उसके आँशुओ से भीगे चेहरे पर अल्हड़पन आ गया, बोली -’’हम सुधाकर से कह देंगें कि हमें जल्दी से ढ़ेर सारे बच्चे पैदा करने हैं फिर तो हम उन्हीं में व्यस्त हो जायेंगें तुम्हें याद करने का समय ही नहीं रहेगा हमारे पास।’’

“इरादा अच्छा है।’’ मैंने कहा।

******

वक्त तेजी से गुजर रहा था। पढ़ाई, परीक्षाएं और फिर शादी की तिथियाँ । शादी से पहले एक दिन अचानक मेरे पापा मेरे कमरे पर आ धमके। उन्हे अपने सामने पाकर मैं हैरान था। सालो बाद आज मैंने उन्हे देखा था। एक दो बार उन्होने मुझे फोन जरूर किया था मगर मैंने उनसे कुछ ज्यादा बात नही किया। मैं उनसे बहुत नाराज था। उन्होने मेरी मम्मी को बहुत तकलीफ दी थी। माँ की अंतिम यात्रा मे भी वह अपना व्यवसाय छोड़ कर नही आ पाये।

मैं बिस्तर से उठ कर खडा़ हो गया। वह मेरी माँ के अच्छे पति कभी नही बन पाये मगर थे तो मेरे पापा। मुझे अभिवादन मे उनके पैर छूना चाहिए था मगर नफरत इतनी थी कि मैं चाह कर भी उनके सामने झुक नही पाया।

‘‘अंदर आने के लिए भी नही कहोगे?’’ वह दरवाजे पर ही खड़े रहे -‘‘तुम्हारी शादी होने वाली है। बड़े हो गये हो तुम। तुमसे इतने शिष्टाचार की तो उम्मीद कर ही सकता हॅू।’’

‘‘आप यहाँ तक आ गये है… तो कुर्सी तक भी आ सकते हैं।’’ मैंने अपनी नफरत नही छोड़ी।

‘‘तो तुम अब भी नाराज हो मुझसे? वे कुर्सी पर बैठते हुए बोले -‘‘तुम्हारी माँ को गुजरे हुए सालो हो गये… कब तक उन पुरानी गलतियो के लिए मुझे जलील करते रहोगे?’’

‘‘पता नही।’’ मुँह फेरते हुए मैंने कहा।

वह थोड़ी देर तक मेरी ओर देखते रहे फिर कमरे मे इधर उधर नजर दौड़ाते हुए बोले -‘‘तुम्हे इस कमरे मे घुटन नही होती?’’

‘‘ये सब आप क्यों पॅूछ रहे हैं?’’

‘‘मुझे तो हो रही है।’’

‘‘मुझे नही होती।’’

‘‘तो शादी यही से करोगे?’’

‘‘नही… मैं एक नया घर किराये पर खोज रहा हॅू।’’

‘‘और पापा? क्या उसे भी किराये पर खोज रहे हो?’’

मैंने अर्थपूर्ण निगाहों से उनकी ओर देखा। उनकी आँखों मे अथाह सूनापन था। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोले -‘‘अच्छा ये बताओ- रिक्सा मैं बुलाऊँ या तुम बुलाओगे?’’

‘‘रिक्सा! क्यो?’’

‘‘तुम अभी घर चल रहे हो।’’ अचानक उनका स्वर सख्त हो गया –“तुम्हारा अपना घर तुम्हारा इन्तजार कर रहा है और हाँ, तुम्हारी शादी भी वही से होने वाली है।’’

‘‘नही, मै नही जा पाऊॅगा, मुझे मजबूर मत करिये।’’

‘‘तो मैं ही यहाँ ठहर जाता हॅू।’’

‘‘उसकी जरूरत नही है। इतनी हमदर्दी आपको मेरी माँ के साथ दिखानी चाहिए थीं।’’

‘‘ओफ्फोह।’’ वह अचानक भड़क उठे -‘‘संजय तुम कब तक गुजरे हुए कल को अपने सर पर ढ़ोते रहोगे? मैं लाख बुरा सही मगर तुम्हारी मर्जी के खिलाफ मैंने तुम्हे अपने पास आने के लिए कभी मजबूर नही किया। तुम हमेशा कहते रहे कि तुम्हे मेरी शक्ल पसन्द नही है… मैंने तुम्हे कभी अपनी शक्ल नही दिखाई। लेकिन संजय अब शादी कर रहे हो तुम और मैं तुम्हारा बाप हॅू। मेरे भी अपने कुछ अरमान है।’’ एकाएक उनके स्वर मे लाचारी छा गयी -‘‘तुम्हारे सामने गिड़गिड़ा रहा हॅू, माँ फी मांग रहा हॅू… अब तुम चाहते हो कि तुम्हारे पैर छुऊॅ तो वह भी कर सकता हॅू… बोलो।’’

फिर वह देर तक कुछ कहते रहे और मैं बिना किसी सवाल जवाब के सुनता रहा। अचानक मेरी निगाह उनकी आँखों पर गयी तो मैं तड़प उठा। वो आँ शुओ से भरी हुई थी। मैं खुद को रोक नही पाया, झपट कर उनके सीने से चिपक गया -‘‘पापा’’ दर्द के मारे मेरे मुँह से चीख निकल गयीं।

पापा मेरा और मेरी पढ़ाई का खर्च उठा रहे थे इससे ज्यादा हम लोगो के बीच और कोई संबन्ध नही था। इतने सालों मे न वह कभी मुझसे मिलने आये न मैंने कोशिश की। शायद इसलिए कि माँ की करीबी मुझे कभी उनके करीब नही जाने दिया।

उनके आँसू देर तक मेरे कंधें को भिगोते रहे।

******

जार्जटाउन के अपने घर मे घुसने से पहले मैं जी भर के उसे देख लेना चाहता था। दूधिया रंग मे रंगा हुआ वह घर मेरी माँ की जिन्दगी की कीमत पर बनाया गया था। पापा अपने व्यवसाय मे इतना व्यस्त थे कि वे मेरी माँ को फुरसत के चार पल भी कभी नही दे पाये। माँ  की बीमारी से लेकर उनकी मौत तक पापा एक बार भी घर नही लौटे। माँ  अपनी आखिरी सांस के वक्त भी पापा को देख नही पायी।

मैं अपने किराये के घर से कम्पनी बाग जाते वक्त अक्सर यही से गुजरा करता था मगर इस घर की ओर कभी नही देखा।

‘‘वही दरवाजे पर खड़े रहोगे?’’ एकाएक पापा ने आवाज दी।

‘‘आ रहा हॅू।’’ मैं सकुचाते हुए आगे बढ़ गया।

‘‘इस घर को बनाते बनाते मैंने बहुत कुछ खोया हैं।’’ उन्होने मेरी ओर देखा -‘‘‘शायद इतना कि उसका बोझ मैं अपने कंधे से जिन्दगी भर नही उतार पाऊॅगा। मगर क्या तुम जानते हो कि ये कुण्ठा मेरे अंदर आयी कैसे?’’

उन्होने नजरें झुका ली। मैं उनकी ओर देखने लगा। उनकी आँखें भर आयी थी। मेरे कंधे पर हाँथ रखते हुए उन्होने कहा -‘‘जब तुम पैदा हुए थे उस वक्त हम लोग सोहबतियाबाग में एक किराये के घर पर रहते थे। तुम कोई 2-3 महीने के रहे होंगे, तुम्हारे मुँह के अंदर छाले आ गये थे। उस दिन तुम सारी रात रोते रहे। मुझे अच्छे से याद नही है पर शायद रात के 2 या 3 बजा रहा होगा। माकान मालकिन ने दरवाजा खटखटाया। मैंने खोल दिया। मेरे दरवाजा खोंलते ही वह हम पर बरस पड़ी। कहने लगी -मेरी बहू पेट से है, और तुम्हारे बच्चे के रोने के चक्कर मे वह सो नही पा रही है। संजय क्या तुम यकीन करोगे?’’ उन्होने एक बार फिर मेरी ओर देखा -‘‘आधी रात को वह औरत हमे सुबह ही कमरा खाली कर देने का हुक्म सुना कर चली गयी और…।’’ अचानक उनके आँ खो से पानी छलक पड़ा। रुधे हुए स्वर मे बोले -‘‘हमे सुबह ही कमरा खाली करना पड़ा। उस दिन मैं ने एक बात और सीखी कि आप दूसरो के घर मे थोड़ा बहुत हँस तो सकते है मगर रोने के लिए आपको अपना ही घर चाहिए।’’

मैं अवाक पापा की ओर देखता रहा। शायद वो अपनी सफाई देने से ज्यादा मुझे जिन्दगी के बेरहम चेहरे के बारे मे बताने की कोशिश कर रहे थे। मेरी आँ खे छलछला पड़ी। माँ ने मुझसे इस घटना के बारे मे कभी जिक्र नही किया था।

‘‘तुम्हारी माँ को अपने 3 महीने के बच्चे के साथ पूरे दो रातें और तीन दिन इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गुजारनी पड़ी।’’ अपनी बात जारी रखते हुए उन्होने कहा -‘‘मैं सारा दिन पागलो सा पैसे और कमरे के इन्तजाम में यहाँ वहाँ भटकता रहा। तीसरे दिन शाम को जाकर मैं तुम दोनो के लिए एक कमरे का इन्तजाम कर पाया। नया कमरा कुछ खास नही था मगर तुम्हारी माँ  देर तक भरी भरी आँखों से उन दीवारो को घूरती रही। पता नही क्यों?’’

‘‘पापा…।’’ मेरा दिल फट पड़ा।

‘‘उस वक्त पहली बार मुझे घर और पैसे की कीमत समझ आयी। इससे पहले मैं पैसे को सिर्फ जीवन गुजारने का साधन ही समझ रहा था लेकिन उस दिन समझ आया कि पैसा साधन नही दरअसल यह खुद अपने आप मे एक जिन्दगी है। और उसके बाद जब मैं पैसे कमाने के लिए घर से निकला तो चलते चलते इतनी दूर चला गया कि वक्त पर लौटना मुस्किल हो गया। तुम्हारी माँ की चिता को मैं आग भी नही दे पाया। जानते हो न।’’

‘‘सॉरी पापा।’’ मैं झपट कर उनसे चिपक गया।

‘‘जानते हो संजय।’’ उन्होने मेरी पीठ पर हाँथ फेरते हुए कहा -‘‘जिन्दगी मे मैंने बहुत सघर्ष झेला है। समस्याये भी बहुत आयी मगर उस वक्त हर बार मेरी आँखों के सामने तुम्हारे बचपन का रोता हुआ चेहरा आ जाया करता था। और उसने मुझे कभी हारने नही दिया। मैंने एक बात दिल पर ठान ली थी कि मेरा बेटा भले ही गरीबी और अभाव मे पैदा हुआ हो मगर मैं उसे गरीबी जीने नही दॅूगा।’’

‘‘साहब, चाय।’’ एकाएक एक अधेड़ उम्र का इंसान हाँथ मे चाय की प्लेट थामे हुए आकर हमारे सामने खड़ा हो गया।

‘‘चलो चाय पीते हैं।’’ पापा ने मुझे खुद से अलग करते हुए कहा।

मैं अपने आँ शुओ को पोछता हुआ उनके पीछे पीछे चल दिया।

******

उस रात जब मैं अपने बेडरूम पहुँ चा तो आँखें चैधियां गयी। वह कमरा मेरे किराये के कमरे से लगभग 4 गुना बड़ा था जिसे कीमती समानो से सजाया गया था। खूबसूरत बेड, मखमली बिस्तर, खिड़की से सटी हुई स्टडी टेबल और दूसरे किनारे पर लगा 3 सीट वाले सोफे ने कमरे की सजावट पर जान भर दी थी। मैं थोड़ी देर तक चारो तरफ ऐसे घूरता रहा जैसे मैं किसी अजनवी के बेडरूम पर घुस आया हॅू। मैं चलता हुआ खिड़की के पास पहुच गया। खिड़की पर लगे परदे चमचमा रहे थे। मैं थोड़ी देर तक उन्हे अपनी उॅगलियों से महसूस करता रहा फिर एकाएक उन्हे किनारे की तरफ सरकाते हुए खिड़की के सामने खड़ा हो गया। मेरी नजरे खिड़की के नीचे से गुजर रही सड़क पर ठहर गयी।

‘‘कैसा लगा तुम्हे अपना बेडरूम?’’ अचानक पीछे से आवाज आयी। मैं मुड़ कर पीछे देखा। दरवाजे पर पापा खड़े थे।

‘‘पापा आप?’’

‘‘कैसा लगा?’’

‘‘अच्छा है।’’

‘‘बस अच्छा है?’’ वह आकर मेरे साथ ही खिड़की के सामने खड़े हो गये, मुस्कुरा कर बोले -‘‘मैं खुद खड़ा होकर इसे तैयार करवाया हॅू… तुम्हारे लिए।’’

‘‘नही, सचमुच अच्छा है।’’

‘‘चलो अच्छा लगा, ये जान कर कि मेरा गिफ्ट तुम्हे पसन्द आया। वैसे तुमने ये तश्बीर देखी?’’ उन्होने बेड के ठीक ऊपर लगी तश्बीर की ओर इसारा किया। मैंने पलट कर देखा। तश्बीर पर एक औरत एक नवजात शिशु को गोदी मे लिये हुए बैठी थी -‘‘ये तुम हो अपनी माँ के साथ।’’

‘‘क्या?’’ मैं चौंक पड़ा -‘‘लेकिन इसमे तो माँ पहचान मे नही आ रही है?’’

‘‘यह तश्बीर इलाहाबाद रेलवे स्टेशन की है, अखबार मे छपी थी। मैंने उस अखबार को अब तक सम्भाल कर रखा हुआ था। अभी कुछ दिन पहले ही मैंने उसे एक फोटो स्टूडियो को देकर बड़े साइज मे बनवा लिया है।’’

मैं एक बार फिर पापा की ओर देखा। उनकी निगाहें एकटक उस तश्बीर पर टिकी रही।

‘‘अक्सर लोग कहते है कि बुरे वक्त को भुला देना चाहिए।’’ पापा ने मेरी ओर देखा -‘‘तुम क्या कहते हो?’’

‘‘पता नही।’’ मैंने अपना सर हिलाते हुए कहा।

‘‘मेरा मानना है कि उसे फ्रेम मे मढ़वा कर बेडरूम मे सजा लेना चाहिए।’’

‘‘लेकिन ऐसा करने पर वह आपको जिन्दगी भर चुभेगा नही?’’ मैंने पूछा

‘‘नही। वह धीरे धीरे करके आपके अंदर की चुभन को कम कर देगा। आप जरा जरा सी बात पर रोने की बजाए उससे लड़ना सीख जाओगे।’’

पापा जो कभी मेरी नजर मे सबसे बड़े खलनायक थे जिन्हे मैंने हमेशा माँ की नजरों से देखा था आज जब मैं उन्हे अपनी नजरों से देख रहा हॅू तो स्तब्ध हॅू। वे कितनी सरलता से मेरे सामने जिन्दगी के एक एक पन्ने को खोल कर मुझे समझाते जा रहे थे।

‘‘पापा एक बात कहॅू आपसे।’’

‘‘बोलो।’’ 

‘‘आप मेरे हीरो हो।’’

‘‘क्यो?’’ वह हँस पड़े।

‘‘मैं बहुतो को जानता हॅू जो बहुत पढ़े लिखे है मगर वह अपनी जिन्दगी मे कभी सफल नही हो पाये। आपके पास कोई डिग्री नही है वावजूद इसके आप अपनी जिन्दगी मे इतने सफल है।’’

‘‘संजय।’’ उन्होने भरपूर निगाह से मेरी ओर देखा -‘‘दरअसल डिग्री का न होना फायदेमन्द होता है। अगर आप इंजीनियर या डाँक्टर है तो आप एक ही काम कर सकते है लेकिन अगर आपके पास कोई डिग्री नही है तो आप कुछ भी कर सकते हैं।’’

‘‘ओह!’’ मेरा मुँह फैल गया।

‘‘बहुत समय हो गया।’’ उन्होने घड़ी की ओर देखते हुए कहा -‘‘मुझे चलना चाहिए। तुम आराम करो।’’

‘‘जी पापा।’’ मैं बिस्तर की ओर बढ़ा।

फिर अचानक उन्हे कुछ याद आया वो जाते जाते दरवाजे के पास ठहर गये। बालकनी के दाहिने तरफ इसारा करते हुए बोले -‘‘बाथरूम यही बना हुआ है। सीढ़ियो पर अंधेरा है। और हाँ अगर उतरना ही हो तो सीढ़ियो की स्विच आँ न कर लेना।’’

‘‘ठीक है।’’ मैं बिस्तर पर औंधे मुँह कूद पड़ा।

******

सुबह के लगभग साढ़े दश बजा रहा होगा। पापा ऑफिस जा चुके थे। मैं घर पर अकेला था। रसोई और घर की सफाई का काम सम्भालने वाले राजू चाचा पापा के किसी काम से बाहर गये हुए थे। मैं खाली था इसलिए जाकर अपने बेडरूम मे लेट गया -‘‘अपनी शादी में क्या-क्या करूंगा, किस किस को बुलाऊंगा? प्रिया को सुधाकर बाबू भेजेंगें भी कि नहीं… क्या खुशबू को भायेगा प्रिया का आना? और राज? उसकी शादी मे तो मैं पहॅुच भी नही पाया था। किसन? वह तो मेरा यार है, शादी की जिम्मेदारियां तो वही सम्भालने वाला है लेकिन पापा?’’ ऐसे बहुत सारे सवाल मेरे दिमाग मे उथल पुथल मचाए हुए थे कि एकाएक घर की डोरवेल चिल्ला उठी।

‘कौन हो सकता है?’ सोचते हुए मैं बाँलकनी की ओर बढ़ा। गेट पर खाकी कपड़ो मे एक बृ़द्ध खड़ा था। उसकी निगाह मुझ पर पड़ी तो चिल्लाते हुए बोला -‘‘डाकिया। आपकी चिट्ठी आयी है।’’

‘‘रुको… मै आता हॅू।’’ कहता हुआ मैं नीचे की ओर भागा।

उसने मुझे चिट्ठी थमाते हुए कहा -‘‘आपको इससे पहले यहाँ कभी नही देखा। किराये पर आये हैं?’’

‘‘नही।’’

‘‘अच्छा… रिश्तेदार होगें।’’ उसने अपनी छोटी छोटी आँखों से मुझे घूरते हुए कहा।

मैं जवाब दिये बिना ही दरवाजा बन्द किया और बड़े कदमो से सीढ़िया लांघता हुआ बेडरूम आ गया ‘ये चिट्ठी किसकी हो सकती है?’ मैं लिफाफे को उलट-पलट कर देखने लगा। चिट्ठी तो मेरे ही नाम पर आयी थी मगर उसमे भेजने वाले का नाम नही था।

उत्सुकता मे मैंने लिफाफे को फाड़ा और पढ़ने लगा। भेजने वाले ने लिखा था-

प्रिय संजय।’’

हमे अच्छा लगा कि तुम अपने घर आ गये। तुम्हे यही होना भी चाहिए था। मगर खेद जरूर है कि तुम अक्सर लोगो को पहचानने मे या तो गलती करते हो या फिर देर। वैसे हम जानते हैं कि फिरहाल तुम क्या सोच रहे होगे। कि हम कौन हैं? तुम्हे ये सब हिदायत क्यों दे रहे है? हालाकि ये सब जानने की तुम्हे जरूरत नही है फिर भी मन की संतुष्टि के लिए बताये दे रहे हैं कि तुम हमें अपना दोस्त समझ सकते हो। हम मानते हैं कि तुम अपना अच्छा बुरा समझ सकते हो इसलिए तुम्हें सलाह की कोई आवश्यकता भी नहीं है मगर हम यह भी जानते हैं कि तुम बहुत भावुक हो। और शायद तुम्हारी यह भावुकता ही तुम्हारी कमजोरी है। तुम अक्सर इंसान को पहचाने में गलती कर बैठते हो।

तुम शादी करने वाले हो और आने वाली दुल्हन सिर्फ दुल्हन नही होती, तुम्हारी जिन्दगी का वह एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगी इसलिए सिर्फ इतना कहना चाहते है कि नये दौर की नई गलियों में अन्धी सी भागती लड़कियों की हकीकत वह नहीं है जो तुम समझते हो। जरा ध्यान रखना- ऊपर से खूबसूरत दिखाई देने वाले इन बहारों से फूल चुनने की कोशिश मे कहीं कांटे न हाँथ आ जाए।

आपकी शुभ चिंतक।

‘नीतू।’ पत्र खत्म होते ही जो पहला नाम मेरे दिमाग मे आया वह यही था। लेकिन नीतू ही क्यो? मेरे पास कोई ठोस वजह नही थी। वह प्रिया भी हो सकती है। प्रिया खुशबू की दोस्त थी और वह अब उसे उतना पसन्द भी नही करती थी। मगर मुझे प्रिया को लेकर भी एक संसय था। खत मे जिस तरह के शब्दो का प्रयोग हुआ है वह प्रिया तो नही लिख सकती। पत्र मे खुशबू का जिक्र था यह समझने मे मुझे देर नही लगी।

मैंने बिस्तर पर करवट बदला तो सवाल भी बदल गया। खत किसने लिखा इससे महत्वपूर्ण सवाल शायद यह था कि क्यों लिखा? मैंने लपक कर सिरहाने मे रखी खुशबू की तश्बीर उठा ली। वह मुस्कुराती हुई मेरी ओर देख रही थी। हमारी नजरें देर तक एक दूसरे को घूरती रही। इतनी मासूम आँखों मे कोई फरेब तो नही हो सकता। यह खत जरूर किसी की शरारत है। 

मैंने पत्र को उठाया। तोड़ा-मरोड़ा और कुचल कर उस पर आग लगा दी। चंद क्षणों तक उसकी तपन मेरे हाँ थों को महसूस होती रही फिर जल्दी ही मेरी आंखो के सामने वह राख बनकर हवा मे उड़ गया।

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शादी के पल कितने खूबसूरत होते है। एक दिन के लिए ही सही मगर आप बादशाह होते है। आप के आस पास मडराती लगभग हर नजरों के आप केन्द्र बिन्दु बन जाते हैं। दूल्हे राजा… दूल्हे राजा… हर सख्स की जुबान पर बस एक ही शब्द होता है।

जीजा जी… जीजा जी… कहते हुए किस तरह खूबसूरत लड़कियां दूल्हे राजा के आस पास मडराया करती हैं। कोई उसे छूने की हसरत रखती हैं तो कोई उसकी निगाहों में आने की। यदि सबकी निगाहों से चुराकर मौका मिला तो वह नटखट लड़कियां चिकोटी काटने से भी नहीं चूकती।

फेरे का दौर चल रहा था – वातावरण में मंत्रोच्चारण की ध्वनि गूँ ज रही थी मगर उन लड़कियों की बाते अब भी मेरे दिमाग मे घूम रही थी। आगवानी के समय लड़कियों ने मुझे घेर रखा था। उस समय उन्हें शायद ही इस बात का डर रहा हो कि किसी पराए लड़के के साथ इतनी नजदीकी पर कोई उन पर उॅगली भी उठा सकता है।

“हमारी सहेली के सामने कितने बौने लग रहे हैं… बेचारे जीजा जी। देख नहीं रही हो… जीजा जी के सामने हमारी खुशबू ऐसे लग रही हैं जैसे कौए की चोंच में मोती का दाना।’’

“धत् पागल कहीं की… ऐसे क्यों बोलती है? देख नहीं रही हो कैसे शरमा गये हैं बेचारे जीजाजी। हमारी ओर एक बार भी निगाहें नहीं उठा पा रहे हैं।’’ उस दौरान न जाने ऐसे और कितने स्वर गूँजे होंगें। इस वक्त जब मैं अपनी डायरी लिख रहा हूँ उनमें से अधिकतर बातें भूल चुका हूँ ।

इसी दौरान अकस्मात ही मेरी निगाहें एक चेहरे को छू पायी तो बस वही की वही ठहर गयी।

दरअसल वह नीतू थी जो मुझसे थोड़ी ही दूर पर खड़ी एकटक मुझे देखे जा रही थी। उस समय उसकी नजरों मे बेतहासा शिकायत थी। मैं उससे नजर मिलाने की हिम्मत नही जुटा पाया। मेरी नजरें झुक गयी। और फिर किसी कायर की भाँ ति मैं खुद को फेरे की रश्म में ब्यस्त रखने का अभिनय करता रहा। मन बेचैन था। चंद क्षणों बाद साहस जुटा पाया तो मैंने एक बार पुनः नजरें उठायी। लेकिन वह अब वहाँ  नही थी। मेरी निगाहें सरपट आँ गन के इस कोने से लेकर उस कोने तक देर तक उसे खोजती रही मगर वह नही दिखी।

‘‘कुछ ढूढ़ रहे हो?’’ कोहनी मारते हुए खुशबू ने कहा -‘‘पंडित जी कुछ कह रहे हैं तुमसे।’’

‘‘क…क्या?’’ हड़बड़ाहट मे मैंने अपनी नजरें समेटी और पंडित जी की तरफ देखने लगा।

शादी की सारी रश्में तों पूरी हो गयी मगर दिल और दिमाग दोनों मे से कोई भी शान्त नही था। -’’वह यहाँ क्यों आयी थी? किसने बुलाया था? क्या खुशबू ने? कौन लगती होगी वह खुशबू की? क्या सहेली? ऐसे ही अनकों सवाल मेरे मस्तिष्क पर उमड़ते घुमड़ते रहे। जिनका दूर दूर तक कोई हल नजर नही आ रहा था।

‘‘संजयं।’’ अचानक पापा ने आवाज दी।

मै मंडप से उठ कर उनकी ओर बढ़ा तो वह भी अपनी कुर्सी से उठ कर चल दिये । हम थोड़ी दूर तक साथ ही गये फिर वह इधर उधर देखकर खड़े हो गये। मेरी आँखों मे झाँ कते हुए बोले -‘‘वह लड़की कौन थी?’’

‘‘क… कौन?’’ मैं चौंक पड़ा। मुझे यकीन नही हो पा रहा था कि पापा मुझसे अचानक ऐसा सवाल कर सकते है। मैं खुद को सम्भालते हुए बोला -‘‘म… मैं नही जानता उस लड़की को।’’

‘‘वह तुम्हे प्यार करती है शायद? मैंने उसकी आँखों मे देखा है।’’ पापा ने मेरे कंधे मे हाँथ रखते हुए कहा -‘‘हो सकता है मुझे ही गलतफहमी हो।’’

पापा ने एक बार फिर इधर उधर देखा और आगे बिना कोई सवाल किए हुए लौट पड़े। मैं वही खड़ा उन्हे महसूस करता रहा।

******

सुहागरात- शादी की पहली रात।

खुशबू द्वारा मेरा इन्तजार करना, मेरा पहुंचना, उसे छूना प्यार करना… उतना ही स्वाभाविक ढंग से हुआ था जैसे कि अक्सर सुहागरात में हुआ करता है। मगर मेरे दिमाग में ठुंसे कई सवाल मेरे हाव-भाव मे फिर भी झलकते रहे।

खुशबू मेरे जाँ धों मे सर रख कर लेटी हुई थी। मैं आहिस्ता- आहिस्ता उसके बालों को सहला रहा था। वह हमारे दाम्पत्य जीवन की पहली रात थी इसलिए उस वक्त मैं उससे कोई भी अस्वाभाविक सवाल नही करना चाहता था मगर नीतू का चंेहरा मेरी आँखों के सामने ऐसे घूम रहा था कि चाह कर भी खुद को रोकना मुस्किल हो रहा था। मेरी शरारती उंगलियां बालों के झुरमुट से सरकती हुई उसके गले को स्पर्श की तो वह चौंक कर मेरे चेहरे की ओर देखी। उसके होंठों पर गुलाबी मुस्कान तैर पड़ी। बदले मे मुझे भी मुस्कुराना पड़ा। किसी ने कुछ नही बोला।

“खुशबू!’’ कुछ पलो बाद मेरी खामोशी टूटी।

“उहूँ।’’ एक बार फिर उसकी नजरे मेरे चेहरे पर पड़ी।

“हमारी शादी मे मेरे काँलेज की एक लड़की आयी थी, तुम जानती हो उसे?’’

“नीतू की बात कर रहे हो?’’

“हाँ।’’

‘‘वह मेरी सहेली है।’’ वह एकाएक उठकर बैठ गयी -‘‘मगर तुम ये सब क्यों पॅूछ रहे हो?’’

“कब से जानती हो उसे?’’

“हम स्कूल के जमाने से ही साथ-साथ पढ़े हैं।’’

मैं चुप हो गया। शायद इसलिए कि मुझे मेरे सारे सवालों का जवाब मिल चुके थे या फिर इसलिए कि इसके आगे और कुछ पूँछना मुमकिन नही था। बातों से उसका ध्यान हटाने के लिए जैसे ही मेरी शरारती उॅगलियां उसके गले से नीचे उतरी वह एकाएक कसमसा उठी। उसने शरमा कर मेरी ओर देखा और फिर बिस्तर पर नागिन सी सरकती हुई मेरी छाती पर अपने होंठ रख दिए। मैं सिहर उठा।

तभी एकाएक पूरा कमरा अंधेरे मे डूब गया।

कुछ देर बाद जब रौशनी लौटी तो हम थक चुके थे… हमारी सांसे अनियंत्रित थी और हम दोनो एक दूसरे से नजरें नही मिला पा रहे थे। पता नही क्यों? जबकि हम दोनो अब पति पत्नी थे।

कमरे मे देर तक खामोशी छायी रही।

“संजय!’’ काफी देर बाद वह बोली -’’वक्त को तो देखो- कभी यहाँ हम कितना डर-डर कर आया करते थे और आज देखो कैसे बेखबर पड़े हैं… एक ही विस्तर पर। न किसी के आने का डर न यहां से निकलने की जल्दी। आज यह हमारा घर है हम दोनो का आशियाना।’’

“हाँ।’’ मैं उसकी ओर करवट लेते हुए उसके बदन के ऊपर अपने हाँथ का घेरा बना लिया। इस बार उसकी आँखों मे शर्म नही दिखी। वह धीरे से मुस्कुराई फिर मुझे अपनी ओर खीचते हुए किसी बेल की तरह मुझसे लिपट गयी। उसकी गर्म सांसे मेरी छाती को जलाने लगी।

“संजय एक बात पूंछू तुमसे?’’ एकाएक वह बोल पड़ी।

“पूछो?’’ मेरा दिल धड़क उठा। न जाने मेरे किस राज का जिक्र कर बैठें।

“क्या मैं जिन्दगी भर तुमसे ऐसे ही प्यार पाने की उम्मीद रख सकती हूँ?’’ वह मेरी उॅगुलियों मे अपनी उॅगलियां फसाती हुई बोली।

“अन्तिम सांसों तक।’’

“तुम सच कह रहे हो न?’’ वह बलपूर्वक मेरे बदन से लिपट गयी। उसकी ढ़ोढी मेरे सीने मे चुभ गयी।

‘‘उफ। क्या कर रही हो?’’ मैं जरा पीछे हटने की कोशिश की मगर उसने कसाव कम नही किया।

‘‘नही पहले बताओ।’’ उसने बच्ची की तरह जिद करते हुए बोली।

‘‘हाँ ।’’ मैंने धीरे से मुस्कुरा दिया। वह अचानक चुप हो गयी। मैंने भी कुछ नही कहा। हम देर तक खामोश पड़े रहे। न मुझे नींद आयी न उसने सोने की कोशिश की। हमारे हाँथ किसी अनियंत्रित जानवर की तरह एक दूसरे के बदन को यहाँ वहाँ छूते रहे।

“खुशबू!’’ एक बार पुनः खामोशी टूटी।

“उंहूं!’’ वह मेरी ओर देखने लगी।

“तुमने नहीं बताया?’’

“क्या?’’

“यही कि तुम भी हमें हमेशा यूं ही….।’’

“संजय!’’ एक आम लड़की की तरह वह भावुक हो उठी। मेरी बात बीच में ही काटते हुए बोली- ’’हम शादी कर चुके हैं तुमसे। अब तुम्हारे बगैर हम कुछ भी नही है। तुम्हारे वजूद मे ही हमारा वजूद है संजय… और जिन्दगी भर रहेगा।’’

“और मेरा गुजरा हुआ कल? तुम तो जानती हो न… मेरे कल के बारे में?’’

“हाँ संजय!’’ एकाएक उसके होंठों भिच गये। वह मुझसे अलग होकर सीधे लेट गयी। कुछ पल खामोश रहने के बाद कहने लगी –“हाँ संजय हम जानते थे मगर आज से सब भूल गये। हमें कुछ नही याद रखना और सच कहें… संजय अब तुम भी भूल जाओ। हमें तुम्हारे गुजरे हुए कल से कोई मतलब है भी नहीं। हम आज पर भरोषा करते है और आज पर ही जीना चाहते है।’’

“सच!’’ मेरी आँखें डबडबा आयी। मैंने आँखें बन्द कर ली।

“हाँ संजय।’’ तेजी से पलटते हुए उसने मेरे होंठों को चूम लिया -’’हमें पता है, हर किसी का कुछ न कुछ गुजरा हुआ कल होता है। इसका मतलब ये तो नहीं कि बची जिन्दगी को भी उसके नींव में टिका दी जाए।’’

उसकी बात सुनते ही मेरे सर से जैसे किसी ने बर्षों से रखे हुए बोझ को उठाकर एकाएक कहीं बाहर फेंक दिया हो। लम्बी सांस भरते हुए मैंने उसकी ओर देखा -‘‘तुम यकीन करोगी कि प्रिया…।’’

‘‘संजय!’’ उसने अपनी उॅगली मेरे होंठों से सटा दी -‘‘इस वक्त नही प्लीज। प्रिया का नाम तो बिल्कुल नही। मैं उस लड़की का नाम तुम्हारे मुँह से नही सुन पाऊॅगी।’’ उसके आखिरी शब्दो में सिर्फ नफरत ही नफरत थी।

अभी चंद पलो पहले मुझ पर प्यार लुटाने वाली औरत के अंदर अचानक जरा सी बात पर इतनी नफरत कहाँ से आ गयी? मैं अभी समझने की कोशिश कर ही रहा था कि अचानक मेरे मित्र ‘राज’ का कहा हुआ एक वाक्य याद आ गया उसने कहा था -‘औरते प्यार करने के लिए बनी है समझने के लिए नही।’ मुझे चुप होना पड़ा।

“संसार में हर किसी का कुछ न कुछ गुजरा हुआ कल होता है।’’ दिल का बोझ थोड़ा हल्का हुआ तो अकस्मात ही खुशबू के ये शब्द दिमाग मे कौंध पड़े। सवाल उठा -’’हर किसी का? क्या खुशबू का भी? यह ख्याल अचानक मुझे काँ टों सा चुभा।

खुशबू करवट बदल चुकी थी-

मगर मेरा पुरुष वाला दिमाग सक्रिय हो उठा । ’किस हद तक का होगा उसका गुजरा हुआ कल? क्या उस हद तक जैसे कि मेरा… प्रिया का… या फिर नीतू का?’ फिर अचानक एहसास हुआ कि सचमुच सबका तो था… कुछ न कुछ गुजरा हुआ कल। उसका भी होगा… जरूर होगा। मैं जरा उठकर खुशबू की ओर देखा। उसकी पलकें बन्द थी। वह शायद सोने की कोशिश कर रही थी या फिर सो गयी थी।

मैंने अपने बर्फीले हाँथ उसकी बाहों में रखा तो उसने पलकें खोल दी। उसके चेहरे पर दबी हुई मुस्कान दौड़ गयी।

“खुशबू.।’’ मैं मुस्कराने का अभिनय करते हुए बोला

वह बिना करवट बदले, गर्दन घुमा कर मेरी ओर देखने लगी। 

“तुमने अभी कहा था कि हर किसी का कुछ न कुछ गुजरा हुआ कल होता है?’’ मैंने डरते डरते धीमी आवाज मे पॅूछा।

“हाँ तो।’’ उसकी आँखें एकाएक गोल हो गयी।

“हर किसी का? यानी कि…।’’ मेरे होंठ सूखे जा रहे थे -“क्या तुम्हारा भी?’’

वह मेरी मनोदशा देखी तो खिलाखिला पड़ी। उठकर बैठते हुए बोली –“संजय, मैं भी तो इंसान ही हूँ। इसी दुनिया में रहती हूँ। मेरा भी तो गुजरा हुआ कल होना उतना ही स्वाभाविक है जितना कि तुम्हारा। फिर तुम मुझे लेकर इतना परेशान क्यों हो रहे हो?’’

“प…परेशान!’’ मैं हकला पड़ा –“नही खुशबू। अ… ऐसा नही है।’’ मैंने जबरदस्ती हॅसने की कोशिश की। चंद क्षणों तक वह मेरे चेहरो के बदलते रंग को देखती रही फिर अचानक करवट लेकर अपनी पलके गिरा ली।

मुझे भी लेटना पड़ा। अब वैसे भी जागने की मेरे पास कोई वजह नही थी।

‘‘सजय।’’ अचानक खुशबू उठकर बैठ गयी, मुझे झकझोरते हुए बोली -‘‘क्या तुम सचमुच मेरे पास्ट के बारे मे जानना चाहते हो?’’

‘‘न… नही। म… मैंने यूँ ही पॅूछ लिया था।’’ मैं उसके इस प्रतिक्रिया पर सचमुच डर गया था।

वह थोड़ी देर तक एकटक मेरी ओर देखती रही। जब मैंने कोई प्रतिक्रिया नही दी वह पुनः लेट गयी।

******

वह नवम्बर की खूबसूरत सुबह थी।

अपने घर के डाइनिंग टेबल पर हम लोग नाश्ता कर रहे थे।

‘‘जूस लाऊ खुशबू बेटा।’’ टेबल पर कचैरी रखते हुए राजू चाचा ने पूछा।

‘‘नही चाचा जी।’’ खुशबू ने मुस्कुरा कर राजू चाचा की ओर देखा फिर मेरी ओर पलटते हुए बोली   -‘‘संजय आप लेगे?’’

मैंने पापा की ओर देखा। पापा खामोशी के साथ कचैरियों चबाते रहे। उनके दिमाग मे कुछ चल रहा था। आज कल वे कुछ परेशान सा रहा करते थे।

‘‘पापा!’’ मैंने आवाज दी -‘‘बिजनेस मे कोई्र दिक्कत चल रही है क्या?’’

‘‘नही… क्यों?’’ उन्होने हैरानी भरी नजरों से मेरी ओर देखा।

‘‘नही बस ऐसे ही। आज कल आप बातें कम करते हैं न, इसलिए पूँछ लिया।’’

वह हँस पड़े। मेरी ओर देखते हुए बोले -‘‘अब तुम सचमुच बड़े हो गये हो।’’

‘‘पापा…।’’ मैं मुस्कुरा पड़ा।

‘‘हाँ … पार्टनर्स आजकल गोलबंदी करने मे लगे हुए हैं इसलिए कम्पनी के फ्यूचर को लेकर थोड़ी चिन्ता है। पर कोई नही मैं उसे सम्भाल लूगा।’’ पापा आँखें झपकाते हुए कहा -‘‘वैसे… संजय।’’ उन्हे कुछ याद आया -‘‘तुम लखनऊ गये थे न किसी इन्टरव्यू के लिए? क्या हुआ उसका?’’

‘‘अभी वहाँ से कोई जवाब नही आया।’’

‘‘अच्छा।’’ वे कचैरी मे पुनः व्यस्त हो गये। राजू चाचा की ओर देखते हुए बोले -‘‘आप कचैरी अच्छी बना लेते हैं।’’

राजू चाचा कुछ बोलते उससे पहले मेरे फोन की घंटी घनघना उठी। मैं पापा की ओर देखने लगा।

‘‘कॉल लेलो।’’ पापा ने कहा।

मैंने फोन उठा लिया।

‘‘अमा यार तुम्हारी शादी को तीन महीने होने को हैं, रोमाँ न्स पीरियड खत्म हो गया हो तो अपनी कोठी से कभी बाहर भी निकल लिया करो।’’ फोन पर किसन था -‘‘तुम तो इलाहाबाद शहर की गलियाँ भी भूल गये होगे।’’

‘‘किसन।’’ मैं मुस्कुरा पड़ा -‘‘नाश्ता कर रहा हॅू थोड़ी देर मे कॉल करूँ?’’

‘‘अरे सुनो तो।’’

‘‘कुछ जरूरी है क्या?’’

‘‘हाँ, इसीलिए फोन किया हैं। दरअसल तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है।’’

‘‘क्या?’’

‘‘अबे मिठाई मॅगाकर रखों मैं आकर बताता हॅू।’’

‘‘किसन।’’ मैं उत्सुकता मे चिल्ला उठा -‘‘मैं मिठाई मॅगा लूगा मगर तुम बताओ तो सही- कौन सी खुशखबरी है?’’

पापा और खुशबू के चेहरे पर एकाएक चमक आ गयी। उनकी उत्सुक नजरें मुझ पर आ कर ठहर गयी।

‘‘अबे तुम लखनऊ गये थे न किसी इन्टरव्यू के लिए?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘तुम्हारा ज्वाइनिंग लेटर आया हुआ है। तुम्हारे माकान मालिक यह लेटर अभी देकर गये है मुझे। मैं लेकर आ रहा हॅू।’’ कह कर उसने फोन काट दिया।

मैं उठकर तेजी से पापा की ओर बढ़ा। उससे पहले झुक कर मैं उनके पैर छू पाता उन्होने झपट कर मुझे गले से लगा लिया। पीठ ठोकते हुए बोले। ‘‘मुझे तुम पर पूरा यकीन था। असल जिन्दगी की पहली पारी मे छोटी सी जीत के लिए बधाई।’’ फिर मुस्कुराते हुए उन्होने खुशबू की ओर देखा और बोले -‘‘बेटा… तुम इसकी सिर्फ अर्धांगिनी ही नही बल्कि ताकत हो। इसके साथ हमेशा डट कर खड़े रहना।’’

‘‘जी पापा।’’ खुशबू की आँ खे भर आयी। वह दौड़ कर पापा के गले लग गयी। हम देर तक खामोश एक दूसरे की धड़कनो को सुनते रहे। आँखों मे पानी था और होंठो पर मुस्कान।

‘‘ज्वाइनिंग कब है?’’ पापा ने मेरे सर पर हाँथ फेरते हुए पूँछा।

‘‘पता नही। ज्वाइनिंग लेटर लेकर किसन आ रहा है।’’

‘‘लखनऊ मे कहाँ रहोगे?’’

‘‘अभी पता नही है पापा। कम्पनी आलमबाग मे हैं वही कहीं आस पास किराये पर कमरा ले लूँ गा।’’

‘‘ठीक है।’’ पापा ने कहा।

******

खुशबू लखनऊ जाने से पहले अपने पापा से मिलना चाहती थी इसलिए वह चली गयी थी। 3-4 महीने मे ये पहला वक्त था जब मैं अपने बेडरूम मे अकेला था। कुछ समझ मे नही आ रहा था कि मै क्या करूँ? मैंने टेलीविजन आँ न किया और देखने लगा।

अचानक मेरा फोन घनघना उठा। फोन राज का था।

‘‘हेलो राज।’’ मैंने फोन उठाते हुए कहा।

‘‘कैसे हो दोस्त?’’

‘‘ठीक हॅू यार… तुम सुनाओ।’’

‘‘मैं तो ठीक हूँ मगर लगता है तुम्हारी दोस्त ठीक नही है।’’

‘‘दोस्त… कौन?’’ मैं चौंक पड़ा।

‘‘मैं प्रिया की बात कर रहा हॅू।’’ राज ने कहा -‘‘उससे आजकल बात होती है कि नही?’’

‘‘नही उसकी शादी के बाद से नही हुई। क्या हुआ उसे?’’

‘‘आज वह दिल्ली के एक बाजार मे मिली थी मुझे। बीच बाजार मे सुधाकर पर किसी बात को लेकर वह ऐसे चिल्ला रही थी जैसे उसे किसी की परवाह ही न हो।’’

‘‘तुमने उसे कुछ कहा?’’

‘‘नही… मेरी हिम्मत नही पड़ी उसके पास जाने की।’’

‘‘तुम घर जानते हो उसका?’’

‘‘नही। वह अचानक मुझे मिल गयी थी।” राज ने कहा -‘‘वैसे भी तुम जानते हो कि काँलेज मे भी उसने मुझसे कभी बात नही की।’’

‘‘हाँ, मैं जानता हॅू।’’ मैंने धीरे से कहा -‘‘लेकिन राज यह भी तो हो सकता है कि किसी हल्की फुल्की बात पर बहस हो गयी हो दोनो मे?’’

‘‘संजय।’’ राज ने पुकारा -‘‘तुमने विलियम शेक्सपीयर को पढ़ा है? उन्होने कहा था -‘औरतें गिर सकती हैं जब मर्द मे कोई ताकत न हो।’’

‘‘मतलब?’’ उसकी बात मुझे समझ नही आयी।

‘‘ओह संजय…।’’ राज हँस पड़ा -‘‘लगता है तुम सिर्फ इंजीनिरिग ही पढ़ते हो। कभी कभी समाजशास्त्र भी पढ़ा करो। लोगो को समझने मे आसानी होगी। तुम्हे पता होना चाहिए कि औरतो के बारे मे समाजशस्त्री चेर ने क्या कहा था?

‘‘क्या कहा था?’’ मैंने पूँछा।

‘‘उन्होने कहा था -‘महिलाए समाज की वास्तविक वास्तुकार होती है।’ क्या तुम उनका मतलब समझ सकते हो?’’

‘‘हाँ … इस बारे मे मैंने अक्सर लोगो से सुना है।’’

‘‘और वह तुमने क्या सुना है?’’ राज ने हॅसते हुए पॅूछा।

‘‘यही कि औरते…।’’

‘‘अगर तुमने वही सुना है जो लोगो ने मुझे बताया है तो तुमने गलत सुना है।’’ उसने मेरी बात बीच मे ही काट दी, और कहने लगा -‘‘लोगो ने चेर के संदर्भ को सही तरीके से प्रस्तुत नही किया।’’

‘‘और वह सही तरीका क्या है?’’ मै हँस पड़ा।

‘‘तुम मेरा मजाक उड़ा रहे हो?’’

‘‘अरे नही दोस्त। मेरी हॅसी का मतलब वह नही है… मैं तुम्हारे कहने के अंदाज को काँ पी कर रहा था। मुझे सचमुच तुमसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।’’

‘‘अच्छा तब ठीक है।’’ वह हँस पड़ा -‘‘तुमने अक्सर लोगो से सुना होगा कि हर सफल आदमी के पीछे एक औरत होती है। और यह सच भी है मगर महान ग्रूसो माक्र्स ने इस पर एक लाइन और जोड़ दिया था जिसने इस वाक्य को और भी चरितार्थ बना दिया। उन्होने कहा -‘हर सफल आदमी के पीछे एक औरत है, उस औरत के पीछे उसकी पत्नी।’ समझे कुछ?’’ उसने पॅूछा।

मुझे सचमुच कुछ समझ नही आया। मैंने हँस कर कहा -‘‘नही।’’

‘‘क्या कहा तुमने? मैंने सुना नही।’’

‘‘यार सचमुच मुझे इतनी गहरी बातें समझ मे नही आती।’’

‘‘तो चलो तुम्हे आसान भाषा मे समझाता हॅू।’’ वह जोर से हँस पड़ा। चंद पलो तक खामोश रहने के बाद कहने लगा -‘‘ग्रूसो माक्र्स ने एक बात और कहा था कि पुरुष अपना भाग्य नियंत्रित नही कर सकते। उसके लिए ये काम उसकी जिन्दगी मे मौजूद औरत करती है।’ जिसे हम पत्नी कहते है।’’

‘‘अच्छा।’’ मैंने ऐसे कहा जैसे सचमुच मुझे सब कुछ समझ मे आ गया हो। हालाकि मैं जितने अच्छे तरीके से इंजीनिरिंग को समझता था, समाजशास्त्र मे उतना ही कमजोर था। मुझे समाज के तौर तरीको से अक्सर इसीलिए खुन्दक हुआ करती है। वह कभी भी मेरे तरीके के नही रहे।

******

हम शाम को गंगा गोमती से लखनऊ निकलने वाले थे। उस दिन पापा ऑफिस नही गये। जब मैंने उनसे कहा कि ‘‘गाड़ी तो शाम 6 बजे है और आप वैसे भी 5 बजे तक लौट आते है।’’ तो उन्होने कहा -‘‘नही… आज पूरा दिन मैं अपने बेटे और बहू के साथ गुजारना चाहता हॅू।

उस समय मेरी आँ खे डबडबा आयी थी -‘‘लेकिन पापा मैं तो आता जाता रहॅूगा।’’

‘‘संजय… बेटियां भी तो ससुराल जाने के बाद अक्सर आती जाती रहती है लेकिन उसकी विदाई के बाद उसका बाप रोता है न। जानते हो क्यो?’’

‘‘क्यों?’’ मैं उत्सुकतावश पूँछ पड़ा। शायद पापा जिन्दगी का एक और पन्ना पलटने वाले थे।

‘‘क्योंकि घर छोड़ने के बाद सिर्फ बेटियां ही पराई नही होती… बेटे भी होते है।’’

‘‘मैं समझा नही।’’

‘‘तुम जानते हो संजय? बेटी का बाप जब बेटी के ससुराल जाता है तो वह बेटी का आलीशान घर देख कर खुश तो होता हैं मगर उस पर अधिकार नही जता सकता। ठीक ऐसे ही लखनऊ के किसी घर मे जब तुम अपनी दुनिया बसा लोगे तो मैं भी शायद उसी बेटी के बाप की तरह वहाँ महसूस करूगा।’’

‘‘नही पापा। ऐसा नही होगा। आप तब भी उस घर के मुखिया होगे।’’

‘‘मैं जानता हॅू बेटा। तुम मुझे उस घर का भगवान बना दोगे। खैर छोड़ो वह सब…।’’ वह अचानक हँस पड़े। आँ खो मे भरे पानी को पोछते हुए बोले -‘‘तुम बहॅू को लेकर जा तो रहे हो मगर अभी रुकोगे कहाँ?’’

‘‘उसकी चिन्ता नही है पापा। मेरा एक दोस्त वही आलमबाग के आस पास रहता है। अभी एक दो दिन उसी के पास रह लेगें और उसके बाद कोई फ्लैट खोज लेगें।’’

‘‘अच्छा।’’ उन्होने अजीब नजरों से मेरी ओर देखा -‘‘बहू कहाँ है? गाड़ी का समय हो रहा है उसे बुलाओ।’’

‘‘जी पापा।’’ मैंने खुशबू को आवाज दी। वह आ गयी।

‘‘पापा, मैं तैयार हो चुकी हॅू।’’ खुशबू ने घड़ी देखते हुए कहा -‘‘गाड़ी आ गयी क्या?’’

‘‘नही मैं खुद तुम लोगो को स्टेशन तक छोड़ने के लिए चलूगा।’’

‘‘पापा… हम चले जायेगे। आप गाड़ी मंगवा दीजिए।’’

‘‘वह सब तुम छोड़ो। लो तुम्हारे लिए मेरे पास एक तोहफा है।’’ पापा ने जेब से एक चाबी का गुच्छा निकालते हुए कहा।

‘‘ये क्या है पापा?’’ खुसबू ने पूँछा।

‘‘लखनऊ मे तुम्हारे घर की चाबी।’’

‘‘लेकिन पापा इसकी क्या जरूरत है।’’ खुशबू कुछ बोलती उससे पहले मैं बोल उठा।

खुशबू हैरानी से मेरी ओर देखने लगी। मेरी हाँ मे हाँ मिलाते हुए बोली -हाँ  पापा अभी इसकी  जरूरत नही है।’’

‘‘जरूरत है संजय।’’ पापा ने मुस्कुरा कर कहा -‘‘यह मेरी बहू है और उसकी खुशियों का ख्याल रखना मेरा अधिकार है। क्यों खुशबू बेटा?’’ 

खुशबू कुछ नही कह पायी और मेरी ओर देखते हुए उसने चाबियां थाम ली। पापा ने जेब से एक पेपर निकाला और मुझे थमाते हुए बोले -‘‘लो… ये तुम्हारे घर का पता है। सम्भाल कर रख लो।’’

खुशबू और मैं थोड़ी देर तक एक दूसरे की ओर डबडबाई आँखों से देखते रहे। हमारे पास शब्द नही थे कुछ कहने के लिए।

‘‘तुम गेट पर आ जाओ मैं गाड़ी निकालता हॅू।’’ कहते हुए पापा वहाँ से निकल गये।

गाड़ी मे बैठने से पहले एक बार फिर मैंने भरी भरी नजरों से उस घर की ओर देखा। जो जल्दी ही मुझसे अलग होने वाला है।

******

लगभग रात के 10 बजे, हम लखनऊ पहुच गये। आटो वाले को पेपर मे लिखे हुए पते को दिखाया तो वह चमचमाती आँ खो से हमारी तरफ देखने लगा -‘‘भइया जी इस पते पर तो कोई रहता ही नही?’’

‘‘तुम जानते हो इस पते को?’’

‘‘हाँ ।’’ वह मुस्कुरा पड़ा। आटो मे हमारा समान रखते हुए बोला -‘‘अरे इसी कोठी के पीछे तो मेरा मकान है।’’

‘‘अच्छा तुम्हे पता है ये किसकी है… मेरा मतलब किसकी थी।’’ हम आटो मे बैठ गये।

‘‘नही, ये तो पता नही है। हाँ इसमे जो लोग रह रहे थे अभी 5-6 दिन पहले ही खाली करके वहाँ से जा चुके हैं। जब पडोसियों ने उनसे पॅूछा कि ‘क्यों खाली कर रहे हो?’ तो कहने लगे कि उनके माकान मालिक ने उसे इलाहाबाद के किसी आदमी को बेंच दिया है। वैसे आप लोग इलाहाबाद से आ रहे है क्या?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘ओह… अब समझा।’’ उसने आटो मे लगे हुए दर्पण मे मेरी ओर देखते हुए बोला -‘‘साहब आपने ही खरीद लिया है न उसे?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘बंहुत अच्छा किया आपने। बहुत लकी कोठी है साहब। देखिएगा बरक्कत ही बरक्कत होगी आपकी।’’

बातो ही बातो मे हम वहाँ कब पहुच गये पता ही नही चला। आटो से उतर कर मैंने भरपूर निगाहो से देखा इमारत की ओर। बिना रौशनी के पहाड़ की तरह लग रही थी। हम दरवाजा खोल कर अंदर चले गये। दरवाजे के आस पास स्विच खोजने लगे, नही मिली तो मैं तेजी से बाहर निकला। खुशबू दरवाजे पर ही खड़ी रही।

‘‘भाई साहब आपके पास कोई टार्च है क्या?’’ मैंने पूछा।

‘‘नही साहब आटो मे तो नही है… घर से लेकर आता हॅू।’’

‘‘नही… नही उसकी जरूरत नही है। माचिस हो तो दे दीजिए, उसी से काम हो जायेगा।’’

‘‘हाँ, माचिस है।’’ उसने अपनी जेब टटोलते हुए कहा -‘‘लेकिन करेगे क्या?’’

‘‘बिजली का कट आउट नही पता कि कहाँ लगा है? उसे खोजना है।’’

‘‘अरे वह तो यही दरवाजे के बगल मे ही लगा है। रुकिए हम आते है।’’

वह अंधेरे को चीरते हुए सीधे कट आउट के पास पहुचा और उसका हैण्डिल पकड़ कर नीचे की ओर खीच लिया। एकाएक पूरी इमारत रौशनी से नहा उठी। मैं हैरानी से उसकी ओर देखने लगा -‘‘तुम्हे कैसे पता था कि यह स्विच इधर है?’’

‘‘साहब मैं पार्ट टाइम इलेक्ट्ीसियन हॅू।’’ उसने अपने हाँ थो को मलते हुए कहा -‘‘यहाँ कुछ भी खराब होने पर अक्सर मैं ही आकर ठीक करता था।’’

‘‘ओह… ये तो अच्छी बात हैं।’’ बीच मे खुशबू बोल पड़ी -‘‘तब तो हम भी आपको ही बुला लिया करेगे।’’

‘‘जी भाभी जी… किसी भी समय अपनी छत पर चढ़ कर आवाज दे दीजिएगा। हम हाजिर हो जायेगे।’’ कहता हुआ वह आटो की तरफ बढ़ गया। मैं बाहर आकर आटो वाले को पैसे दिए और मुड़कर कोठी की ओर देखने लगा। वह सचमुच बहुत खूबसूरत थी। इलाहाबाद की कोठी से भी खूबसूरत।

‘‘संजय।’’ मुझे लौटता हुआ देख खुशबू मुस्करा पड़ी -‘‘पापा जी को फोन करके कहिएगा कि उनका गिफ्ट सचमुच बहुत खूबसूरत है। हमें पसन्द आया।’’

‘‘जरूर।’’ मैं मुस्करा पड़ा -‘‘ऊपर चलकर देखें कि कैसे क्या है?’’

‘‘बिल्कुल।’’

उस रात हम देर तक सफाई और समान को व्यवस्थित करने मे लगे रहे। काम से फुरसत मिली तो एक दूसरे पर नजर गयी। हम ठहाके मार कर हँस पड़े। हम दोनो के शरीर धूल से ढक चुके थे। चेहरा ऐसे लग रहा था अभी अभी ईट के भट्ठे से निकल कर आये हो। हम बिना शर्म संकोच के साथ ही बाथरूम मे घुस गये। आज उस घर मे हमारी पहली रात थी -सुहाग रात।

******

हमारा दाम्पत्य जीवन एक-एक दिन करके तेजी से कटता जा रहा था- इसी दौरान हमारे घर में एक नन्ही सी बेटी भी आ गयी।

“पंखुड़ी।’’ जी- हां हम उसे इसी नाम से पुकारते थे- वह हम दोनो के बीच बड़े लाड़-प्यार से पल रही थी। उसके नाना जी उसके जन्म पर हमें तोहफे में एक कार भी दे दी। बस यही एक कमी थी वह भी पूरी हो गयी। शादी के तीन वर्ष पूरे होते-होते हमारी लगभग सारी घरेलू जरूरतें पूरी हो गयी। मैं कितना नसीब वाला हूँ? कभी कभार खुद ही सोचा करता। इतने कम समय मे इतना कुछ कुछ खास लोग ही पा पाते हैं। इसी वर्ष खुशबू को भी एक प्रेस पर नौकरी मिल गयी- दस हजार वेतन कम नही होता। मेरे वेतन से सिर्फ दो हजार ही कम था।

खुशबू को नौकरी करते हुए 3-4 महीने गुजर गये थे- इस दौरान उसमें कुछ खास तब्दीली नहीं आयी। वही चुलबुलापन, वही हंसने की बेवजह आदत और बिस्तर पर हर रात मे सुहाग रात जिन्दा रखने की तमन्ना।

अप्रैल की वह सुबह-

उस दिन खुशबू विस्तर से जल्दी उठ आयी। बेडरूम के बाहर गलियारे मे कुछ उठक पटक की आवाज आयी तो मेरी भी नींद खुल गयी। मैं आँखें मलते हुए बाहर निकला तो वह एकाएक मुझ पर बरस पड़ी -‘‘तुममे जरा भी शर्म नही है संजय? सब कुछ जानते हुए भी तुमसे दो रातें भी नही रहा गया बिना सेक्स के। चलो मानती हॅू वे मेरे ससुर थे मैं भूल गयी मगर तुम्हारे अपने पापा थे न, तुम कैसे भूल गये इतनी बड़ी बात? तुम्हे तो याद दिलाना चाहिए था।’’

खुशबू पिछले तीन सालो मे कभी मुझसे ऐसी बात नही की। मैं थोड़ी देर तक हैरानी से उसे देखता रहा। मैं समझ नही पा रहा था वह किस बारे मे बात कर रही है।

‘‘लो अब भी खड़े हो?’’ वह एक बार फिर पलटी मेरी ओर -‘‘जाओ जल्दी बाथरूम और नहा – धोकर बाहर आओ।’’

‘‘ठीक है जाता हूँ मगर बताओ तो सही हुआ क्या? कोई गलती हो गयी मुझसे रात मे? किस बात पर सुबह सुबह इतना चिल्ला रही हो।’’

‘‘मतलब तुम्हे अब भी कुछ याद नही आ रहा है?’’ पूजा की थाली को सजाते हुए उसने पूँछा।

‘‘खुशबू बताओगी तब तो याद आयेगा। और ये थाली किस लिए सजा रही हो तुम?’’

‘‘ओह संजय… मैं सचमुच पागल हो जाऊॅगी।’’ वह खीझते हुए बोली -‘‘आज 22 अप्रैल है।’’

‘‘22 अप्रैल?’’ मैं अपना नाखून चबाते हुए उसकी ओर देखा। मेरे होंठो पर शरारती मुस्कान छलक रही थी -‘‘हाँ आज 22 अप्रैल है… तो?’’

‘‘आज पापा जी की पुन्यतिथि हैं संजय। और भगवान के लिए मुझसे ये मत पॅूछना कि कौन से पापा की?’’ इस बार उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था -‘‘पिछले साल आज के ही दिन हर्ट अटैक से उनकी मौत हुई थी। याद आया?’’

उसके ये चंद शब्द मेरे कानो से टकराये तो एकाएक मेरा शरीर शून्य पड़ गया। चंद क्षणो पहले मेरे होंठो पर छायी हुई शरारत भरी मुस्कान को एकाएक मेरे आँ सुओ ने निगल लिया। मैं धड़ाम से घुटनो के बल बैठ गया। फिर खुशबू देर तक कुछ कहती रही मगर मैं सुन नही पा रहा था। मेरी पथराई आँखें बेतहासा पानी उलेड़ती रही।

‘‘संजय तुम सुन रहे हो न कि मैं क्या…।’’ कहते हुए खुशबू जैसे ही मेरी ओर मुड़ी उसके हाँथ से पूजा की थाली छूट गयी। थाली के गिरने का वह शोर जैसे मेरे कानो के परदे को चीरता हुआ निकल गया हो। एकाएक मेरी संवेदना वापस लौटी मैं जोर से चीख पड़ा।

‘‘संजय… तुम ठीक हो?’’ खुशबू तेजी से मेरी ओर भागी। फिर वह जैसे ही मेरे इतने करीब आयी कि मैं उसे छू पाता, पूरी ताकत से झपटकर मैं उससे लिपट गया। हम दोनो की आँखें देर तक बरसती रही।

‘‘पापा।’’ तभी अचानक पंखुड़ी हमारे पास आकर खड़ी हो गयी। हमें अपने आँसू पोछने पडे़।

******

मेरा दोस्त ‘राज’ अक्सर कहा करता था कि औरतो और मौसम मे कुछ खास फर्क नही होता इन्हे समझने की कोशिश मे वक्त बरबाद मत करो, मौसम अच्छा है तो उसका मजा ले… प्रतिकूल है, जीने मे तकलीफ हो रही है तो किसी नये शहर चले जाइये… क्योंकि आप उसे बदल नही सकते।

शादी के कुछ दिनो बाद से लेकर उसे नौकरी मिलने से पहले तक खुशबू दिन ब दिन खुद पर ध्यान देना कम करती जा रही थी। बाल संवरे हैं या नहीं, चेहरे पर मेक-अप है कि नहीं, कपड़े कैसे पहन रखे है इन सब बातों को वह परवाह नही किया करती। वह पंखुड़ी की देखभाल मे खुद को इतना व्यस्त कर लिया कि अगर शोर मचा कर मैं खुद का एहसास न कराता तो कब का किसी बन्द पड़े कमरे के किसी कोने की रखी एक ऐसी बेड बन जाता जिसका इस्तेमाल तो हो रहा है मगर उसकी परवाह किसी को नही है। मगर नौकरी मिलने के कुछ दिन के बाद से ही अचानक उसके स्वभाव मे आया परिवर्तन हैरान कर देने वाला था।

अब वह खुद के सौन्दर्य को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गयी। सजने सवरने के बाद दर्पण के सामने खड़े होकर देर तक खुद को निहारना हंसना, मुस्कराना फिर खुद में ही रीझ जाना, हर सुबह आफिस जाने से पहले की उसका ये सब करना जैसे उसकी आदत मे सामिल हो गया हो। हालाकि मुझे भी उसका खूबसूरत दिखना पसन्द था मगर न जाने क्यो कुछ वक्त से उलझन होने लगी थी। खास कर ‘राज’ की बात याद करके।

एक बार राज ने किसी घटना का जिक्र करते हुए कहा था -‘‘घर से निकलते वक्त औरतों का सजना सवरना अप्रत्यासित नही है क्योकि दुनिया की हर औरत सुन्दर दिखना चाहती है। मगर सजने सवरने के बाद देर तक खुद को एकटक देखते रहना, आइने के सामने हॅसना, मुस्कुराना जरूर अप्रत्यासित है जो बताता है कि वह प्यार बाहर तलास रही है या तलास चुकी है।’’ मेरा दिल धड़क उठा मगर मैंने मन को सम्भाल लिया। हो सकता है ‘राज’ की ये समाजशास्त्र की बातें किसी दूसरी औरतो के लिए सच हो मगर खुशबू? उस पर मेरा अथाह विश्वास था। वह ऐसा कुछ नही कर सकती।     

उसका ऑफिस मेरे ऑफिस की तुलना मे थोड़ा दूर था। वह मुझसे लगभग 15-20 मिनट पहले ही घर से निकल जाया करती। उस दौरान उसकी सबसे खास बात यह थी कि वह हर सुबह घर से निकलते वक्त मुझे ‘किस’ करना नही भूलती। हाँ  वक्त के साथ एक बदलाव जरूर उसमे आ गया जो पिछले कुछ दिनो से मैं महसूस भी कर रहा था। खाना बनाने के प्रति उसका व्यवहार काफी हद तक बदल चुका था। अब वह खाना बनाने से काफी हिचकिचाया करती। कभी-कभी तो हॅसी-हॅसी में कह भी दिया करती कि संजय आज खाना तुम पका लोगे क्या?

“क्यों नहीं?’’ मैं मुस्कुरा कर कहता और मैं पका भी लिया करता। चाय तो अक्सर मैं ही बनाया करता। इन सब के बीच पंखुड़ी एक भरोषेमंद के सहारे बड़े लाड़-प्यार से पल रही थी। अब तक वह तीन सावन देख चुकी थी। उसकी तोतली आवाज घर के गलियारो मे गूंजना शुरू कर दिया।

एक दिन खुशबू आफिस से काफी देर में आयी और आते ही मेरे गालों को चूम लिया। हालाकि वह पहला मौका नही था जब उसने ऑफिस के लौटने के बाद उसने मुझे चूमा हो मगर आज न जाने क्यो मुझे उसके ‘किस’ मे प्यार कम और रिझाने वाली अदा ज्यादा लगी।

धीरे धीरे देर से आने पर अक्सर वह यही करने लगी। कई बार तो रात के 10-11 बज जाते उसे आने मे। मैं उससे देरी के बारे में पूछता उससे पहले ही वह बिफरते हुए कहने लगती –“संजय मैं यह नौकरी नहीं करूंगी।’’

“क्यों?’’ मैं हैरान होकर पूँछता तो मुझसे लिपट कर कहने लगती –“मुझे देर से आना अच्छा नहीं लगता और वो पटेल सर हैं ना… आफिस टाइम के बाद भी कुछ न कुछ काम मुझे दे देते हैं।’’

उस दिन उसकी बात सुनी तो मुझे हॅसी आ गयी -’’खुशबू दूसरो की नौकरी ऐसी ही होती है हमें खुद को ही अर्जेस्ट करना पड़ता है। तुम परेशान न हो? दिन में पंखुड़ी को सम्भालने के लिए आया रहती है और शाम होते होते तो मैं भी आ जाता हूँ। तुम्हें कुछ देर ही सही… फिर ऐसा कभी-कभार ही तो होना है। थोड़ा बहुत आफिस का एक्स्ट्रा वर्क कर दोगी तो तरक्की के लिए और रास्ते खुल जायेंगें।’’

“ओह संजय।’’ वह खिलखिला कर एक बार पुनः मेरे गालों को चूम लिया –“मुझे लगा था तुम बुरा मानोगे- तुम सचमुच बहुत अच्छे हो।’’

“इसमें बुरा मानने की कौन सी बात है खुशबू?’’ मैंने मुस्कुरा कर कहा -‘‘हम जो भी कर रहे हैं पंखुड़ी के भविष्य के लिए कर रहे है। वैसे भी पापा की कम्पनी पर उनके पार्टनरो ने कब्जा कर लिया है अब अगर हम लोग छोटी छोटी बातों को लेकर घर मे बैठ जायेगे तो हमारे अपने भविष्य का क्या होगा?’’

‘‘हाँ … संजय। मगर प्लीज तुम कभी मुझ पर शक मत करना।’’ कहते हुए वह मेरे बाहों में सिमट आयी।

******—–

अगली शाम मैं जैसे ही घर पहुंचा, दरवाजे पर लगे पत्र बाक्स मे पड़ा एक खत मेरे हाथ लग गया। लिफाफे पर भेजने वाले का नाम नहीं था। मैं उसे खोलता हुआ अंदर आ गया। उसमे लिखा था-

‘‘हम कौन हैं? ये सब क्यों कर रहे है? यह सब पता करने से ज्यादा यह जानना जरूरी है कि तुम्हारे आस पास क्या हो रहा है? जिसके बारे मे तुम्हे पता नही है। हम जानते है संजय कि तुम अपना अच्छा बुरा समझ सकते हो मगर जो कुछ तुम्हारी जिन्दगी मे हो रहा है वह तुम्हारे लिए अच्छा नही हैं। तुम भावुक बहुत हो और कई बार तुम्हारी यह भावुकता ही तुम्हारी कमजोरी बन जाती है जिसका लोग अक्सर फायदा उठाना शुरू कर देते है। इसलिए अपना और अपनी लाडली बेटी पंखुडी का खयाल रखो। पंखुड़ी बहुत प्यारी है।

वैसे हम ये सब बताने के लिए खत नही लिखा। हम तुम्हें सिर्फ इतना बताना चाहते हैं कि पिछले 2-3 दिनो से खुशबू आफिस नहीं गयी।’

पत्र पढ़ने के बाद मैं अन्दर ही अन्दर तड़प उठा मगर क्यों? मैं खुद नहीं जानता। शायद इस बात पर कि खुशबू मुझसे कुछ छुपा रही है या फिर इस बात पर कि कौन है वह सख्स जो इस तरह के पत्र लिख कर हमारी जिन्दगी में जहर घोलने की कोशिश कर रहा है। मैं उस पत्र को उलट-पलट कर देखने लगा तो एहसास हुआ कि वह खत सीधे मेरे पत्र बाक्स मे फेंका गया है क्योंकि उस पर न तो कोई टिकट था और न ही किसी डाकघर की कोई मुहर।

“संजय।’’ एकाएक कमरे मे आवाज गूंजी। मैं पलट कर देखा, सामने खुशबू खड़ी थी।

‘‘त… तुम!’’ एकाएक उसे अपने सामने पाकर मैं चौंक पड़ा -’’आज जल्दी आ गयी!’’ पूछते हुए मैंने वह पत्र मरोड़ कर अपनी जेब में डाल लिया। घबराहट मे मेरी नजरें झुक गयी।

“क्या बात है संजय?’’ वह झुक कर मेरे सर को सहलाते हुए पॅूछी -‘‘बड़े परेशान नजर आ रहे हो? सब ठीक ठाक है न? और पंखुड़ी कहा है?’’

‘‘पंखुड़ी नीचे आया के पास है। मैं उसे लेने जाने ही वाला था।’’

‘‘कोई नही… मैं जाकर ले आती हॅू।’’ वह तेजी से पीछे की ओर पलटी।

‘‘खुशबू।’’ मैंने पुकारा तो वह ठहर गयी। -‘‘तुमने बताया नही आज इतनी जल्दी कैसे आ गयी?’’

मेरे दोबारा उसी सवाल को पूँछने पर वह घूर कर ऐसे देखी मेरी ओर जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो। फिर खुद को सम्भालते हुए अचानक हँस कर वह कहने लगी -‘‘आज पटेल सर को कहीं निकलना था तो साथ में उन्होने अपने साथ काम करने वाले स्टाफ को भी जल्दी ही छोड़ दिया।’’

मैंने फिर कोई सवाल नही किया। मेरी निगाहें उसके चेहरे पर कुछ पढ़ने का प्रयास करती रही।

******

पत्र मिले हुए 3-4 दिन हो गये इस बीच मैंने अपने दिमाग को कई बार समझाने की कोशिश की मगर वह नही माना। आफिस की कुर्सी पर बैठे-बैठे अकस्मात ही मेरा हाँथ जेब मे कुछ टटोलने लगा। वह पत्र एक बार फिर मेरे हाँथ मे आ गया।

उस वक्त मैंने उस खत को लगातार दो तीन बार पढ़ा। मन तिलमिला उठा –“खुद को इस तरह परेशान करने से अच्छा था कि मुझे खुशबू से ही इस बारे में चर्चा कर लेनी चाहिए थी। लेकिन कहता क्या?’’ अचानक मन भ्रमित हो गया -‘‘क्या यह कि यह सब कुछ मुझे किसी ने खत भेज कर बताया हैं?’’

मैं अपनी कुर्सी से उठा और ऑफिस से बाहर आ गया। गेट के बगल मे सिगरेट की दुकान थी उससे सिगरेट ली और उसे जलाने ही वाला था कि किसी ने मेरे कंधे पर हाँथ रखते हुए बोला -‘‘क्या यार, अकेले ही अकेले धॅुयें का मजा ले रहे हो?’’

मैंने पलट कर उसकी ओर देखा -‘‘अरे मोहित तुम? यहाँ?’’

‘‘हाँ, यार।’’ वह हॅसते हुए कहा -‘‘यही तुम्हारे ऑफिस के बगल मे जो बी0पी0ओ0 है वही आया था। तभी अचानक तुम दिख गये तो सोचा चलो संजय के साथ एक सिगरेट ही पी लेते है।’’

‘‘हाँ  बिल्कुल।’’ मैंने उसकी ओर सिगरेट थमाते हुए बोला -‘‘कुछ काम था यहाँ ?’’

‘‘अरे काम क्या था।’’ सिगरेट का जोरदार कस खीचते हुए वह बोला -‘‘बिना वजह का लफड़ा पाल लेते हैं शर्मा जी।

‘‘शर्मा जी?’’

‘‘अरे बी0पी0ओ0 के मैनेजर… शर्मा जी। दरअसल हमारे अच्छे दोस्त हैं। इन्ही के बीबी का कुछ लफड़ा था। घर मे तनाव बढ़ा तो हमें बुला लिए।’’

‘‘क्या लफड़ा था?’’ मैंने पूँछा।

‘‘संजय अब क्या कहें… वैसे हमने इनसे एक बार कहा था कि शर्मा जी, अगर भाभी जी का लोगो से घुलना मिलना आपको अच्छा नही लगता तो उन्हे घर पर ही रहने दीजिए मगर तब सुना नही। और पैसे के लालच मे एक प्राइवेट बैक मे मार्केटिंग के लिए लगवा दिए।’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या? भाग गयी उस लफण्डर के साथ। पीछे 4 साल का बेटा है उसे छोड़ गयी है। अब शर्मा जी या तो बेटे को सम्भाले या ऑफिस को।’’ कहते कहते उसने मेरी ओर देखा -‘‘संजय एक बात बोले?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘कहते है इंसान तब तक ईमानदार रह सकता है जब तक कि उसे बेइमानी करने का मौका नही मिलता। वफा के मामले मे औरते भी कुछ ऐसी ही होती।’’ उसने सिगरेट का आखिरी कस खीचा -‘‘मर्द तो साला कुत्ता है कुत्ता। कसम से साला ऐसे ही बदनाम है।’’

‘‘नही यार।’’ मैंने उसके कंधे मे हाँथ मारते हुए बोला -‘‘ऐसे किसी के बारे मे कुछ भी कहना ठीक नही है।’’

‘‘ऐसे ही नही बोल रहा हॅू मेरे दोस्त… खुद भुक्त भोगी हॅू। मगर छोड़ो वह सब। यहाँ मैं औरतो के बारे मे लेक्चर देने नही आया।’’ वह अपने होंठ चबाते हुए मेरी ओर देखने लगा -‘‘बस क्या कहॅू… शर्मा जी से मिलकर दिल फट गया यार। इतने कम समय मे बेशुमार दौलत कमाई है इन्होने। किसके लिए? और उसका ये सिला मिला उन्हे?’’

‘‘भाभी जी को समय नही दे पा रहे थे क्या?’’

‘‘कह नही सकता।’’

‘‘ओह।’’

‘‘लेकिन मुझे लगता है प्यार नही दे पाये।’’ वह धीरे से बोला।

‘‘प्यार?’’ मैं चौंक गया -‘‘मोहित… वह उनकी बीबी थी। उनके बीच शादी का पवित्र बंधन था।’’

‘‘संजय।’’ सिगरेट की राख झाड़ते हुए मेरी ओर देखा, बोला -‘‘एक बात याद रखना औरतें पार्टनर के प्रति नही बल्कि प्यार के प्रति वफादार होती है। अगर आपको औरतो को खरीदना है तो जेब मे पैसे नही, प्यार रखिए।’’

‘‘लेकिन सिर्फ इसके लिए कोई औरत अपने बेटे को कैसे छोड़ सकती है?’’

‘‘क्योंकि औरते प्यार की भूखी होती है और वह भूख कई बार इतनी ज्यादा होती है कि उसके लिए अक्सर वह इससे भी बड़ी कीमत चुका जाती हैं।’’ कहते हुए वह दुकानदार की ओर मुड़ा -‘‘एक सिगरेट और मिल सकती है?’’

‘‘लेकिन तुमने अभी तो पी है।’’ मैंने कहा।

‘‘हाँ, मगर जब मैं बातें करता हॅू तो मुझे सिगरेट की ज्यादा जरूरत पड़ती है।’’ उसने नयी सिगरेट पर आग लगाते हुए कहा -‘‘वैसे तुम अखबार पढ़ते हो?’’

‘‘हाँ ।’’

‘‘तो तुम अक्सर देखते होगे कि लड़कियां कई बार प्यार के चक्कर मे अपने रास्ते पर आने वाले अपने भाई या माँ बाप को भी नही छोड़ती। जबकि लड़को के बारे मे इस हद तक की दीवानगी कम देखने को मिलती है।’’

‘‘नही ऐसा नही है मोहित।’’ मैंने उसकी बात का बिरोध करते हुए कहा -‘‘मैं ऐसे बहुत लड़को को जानता हॅू जिन्होने किसी लड़की के लिए कत्ल तक कर डाले हैं।’’

‘‘लेकिन उसने अपने माँ बाप या भाई का कत्ल नही किया होगा।’’ वह उत्तेजित हो उठा -‘‘मैं जानता हॅू न मर्द की अवकात। वह पैसे के लिए तो ऐसा कर सकता है मगर प्यार के लिए नही। अगर तुम्हारे पास कोई उदाहरण हो तो मुझे जरूर दिखाना।’’

मैं सोचने लगा तो वह हॅस पड़ा। कहने लगा -‘‘तुम्हारी चुप्पी बता रही है कि मैं सही हॅू।’’

‘‘नही… ऐसा नही है। लेकिन मुझे खोजना पड़ेगा।’’ मैंने घड़ी की ओर देखते हुए कहा -‘‘काफी देर हो गयी है अभी मैं चलता हॅू।

मैं वहा से आकर अपनी कुर्सी मे बैठ गया। मोहित से बात होने के बाद दिमाग और भी अशान्त हो गया। मैं समझ नही पा रहा था कि क्या करू? मेरे सामने फोन रखा हुआ था। मैंने रिसीवर उठाया और खुशबू के आफिस का नम्बर डायल कर दिया। फोन पर अमित पटेल ही था- खुशबू का बॉस

“सर! क्या आप मुझे थोड़ी जानकारी दे पायेंगें?’’

“जी बोलिए?’’

“अभी 4-5 दिन पहले खुशबू आफिस में उपस्थित थी?’’

“जी आप बोल कौन रहे हैं?’’ जरा रूक कर उसने पूछा।

“खुशबू का पति… संजय।’’ मैंने अपना परिचय दिया।

मेरा परिचय सुना तो अकस्मात ही वह हो हो करके हँस पड़ा -’’जी… जी बिल्कुल… बिल्कुल उपस्थित थी… हां-हां उपस्थित थी।’’ उसकी हॅसी में अचानक हकलाहट आ गयी।

“जी थैंक्स।’’ मैंने फोन रख दिया।

******

उस दिन जब मैं घर पहुचा। आया किसी काम में व्यस्त थी। पंखुड़ी अकेली ही बाहर के बरामदे में चाबी से चलने वाली कार के खिलौने का पीछा कर रही थी… दौड़ रही थी।

“पापा!’’ मुझे देखते ही वह खिलखिला पड़ी। उसकी नन्ही सी कार एक दीवाल से टकरा कर रूक गयी।

“आंटी के पास नहीं खेल रही हो?’’ मैं उसे गोदी में उठाते हुए दुलराया।

‘‘आंटी को मम्मी ने डाँ ट कर भगा दिया है इसलिए वह चली गयी है।’’

‘‘मम्मी ने?’’ मैं चौंकते हुए उसे पुचकारा -‘‘मम्मी आ गयी क्या?’’

“हाँ, वो कमरे में पली हुई हैं।’’ बड़ी मासूमियत के साथ उसने कहा -“मम्मी ने हमें भी डाँटा और हमसे बात ही नहीं कल रही हैं।’’

“क्यों? आपको क्यों डाँटा?’’ उसके नाजुक गालो को छूते हुए मैंने कहा -‘‘चलो हम भी मम्मी को डाँटते है।’’ गलियारे को पार करते हुए मैं सीधा बेडरूम पंहुच गया। खुशबू सचमुच खामोश लेटी हुई थी। मेरी आहट पर उसे कोई असर नही हुआ –“खुशबू!’’ मैंने पुकारा तो वह उठकर बैठ गयी।

“संजय।’’ उसके होंठों पर एक फीकी हॅसी दौड़ पड़ी –“कब आये तुम?’’

“मम्मी से पंखुड़ी की एक शिकायत है।’’ मैंने उसकी बात पर बिना ध्यान दिए हुए कहा।

“क्या?’’ वह पंखुड़ी की ओर देखी फिर खुद पूछ पड़ी –“क्या है पंखुड़ी?’’

पंखुड़ी चुप रही- उसके नन्हें गुलाबी होठों पर हल्की सी हॅसी बिखर गयी।

“पंखुड़ी की शिकायत है कि मम्मी ने उसे डाँटा।’’

“पंखुड़ी… आपने पापा से ऐसा कहा?’’

“हाँ।’’ पंखुड़ी ने सर हिला दिया।

“धत् पगली कहीं की।’’ एकाएक उठकर खुशबू ने उसे मेरी गोदी से छीन लिया। लाड करते हुए बोली –“हमने तुम्हे कब डाँटा? बताओ… बताओ तो जरा।’’

“चाय मिल सकती है?’’ अकस्मात ही बीच में मैं पूछ पड़ा -‘‘सर मे दर्द हो रहा है।’’

“हाँ… जा रही हूँ।’’ खुशबू पंखुड़ी को वहीं छोड़कर अन्दर रसोई की ओर चली गयी।

मैं कपड़ा बदल कर बेड की ओर बढ़ा ही था कि खुशबू चाय का कप लेकर आ गयी।

“एक ही कप!’’ मैं चौंक पड़ा।

“हाँ…मेरा मन नहीं है।’’

“क्यों?’’

“कारण बताना जरूरी है।’’ वह अचानक झल्ला उठी। इस तरह अचानक गुस्सा करते हुए मैंने आज उसे पहली बार देखा था। मैंने अपना सर खुजलाते हुए कमरे मे इधर उधर देखा। मुझे उसके गुस्से का कारण समझ नही आया। मैं चुपचाप चाय पीने लगा। पंखुड़ी टहलते- टहलते कमरे से बाहर निकल गयी।

“संजय।’’ खुशबू ने आवाज दी तो मैं उसकी ओर देखने लगा। उसकी आंखों में एकाएक पानी उतर आया। वह पलके झपकाते हुए बोली –“तुमने आज आफिस में फोन किया था?’’

“क्यो?’’ उसका सवाल सुनते ही चाय का घूँ ट मेरे गले मे अटक गया। मैं खाँ सते हुए पॅूछा -‘‘तुम ये सब क्यों पूँछ रही हो?’’

“बस ऐसे ही। तुम बताओ, तुमने फोन किया था या नहीं?’’ उसके स्वर का कम्पन्न बढ़ गया।

“हाँ, किया था।’’ मुझे स्वीकार करना पड़ा।

“क्यो?’’

“बस ऐसे ही… तुम्हारा हाल चाल जानने के लिए?’’ मैंने बात को वहीं थाम लेना चाहा।

खुशबू चुप हो गयी। थोड़ी देर तक एकटक मेरी ओर देखती रही फिर रुवासी आवाज मे कहने लगी -‘‘संजय, इस तरह तुम मेरे बॉस को फोन करके मेरा हाल चाल ले रहे थे?’’

‘‘सॉरी।’’

‘‘सॉरी…।’’ मुँह बनाते हुए वह बोली -‘‘तुम्हारे सॉरी बोलने पर मैं तुम्हे माँ फ तो कर दॅूगी मगर मेरी जो बदनामी हुई है उसे लौटा सकते हो तुम?’’

मैं कुछ नही कह पाया

‘‘जानते हो संजय?” कहते कहते उसकी आँखों से आँ सू की बूंदे टपक पड़ी। वह रुकी नही। अपनी बात को जारी रखते हुए बोली -‘‘जिस समय तुम्हारा फोन आया था पटेल सर के केबिन पर मैं अकेले नही थी। साथ मे काम करने वाले कई लोग थे। जरा सोचो तुम्हारे इस तरह के सवाल सुन कर सबको कैसा लगा होगा? और मुझे कैसा लगा होगा?’’

‘‘मैं समझ सकता हॅू।’’ मैं द्रवित हो गया।

‘‘तुम नही समझ सकते संजय।’’ एकाएक वह खीझ पड़ी -‘‘जानते हो क्यों? क्योंकि तुम एक मर्द हो। तुम्हे नही पता कि तुम्हारी इतनी सी बात पर लोग मेरे साथ कैसा व्यवहार करेगे? मेरे बारे मे कैसी कैसी बातें होगी?’’

‘‘खुशबू।’’ मैं उसके पैरो के पास फर्स पर घुटनो के बल बैठ गया। मेरी आँखें आँ शुओ से भर गयी। उस वक्त मैं समझ नही पा रहा था कि उससे क्या कहॅू? उसकी हॅथेली को अपने हाँ थों मे भरते हुए मैंने कहा -‘‘मैं अपनी उस हरकत के लिए सचमुच शर्मिन्दा हॅू।’’

‘‘संजय।’’ वह फफक कर रो पड़ी -‘‘तुम्हारे अंदर अगर कुछ था तो यही हमारे घर पर मुझसे बात कर लेते। या ऑफिस के नम्बर पर कॉल करने की बजाए मेरे मोबाइल पर कर लेते।’’

‘‘मैं ये सब कैसे किया… कब? मैं… मैं कुछ समझ नही पा रहा हॅू।’’ कहते हुए मैंने अपना सर उसकी जांघो मे टिका लिया। फिर हम देर तक खामोश रहे। वह मेरे बालो को किसी बच्चे की तरह सहलाती रही।

******

वह इतवार की सुबह थी- हम दोनों छुट्टी पर थे मुझे लगा सारे गिले शिकवे दूर करने के लिए यह बेहतर मौका है।

‘‘हमें कहीं घूमने निकलना चाहिए।’’ खुशबू से जब मैंने अपनी इच्छा जताई तो वह चौंक पड़ी। उसका चौंकना अस्वाभाविक नही था। जब से हम लखनऊ आये थे यह शायद पहला मौका था जब मैंने अपनी तरफ से घूमने की इच्छा जाहिर की। वर्ना खुशबू जब तक रूठने की हद तक नही आ जाया करती तब तक कही बाहर निकलने की योजना नही बन पाती।

खुशबू जल्दी जल्दी नहा कर अपने गीले बालो को झटकती हुई आयी और बेडरूम मे रखी हुई मेक-अप टेबल के सामने खड़ी हो गयी। मैं और पंखुड़ी पहले ही तैयार हो चुके थे इसलिए मैं गेस्टरूम मे लगे सोफे मे बैठ कर अखबार पढता हुआ उसके तैयार होने का इन्तजार करने लगा। पंखुड़ी मेरे पास ही अपने खिलौनो के साथ खेलने मे ब्यस्त हो गयी।

जब काफी देर तक खुशबू नही आयी तो मैंने पांखुड़ी से कहा –“बेटा जाकर देखो तो… मम्मी क्या कर रही हैं? उन्हे बुला लाओ।’’

“नही… हम नहीं जायेंगें… मम्मी अच्छी नहीं है। मुझे प्यार नहीं करती।’’ “रूठने का अभिनय करती हुई पंखुड़ी ने मेरी ओर देखा। मेरे पास आकर कहने लगी -’’पापा आप हमें बहुत प्यार करते हैं?’’

“हाँ बेटा…।’’ मैंने झपट कर उसे अपनी गोदी मे उठा लिया और उसके गालो को चूमते हुए बोला -‘‘पापा आपको बहुत प्यार करते हैं।’’

वह मेरे सीने से चिपक थोड़ी देर तक दुलार करती रही फिर मैं उसे वहीं छोड़कर तेज कदमो से बेडरूम पहंुचा तो दंग रह गया। खुशबू बिल्कुल तैयार थी मगर न जाने क्या आईना के सामने खड़े होकर घूम-घूम कर, हर कोने से खुद को देख देख कर मुस्करा रही थी। इससे पहले कि मैं उसकी हरकतो का कुछ तथाकथित समाजशास्त्रियों की नजरों से मतलब निकालना शुरू करता मैं उसके कंधों को अपने दोनों हाँ थो से थाम लिया। मुझे एकाएक आइने में अपने पीछे देख कर शरमा गयी, और मुस्करा कर बोली -‘‘तुम जानते हो न… कि इस तरह चोरी से किसी लड़की के कमरे में घुसना बुरी बात है?’’

“हाँ… जानते हैं हम।’’ मैं मुस्करा पड़ा –“मगर साहिबा अब आप कोई लड़की नहीं रही… पत्नी हैं हमारी। और हमें इस तरह की हरकतों का पूरा अधिकार है। समझी आप?’’

“जी नहीं।’’ वह बिजली की रफ्तार से मेरी ओर घूमी। फिर हॅसते हुए बोली -’’ऐसा कोई अधिकार नहीं है।’’

“ओ0के0 जी।’’ मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसके आँखों मे देखते हुए बोला -’’जानती हो इस तरह देर तक आईना को देखने का मतलब क्या होता है?’’

“क्या होता है?’’ वह बच्चों सी खिलखिला उठी।

“उसे किसी से प्यार…..।’’ मैं अपनी बात जान बूझकर बीच में ही छोड़ दिया और उसके चेहरे पर बनती बिगड़ती भाव भंगिमाओं को गौर से देखने लगा।

“क्या देख रहे हो?’’ अचानक उसके होंठ सूख गये –“और तुम… कहना क्या चाहते हो?’’ वह उत्तेजित निगाहों से मेरी ओर देखने लगी। पल भर पहले उसके होंठों पर तैरती मुस्कान एकाएक गायब हो गयी।

“यही कि तुम्हें हमसे प्यार हो गया है।’’

“हाँ… हाँ… स… संजय! ह…हमें तुमसे प्यार हो गया है।’’ वह हकलाकर पड़ी। फिर खुद को सम्भाल पायी तो कहने लगी- ’’हम तो तुमसे हमेशा से प्यार करते आए हैं।’’

अगले कुछ मिनटो मे हम चिड़िया घर पहुँच गये।

शेर, हाथी, भालू तथा अनेक प्रकार के पक्षियों एवं जन्तुओं को देखते हुए हम आगे बढ़ते गये। पंखुड़़ी मेरी गोद में थी। हम देर तक इधर उधर घूमते रहे।

“संजय इधर देखो, सफेद बन्दर।’’ खुशबू हैरान होते हुए बोली -“आओ करीब से देखते हैं।’’

हम करीब पहुंचे तो बन्दर का एक झुण्ड बड़ी तेजी से हमारी ओर दौड़ा। पंखुड़ी का चेहरा खिल उठा।

“संजय यह शायद कुछ खाना चाहते हैं।’’ खुशबू बोली।

“क्या खायेंगें? हमारे पास मूंगफली के अलावा तो ऐसा कुछ नहीं है जो इन्हें खिलाया जा सके।’’

“लाओ मूंगफली ही खिलाते हैं।’’

खुशबू मेरे हाँथ से मूंगफली का कुछ हिस्सा अपने हाँथ में लेकर जैसे ही जाल के करीब पहुंची एकाएक सारे बन्दर उसकी ओर टूट पड़े।

“संजय, तुम भी खिलाओ न।’’ वह जाल के अन्दर मूंगफली फेंकते हुए बोली।

मैंने मूंगफली से भरी हॅथेली जाल के अन्दर बढ़ाई और फिर जो नजारा देखा उस पर कुछ देर तक मुझे यकीन ही नहीं हुआ। मेरी ओर एक भी बन्दर नहीं आया। मैंने खुशबू की ओर देखा। मेरा आसय समझ वह हँस पड़ी।

“खुशबू।’’ मैंने हॅसते हुए कहा -‘‘लगता है इंसानों की तरह बन्दर भी बहुत जल्दी खूबसूरत लड़कियो पर फिदा हो जाते है।’’

‘‘हा…हा…हा।’’ खुशबू ठहाका मार कर हँस पड़ी। फिर शरमाते हुए बोली –“ये भी तो इंसान के पूर्वज ही हैं।’’

खुशबू मूंगफली फेंकती हुई मुझसे कुछ दूर निकल गयी थी। पंखुड़ी अब भी मेरी ही गोद में थी। “बेटा।’’ मैंने कहा -‘‘अब कुछ देर के लिए पैदल चलिए। देखो पापा के हाथ दर्द करने लग गये।’’

पंखुड़ी एक अच्छी बच्ची की तरह, मेरी गोदी से उतर कर जमीन पर खड़ी हो गयी । मुझे कुछ राहत सी महसूस हुई। मैं अपने हाँथ को झटकते हुए इधर-उधर चहल कदमी करने लगा तभी अकस्मात मेरी निगाहें एक व्यक्ति पर जाकर ठहर गयी। लगभग 30-35 साल का वह युवक बड़ी तल्लीनता से खुशबू की ओर देखे जा रहा था। फिर जाने अचानक उसे कैसे एहसास हुआ कि उसको मैं देख रहा हॅू। वह एकाएक मुस्करा पड़ा कर बोला- ’’साहब नमस्ते।’’

“नमस्ते।’’ मुझे अजीब सा लगा वह चलता हुआ मेरे पास आ गया।

“साहब आप चिड़ियाघर देखने आये हैं?’’

“हाँ… मगर तुम कौन हो?

“आप नहीं जानते मुझे। वैसे आपकी बेटी बहुत प्यारी है क्या नाम है इसका?’’

“पखुड़ी… मगर तुम हो कौन?’’

“कैसे हो पंखुड़ी बेटा?’’ पॅूछते हुए उसने पंखुड़ी को अपनी गोद में उठा लिया। मैं हैरान नजरों से उसकी ओर देखता रह गया। वह थोड़ी देर तक पंखुड़ी को लाड करता रहा फिर एकाएक उसे मेरी गोदी मे थमा कर वह वहाँ से चला गया।

“संजय चलो यहां से।’’ तभी खुशबू ने आवाज दिया। मैं पीछे मुड़ कर देखा, खुशबू मेरे पीछे खड़ी बड़ी घृणित निगाहों से लौटते हुए उस युवक को घूर रही थी।

पता नही वह कौन था? फोन की उस घटना के बाद मुझे खुशबू से इस बारे मे कुछ भी पॅूछने की हिम्मत नही पड़ी।

****** 

अगले दिन सुबह मुझे घर से जरा जल्दी निकलना पड़ा। ऑफिस में एक मीटिंग थी। उस समय तक पंखुड़ी के लिए दूध नहीं आ पाया तो मैं निकलते वक्त खुशबू को कहता गया कि वह ऑफिस निकलने से पहले हर हाल में दूध मंगा कर रख दे ताकि हमारी अनुपस्थिति में पंखुड़ी को कोई दिक्कत न हो। मैं आफिस तो पहुच गया मगर खुशबू ने दूध मंगा ही लिया होगा इस बात की मुझे तसल्ली नहीं हो पा रही थी। खुशबू इधर कुछ दिनो से इन सब मामले में कुछ लापरवाह सी हो गयी थी।

मीटिंग खत्म होते ही मैंने खुशबू के मोबाइल पर फोन किया तो कॉल नही लग पायी। मैं उसके आफिस फोन किया तो देर तक घंटी बजती रही- फोन नही उठा। मैंने जब पुनः ट्राई किया, फोन किसी कर्मचारी ने उठाया। उससे मैंने खुशबू को लाइन पर बुलाने के लिए कहा तो वह कहने लगा –“सर खुशबू तो आफिस में नहीं है। पटेल सर के साथ कही निकली हुई हैं।’’

“कहां?’’

“पता नहीं है, बताकर नहीं गये।’’

“कोई आफिसियल काम था?’’

“कह नहीं सकता, लेकिन सर आप कौन बोल रहे हैं।’’

“ठीक है मैं बाद में फोन करता हूँ।’’ कहकर मैंने फोन रख दिया।

उस दिन मैं जब शाम को घर पहॅुचा तो पता चला, कि दूध आज आया ही नहीं। मैंने जब आया से पॅूछा कि -‘‘खाने मे पंखुड़ी को क्या दिया था?’’ इस सवाल पर वह मुँह बनाते हुए बोली -’’क्या करती साहब… बिस्कुट के अलावा और कुछ नहीं था। फ्रिज में कुछ सेब रखे हुए थे, उसी को काट कर दिया तो उसे खायी भी नहीं। वह अब भी वहाँ  कटा हुआ रखा है।’’ उसने सामने आलमारी की ओर इसारा करते हुए बोली। मैंने घूम कर देखा- लगभग पूरा का पूरा सेब सुरक्षित था।

वह कितना खायी होगी? मैं अंदाजा नही लगा पा रहा था। मैं दौड़ कर पंखुड़ी को गले से लगा लिया और पुचकारते हुए पॅूछा –“बेटा भूख लगी है?’’

“हाँ ।’’ उसने सर हिलाया।

मैंने बगैर कपड़े बदले सीधे उसे गोद में लेकर बाजार की तरफ निकल गया।

लौट कर आया तो खुशबू आ चुकी थी। वह मुझे देख कर मुस्कराई मगर मैंने कोई प्रतिक्रिया नही दी। मेरे अन्दर पीड़ा थी… पंखुड़ी के लिए अथाह पीड़ा।

“आज तुम आफिस पर नहीं थी? कहाँ गये थे आप लोग?’’ मैंने सवाल किया। आज मुझे इस बात की फिक्र नहीं थी कि वह बुरा मान जायेगी।

“तुमने आज फिर ऑफिस फोन किया? और संजय ये ‘आप लोग’ का क्या मतलब।’’ पहले तो वह भड़की मेरे चेहरे पर खिची क्रोध की रेखाओ का उसे जल्दी ही अनुमान लग गया। उसके होंठो की मुस्कान अचानक गायब हो गयी।

“आप लोग का मतलब है… पटेल के साथ। समझ गयी?’’

“ओह हाँ।’’ उसने एकाएक हॅसने की कोशिश की मगर हौठो ने साथ नही दिया। हकलाते हुए बोली -’’वह क्या है ना संजय… ए… एक जरूरी काम वश हमे हजरतगंज… ।’’

‘‘हाँ हाँ हम जानते है हजरतगंज प्रेस मे तुम्हे जाना पड़ा।’’ मैं अचानक चिल्ला पड़ा -‘‘खुशबू ये बात हम बहुत बार तुम्हारे मुँह से सुन चुके है।’’

‘‘नही संजय हम वह नही कहना चाह रहे थे। दरअसल आज हम दूसरे प्रेस मे गये थे।’’

“किस प्रेस में?’’

उसके दिमाग में कोई नाम आया, वह बोल गयी।

“वहाँ का फोन नम्बर है तुम्हारे पास?’’

“न… नहीं।’’ उसके होंठ सूखने लगे।

“अच्छा छोड़ो…पटेल का तो कोई व्यक्तिगत काँ न्टैक्ट नम्बर होगा?’’

“है।’’

“नम्बर बोलो।’’ फोन मेरे पास ही रखा हुआ था। मैंने रिसीवर उठाते हुए उसकी ओर देखा।

“लेकिन फोन करके उनसे पॅूछोगे क्या?’’

“उस प्रेस का फोन नम्बर।’’ मैंने कहा।

“उन्हें भी नहीं मालूम होगा।’’

“तुम कैसे जानती हो कि उन्हें नहीं मालूम होगा?’’

एकाएक वह चुप हो गयी।

“नम्बर बोलो।’’ मैंने जोर देते हुए कहा।

“साहब मैं जा रही हूँ।’’ तभी एकाएक आया की आवाज आयी।

“जाओ।’’ मैंने वहीं बैठे बैठे कह दिया।

“अ…आया, रू…रूको।’’ कहती हुई तेजी से वह आया की ओर भागी -‘‘दूध आया था?’’ मुझे दूर से खुशबू का स्वर सुनाई दिया। शायद वह मेरे गुस्से के कारण को समझ गयी थी।

उस दिन खुशबू मेरे पास नहीं सेायी। खाना खाने के बाद वह नीचे वाले बेडरूम मे चली गयी। पंखुड़ी मेरे पास ही थी। अगली सुबह घर से निकलते वक्त उसने मुझसे बात नही की।

मैं ऑफिस पहॅुचा तो पता चला कि वह उस दिन फिर ऑफिस नही गयी। शाम को जब मैंने पॅूछा –“आफिस क्यों नहीं गयी?’’ तो झल्ला कर बोली- “मेरी मर्जी। और इसके बाद तुम्हे कुछ कहना है?’’ उसने लाल लाल आँखों से मेरी ओर देखा।

मैं चुप हो गया।

इन गुजरे सालों का वह पहला मौका था जब उसने ‘मेरी मर्जी’ जैसे शब्दो का इस्तेमाल किया था।

रात में फिर हम अलग-अलग कमरे में ही सोये थे।

******–

सुबह मैं जैसे ही नाश्ता करके अखबार उठाया और नजर मुख्य पृष्ठ पर गयी तो एकाएक मेरा पूरा बदन थरथरा उठा। अखबार मे प्रिया का चित्र छपा हुआ था मगर खून से लथपत… जिसमे अब सांसें नही थी। पूरी खबर पढ़ी तो लगा कि अब मैं उठ नहीं पाऊंगा। मेरे पाँ व थरथरा रहे थे।

“अज्ञात हालातों पर दिल्ली मे एक और कत्ल।’’ खबर की मुख्य लाइन थी।

मैं खुद को सम्भाला, बेडरूम पहुँ चा, कपड़ा पहना, अपना पर्स देखा और सीढ़िया उतरते हुए नीचे आ गया। सामने खुसबू खड़ी हैरानी से देख रही थी। क्षण भर के लिए हमारी नजरे टकरायी मगर उसने कुछ नही पॅूछा।

‘‘कल तक आऊंगा मैं?’’ मैंने कहा और घर से इलाहाबाद लिए निकल गया। अखबार की खबर के अनुसार प्रिया की लाश शाम तक इलाहाबाद पहुंच जायेगी।

मैं जब इलाहाबाद के उसके घर पहुंचा, प्रिया की लाश वहां पहुंच चुकी थी। लाश के आस पास कितने लोगो का घेरा था, मुझे ठीक से याद नही है मगर इतना जरूर है कि बड़ी मुस्किल से भीड़ को पार करके मेरी निगाहें उसकी की लाश तक पहुंच पायी थी। उसके चेहरे को छोड़ कर पूरा शरीर सफेद चादर से ढका हुआ था। चेहरे पर नजर पड़ते ही मेरी आँखें रो पड़ी। जी किया कि सबको चीरते हुए उसके पास तक पहुंच जाँऊ और उसे अपनी बाहों में समेट कर चिंग्घाड़ कर रो लूँ , लेकिन ऐसा संम्भव नही हो सका। कुछ बंदिसे थी जिनकी वजह से खुद को सम्भालना पड़ा।

वक्त धीरे धीरे रेंगता हुआ गुजरता रहा। शाम की ढ़लान के साथ ही भीड़ धीरे-धीरे वहाँ से निकलती जा रही थी।

रात का पहला पहर लगभग आखिरी पड़ाव पर था। घर के सामने छोटे से लान पर रखी लास के इर्द गिर्द अब इक्के दुक्के लोग ही बचे थे जो इधर उधर अंधेरा का सहारा लिए दूर दूर तक लान मे छितराए हुए थे। चारो तरफ पूरी तरह से सन्नाटा छा गया। रोते-रोते हर किसी का स्वर रूंध चुका था, और आंखें सूख गयी थी। उस वक्त प्रिया की लाश के सबसे करीब मैं ही था। जिसे ओस की नम बूंदे धीरे धीरे भिगोये जा रही थी। मैंने भरी भरी आँखों से आसमान की ओर देखा। चाँ द लुढ़कता हुआ पश्चिम से पूर्व की ओर लौट रहा था। चाँ द की धुधली रोशनी में मैंने एक बार फिर प्रिया के चेहरे को देखा। उसकी आंखें अब भी खुली थी। पल भर के लिए लगा कि जैसे वह मुझे देख रही है। उस वक्त मुझे उसका सबसे पसन्दीदा शेर याद आ गया। जिसे वह अक्सर मुझे सुनाया करती थी।

थम गयी ये सांसे तेरी जुदाई मे ये मेरे प्यार की हद थी।

छोड़ दिया तुझे तेरे एक कहने पर ये ऐतबार की हद थी

पता था तू नही आयेगा मेरी जिन्दगी मे लौट कर मगर,

मर गये हम, खुली रहीं आंखें ये तेरे इन्तजार की हद थी।

मैं परेशान हो उठा कि संसार का एक खुबसूरत गुलदस्ता को किसी ने कितनी बेरहमी से कुचल दिया गया है फिर ये चांद क्यों अपना सफर बन्द नहीं कर रहा है? ये सबनम की बूंदे सूख क्यों नहीं जाती? क्यों नहीं सारा जहाँ अंधेरा से भर गया? तभी न जाने क्यों मुझे लगा कि दूर अंधेरे में बैठे किसी इंसान की आँखें काफी देर से मुझे घूर रही हैं। कौन हो सकता है? मैंने खुद से सवाल किया। नीतू… नीतू होगी? लेकिन वह यहाँ कैसे? नही नही कोई और होगा? मैं अपने सवालो से अभी निकलने की कोशिश कर ही रहा था कि वह वहाँ से उठ कर लड़खड़ाते कदमो से चलती हुई मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। उसने मेरे कंधे पर रखने के लिए अपना हाँथ बढ़ाया फिर कुछ सोच कर अपने हाँथ समेट लिए। मैने गौर से उसकी आँखों की ओर देखा। वह नीतू ही थी।

‘‘ठण्ड लग जायेगी… छाया मे बैठ जाओ।’’ वह मेरे कानों तक झुकते हुए धीरे से बोली। मैंने कोई उत्तर नही दिया। वह थोड़ी देर तक मेरी प्रतिक्रिया का इन्तजार करती रही, मैं नही उठा तो उसने अपने कंधे पर पड़े दुपट्टे को निकाला और मेरे कंधे मे डालकर वही मेरे बगल में बैठ गयी। रात भर हम साथ रहे, एक फुट की दूरी पर। मगर न फिर उसने कुछ कहा, न मैंने कुछ बोला। सर्द हवाओ के बीच रात गुजर गयी।

सुबह मुखाग्नि के वक्त जब प्रिया की लाश से आखिरी बार चादर उठाया गया तो मैं खुद को सम्भाल नही पाया और चिंग्घाड़कर रो पडा़ -कितनी बेदर्दी से चाकुओं द्वारा उस बदन को भेदा गया था। स्तनों को काट दिया गया। उस स्थान को मैं किस नाम से लिखूं? वहाँ पर कितने चाकू चुभाए गये थे। उसके जिस्म के ऊपर पड़े कपड़े पर एक-एक चाकू का निशान अंकित था। पिसाचों ने उसके बदन में सैकड़ो छेद कर दिये थे। पता नही कत्ल करने वाला कौन था – इंसान या शैतान? कौन था वह?

एकाएक अखबार की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं। क्या मारने में सचमुच सुधाकर का हाथ था? चिता धू-धू करके जल रही थी। हड्डियां चिटक रही थी। प्रकृति के इस प्रलय को देखने वाला उस समय वहां पर कोई नही था… शिवाए मेरे और प्रिया के भाई के।

******

मुझे शाम को वापस लखनऊ लौटना था। ट्रेन के निकलने मे अभी काफी वक्त था।

“कहां जाऊँ । मैंने खुद से सवाल किया। मैं अपने जार्जटाउन के घर पर जाने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था। पापा के जाने के बाद उस घर मे मैं कभी नही गया। उसके निचले वाले हिस्से मे मैंने अपने दोस्त किसन को कोचिंग चलाने की अनुमति दे दी थी। ऊपर का हिस्सा घर के समान से भरा हुआ था।

प्रिया के घर मे मैं नीतू से चार सालो बाद पहली बार मिला था मगर हालात ऐसे थे कि हम दोनो मे कोई बात नही हो पायी। मैंने टैक्सी पकड़ी और सीधे उसके घर उतर गया। दरवाजे पर बैठने वाला इंसान अब बदल चुका था। मुझे दरवाजे की ओर आते देख वह खड़ा हो गया।

‘‘आपको किससे मिलना है? उसने पॅूछा।

“नीतू है घर पर?’’ मैंने पूँछा तो थोड़ी देर तक वह मेरी ओर घूरता रहा फिर बोला -‘‘आपका नाम?’’

‘‘संजय पाठक।’’

“हां साहब हैं तो घर पर ही। कोई काम था आपको?’’

“यार बहुत सवाल जवाब करते हो तुम।’’ मैंने डाँटकर कहा।

“माफ कर दीजिए साहब।’’ वह सकपकाते हुए कहा -‘‘मेरी नौकरी ही ऐसी है। आप यही रुकिए मैं अंदर जाकर पूँछ कर आता हॅू।’’

एकाएक वह अन्दर की ओर लपका फिर अचानक ठहर कर मेरी ओर देखने लगा। हँस कर बोला -’’कोई नही साहब मुझे आप पर भरोषा है। आप अंदर जाइए।’’

“अरे संजय बेटा तुम।’’ दरवाजा पार करके जैसे ही मैंने गलियारे पर कदम रखा अकस्मात ही आवाज आयी। मैंने पलट कर देखा, एक 40-50 साल की अधेड़ औरत मेरे सामने खड़ी थी –“अन्दर आओ… अन्दर आओ।’’

मैं हैरान था 5-6 साल बाद मैं उस हवेली मे घुसा था और जहाँ तक मुझे याद है कि इससे पहले उस अधेड़ स्त्री मैं कभी नही मिला।

‘‘नीतू ऊपर अपने कमरे मे है। इधर सीढियों से चले जाओ।’’ उसने कहा।

अचानक मेरी निगाहें ऊपर बालकनी की ओर गयी तो मैं सहम गया। नीतू सामने बालकनी पर कोहनी के बल झुकी हुई मेरी ओर देख रही थी। हमारी नजरें मिली तो वह मुस्कुरा पड़ी मगर उसकी वह फीकी सी मुस्कान देर तक नही ठहरी। नजरों से ऊपर आने का संकेत करते हुए धीरे से बोली -‘‘आ जाओ संजय।’’

’’हाँ बेटा ऊपर चलो, मैं नाश्ता वही भेजवाती हूँ ।’’ अधेड़ स्त्री बोली। उसकी आवाज मे मेरे लिए मातृत्व ठुस ठुस कर भरा हुआ था।

‘‘जी…।’’ मैं उसकी प्यार से लथपत आँखों की ओर देखता हुआ अभी धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ ही रहा था कि अचानक एहसास हुआ कि वहाँ पर सिर्फ हम तीन लोग नही थे। कुछ और भी थे जो मेरी ओर बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। मैं सबकी नजरों से बचने की कोशिश करता हुआ नीतू के पास पहुँच गया।

नीतू मुझे अपने सामने पा कर थोड़ी देर तक पथराई आँखों से एकटक देखती रही। उसका चेहरा भावहीन था जिसमे न उत्सुकता थी न नफरत। मैंने जब हाँथ मिलाने के लिए अपना हाँथ बढ़ाया तो वह चौंक पड़ी जैसे अभी अभी होश मे आयी हो। उसने अपना हाँथ नही बढ़ाया। अपने सूखे हुए होंठो मे रूखी हॅसी भरते हुए बोली -‘‘कैसे हो संजय?’’

‘‘ठीक हूँ ।’’ मैंने अपने हाँथ समेट लिए -‘‘तुम?’’

‘‘जी रही हॅू।’’ उसने नीचे खड़े लोगो पर निगाह दौड़ाते हुए कहा।

‘‘ये सब मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं?’’ मेरी निगाह भी नीचे खड़े लोगो पर चली गयी।

‘‘मेरे घर भगवान जो आ गये हैं।’’

‘‘भगवान??’’ मैं चौंक पड़ा।

‘‘भगवान ही तो हो तुम।’’

‘‘क्या?’’ यहाँ वहाँ  फिरती मेरी निगाहें एकाएक लौट कर नीतू की आँखों मे ठहर गयी।

‘‘अंदर आ जाओं।’’ कहती हुई वह पलट कर कमरे की ओर बढ़ गयी। घुसते वक्त उसने दरवाजा खुला छोड़ दिया। मैं उसके रूखे व्यवहार पर हैरान था। पीछे पीछे मैं भी अन्दर चला गया।

वह जाकर धड़ाम से सोफे पर बैठ गयी। उसकी नजरें सामने खाली पड़े सोफा की ओर से दौड़ लगाती हुई आई और मेरे चेहरे पर अटक गयी।

मैं कुछ देर नीतू की ओर देखता रहा कि शायद वह कहेगी कि ‘बैठ जाओ’ मगर वह चुप रही।

“बैठने के लिए नहीं कहोगी?’’ आखिर मे मुझे ही उसे शिष्टाचार की याद दिलानी पड़ी।

“संजय मुझे अब ये भी कहना होगा?’’

“हाँ जरूर। मैं तुम्हारा मेहमान हॅू।’’

“संजय।’’ उसने भरपूर निगाहो से मुझे देखा। कुछ पल खामोश रहने के बाद बोली -‘‘भगवान को कौन कहता है कि आओ और बैठो हमारी आत्मा में।’’ एकाएक उसने अपनी पलकें झुका ली। उसके आँखों से पानी की चंद बूंदे उबल कर ज्यो ही फर्स पर टपकी वह उठकर एकाएक कमरे के पीछे वाले दरवाजे की ओर भागी। मैं अभी कुछ समझ पाता उससे पहले एकाएक जोरदार किन्तु दबा हुआ रूदन का स्वर मेरे कानो को चीरता हुआ उस हवेली की दीवारो के बीच कही दफन हो गया। मैं हड़बड़ा कर उसकी ओर लपका। वह एक खम्भे का सहारा लिए हुए खड़ी रो रही थी। मैं समझ नही पा रहा था कि वह ऐसे अचानक किस बात पर रो पड़ी?  

“ये क्या पागलपन है नीतू?’’ मैं उसके कंधे को पकड़ कर खींचने का प्रयास किया तो वह और भी मजबूती से खम्भे से लिपट गयी। रोते हुए बोली –“संजय आज हमें मत रोको। जी भर के रो लेने दो हमें। शायद थोड़ी तसल्ली मिल जाये।’’

“तो हम यूं ही खड़े रहें?’’ मेरी आँखें भी नम हो गयी –“इतने दिनों बाद तुमसे मिलें हैं। कुछ बात नहीं करोगी हमसे?’’

“करेंगें संजय।’’ खुद को सम्भालते हुए वह एकाएक मेरी ओर पलटी। उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं। वह दोबारा आकर सोफे मे बैठ गयी। मैं खड़ा ही रहा।

‘‘अब बैठ भी जाओ संजय।’’ नीतू हॅसने की कोशिश की, बोली -‘‘या फिर आरती जलाऊॅ?’’

‘‘नही, उसकी जरूरत नही है।’’ मैं उसके सामने पड़े सोफे पर बैठ गया।

हम देर तक खामोश बैठे रहे। बात कहाँ से शुरू करें शायद अभी इस बात का फैसला नही हो पा रहा था।

“संजय।’’ एकाएक खामोशी टूटी। स्वर नीतू का था -“हम समझ नहीं पा रहे हैं कि तुम्हे इतने करीब देख कर हम क्या करें? तुम यहाँ आये इसलिए हॅसे या फिर इस बात पर रोये कि तुम अभी चले जाओगे?’’ कहते हुए वह हॅसने की कोशिश की मगर आँसू नही सम्भल पाये… टपाक से एक बूंद फर्स पर गिर गयी। उसने झटके से उस पर पैर रख दिया। अपनी बात जारी रखते हुए बोली-“खैर… तुम वह सब छोड़ो। बताओ तुम कैसे हो आज कल? दुबले होते जा रहे हो। खाते पीते नहीं हो क्या? पहले तो तुम बहुत मोटे थे। कितना बक-बक किया करते थे। अब तो तुम बिल्कुल ही खामोश रहने लगे हो। पहले तुम हॅसते भी बहुत थे।’’ वह बिना रूके हुए बोले जा रही थी -’’संजय, तुम भी तो कुछ कहो… कुछ बताओ अपने बारे में… कुछ पूछो हमारे बारे में?’’

“मौका मिले बोलने का तब तो?’’ मैं पूरी मासूमियत के साथ मुस्करा कर बोला।

मेरी बात का अर्थ समझ पायी तो वह झंेप गयी, दुपट्टे से चेहरा छुपाते हुए बोली -’’तुम अब भी नहीं सुधरे संजय।

“सुधरेंगें भी नहीं ।’’

“क्यों।’’

“सुधारने वाला कोई नहीं है।’’

वह चुप हो गयी। शायद उसका अपना अस्तित्व उसके सामने आ गया था।

उसी समय- एक छोटी सी लड़की कमरे मे दाखिल हुई। उसके हाँ थों में नाश्ता की प्लेट और पानी की गिलास थी।

“यहाँ रख दो।’’ मेज की ओर संकेत करते हुए नीतू बोली।

वह नाश्ता रखकर लौट गयी।

“लो नाश्ता करो।’’ उसने कहा और फिर खुद ही सेब की फांको को उठाकर छीलने लगी -‘‘इस घर मे सब निकम्मे होते जा रहे है। अब देखो न बिना छीले हुए सेब रख दिया तुम्हारे सामने।’’

“रहने दो नीतू। मैं सेब को छिलके के साथ ही खाता हॅू। इसका छिलका हेल्दी होता है।’’

‘‘अच्छा।’’ वह मेरी ओर ऐसे देखी जैसे मैंने भौतिक विज्ञान का नया सूत्र उसे बता दिया हो।

“तुम भी खाओ न।’’ मैंने प्लेट को नीतू की ओर बढ़ाते हुए कहा।

“मैं बाद में खा लूंगी। तुम खाओ।’’

‘‘बाद मे कब?’’

‘‘अरे मेरी फिकर न करो संजय। आज इस घर मे दिवाली मनाई जाने वाली है।’’

‘‘क्यों?’’ मैं चौंक पड़ा।

‘‘घर मे राम जो आये हैं।’’

‘‘तुम पागलो की तरह बातें क्यों कर रही हो?’’ मैंने कहा।

‘‘नीचे तुम्हे जो औरत मिली थी, जानते हो कौन है? कभी मिले हो उनसे?’’

‘‘नही, कौन है?’’

‘‘मेरी माँ ।’’ अचानक एक बार फिर उसकी आँखें छलछला आयी –“जानते हो संजय? वह कई बार मुझे भी नही पहचान पाती। एक बार तो पापा को ऊपर मेरे कमरे मे आने से रोक दिया। मगर अभी तुम्हे…उफ! तुम्हारे लिए उनका यह व्यवहार देखकर मैं हैरान थी। तुम्हे ऐसे पहचान लिया जैसे तुम्हे वर्षो से जानती हो।’’

‘‘लेकिन मैं उनसे कभी नही मिला।’’

‘‘वही तो… उन्होने तुम्हे हमेशा तस्वीर मे ही देखा हैं फिर भी…।’’

‘‘उन्हे हुआ क्या है?’’

‘‘क्या हुआ है? कैसे बताऊ संजय उन्हे क्या हुआ है?’’ कहते हुए वह एक बार फिर भावुक हो गयी। लम्बी सांसे खीचते हुए बोली -‘‘दरअसल वह पापा की तरह मजबूत नही है इसलिए टूट गयी।’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अपनी इकलौती बेटी को कभी विदा नही कर पायी न… इसलिए।’’

‘‘तुमने शादी नही की?’’ मेरी सांसे मेरे गले पर अटक कर रह गयी।

उसने कोई जवाब नही दिया। बस खाली खाली नजरो मे मेरी ओर देखती रही।

‘‘नीतू।’’ मैंने पुकारा -‘‘मैं कुछ पूछ रहा हॅू… मुझे जवाब दो।’’

‘‘क्या जवाब दूँ,संजय?’’ उसने अपनी नजरें झुका ली। मैं थोड़ी देर तक उसके खामोश होठो की ओर तकता रहा। वह नही बोली। मुझसे जब नही रहा गया तो सोफे से उठा और उसके कदमो के पास फर्स पर घुटनो के बल बैठ गया। उसने मुझे रोकने की कोशिश भी नही की। पता नही कहाँ  खो गयी थी?

‘‘नीतू।’’ मैंने आवाज दी तो वह चौंक कर मेरी ओर देखने लगी

‘‘क्या सोच रही हो?’’ मैंने पॅूछा।

‘‘मैं?’’

‘‘हाँ, तुम?’’ मैंने कहा तो वह मुस्कुराने लगी।

‘‘संजय।’’ थोड़ी देर बाद उसने कहा -‘‘मैं तुम्हे जितना निष्ठुर समझती थी तुम उतना हो नही।’’

‘‘अच्छा।’’

‘‘हाँ संजय… मैं सोचा करती थी कि ये जानते हुए भी कि मैंने शादी नही की तुममे कोई असर नही हुआ? इतने निष्ठुर हो तुम? लेकिन तुम्हे तो…।’’ कहते कहते वह अचानक रुक गयी। थोड़ी देर तक एकटक मेरी ओर देखती रही फिर बोली -‘‘संजय, तुमने कभी जानने की कोशिश नही की कि मैं कहाँ हूँ? किस हाल मे हॅू?’’

‘‘नही।’’

‘‘क्यों संजय? इतना बड़ा अपराध तो हमने नही किया था।’’

‘‘अपराध की कोई बात नही थी नीतू।’’ अचानक मैं भावुक हो उठा, बोला -‘‘शायद इसलिए मैं अपने खुशहाल जिन्दगी मे ब्यस्त था या इसलिए कि अपनी बदहाल जिन्दगी को समेटने मे इतना वक्त लग गया कि मुझे फुरसत नही मिली।’’ मैं धीरे से उठकर सोफे मे बैठ गया। इससे पहले कि वह मेरी जिन्दगी के तार छेड़ती, मैंने कहा -‘‘ये सब बातें बंहुत जरूरी नही हैं। तुम बताओ, तुमने अब तक शादी क्यों नही की?’’

‘‘शादी!’’ वह हॅस पड़ी, बोली -‘‘शादी क्या सचमुच जीवन के लिए इतनी जरूरी है?’’

‘‘हाँ ।’’

“लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता।’’ उसने कहा –“मैं अक्सर सोचा करती हूँ राधा के बारे में… मीरा के बारे मे… और संजय, राधा, मीरा ही क्या हमारी किताबें ऐसे बहुत से नामों से भरी पड़ी है जिन्होने जीवन में कभी शादी नहीं की फिर भी उन्होने जीवन जिया है… बेहतर तरीके से जिया। ऐसे ही हम भी जी लेंगे।’’

“नीतू! ये सब बातें किताबों के पन्नों में अच्छी लगती है असल जिन्दगी में ऐसा सम्भव नही है। हाँ अगर तुम राधा की बात करती हो तो राधा सिर्फ इंसान नहीं थी…वह ईश्वर का रूप थी और तुम? तुम क्या हो? इंसान हो नीतू… इंसान।’’ मेरे स्वर मे झल्लाहट थी।

“चलो संजय, हम तुम्हारी बात मान लेते हैं।’’ उसका स्वर भारी हो गया –“हम राधा बनकर नही जी सकते तो न सही लेकिन मीरा? वह तो इंसान थी न संजय। उसे तो तुम ईश्वर का रूप नहीं कहोगे।’’

“नीतू।’’ मेरे स्वर का कम्पन्न बढ़ गया -’’इस तरह भावनाओं में बह जाने से प्राकृतिक आवश्यकताएं नहीं मर जाती हैं और न ही ईश्वर के नियम बदल जाते हैं। ईश्वर द्वारा बनाई गयी हर छोटी बड़ी चीज का अपना एक फर्ज होता है और तुम उस फर्ज से मॅुह नहीं मोड़ सकती। जिन्दगी बहुत बड़ी होती है। न चाह कर भी एक दिन तुम्हें उन्ही राहों मे लौटना पड़ेगा। पूरा करना पड़ेगा उन फर्जों को… और तब क्या करोगी तुम? जानती हो… समाज में जीना मुस्किल हो जाता है।’’

“संजय! मैं जानती हूँ  तुम क्या कहना चाहते हो मगर एक बात याद रखना- तुम्हारे सामने बैठी हुई ये लड़की इतनी कमजोर नहीं है कि वह शारीरिक भूख के सामने घुटने टेक देगी… और न ही विदेशियो की जिन्दगी के पीछे दौड़ लगाने वाली आधुनिक अंधी बाला है। जिसको लगता है कि जिस्म दिखाना आधुनिकता की पहचान है। मैं एक भारतीय नारी हूँ… एक ऐसी नारी जो खुद तो जल सकती है मगर दामन में एक चिनगारी भी नहीं छिटकने देगी। प्रेम में पागल यह बदन अगर एक बार तुम्हारे सामने बेपर्द हो चुका है… तो अब जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर किसी के सामने बेपर्द नहीं होगा।

“नीतू मैं जानता हॅू ये आदर्शवादी बातें कहने मे अच्छी लगती है… सुनने वाले को प्रभावित भी करती है मगर इनका कोई भविष्य नही होता। बातें है इन्हे दौर के साथ बदलना ही होगा। फिरहाल 2003 मे जी रहे हंै हम। आज नारी समाज बहुत आगे निकल चुका है, उनके बीच इस सोच के साथ नही जिया जा सकता।’’

“बेशक संजय… मैं इंकार नही कर रही हॅू। नारी समाज आगे निकल चुका है।’’ उसने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा -‘‘मगर जरा करीब से झाँ क कर तो देखो उस समाज को। वह अन्दर से कितना खोखला है। किसी के जिन्दगी में स्थायित्व नजर आता है तुम्हें? पति पत्नी पुराने कपड़ों की तरह बदल रहे हैं एक दूसरे को। और उनके बच्चें?? संजय… पति पत्नी के अलग होने पर पशुओं के बच्चों की तरह बंटवारा किया जाता हैं उनका। कल शादी, आज तलाक… यह किसका परिणाम है? अगर तुम फिर भी इसे समाज कहते हो तो मैं खुश हूँ कि मैं इस समाज का हिस्सा नही हॅू।’’ उसका चेहरा उत्तेजित हो उठा। अपनी बात जारी रखते हुए वह बोली –“संजय मैं भी तो स्त्री ही हॅू… या नही? क्या मैं बच्चे को जन्म नही दे सकती? या खूबसूरत नही हॅू? मगर फिर भी इस समाज ने मुझे ठुकराया। क्यों संजय?’’

“नीतू।’’ मैं उसे वही रोक लेना चाहा।

‘‘इसलिए न कि…।’’ वह क्षण भर के लिए ठिठकी, फिर आँखों अॅाशू भरते हुए बोली -‘‘मैं छोटे कपड़े नही पहन सकती। बहन जी टाइप दिखती हॅू।’’

‘‘नीतू।’’

‘‘तो संजय इसमे मेरा क्या कसूर अगर मेरी परवरिस ही ऐसी हुई है।’’

‘‘ये सब क्या बोल रही हो तुम?’’

‘‘संजय मैं जानती हॅू कि तुमने प्रिया या खुशबू को क्यो चुना? बोलो सच है या नही?’’

“अच्छा मैं चलूं, नीतू।’’ मैं उठ कर खड़ा हो गया। मुझे उसकी बातें अच्छी नही लगी।

‘‘तुम बुरा मान गये मेरी बातों को?’’ मुझे खड़ा होते हुए देखा तो एकाएक उसकी उत्तेजना गायब हो गयी। चेहरा पीला पड़ गया। सोफे से उठते हुए रुवासी आवाज मे बोली –“हमसे कुछ नहीं पूछोगे? कि हम किस तरह जी रहे हैं? आजकल क्या कर रहे हैं हम? कहाँ रहते हैं?’’

“मेरी ट्रेन का वक्त होने वाला है।’’ मैंने घड़ी की ओर देखते हुए कहा -‘‘तुम जानती हो, मुझे आज ही लौटना है।’’

’’मुझे भी तो लौटना है संजय लेकिन मैं कल निकलूंगी यहां से। अगर तुम्हें दिक्कत न हो तो रात यहीं रूक जाओ कल साथ चलेंगें।

“कहाँ? लखनऊ?’’ मैं चौंक पड़ा –“तुम लखनऊ चलोगी?’’

“हाँ।’’

“कोई काम था वहाँ?’’

“नही संजय। मैं वहीं रहती हॅू। एक छोटी सी नौकरी मिल गयी है।’’

“तुम लखनऊ मे जाब करती हो?’’ मेरा मुँह खुला रह गया -‘‘कब से? किस जगह?’’

“तुम्हारे आस पास ही।’’ उसने कहा -‘‘मन की तसल्ली के लिए उसी में लगी रहती हूँ ।’’

“तुम मेरे बारे में जानती थी?’’

“हाँ । खुशबू और पंखुड़ी के बारे में भी।’’ अपने आखिरी अल्फाजों को वह जरा धीरे से बोली।

मैं एकटक उसकी ओर देखता रह गया। घबराहट थी या खुशी कहना मुस्किल था।

******

मैं रात 11 बजे तक लखनऊ पहुँच गया। डोर बेल मेरे अंगुली के नीचे थी। उस पर जरा सा दबाव पड़ते ही घर के अंदर एक कर्कस आवाज गूँजी ।

कुछ ही देर गुजरे कि घर के अन्दर रोशनी बिखर गयी। खुशबू जाग चुकी थी। मुझे उम्मीद थी कि वह दरवाजा खोलने आयेगी तो कुछ बोलेगी, कुछ पूछेगी या फिर अपनी सहेली की मौत पर दुःख प्रकट करेगी मगर मेरी आशाएं टूटकर तब बिखर गयी जब उसने तेजी से आकर दरवाजा खोला और फिर उसी रफ्तार से बगैर कुछ भी बोले वापस लौट गयी।

मैं लाचार सा उसके लौटते कदमों को देखता रह गया। वह कितनी कठोर हो गयी है। मेरा मन रो पड़ा।

मैं सीढ़िया लांघता हुआ सीधे अपने बेडरूम पहॅुच गया। पंखुड़ी सो रही थी। जी में आया कि उसे जगाकर उसके खामोश होंठो को चूम लूँ मगर कुछ सोचकर अपना इरादा बदल दिया। जल्दी जल्दी मैंने अपने कपड़े बदले और नहाने के लिए बाथरूम की ओर चला गया। उस रात मैं ठीक से सो नही पाया। सुबह, समय से दो घंटे पहले ही मैं अपने आफिस के लिए निकल गया था। मैंने घर पर चाय नहीं पी इसलिए उस दिन बाजार होते हुए गया। लंच के समय भी टिफिन मैंने बाजार से ही मंगवाई थी।

दोपहर के लगभग एक बज रहा था। मैं लंच करने के लिए टिफिन खोला ही था कि एकाएक पंखुड़ी की याद आ गयी -’’क्या हुआ होगा उसका इन दो दिनों में? खुशबू उसका ख्याल रखी भी होगी या फिर मुझसे नाराजगी की भड़ास उससे निकालती रही होगी? मन किया कि फोन करके खुशबू से पूँछ लूँ लेकिन हिम्मत न पड़ी।

मैंने टिफिन बन्द कर दिया –“मैं भी आज नहीं खाऊंगा। मैंने एहसास करने की कोशिश की कि उस दिन पंखुड़ी को कैसा महसूस हुआ होगा?

ट्रिंग- ट्रिंग एकाएक फोन की घंटी बज उठी।

“हेलो।’’ रिसीवर उठाते हुए मैंने बोला।

“खुशबू बोल रही हूँ।’’ उधर से आवाज आयी। मेरा दिल धड़क उठा। पता नहीं अब कौन सा हंगामा होने वाला है?

“हाँ बोलो।’’ मैंने भर्राई आवाज में कहा।

“आज, मैं दूध के लिए नहीं भूली हूँ। पंखुड़ी के लिए पर्याप्त दूध मंगा लिया है। ऑफिस से लौटकर नाराज मत होना।’’ मैं जवाब मे कुछ कहता उससे पहले ही फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

******

उस दिन मुझे इस बात की तसल्ली हो गयी थी, कि शाम को पहुँचूगा तब खुशबू जरूर मेरी यात्रा का हालचाल लेगी। प्रिया के बारे में भी बात करेगी। हो सकता है उसे उम्मीद हो कि मैं उसके मम्मी पापा से भी मिलकर आया होऊॅगा।

शाम आयी तो मगर निराशा भरी। खुशबू ऑफिस से देर मे लौटी और फिर कपड़े बदल कर सीधा रसोई मे घुस गयी। इस दौरान हमारी नजरें कई बार मिली मगर उसने कुछ नही पूँछा। खाना की थाली रखकर जब वह चलने लगी तो मजबूरन मुझे ही बोलना पड़ा -’’खुशबू।’’

वह ठहर कर मेरी ओर देखी।

“तुम्हें मालूम है? प्रिया का कत्ल हो गया है।’’

“कब?’’

“परसों शाम को। अखबार में पढ़ा भी होगा तुमने। तस्वीर भी तो छपी थी प्रिया की।’’

“मैंने अखबार नहीं देखा।’’ बड़ी बेरुखी से उसने कहा और लौट पड़ी।

“सुनो तो…।’’ अन्दर ही अन्दर मैं क्रोध और पीड़ा से तड़फड़ा उठा फिर भी जुबान को संतुलित रखते हुए बोला -’’तुम्हें सुनकर जरा भी दुःख नहीं हुआ, खुशबू वह तुम्हारी सहेली थी।’’

’’और तुम्हारी कौन थी?’’ अचानक वह पलट कर खड़ी हो गयी। उसकी आँखों से गुस्सा टपक रहा था। मेरी ओर झुकते हुए बोली -‘‘बोलो न संजय कौन थी तुम्हारी? दोस्त… प्रेमिका… या रखैल।’’

“खुशबू।’’ मैं चीख पड़ा।

“ठीक ही तो कह रही हूँ। चिल्लाते क्यों हो? तुम्हीं बताओ कौन थी वह तुम्हारी?’’

उसके इस रौद्ररूप को देखकर कुछ पलो के लिए मेरा दिमाग शून्य पड़ गया। मेरे एक साधारण से सवाल पर वह इस तरह की प्रतिक्रिया देगी मुझे बिल्कुल उम्मीद नही थी।

“बोलो, अब चुप क्यों हो?’’ वह खीझते हुए बोली -‘‘शादी से पहले तुम खुद न जाने कितनी लड़कियों के बदन को रौंदे होगे और मैं… मैं एक बार किसी के साथ यूँ  ही चली गयी तो तुम इतनी दूर तक सोचने लगे। मेरे ऑफिस मे फोन कर करके पूछताछ शुरू कर दी।’’ वह बिना मेरी ओर देखे हुए देर तक बरसती रही मुझ पर –“मैं मानती हूँ  हर किसी का अतीत होता है, शायद मेरा भी… लेकिन तुम्हारे जैसे किसी का नहीं होता। एक नहीं तीन… तीन लड़कियों को भोगा है तुमने और उनमें से… एक मैं भी हूँ।’’

“खुशबू बस करो। पंखुडी है यहाँ पर।’’

‘‘तो? उसे भी तो पता चले कि वह कैंसे बाप की बेटी है? दिन भर पापा की पॅूछ बनी रहती है।’’

‘‘कैसा बाप हॅू मैं?’’ मेरी आंखों में एकाएक आँसू छलछला आए -‘‘क्यों तुम रिश्तो को ऐसे… खुशबू बहुत कह लिया तुमने प्लीज अब…।’’ मेरा गला रुँध गया।

सकी निगाह मेरे आँसुओं पर पड़ी तो अचानक वह सहम गयी। अपने शब्दो के तीखापन मे लगाम लगाते हुए बोली –“अब रोते क्यों हो? मुझे रूलाने का इरादा है क्या?’’ कहते हुए वह सचमुच रो पड़ी। इससे पहले मैं कुछ कहता वह तेजी से लपकते हुए मेरे सर को अपने वक्ष से चिपका ली। एकाएका उसका सारा गुस्सा धॅुये की तरह हवा मे उड़ गया। अपने दुपट्टे से मेरे आँसुओं को पोंछते हुए बोली –“जय, आजकल तुम मुझे बहुत रूलाने लगे हो। मैं तुमसे तंग आ चुकी हूँ अब।’’

अचानक उसकी इस हमदर्दी पर मेरी आंखें और भी उबलने लगी। उसने मुझे किसी बच्चे की तरह अपनी बाँ हो मे समेट लिया। वह देर तक मेरे बालो को सहलाती रही।

महीनों बाद हमारे बीच प्यार का बीज पुनः अंकुरित हुआ था जो इधर कुछ दिनो से शायद सूखता जा रहा था। उस रात एक बार फिर हम एक ही कमरे के एक ही बिस्तर पर पति पत्नी बन कर आँखों मे बिना नींद के बोझ के देर तक जागते रहे। मुझे नही पता कि उस रात, बहारों की कितनी कलियां टूटी होगी।

खुशबू पूरे समर्पण के साथ मेरी बाहों मे अपना सर रखे हुए लेटी रही। इतनी थकान के वावजूद उसकी आँखों से नींद गायब थी।

“संजय।’’ अचानक उसने आवाज दी -‘‘सो गये क्या?’’

‘‘नही।’’ मैंने आँखें खोलते हुए उसकी ओर देखा। मुझे सचमुच झाप लग गयी थी।

‘‘प्रिया को किसने मारा होगा?’’ मेरे नंगे सीने को सहलाते हुए वह बोली।

’’पता नहीं। अभी कुछ कह नहीं सकते। अखबार में सुधाकर सहित दो नाम और दिए गये थे। पुलिस को इन्हीं तीनों पर शक है।’’

‘‘काश! सब जल्द से जल्द पकड़े जाये।’’ कहते हुए वह मेरे सीने से सरक कर विस्तर पर सीधे लेट गयी। नजरें छत पर घूम रहे पंखे को घूरती रही।

******

रात का दूसरा पहर दबे पंाव गुजर रहा था, एकाएक डोर बेल चिल्ला उठी।

मैं चौंक कर जागा। मेरी निगाहें दीवाल पर टंगी घड़ी पर गयी, रात के दो बज रहे थे –“कौन हो सकता है इतनी रात को।’’ मैंने बिजली का स्विच आँ न किया। कमरे में रोशनी बिखरते ही पंखुड़ी की आंखें खुल गयी। खुशबू अब भी सोती रही।

“पापा।’’- वह बोली और मुस्कुरा पड़ी।

 झुक कर अपने होंठों से उसके गाल छू लिए –“बेटा तुम सो जाओ।’’ मैंने कहा तो पंखुड़ी पुनः ऐसे लेट गयी जैसे वह मुझसे इतना प्यार पाने की चाहत में जगी थी।

मैं कमरे से निकल कर सीढ़ियां उतरते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा। दरवाजे के पीछे बाहर लगी लाइट की स्विच थी। मेरे स्विच दबाते ही दरवाजे के बाहर एकाएक रोशनी बिखर गयी। मेरा शरीर उस समय काँप उठा जब दरवाजे पर खड़ा व्यक्ति रोशनी विखरते ही झटके से पीछे अंधेंरे की ओर हट गया। ‘कौन हो सकता है? इतनी रात को क्यों आया है?’ कुछ पलो तक मैं सोचता रहा फिर हिम्मत जुटा कर मैंने पूँछा –“कौन है बाहर।’’

“मिस्टर संजय।’’ बाहर से आवाज आयी।

“कौन है? मैंने आपको पहचाना नही। इधर रोशनी में आइए।’’

मेरी आवाज सुनी तो वह चंद क्षणों के लिए वह रोशनी में आया और फिर उसी झटके से लौटते हुए अंधेरे का सहारा लेकर खड़ा हो गया। मैं उसे पहचान नही पाया। बिखरे बाल, उलजलूल कपड़े, आंखों पर बड़ा सा चश्मा। पता नही कौन है?

“मैं तुम्हे नही जानता। कौन हो तुम? जाओ यहां से।’’ कहते हुए मैं पलट पड़ा।

“अरे रूकिए मिस्टर संजय।’’ एक बार फिर वह इंसान रोशनी की ओर दौड़ा “’हम सुधाकर हैं… डाँक्टर सुधाकर… प्रिया का पति सुधाकर।’’

मैंने उसकी ओर गौर से देखा। वह सुधाकर ही था।

“अरे सुधाकर बाबू आप?’’ मैं चौंकते हुए बोला -‘‘इतनी रात को, यहाँ लखनऊ मे?’’

“हाँ मिस्टर संजय… आप प्लीज पहले दरवाजा खोलिए। पुलिस मेरे पीछे पड़ी हुई है और ये रोशनी बुझा दीजिए।’’

मैंने बढ़कर दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही सुधाकर तीव्रता से अन्दर घुसा। मैं उसे लेकर सीधा गेस्टरूम पहंच गया।

“क्या लाऊं सुधाकर बाबू?’’ मैंने पूँछा -‘‘खाना खायेगे आप।’’

“नहीं… नहीं मिस्टर संजय। आप परेशान मत होइए। इस समय खाने पीने की कोई जरूरत नहीं है। आपने पनाह दे दी… मेरे लिए इतना ही काफी है।’’

“ऐसे कैसे हो सकता है?’’ आप मेरे घर में हो, फिर भी… मैं कुछ लेकर आता हॅू।’’

मैं अन्दर चला गया जब लौटा तो अलमारी से बिस्कुट की पैकेट और पानी की बोतल लेकर गेस्टरूम में पहुँच गया।

“मिस्टर संजय, मैंने बेवजह आपको दिक्कत दी।’’ उसके सूखे होंठों के बीच से रूखी हॅसी फूट पड़ी।

“इसमें दिक्कत की क्या बात है सुधाकर बाबू। आप मेरे मेहमान है।’’

वह मेरी ओर खाली खाली नजरो से देखने लगा। मैंने बिस्कुट की प्लेट उसकी तरफ बढ़ा दी। उसने बिना कुछ कहे प्लेट से बिस्कुट उठा कर अपने मुँह मे डाल लिया। उसके दिमाग मे कोई तूफान था जो उसकी खामोश आँखों मे दिख रहा था।

“ये सब कैसे हो गया है सुधाकर बाबू?’’ मैंने पूँछा। मेरे यह सवाल उसके कानो से टकराया तो वह मेरी ओर भरी भरी नजरों से देखने लगा।

‘‘मैंने जो अखबार पढ़ा है वह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है, किसने किया ये सब?’’

मुझे उम्मीद थी कि वह प्रतिक्रिया मे कुछ कहेगा, अपनी सफाई देगा या गुनाह कबूल करेगा मगर उसने ऐसा कुछ नही किया। वह देर तक खामोश बैठा मुँह मे पड़े बिस्कुट ऐसे चबाता रहा जैसे उसे निगलना भूल गया हो।

“और लीजिए।’’ मैंने कहा तो वह अचानक भावुक हो उठा।

उसने अपनी आँ ख से चश्मा उतारते हुए मेरी ओर देखा। उसकी आँखें नम हो गयी थी। खुद को सम्भालने के लिए उसने पानी का गिलास उठाया और एक ही सांस मे गटक गया।

“मिस्टर संजय।’’ खाली गिलास रखते हुए उसने कहा -‘‘प्रिया वास्तव मे जितनी गलत थी, इतना गलत मैंने उसे कभी नहीं समझा।’’

मैंने कुछ नही कहा।

“आप ही बताइए मिस्टर संजय?’’ उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा -‘‘क्या सचमुच जीवन में संतान की इतनी जरूरत होती है कि अगर पति असक्षम हो तो पत्नी किसी गैर मर्द के सामने अपना दामन, अपनी इज्जत सिर्फ इसलिए समर्पित कर दे कि उसे संतान चाहिए।’’

“क्या?’’ मैं चौंक पड़ा -’’आप… आप ये क्या कह रहे हैं सुधाकर बाबू?’’

“हाँ  मिस्टर संजय। प्रिया के कत्ल का मुख्य कारण यही था। वह बच्चा चाहती थी और वह असक्षम पति मैं ही था। मेरी मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि मैं बाप नहीं बन सकता था। और मेरी इस कमजोरी का  उसने ऐसा हल निकाला। उसने बच्चे के लिए मेरे पड़ोसी का सहारा लेने की कोशिश की। इसमें वह सफल भी रही। उसके के पेट में गर्भ आ गया। मैं झूठ नही कहॅूगा मिस्टर संजय। इस मामले मे प्रिया ने इमानदारी भी दिखाई। उसने मुझे इस पूरे मामले को बताया तो मैंने भी उससे कोई शिकायत नहीं की। मिस्टर मैं स्त्री के मातृत्व की उत्कण्ठा को भंली भंति समझता हॅू। उसकी खुशी के लिए मैंने जिन्दगी का यह जहर न सिर्फ पिया बल्कि उसका साथ देने का वादा भी किया। और मैं देता भी…।’’

“फिर उसका कत्ल?’’ मैंने पूँछा।

“उन्हीं लोगों ने मार दिया उसे।’’

“मगर क्यों?’’ मेरे पूरे बदन मे झुनझुनी तैर पड़ी।

“मेरे अलावा प्रिया के और दो लोगों के साथ सम्बन्ध थे।’’ अचानक उसकी आँखों से पानी की चंद बूँ दे उछल कर फर्स पर टपक पड़ी। उसने पलके झुका की। थोड़ी देर खामोश रहने के बाद खुद को सम्भाला, रुवासी आवाज मे बोला -‘‘मेरी प्रिया… उन्ही के बीच पिस कर रह गयी। उसके शरीर पर अपने हक की खीचातानी मे उन्होने उसे ही मार दिया।

‘‘सुधाकर बाबू।’’ मेरी निगाहें एकटक उसके चेहरे पर अटक कर रह गयी।

उसने रुमाल से अपनी आँ खे पोछी फिर लम्बी सांस खीचते हुए मेरी ओर देखा, बोला –“मिस्टर संजय, आप अगर प्रिया की लास देखते, तो समझ जाते कि कितनी बेरहमी से उसे मारा गया है… मेरे ही घर में घुसकर।’’

“आपने बचाने की कोशिश नही की?’’

“उस वक्त मैं आफिस में था।’’

“दिन में कत्ल किया गया था?’’ मैं हैरान होते हुए उसकी ओर देखा।

’’दोपहर में।’’

‘‘मैं इलाहाबाद से आज ही लौटा हॅू। लास देखी है मैंने।’’ मैंने कहा।

‘‘तब तो आप उनकी हैवानियत देखी होगी?’’

‘‘जी…।’’ मेरे आंखों के सामने एक बार फिर प्रिया का वह जख्मी बदन घूमने लगा। ‘इतने खुबसूरत गुलदस्ते का इतना बुरा अन्त?’ मेरे आंखों में पानी की बूँ दे उतर आयी।

सुबह के लगभग पंाच बजने वालेे थे। सुधाकर सोफे पर बैठै बैठे ही सो गया मगर मुझे नींद नही आयी। मैंने उसके हाँथ को हिलाते हुए बोला -‘‘सुधाकर बाबू।’’ नींद की दरिया में डूबा इंसान मेरी एक ही आवाज मे उठकर बैठ गया और फटी-फटी निगाहों से मेरी ओर देखने लगा। इससे पहले वह कोई सवाल करता मैंने कहा -‘‘पाँच बज गये हैं सुधाकर बाबू। जल्दी ही उजाला होने वाला हैं।’’

वह मेरे आसय को समझा तो उठकर खड़ा हो गया। धीरे से बोला “अगर आप को तकलीफ न हो तो क्या मैं आज यहाँ ठहर सकता हॅू? आपको पता है कि मेरे सगे सम्बन्धियो के यहाँ किसी पागल कुत्ते की तरह पुलिस मुझे खोज रही होगी। एक यही जगह है जहाँ उनके पहुचने की संभावना नही है।’’ उसके स्वर में बेतहासा लाचारी थी।

मैं कुछ देर तक सोचता रहा। उस समय पुलिस का लफड़ा मेरी आंखों के सामने घूम़ रहा था और ऐसे मामलो मे मैं जानबूझ कर नही फसना चाहता था। मैंने उसे पनाह देने से इंकार कर दिया। मेरी खामोशी देखा तो बिना क्षण भर भी देरी किए हुए वह वहाँ से निकल गया।

अगले ही दिन, अखबारो में उसकी तस्वीर छप गयी। पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया।

******

खुशबू की नौकरी को लगभग एक साल पूरा होने को था। इस दौरान खुशबू में बहुत बदलाव आ गया था। कभी बात बात पर हॅसने चिंग्घाड़ने वाली वह खुशबू, दिन-ब-दिन खामोश होती जा रही थी। वासना की प्रतिमूर्ति बनी रहने वाली खुशबू जो बिस्तर के नाम पर बड़ी से बड़ी पीड़ा… बड़ा से बड़ा झगड़ा भूल जाने के लिए तत्पर रहती थी, आज उसमे बिस्तर को लेकर बिल्कुल दिलचस्पी नहीं बची। पता नही उसे क्या होता जा रहा है? उसका बेवजह का चिढचिड़ापन, बात बात में तमतमा जाना ऐसे था जैसे मेरे जीवन के हर रोज का हिस्सा बन गया हो।

राज अक्सर कहा करता था कि ‘औरत आपके अनुसार कभी नही ढल सकती इसलिए बेहतर है कि आप उसके अनुसार ढल जाये।’ मैं हर हाल में अपनी बैवाहिक जिन्दगी की टूटती कड़ियों को जोड़े रखना चाहता था और इसके लिए मैं उसकी उपेक्षा, पीड़ा और बेरुखी को जिन्दगी का एक हादसा समझ कर सहता जा रहा था। मैं समझ नही पा रहा था कि उसमें लगातार आ रहे इस बदलाव का कारण क्या है? क्यों वह गृहस्थी को बोझ सा महसूस करने लगी है?

एक दिन तो वह महज इस बात के लिए नाराज हो गयी कि हर रोज सुबह चाय उसी को क्यों बनानी पड़ती है। वह भी उस घर के लिए उतना ही कमाती है जितना कि मैं। उसका कहना था -’’या तो शाम सुबह दोनों पहर चाय और खाना बनाने के लिए कोई नौकरानी घर पर रख ले या फिर एक पहर वह बनाये और एक पहर मैं।

“ठीक है।’’ उसकी जिद पर मैं हँस पड़ा -’’दोनो पहर का खाना हम ही बना लिया करेंगें । नौकरानी की कोई जरूरत नहीं है। उसके हाँथ का खाना मुझे पसन्द नहीं है।’’

मेरी बात सुनी तो वह खुश हो गयी। हॅसते हुए बोली -‘‘नहीं… एक पहर मैं बना लूगी।’’

एक शाम मैं जैसे ही घर पहुचा कि एकाएक फोन घनघना उठा। फोन पर पटेल था- खुशबू का बॉस

“आप कौन?’’ उसने पागलों सा सवाल किया।

“आपने फोन कहाँ किया हैं?’’

“ओह…।’’ वह हो-हो करके हँस पड़ा –“आप संजय जी हैं।’’

“जी हाँ … सही पहचाना आपने। बताइए फोन पर खुशबू को बुलाना है?’’ मैंने गुस्से मे कहा। मुझे घर पर उसका फोन करना विल्कुल पसन्द नही था।

“जी कोई जरूरी नहीं है… बात आपसे भी हो सकती है?’’

“जी बोलिए।’’

“खुशबू की तबियत तो ठीक है ना?’’

“क्यों… आपको उसकी फिक्र हो रही है?’’ उस दिन मैंने भी जैसे ठान लिया था कि सीधा तो कुछ बोलना ही नही हैं।

“संजय जी ऐसी बात नहीं है।’’

“तो…?’’ मैंने पॅूछा।

“दरअसल पिछले दो दिन से वह आफिस नहीं आयी और न ही फोन का उत्तर दे रही है। तो मुझे लगा कि…।’’

“रूकिए रूकिए।’’ एकाएक जैसे किसी ने मेरे सर पर जोर से हथौड़ा मार दिया हो। मेंरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। चंद क्षणों तक मैं रिसीवर की तरफ देखता रहा फिर खुद को सम्भालते हुए पॅूछा –“क्…क्या कहा आपने? जरा फिर से कहिए?’’

“संजय जी, मैंने कहा है कि खुशबू दो दिन से आफिस नहीं आयी। क्या वह बीमार है?’’

“दो दिनों से वह आफिस नहीं गयी?’’ मेरा सर चकरा गया। वह तो हर रोज ही ऑफिस के लिए घर से निकलती थी। मैंने हड़बड़ाहट मे पूँछा -’’आप पूरी तरह से आश्वस्त हैं ना।’’

“जी हां।’’ उसने कहा।

“लेकिन…।’’

“संजय जी।’’ वह मेरी बात को बीच मे ही काटते हुए बोला -‘‘आप जरा फोन पर खुशबू को बुला देंगें क्या?’’

“वह घर पर नहीं है।’’ कह कर मैंने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।

उस दिन खुशबू घर काफी देर में आयी। मैं रसोईघर मे खाना बना रहा था। पंखुड़ी मेरे पास ही खेल रही थी।

“कैसी हो पंखुड़ी?’’ खुशबू ने पंखुड़ी के गालो को छूते हुए बोली। पहली बार उस दिन वह इतने प्यार से पंखुड़ी से बात की थी। पंखुड़ी हँस कर उसकी ओर देखने लगी। मैं चुपचाप खाना बनाने में व्यस्त रहा।

“संजय।’’ एकाएक उसने आवाज दी।

मैंने बेरूखी से उसकी देखा था। उसके होंठ सूखे हुए थे। किसी चोर की तरह वह मेरे सामने खड़ी एकटक मेरी ओर देखे जा रही थी।

“कुछ पूँ छोगे नहीं, कि मैं कहां थी?’’ चंद क्षणों बाद उसने कहा।

“इसका मुझे अधिकार है?’’ मैंने बिना उसकी ओर देखे हुए पॅूछा -‘‘जिन्दगी तुम्हारी है, तुम जो चाहो कर सकती हो।’’ मैं जानता था आज भी उसके पास कोई न कोई बहाना मौजूद होगा।

“संजय, तुम मुझे कितना पराया समझने लगे हो?’’ अचानक उसकी आँखें डबडबा आयीं। मैं चुपचाप खाना पकाता रहा। वह देर तक वही खड़ी-खड़ी मेरी ओर देखती रही।

“पटेल सर ने फोन किया था।’’ मैंने धीरे से कहा।

‘क्या? क्या कहा उन्होंने? अकस्मात ही वह हड़बड़ा पड़ी।

“तुमसे बात करने के लिए कहा था।’’

“इतना ही क…कहा था उन्होंने?’’ उसके चेहरे के भाव बदल गये –“और कुछ कहा… उन्होंने?’’

“नहीं।’’

“ओह। ये सर भी…?’’ उसने लम्बी सांस खीची। उसके होंठों पर हल्की मुस्कान तैर पड़ी -” किसी बात पर इन्हें जरा भी सब्र नहीं होता। अब आज ही देखो।’’ मेरी ओर बढ़ते हुए बोली -‘‘उन्होंने कहा था कि खुशबू जाकर प्रेस की हजरतगंज शाखा से उसकी कार्यकारणी के पन्नों की रिपोर्ट लेकर आ जाओ।’’ वह अचानक अपने पर्स में कुछ टटोलने लगी –“फिर वहाँ के स्टाफ के आलसीपन के कारण जरा देर हो गयी तो घर पर फोन कर दिया।’’

मैंने कही पढ़ा था कि आँ ख मे आँ ख डाल कर जितने भरोषे के साथ औरतें झूठ बोल सकती है वह हिम्मत मर्द कभी नही कर पाता। मैंने गौर से देखा उसकी ओर। खुशबू के चेहरे पर अपार संन्तुष्टि थी। वह अपनी बात जारी रखते हुए बोली -‘‘पटेल सर, शायद उसी के बारे में मुझसे बात करना चाहते थे। अच्छा हुआ संजय, तुमने बता दिया, मैं अभी जाकर फोन करती हूँ ।’’ कहकर वह तेजी से बेडरूम की ओर पलटी।

“खुशबू।’’ मैंने पुकारा। वह खड़ी हो गयी -‘‘फोन यही है रसोई के पास।’’

“फोन यहां रखा है?’’ उसके चेहरे के रंग अचानक गायब हो गये।

“हाँ … दरअसल अभी लगातार दो-तीन फोन आये थे। मुझे बार-बार वहां तक जाना पड़ रहा था, तो इसे लाकर मैंने अपने पास ही रख लिया।’’

“कोई बात नही। मैं अपने मोबाइल से बात कर लूंगी।’’ उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“मोबाइल से क्यो? इसी से कर लो। इसमे लोकल कॉल फ्री है।’’

“हाँ वह तो है।’’ वह थोड़ी देर खड़ी कुछ सोचती रही… देखती रही मेरी ओर।

“पटेल सर ने कहा था कुछ जरूरी काम है इसलिए जरा जल्दी कॉलबैक करे।’’ मैंने कहा।

“जल्दी क्यों?’’ वह अचानक अस्वाभाविक हो उठी। भर्राई आवाज मे बोली -“’पागल हैं वो… मैं अभी फोन कैसे कर सकती हूँ । अरे अभी तो आ रही… कम से कम कपड़े बदल लूं। कुछ सुस्ता लूं। उन्हें तो लगता है हर वक्त काम में पिसी रहूँ । दूसरे की जरा भी परवाह नहीं है उन्हें। मैं नही करती उन्हे फोन।’’

“कमीने बाँ सेस को दूसरों की परवाह कहाँ हुआ करती है।’’ मैंने भी उसके समर्थन का अभिनय किया।

“हाँ संजय। तुम सही कह रहे हो। ये सचमुच बहुत कमीने होते हैं। इन्हें किसी की परवाह ही नहीं हुआ करती है।’’ उसके चेहरे के उड़े हुए रंग दोबारा आ गये।

“संजय। तुम्हारी कुछ सहायता करूं क्या?’’ वह अचानक मेरी ओर बढ़ी।

“नहीं, तुम जाकर कपड़े बदलो। खाना लगभग बन चुका है। मैं टेबल पर सजाता हॅू।’’

“अच्छा ठीक हैं।’’ कहते हुए वह पलटी। फिर अचानक उसे कुछ याद आया तो ठहर गयी। पंखुड़ी की ओर बढ़ते हुए बोली -‘‘पंखुड़ी तुम आओ हमारे साथ। तुम्हारे लिए हम कुछ लाये हैं।’’ कहते हुए उसने पंखुड़ी को अपनी गोद में उठा लिया -‘‘देखना चाहोगी?’’

पंखुड़ी आश्चर्यपूर्ण निगाहों से उसे देखती रही।

******

जब पिता मायूस औलाद को अपने घटिया चुटकुलो से हॅसाने की कोशिश कर रहा होता है उस वक्त वह खुद अंदर ही अंदर रो रहा होता है। मैंने आखिरी दिनो मे ऐसा करते हुए अक्सर अपने पापा को देखा था। मुस्किल के वक्त वह मेरी पीठ पर हाँथ फेरते हुए अक्सर कहा करते कि ‘चिन्ता मत करो, मैं हूँ  न’ और उनके इस भरोषे पर मैं सचमुच चिन्तामुक्त हो जाता मगर वही चिन्ता खुद उन्हे जलाने लगती। माँ  ने बचपन से उन्हे देखने के लिए मुझे अपनी नजर दे दी थी और मैं उन्हे सालो तक उसी नजर से देखता रहा। आज सोच रहा हॅू कि खुशबू अगर यही पंखुड़ी के साथ करे तो? मैंने उचक कर पंखुड़ी के चेहरे की ओर देखा वह खुशबू और मेरे बीच मे लेटी हुई चैन से सो रही थी। उस दौरान मेरी नजरे निद्रा मे डूबे हुए खुशबू के चेहरे पर भी गयी। मैं परेशान हो उठा। पता नही क्यो? शायद इसलिए कि मुझे नींद नही आ रही है या फिर इसलिए कि वह सो रही है।

रात का पहला पहर बीतने वाला था मगर मेरी आखों मे नींद का एक कतरा भी नही था। कमरा में फैली धीमी रोशनी के बीच मैं छत पर लगातार घूम रहे पंखे को देखता रहा। मन मे अथाह कुण्ठा थी। एकाएक मैं उठकर बैठ गया। गर्दन घुमा कर खुशबू की ओर देखा तो मन एकाएक घृणा से भर गया। वह इतना कुछ करके भी चैन से सो रही है और मैं? मैं क्या कर रहा हॅू? मेरा चैन कहाँ गया? उस वक्त अचानक मेरा खून खौल उठा। एक बार तो लगा कि अभी उसका गला घोंट दूँ या फिर उसके जिस्म मे इतने चाकू भोक दूँ कि उसका बदन खण्ड खण्ड हो जाये।

मैं दबे पाँ व बिस्तर से उतरा और पास रखी आलमारियों में कुछ खोजने लगा था। मगर क्या? याद नही आ रहा था। बस देर तक खोजता रहा। मुझे वहाँ कुछ नही मिला तो टहलता हुआ मैं रसोई की ओर बढ़ गया। सब्जी की टोकरी मेरे सामने थी। चाकू? मेरी आँखों मे अचानक चमक आ गयी। हाँ यही तो खोज रहा था। मैंने टोकरी से चाकू उठाया सीधे बेडरूम पहुँच गया।

खुशबू गहरी नींद में थी। मैं थोड़ी देर खड़ा उसे देखता रहा। फिर अकस्मात ही मेरा हाँथ उठा और खच्!! पहला चाकू मैंने उसके पेट में घुसेढ़ दिया। वह तड़प कर मेरी ओर देखी मैंने दूसरे हाँथ से उसका मुँह दबा लिया। फिर… खच्-खच्। न जाने कितनी आवाजें हुई। उसका बदन लहूलुहान हो गया। बिस्तर पर पूरी तरह खून ही खून बिखर गया मगर मेरे मन की पीड़ा अब भी शान्त नही हुई। मैंने बड़ी बेरहमी से चाकू उसके स्तनो मे घुसेड़ दिया। थोड़ी देर तक मैं अपनी लाल आँखों से उसके तहस नहस हो चुके बदन को देखता रहा। उसकी सांसे थम चुकी थी।

“उसके बदन का कौन सा अंग सबसे ज्यादा प्यासा था जिसकी प्यास ने मेरे घर को उजाड़ दिया?’’ मुझे अचानक याद आया तो एकबार फिर मैंने झटके में बीसों चाकू चला दिए।

“पापा।’’ अचानक पंखुड़ी उठकर बैठ गयी। मैं हड़बड़ा कर उसकी ओर देखा। खून बहता हुआ उसके नीचे तक चला गया था। वह अपने खून से भीग चुके हाथों को उठाए हुए मेरी ओर एकटक देख रही थी। फिर अचानक उसकी निगाह खुशबू पर पड़ी तो जोर से चीख पड़ी -‘‘मम्मी को क्या हुआ? उनका खून बह रहा है।’’

“क…कुछ नहीं। कुछ नहीं बेटा।’’ मैं लपक कर खून से सने हुए अपने हाथों की बिना परवाह किए हुए उसे गोदी मे उठा कर बाहर की ओर भागा। तभी अचानक दूर सड़क परं एक जानी पहचानी आवाज गूँजी –“पु…..पु…..पुलिस।’’ मेरे मुँह से चीख निकल गयी।

“क… क्या हुआ संजय?’’ करवट लेते हुए खुशबू चौंककर मेरी ओर देखी।

“स…सपना… सपना था खुशबू।’’ मैं अचानक उठकर बैठकर बैठ गया। बिस्तर को थोड़ी देर तक देखता रहा। मेरा बदन काँप रहा था।

“संजय।’’ खुशबू भी उठ कर बैठ गयी।

“लाइट जलाओ खुशबू।’’ मैंने हाँफते हुए कहा।

अगले पल पूरे कमरे में रोशनी बिखर गयी। मैंने पंखुड़ी की ओर गौर से देखा। वह अब भी सो रही थी। खुशबू मेरी घबराहट देख कर डर गयी। उसे कुछ नही सूझा उसने मुझे अपनी बाहों मे भर कर अपने दुपट्टे से मेरे माथे का पसीना पोंछने लगी।

खुशबू का यह कौन सा रूप था? मैं देर तक उसके चेहरे की ओर देखता रहा।

******

“अगली सुबह मेरे मस्तिष्क में भयंकर उलझन थी। मैं सोच नहीं पा रहा था कि मैं इस उलझन से कैसे निकलू? मैं समझ नही पा रहा था कि खुशबू एक साथ दो चरित्र जी रही थी या फिर मुझे ही कोई गलतफहमी थी? कल जिस ममता के साथ उसने अपने दुपट्टे से मेरे माथे का पसीना पोंछने के वक्त गले से लगा लिया था वह मेरे लिए इस माहौल मे हैरान कर देने वाला था मगर दिन दिन भर बाहर रहना, मुझसे सच छिपाना… उफ! उसका कौन सा रूप वास्तविक है?’’

अस्कर वाइल्ड ने पुरुषो की आलोचना करते हुए कहा था ‘संसार का हर पुरुष हमेशा महिलाओ का पहला प्यार बनना चाहता है जबकि दुनिया की हर महिला पुरुषो का आखिरी रोमांस।’ फिर मेरे साथ ऐसा क्यो हो रहा है? अपने ही सवालो मे जलते हुए मैं टहलने के लिए छत चला गया। मेरे हाँथ में मोबाइल था। मैंने एक नम्बर डायल कर दिया।

“हैलो, कौन? उधर से आवाज आयी।

“संजय बोल रहा हूँ।’’ मैंने उत्तर दिया। मेरा नाम सुनते ही मोबाइल पर कुछ क्षणो के लिए खामोशी छा गयी। मैंने कान से हटाकर मोबाइल की स्क्रीन पर देखा। कॉल चल रही थी -‘‘हेलो।’’ मैंने दोबारा कहा।

“हाँ, बोलो संजय। मैं सुन रही हॅू।’’ चंद क्षणों बाद मुझे सहमा-सहमा सा स्वर सुनाई दिया।

“नीतू।’’ मैंने रुवासे स्वर मे उसे पुकारा।

“संजय।’’ मेरी आवाज उसके कानो से टकरायी तो वह हड़बड़ा गयी, बोली -‘‘तुम परेशान हो?

‘‘नही।’’ मैंने खुद को सम्भाला।

‘‘फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है संजय कि मेरी सांसे रुकने वाली है?’’ कहते कहते उसकी आवाज गले मे फस कर रह गयी।

‘‘नीतू।’’ मैंन पुकारा।

‘‘हॅू।’’ शायद वह रो पड़ी थी, सिसकते हुए बोली -‘‘मैं तुम्हे थोड़ी देर मे फोन करू?’’ उसने फोन काट दिया।

‘किसी ने कहा था कि पुरुष जब महिला से प्यार करता है तो वह अपनी जिन्दगी का बहुत छोटा हिस्सा ही महिला को देता है मगर जब महिला किसी पुरुष को प्यार करती है तो वह अपना सबकुछ दे देती है।’ नीतू इसकी जीती जागती उदाहरण थी। अपनी पिछली मुलाकात में मैंने महसूस किया था कि उसने सचमुच मुझे अपनी जिन्दगी सौप दी मगर मैंने शिवाय दर्द के उसे कभी कुछ नही दे पाया।

ट्रिंग ट्रिंग अचानक फोन बज उठा। वह वादे की पक्की थी।

“बोलो संजय।’’ उसने जरा हँस कर कहा।

हालाकि मैं जानता था कि वह अपनी हॅसी के पीछे कोई दर्द था जिसे छुपा रही थी मगर मैंने उसे छेड़ा नही। मैंने कहा -‘‘आज मैंने कुछ कहने के लिए फोन नहीं किया है नीतू। आज मैं सिर्फ सुनना चाहता हूँ। तुम ही कुछ कहो… कोई सलाह दो मुझे।’’

‘‘ऐसा क्यो कह रहे हो संजय?’’

‘‘क्योकि मैं जानता हॅू कि मेरी शादी से पहले और शादी के बाद, वे दोनो खत तुमने ही लिखा था।’’

‘‘संजय।’’ वह एकाएक खामोश हो गयी, थोड़ी देर बाद बोली -‘‘दरअसल मैंने…?’’

‘‘नही नीतू।’’ मैंने उसकी बात बीच मे ही काट दी, गम्भीर होते हुए बोला -‘‘उस बारे मे तुम्हे कोई सफाई देने की जरूरत नही है। ये मेरा दुर्भाग्य था कि मैंने तुम्हारी सलाह पर कभी ध्यान नही दिया।’’

वह फिर चुप हो गयी। मैं थोड़ी देर तक उसका इन्तजार करता रहा। वह नही बोली तो मैंने आवाज दी। वह चौंक पड़ी। धीरे से बोली -‘‘मुझे नही पता संजय कि ऊॅची एड़ी के जूतो का अविस्कार किसने किया है मगर यकीन मानो उन जूतो को पहनने वाली दुनिया की सारी महिलाये उसका कर्ज कभी नही उतार पायेगी।’’

‘‘नीतू।’’ मैं हैरानी भरे अंदाज मे उसे पुकारा। मुझे उसकी बात समझ नही आयी तो मैंने पॅूछा -‘‘इसका मतलब?’’

‘‘कुछ बातो का मतलब नही होता है संजय।’’ वह अचानक हॅस पड़ी -‘‘इत्र जानते हो न?’’

‘‘हाँ ।’’ कहने को तो मैंने कह दिया मगर समझ नही पा रहा था कि वह क्या कहने की कोशिश कर रही थी। मैंने संदेहात्मक भरे स्वर मे पूँछा -‘‘तुम परफ्यूम की बात कर रही हो?’’

‘‘एक दार्शनिक थे – ‘कोको चैनेल’।’’ उसने मेरी बात पर बिना ध्यान दिए हुए अपनी बात जारी रखते हुए बोली -‘‘कोको चैनेल ने कहा था कि वे औरते जो इत्र नही लगाती उनका कोई भविष्य नही है। और मैं शायद उन्ही मे से हॅू।’’ उसने अपने आखिरी शब्दो को धीरे से कहा।

‘‘लेकिन नीतू इससे मेरी बातो का क्या लेना देना?’’ मैंने पॅूछा।

‘‘नही संजय… दरअसल ये जिन्दगी का सार है और इन्ही चंद शब्दो मे जिन्दगी की पूरी समस्याए और सारे सुख निहित होते हैं। जानते हो कैसे?’’ वह थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोली।

‘‘कैसे?’’ मैंने पॅूछा।

‘‘संजय, ऊॅची एड़ी के जूते पहने हुए और इत्र की खुशबू से महकती गोरी औरतें कभी अकेली नही होती। श्वेत पुरुष उन्हे प्यार करते है और अश्वेत उन्हे पाने की इच्छा रखते है। और तुम जानते हो न… कि जिस भी चीज की मांग बढ जाती है, शाश्वत नियम है कि उसकी कीमत भी बढ़ जाती है। और जिन्हे फिर देर तक बाजार से दूर नही रखा जा सकता। क्योंकि आज के समाज मे ऐसे बहुत लोग हैं जो मंहगी चीजो के शौकीन होते है।’’

उसकी बात एक बार फिर मेरे सर के ऊपर से निकल गयी। मैंने चंद क्षणो तक मोबाइल को कान से हटाकर उसे एकटक देखता रहा। समझने की कोशिश कर रहा था कि फोन पर नीतू है या राज। दोनो की बातें मुझे समझ नही आया करती। पता नही कौन सी किताबें पढ़ते हैं दोनो?

‘‘संजय।’’ मुझे खामोश देखकर नीतू ने पुकारा।

‘‘हॅू।’’ मैंने धीरे से कहा।

‘‘तुम जानते हो कि…।’’

“अब मैं कैसे निकलू इस हालात से? मैंने उसकी बात बीच में ही काट दी। उसे और इधर उधर की बातें करने का बिना मौका दिए हुए मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा -‘‘मैं अब हार चुका हूँ नीतू। मैं सचमुच समझ नहीं पा रहा हूँ कि अपने दाम्पत्य जीवन को बिखरने से कैसे रोकू?’’

“संजय।’’ उसने कुछ कहना चाहा।

“रुको नीतू।’’ मैंने एक बार फिर उसकी बात बीच मे ही काट दी -’’मैं इंजीनियरिंग का छात्र रहा हॅू। टिपिकल बातें मुझे जरा कम समझ आती है। क्या तुम मेरी समस्याओ का हल आसान भाषा मे मुझे समझा सकती हो?’’

‘‘आसान भाषा?’’ वह हँस पड़ी -‘‘संजय मैं कोई टीचर नही हॅू तुम्हारी… और सच कहॅू तो… मेरे पास तुम्हारी समस्याओ का कोई हल है भी नही। मगर मुझे इतना पता है कि आसान भाषा, समझ मे तो जल्दी आ जाती है मगर उसका प्रभाव इतना नही होता कि लोग उसका अनुसरण करे ही। यही मानव स्वभाव है।’’

            ‘‘क्या तुम जानती हो कि पिछले 3-4 दिनो से खुशबू कहाँ जाती है?’’

            ‘‘नही… मगर तुम ये मुझसे क्यों पॅूछ रहे हो?’’

            ‘‘क्योंकि वह तुम्हारी अच्छी दोस्त है।’’

            ‘‘नही संजय। तुम्हारी शादी के बाद से ही उसने मुझसे बात नही की। पता नही वह किस बात पर मुझसे नाराज है?’’

            ‘‘शायद वह जान गयी है कि तुम मुझसे…।’’ मैंने कहा।

            ‘‘मुझे भी यही लगता है।’’ अचानक उसके स्वर मे उदासी छा गयी।

            ‘‘नीतू तुमने बताया नही?’’

            ‘‘क्या?’’

            ‘‘कि खुशबू कहाँ जाती है?’’

            ‘‘मुझे सचमुच नही पता संजय।’’

            ‘‘तो फिर तुमने जो खत मे लिखा था वह सब कैसे?’’

            ‘‘संजय।’’ वह हँस पड़ी -‘‘खुशबू के ऑफिस मे मेरी एक दोस्त भी काम करती है। उसी ने बताया था।’’

            ‘‘तो क्या तुम उससे बात कर सकती हो? शायद उसे कुछ पता हो।’’  

“ठीक है संजय मैं बात कर लूँ गी… मगर एक बात कहॅू तुमसे?

‘‘कहो।’’

‘‘वासना या किसी गैरमर्द के प्यार के लिए दौड़ती ऐसी औरतों का भटकाव ज्यादा दिनों तक नही ठहरता। उन्हें जल्दी ही एहसास हो जाता है कि जो प्यार, जो अपराधबोध रहित चरम सुख उन्हें अपने पति से मिल सकता है वह कहीं अन्यत्र सम्भव नहीं है। इसलिए मुझे लगता है कि तुम अगर रख सको तो थोड़ा धैर्य रखो। जल्दी ही उसे अपनी गलती का एहसास हो जायेगा। और तब वह शायद हमेशा के लिए तुम्हारे पास पूर्ण मन और समर्पण के साथ वापस लौट कर आ जायेगी।’’

‘‘नीतू…।’’

‘‘मैं जानती हॅू संजय, तुम क्या कहना चाहते हो।’’ उसने मेरी बात काटते हुए बोली -‘‘मगर एक बात सोचो… कि तुमने उसके गुनाह को इतनी बार बर्दास्त किया है, तो प्लीज थोड़ा और कर लो। हालाकि मैं जानती हॅू कि पुरुषो मे ऐसी सहनशीलता नही होती जो तुममे है… जो अपनी पत्नी के ऐसे गुनाह को भी माफ करने की हिम्मत रखता है वरना मैंने इतना बड़ा दिल हमेशा औरतो मे ही देखा है।’’ मैं चुप हो गया।

“संजय तुम सुन रहे हो न?’’ मुझे खामोश देख कर वह बोली।

“हाँ सुन रहा हूँ।’’

‘‘अच्छा सुनो…।’’ अचानक उसके स्वर मे खनक आ गई, बोली -‘‘तुम हर रोज यूँ ही छत पर टहलने आ जाया करो।’’

‘‘ठीक है।’’ मैंने भारी मन से कहा और फोन काट दिया।

फोन कटने के बाद मैं सोचने लगा कि मैं नीतू से बात करने से पहले ज्यादा परेशान था या बात करने के बाद? कुछ समझ नही आया तो लड़खड़ाते कदमो से मैं सीढ़ियां उतरने लगा। 

अभी मैं आखिरी सीढ़ी को लांघकर फर्स पर कदम रखने ही वाला था कि अचानक मेरा दिल ठहर गया। उसने आखिरी मे क्या कहा था? क्या कहा था उसने? मैं याद करने की कोशिश करने लगा -‘‘हाँ… हाँ यही तो कहा था कि -‘‘तुम हर रोज यूं छत पर टहलने आ जाया करो।’’ लेकिन उसे कैसे पता? सौ टन का सवाल एकाएक मेरे ऊपर आ गिरा। मैं खुद को सम्भालते हुए उल्टे पाँ व छत की ओर भागा। पहुच कर इधर उधर देखा तो मुझे वहाँ कोई नही दिखा। मैंने एक बार फिर नीतू को फोन लगा दिया।  

फोन उठाते ही वह जोर से हँस पड़ी, बोली –“हमें मालूम था संजय… कि तुम फोन लगाओगे।’’

“नीतू एक बात बताओगी?’’- मैं बिना वक्त गवाये अपने असली मुद्दे पर आ गया, पॅूछा –“तुम्हें कैसे मालूम कि मैं छत पर था?’’

“हमें तो यह भी मालूम है कि तुम नीली शर्ट में हो।’’ वह फिर खिलखिला पड़ी -‘‘और जानते हो संजय? हम यह भी जानते हैं तुम अपने आस पास हमें खोजने की कोशिश कर रहे हो। बोलो है न?’’

“ये सब तुम कैसे जानती हो?’’

“क्यों बताए?’’ वह किसी बच्चे की तरह मुझे छेड़ते हुए बोली -‘‘बस इतना जान लो हमें तुम्हारी पल पल की खबर रहती है। यकीन न हो तो आजमा लो।’’

‘‘अच्छा।’’

‘‘हाँ । बोलो तो बताएं हम कि इस समय तुम क्या कर रहे हो? तुम अपना दायाँ हाँथ सर पर रख कर पूर्व की ओर बनी ऊॅची इमारतों पर हमें ढूंढने की कोशिश कर रहे हो। है न? शायद तुम्हे लग रहा है कि हम इन्हीं खिड़कियों में कही दिख जायेंगें। लेकिन नहीं यार हम ऐसे भी…।’’

“रूको… रूको।’’ एकाएक मैं चिल्ला पड़ा –“जरा फिर से कहो।’’

“क्या?’’ उसने पॅूछा।

“जो तुमने अभी कहा। अपनी आखिरी लाइन को।’’

“क्या कहा था? संजय हमें नहीं याद, तुम ही बता दो कि क्या कहा है हमने?’’

“यही कि… लेकिन नहीं यार।’’

कालेज के दिनों में यही वह नीतू थी जो बात बात में ’यार’ कहने की आदी थी और आज इतने सालों बाद बड़ी मुश्किल से उसके मुँह से वह छोटा सा शब्द सुनने को मिला था। दिल कह रहा था कि वह उस शब्द को बार-बार हर बार दोहराती रहे।

“सुन तो लिए हो तुम, फिर हम दोबारा क्यों कहें?’’ वह बच्चों सी झेंप गयी। शायद उसे भी याद आ गये थे- कालेज के दिन।

“अच्छा फोन रखो, पंखुड़ी आवाज दे रही है हमें। तुमसे बाद मे बात करते हैं।’’ मैंने कहा।

“हम क्यों रखें… तुम्हीं रखो।’’ अचानक किसी नन्ही गुड़िया की तरह जिद्दी लहजे मे बोली।

“नही… तुम रखो।’’ मैंने भी उसी लहजे मे जवाब दिया।

“संजय, फोन तुमने लगाया था तो तुम रखो… हम नहीं रखेंगें।’’

दरअसल मैं यही चाहता भी था कि वह हॅसे, खिलखिलाए, जिद करे और इन रोने धोने के दिनों को छोड़कर लौट जाए अपने पुराने खिलखिलाते दिनों में।

“अच्छा हम रखें?’’ मैं हार मानते हुए बोला।

“तुम क्यों रखोगे?’’ सहसा उसने पैंतरा बदल लिया –“तुमने हमें कहा है तो हम रखेंगें।’’ हँस कर उसने कहा और फोन डिसकनेक्ट हो गया।

मैंने एक बार फिर अपने घर के चारो तरफ देखा। वह नही दिखी तो अपना सर मलते छत से नीचे उतर आया। पंखुड़ी मेरा इन्तजार कर रही थी।

****** 

रात को लगभग बारह बजने वाले थे, खुशबू अब तक घर नहीं पहुँ ची। उसे देर हुआ करती थी मगर यह उसकी हद थी। जहां तक मुझे याद है वह 9 या 10 बजे तक अक्सर आ जाया करती थी। उस दिन मैंने सोच लिया था कि आज वह हर कुछ कर जाऊँगा, जो मुझे बहुत पहले करना चाहिए था। अब और बर्दास्त नही हो रहा है।

मैंने 6 बजे के आस पास उसके आफिस मे फोन करके पता कर चुका था कि वह वहाँ से निकल चुकी है। फिर लगभग 6 घंटे से वह कहाँ है। किसके साथ है?

मैंने पंखुड़ी को खाना खिलाने के बाद बिस्तर पर सुलाने के लिए ले गया मगर वह सोई नही। दरअसल उसे मम्मी और पापा के बीच मे सोने की आदत थी। मैं उसे लेकर बरामदे मे आ गया।

लगभग सवा बारह बज रहे थे कि एकाएक किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। मैं आखें फैलाकर दरवाजे की ओर देखा। अंधेरा और रोशनी के झुरमुट को पार करती खुशबू चली आ रही थी। उसके हाँथ में कोई कागज का टुकड़ा था जिसे वह लहरा रही थी।

कुछ पल गुजरे तो वह एकाएक बरामदे की रोशनी में दाखिल हुई। मैं उससे कुछ दूरी पर कुर्सी पर बैठा हुआ। हमारी नजरे मिली तो वह वही ठहर गयी और हाँथ मे लहरा रहे कागज को पढ़ने लगी।

“प्रेम पत्र होगा अपना?’’ अन्दर ही अन्दर मैंने सोचा। मेरे दिल की धड़कन एकाएक रफ्तार पकड़ ली। वह पत्र पढ़ चुकी तो तेजी से मेरी ओर बढ़ी। मैंने उसके चेहरे से अपनी नजरें हटा ली।

“पंखुड़ी।’’ उसने पुकारा। पंखुड़ी मेरे पास ही एक खिलौने में व्यस्त थी।

‘‘मम्मी।’’ पंखुड़ी एकाएक खिलौना छोड़कर उसकी ओर भागी। खुशबू ने उसे गोद मे उठा लिया। उस दौरान उसकी नजरें एक बार फिर मेरी नजरों से टकराई। उसके चेहरे पर डर या संकोच का एक तिनका भी नही था। मैं इससे पहले कुछ पूँछता उसने पंखुड़ी के नन्हे हाँ थों मे उस कागज को थमाते हुए बोली –“लो अपने पापा को उनका प्रेम पत्र दे दो। बोलना दिल्ली से आया है।’’

‘‘पत्र… दिल्ली से?’’ मैं तेजी से कुर्सी से उठा और लपक कर पंखुड़ी के हाँथ से झपट लिया।

“सब्र नही हो रहा है जरा भी।’’ वह मेरी ओर टूट कर ऐसे देखी जैसे गुनाह उसने नही मैंने कर दिया हो। मैंने कुछ नही कहा।

चंद क्षणों तक वह मेरी ओर देखती रही फिर अपने पर्स को वही खड़े खड़े दरवाजे के सामने ही रखे बेड पर फेक कर बाथरूम की ओर चली गयी।

पत्र प्रिया का था जिसने अपनी मौत के दो दिन पहले ही लिखा था जो इतने समय बाद मुझ तक पहुँच पाया। प्रिया को मरे हुए एक महीने से भी ज्यादा हो चुके थे। फिर इतने दिन कहां था यह पत्र? शायद खुशबू के पास? या हो सकता है कि मुझ तक पहुँचने मे ही देरी हो गयी हो। भारतीय डाक है कुछ भी हो सकता है।

मैं पत्र को लेकर बेडरूम चला गया।

संजय!

कैसे हो तुम? उम्मीद है ठीक ही होगे। आज इतने दिनों बाद खत लिख रही हूँ बुरा मत मानना बहुत से कारण थे जिनकी वजह से खत नहीं लिख पायी। वैसे तुमने भी तो नहीं लिखा मुझे। शिकायत कर रही हॅू, बुरा मत मानना। तुम जानते हो यह मेरी आदत है।

संजय तुम सच कहते थे कि सुधाकर बहुत अच्छे इंसान हैं। शायद उससे भी ज्यादा जितना तुमने मुझे बताया था। मैं सचमुच उनकी बहुत इज्जत करती हूँ। और वह भी मुझे जान से ज्यादा चाहते हैं। लेकिन पता नही क्यों मैं आज भी नही समझ पा रही हॅू कि तुम मेरे क्या हो? दोस्त? जो भी हो उसी रिश्ते से तुम्हे बता रही हूँ… अपने जीवन के बारे मे… अपने आज के बारे मे।

संजय, मैं अतीत को भुलाने की कोशिश में अपने वर्तमान में फँ स गयी हूँ। जिससे निकलने का अब मुझे कोई रास्ता नही सूझ रहा है। मैं अपने इस सच के साथ अकेली पड़ गयी हॅू और अब उससे निकलने के लिए अकेले ही लड़ रही हॅू। जानते हो क्यों? क्योंकि इस सच के बारे मे मैं सुधाकर को भी बताने की हिम्मत नही जुटा पा रही हॅू।

मैं नही जानती कि जो कुछ मैं बताने जा रही हॅू उसे जानकर तुम मेरे बारे में क्या सोचोगे मगर फिर भी बता रही हॅू… शादी के तीन साल बाद भी जब हमारे कोई बच्चा नहीं हुआ तो मुझे बहुत दुःख हुआ। हम दोनों ने ही अपना चेक-अप करवाया तो पता चला कि सुधाकर कभी बाप नहीं बन सकते। इस खबर ने मुझे अन्दर तक तोड़ कर रख दिया। संजय, मैं तुम्हें हर हाल में भूलना चाहती थी और उसके लिए मुझे ढ़ेर सारे बच्चे चाहिए थे। तुम्हे याद है? मैंने तुमसे कहा भी था ताकि मैं उनमें व्यस्त रहॅूं।

मैं काफी दिन तक खुद में घुटती रही और क्या कर भी क्या सकती थी? जब ऊपर वाला ही बारिस के पानी मे आग लगा दी तो मैं बंजर ही बनूंगी। पता नही भगवान कभी-कभी इतना बेरहम क्यों हो जाया करता है? खासकर मुझे लेकर। मैंने तुम्हे पाना चाहा, तुम नही मिले। तुम्हे भूलने के लिए बच्चे चाहिए थे, बच्चे नही मिले। मैं कब तक ऊपर वाले की कठपुतली बनकर नाचती रहती। मैंने उसको चुनौती देने का फैसला किया। मुझे यह बात लिखने में संकोच हो रहा है मगर सच्चाई से कब तक मुंह मोड़ती फिरूगी। मैंने बच्चे की ख्वाहिस में अपने एक पड़ोसी युवक का सहारा लिया और उसमें सफल भी हुई। अब इस वक्त जब मैं तुम्हे खत लिख रही हॅू, उसका गर्भ मेरे पेट मे आ चुका है।

हालाकि मैं कुछ दिनों तक इस बात को सुधाकर से छुपाती रही मगर यह एक ऐसा सत्य था जिसको एक न एक दिन सामने आना ही था। मैंने सुधाकर को यह बात बता दी। सुधाकर बहुत अच्छा इंसान है। वह मेरे मातृत्व के सामने झुक गया और बच्चे को अपना नाम देने के लिए तैयार हो गया। मगर मेरी बदनसीबी देखो संजय… अब एक दूसरा व्यक्ति मेरे पीछे पड़ गया। वह मेरे पड़ोसी का दोस्त है। वह चाहता है कि मैं उसके साथ भी वही सब करूँ  जो मैंने अपने  पड़ोसी के साथ करती रही हॅू। उसने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने उसकी बात नही मानी तो वह दुनिया के सामने मेरे सच को उजागर कर देगा। उस हालात मे मैं क्या करती? मैं एक औरत हूँ और तुम जानते हो औरत होना क्या होता है? मुझे जिन्दगी का वह जहर भी पीना पड़ा। वह दोनो दोस्त अब आपस दुश्मन बन गये हैं। और मैं दो गैर मर्दो के बीच लगातार पिस रही हूँ। किसी सुनू और किसकी नही… मुझे कुछ समझ नही आ रहा है। मैं अपनी इस मजबूरी को अब सुधाकर से भी नहीं कह पा रही हूँ। संजय, तुम इसे मेरी कमजोरी भी कह सकते हो फिर भी पॅूछ रही हॅू, बताओ, अब मैं क्या करूं? कौन सा रास्ता पकड़ूँ और किसे छोड़ू? दुनिया के डर से अब मैं अघोषित वैश्या बनकर रह गयी हूँ। मैं बहुत घबरा रही हूँ। डर रही हूँ कि एक बच्चे की ख्वाहिश मे फँ स कर आखिर कब तक यूँ घसीटती रहेगी मेरी ये जिन्दगी? क्या होगा इसका अन्त?

खैर संजय छोड़ो मेरी बातों को। मेरी जिन्दगी ही ऐसी है मैं चाह कर भी इन सब से बच तो नहीं सकती। तुम बताओ, तुम कैसे हो? कैसे कट रही है तुम्हारी? वैसे तुम तो बहुत खुश होगे- खुशबू लड़की ही ऐसी है। दोस्त जो है हमारी। एक बात बताओ संजय, क्या अब भी वह लड़की लगती होगी? औरत बन गयी होगी न वह अब तक। कभी उससे मिलवाओगे मुझे। वह मुझे अब तक माफ कर पायी या अब भी नाराज है? ओह हाँ … एक बात पूछने को भूल रही हूँ, कि अब तक तुम बच्चों की एक टीम तैयार कर पाये कि नहीं। याद है न कि तुमने क्रिकेट टीम तैयार करना चाहते थे?

मुझे तुम्हारी बहुत याद आया करती है। मैंने गुस्से मे तुम्हारा फोन नम्बर भी अपने मोबाइल से हटा दिया था ताकि तुम्हे फोन भी न कर पाऊँ । खत के नीचे मैं अपना नम्बर लिख रही हॅू कभी कभी फोन कर लिया करना।

                                                                        तुम्हारी

                                                                        प्रिया

खत समाप्त होते ही मैं चिंग्घाड़कर रो पड़ा। क्यों भगवान कभी-कभी सचमुच किसी के लिए इतना कठोर हो जाया करता है।

“बस करो… अब इतना भी मत रोओ।’’ एकाएक दरवाजे पर खड़ी खुशबू ने तंज कसा –“देखा पंखुड़ी अपने पापा को, कितना दुःख हो रहा है उन्हें दूसरे के दर्द में। कभी कभी हमारे लिए भी रो लिया करो।’’

‘‘खुशबू।’’ मैंने अपनी लाल लाल आँखों से उसकी ओर देखा।

‘‘चिल्ला क्यों रहे हो? क्या गलत कहा मैंने?’’ कहती हुई वह पंखुड़ी को वहीं दरवाजे पर छोड़ बरामदे की ओर पलट पड़ी। पंखुड़ी दौड़ती हुई मेरी गोदी में आ गयी। मैं देर तक बिस्तर मे औंधेमुँह लेटा रहा। सोचता रहा प्रिया की जिन्दगी के बारे मे। पंखुड़ी मेरे बगल मे चुपचाप लेटी रही।

“संजय।’’ एक बार फिर खुशबू का कर्कस स्वर भेद गया मेरे कानो को –“अब पड़े ही रहोगे क्या? मुझे भूख लगी है चलकर खाना निकालो।’’ कहती हुई वह कमरे में घुस आयी। मैंने कोई जवाब नही दिया।

रात गुजर गयी। मैंने सुबह-सुबह उस पत्र को न्यायालय को पोस्ट कर दिया था मुझे यकीन था प्रिया का यह पत्र सुधाकर की रिहाई का सबसे ठोस सबूत साबित हो सकता है।

******

रविवार का दिन था हम दोनों घर पर ही थे। एकाएक दोपहर को पंखुड़ी को दस्त शुरू हो गया। मैं उसे लेकर पास ही एक क्लीनिक चला गया। दवा कराने के बाद फुरसत में जब डाक्टर दस्त होने का कारण बताया तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गयी। उसने कहा –“दरअसल अस्वाभाविक तनाव के कारण ही यह दस्त हुआ है। आपका बच्चा न समय से सो पाता और ही पूरी नींद ले पाता है।’’

तनाव! मैं चैंका पड़ा। 4 साल की बच्ची को क्या तनाव हो सकता है? इंसान की यही तो वह उम्र होती है जिसमें वह पूरा जीवन जी लेता है। इस उम्र में न तो उसे रोटी की फिक्र होती है न इज्जत की। मैंने हैरान होते हुए पॅूछा –“डाक्टर साहब अभी तो यह बच्ची है… अभी इसको कौन सा तनाव हो सकता है?’’

“आपके घर में इसके अलावा और कोई बच्चा है? जिससे इसका अक्सर झगड़ा होता रहता हो, या आप लोग उसे ज्यादा प्यार करते हो जिससे इसे जलन होती हो।’’

‘‘जलन? इतनी कम उम्र मे?’’

‘‘जी हाँ … यही वह स्वभाव है जो व्यक्ति जन्म के समय ही साथ लेकर पैदा होता है।’’

“मगर डाक्टर साहब यह इकलौती है।’’

’’इकलौती।’’ डाक्टर ने मेरी ओर चौंक कर देखा। पॅूछा -’’आप लगों का रिश्ता कैसा है? मेरा मतलब आप पति पत्नी के बीच में कभी झगड़ा होता है क्या?’’

“क्या मतलब?’’ मैंने अर्थपूर्ण नजरों से उसकी ओर देखा -‘‘आपका मतलब है कि हम दोनों के झगड़े से इसे तनाव हुआ है?’’

“जी।’’ उसने अपने होंठ भ़ीच लिए मगर उसकी आँखों मे दिख रहा था कि वह अपनी इस बात से पूर्णतः संतुष्ट नही था। असमंजस भरे स्वर मे बोला –“हो सकता है… क्यों नहीं हो सकता?’’

मैं चुप था।

“देखिए… आप यह मत समझिए यह छोटी बच्ची है। हालाकि वह छोटी बच्ची ही है।’’ इस बार उसकी आँखें आत्मविश्वास से चमक उठी। वह अपनी बात जारी रखते हुए कहा –“आपको लगता होगा कि उसे आप लोगो के झगड़ो से क्या लेना देना? तो ऐसा नही है। आजकल के बच्चे बहुत सेंसटिव होते हैं।’’

‘‘जी डाक्टर साहब।’’

‘‘आपको चाहिए कि अपनी बेटी को इस वक्त एक खुला एवं खुशहाल माहौल दें। उसके साथ थोड़ा वक्त गुजारे।’’

“जी… मैं इसका खयाल रखूगा।’’

क्लीनिक से लौटकर मैं जैसे ही सीढ़ियां चढ़कर बरामदे में घुसा बेडरूम की खिड़की सामने आ गयी। आज उस पर पर्दा नहीं था। मैं वहीं ठहर गया। खुशबू बिस्तर में पेट के बल लेटी हुई हाँथ झटक झटक कर फोन पर किसी से बात कर रही थी। मैं उसकी बात सुनने की कोशिश करता उससे पहले वहाँ की शान्ती को भंग करते हुए पंखुड़ी बोली –“पापा आप यहाँ क्यों खड़े है… अन्दर चलिए ना।’’

मैं हैरान था कि खुशबू इतनी चौंकन्नी थी। पंखुड़ी की आवाज सुनते ही वह तेजी से बिस्तर पर पलटी और इस दौरान फोन उसके हाँथ से गिर गया। मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसके चेहरे की रंगत एकाएक गायब हो गयी। चंद क्षणों तक वह मूर्ति बनी फटी फटी आँखों से मेरी ओर देखती रही फिर होश आया तो बिजली की गति उसने फोन उठाया -‘‘अच्छा रखती हूँ।’’ कहा और फोन काट दिया।

मैंने कुछ नही कहा, चलता हुआ बिस्तर के पास पहुँ चा और पंखुड़ी को उसमें लिटा दिया।

‘‘पंखुड़ी कैसी हो?’’ मैं कोई सवाल करने की कोशिश करता उससे पहले उसने पंखुड़ी को अपना मुद्दा बना लिया। पंखुड़ी को दस्त होने के वावजूद कौन सी माँ होगी जो ऐसे मटक मटक कर किसी से बात करेगी?

पंखुड़ी मुस्करा कर उसकी ओर देखी तो बिना वक्त गवाये वह तीव्रता से पंखुड़ी की ओर लपकी और उसे अपनी गोदी में उठा लिया। हालाकि यह कोई पहला मौका नही था। खुशबू हर ऐसे मौके पर पंखुड़ी पर प्यार लुटाना शुरू कर देती। शायद वह जानती थी कि पंखुड़ी मेरी सबसे कमजोरी थी।

दोपहर ढलान पर थी। घड़ी का काँ टा लगभग 4 बजा रहा था। वह बिस्तर से उठी और अचानक आइने के सामने खड़ी होकर सजने संवरने लगी।

“कहीं जा रही हो?’’ मैंने पूछा।

“हाँ, थोड़ा आफिस का काम था इसलिए जाना पड़ रहा है।’’

‘‘लेकिन आज तो इतवार है।’’

“जानती हूँ।’’ उसने घूर कर मेरी ओर देखा –“आज काम नहीं हो सकता क्या?’’

“इससे पहले तो तुम इतवार को कभी नही गयी।’’

“ठीक है पहले नही गयी तो कहाँ लिखा है कि इतवार को कभी काम नही हो सकता।’’ वह एकाएक बिफर पड़ी –“उधर पटेल सर और इधर तुम। तुम दोनो ने मेरा जीना हराम कर दिया है। पटेल सर न तो इतवार देखते हैं न सोमवार। जब भी इच्छा हुई मुझे ही काम पर लगा देते है और तुम… तुम हो कि अपनी टीका टिप्पणी से कभी बाज नहीं आते।’’

मैं चुप हो गया।

वह सजती संवरती रही। मैं पंखुड़ी को लेकर वहां से निकल गया जब लौटा तो मैं और पंखुड़ी दोनो भी बाहर जाने के लिए तैयार थे।

“तुम दोनो भी कहीं जा रहे हो क्या?’’ हमें सजधज कर खड़े देखा तो वह चौंक पड़ी।

’’हाँ, आखिर यह कार कब काम आयेगी? हमेशा खड़ी रहती है। आज हम सब लोग साथ चलेंगें तुम्हे तुम्हारे ऑफिस छोड़ेगे और फिर हम दोनो वही से कहीं घूमने निकल जायेगे।’’

“तुम पागल तो नहीं हो गये हो।’’ खुशबू एकाएक चीख पड़ी -‘‘तुम जानते हो कि पंखुड़ी की तबियत ठीक नहीं है और तुम उसे घुमाने का प्लान बना रहे हो?’’

“वह ठीक हो गयी है।’’ मैंने उसकी बात बीच में ही काट दी -’’यकीन न हो तो तुम उसी से पॅूछ लो।

वह मेरी ओर देखने लगी और मैं पंखुड़ी की ओर।

“संजय!’’ एकाएक उसका स्वर सहज हो गया। मुस्कुरा कर बोली –“मानती हूँ, संजय कि पंखुड़ी स्वस्थ है मगर सोचो क्या इसे लेकर ऑफिस जाना ठीक होगा?’’

“क्यों? इसके वहाँ जाने से क्या बिगड़ जायेगा?’’

“ओफ्फोह!’’ उसने अपना माथा पकड़ लिया -‘‘संजय, तुम भी कभी कभी जाने क्या-क्या सोचने लगते हो। मैंने ऐसा कब कहा? फिर कहूंगी भी क्यों? पंखुड़ी हमारी बेटी है… हमारी अपनी बेटी। उससे तो हमारी इज्जत बढ़ती है मगर…।’’ वह पंखुड़ी की ओर देखने लगी।

“मगर क्या खुशबू? हमें चलना है तो चलना है।’’ मैंने जिद्दी लहजे मे कहा -‘‘आज हम सब साथ जायेंगें इसी कार में।’’

वह थोड़ी देर तक खामोश नजरों से मुझे देखती रही। शायद कुछ सोच रही थी।

“पंखुड़ी तुम अपना गुड्ढा ले लो।’’ मैं पंखुड़ी की अंगुली पकड़ कर पलटते हुए आलमारी की ओर बढ़ा। दरअसल पंखुड़ी के सारे खिलौने वहीं रहा करते थे।

“संजय।’’ खुशबू अचानक चिल्ला पड़ी –“जरा समझा करो। क्यों बेवजह तुम मुझे परेशान कर रहे हो? फिर किसी दिन सब लोग साथ चलेंगें।’’

“खुशबू।’’ आलमारी से खिलोना उठाकर मैं उसकी ओर पलटा, हँस कर बोला -‘‘एक बात बताओ, तुम्हें हमारे साथ चलने में समस्या क्या है? हम बाहर गाड़ी पर ही रूके रहेंगें, तुम आफिस चली जाना। फिर जब लौटगें तो सब लोग बाजार होते हुए चले आयेंगें। इसी बहाने कुछ खरीददारी भी हो जायेगी।’’

“मैं ऑफिस नहीं जा रही हूँ, संजय।’’ एकाएक वह झल्ला पड़ी।

“तब?’’

“दरअसल, मुझे अपनी एक सहेली के यहां जाना था। हम लोग ऑफिस में साथ ही काम करते हैं।’’

“अभी तो तुमने कहा था कि ऑफिस जाना है।’’

“हाँ, कहा था मगर मुझे ऑफिस नहीं जाना था।’’

“फिर कहा ही क्यों? मतलब तुमने हमसे झूठ बोला?’’

“नहीं संजय, ऐसी बात नहीं है।’’ उसके होंठों से फीकी सी मुस्कान बिखर गयी, बोली -‘‘दरअसल ’मैं तुम्हें बताना नहीं चाहती थी।’’

‘‘क्यो?’’

‘‘मैं डर रही थी कि तुम सहेली के यहां जाने में आपत्ति करोगे।’’

“मैं क्यों आपत्ति करूंगा?’’ मेरी आँखें फैल गयी -’’मैंनें कभी भी तुम्हें कहीं जाने से रोका? फिर आज क्यों रोकता?’’

“हाँ, वह तो है।’’ उसने ऐसे कहा जैसे आभार जता रही हो। फिर मुस्कुरा कर बोली -’’अच्छा अब मैं जाऊॅ?’’

“ठीक है जाओ।’’

“थैंक्यू संजय ।’’ वह खिलखिला पड़ी। उसने अपना मिनी बैग उठाया, कंधे पर डाला और एकबार फिर मेरी ओर मुस्करा कर देखा, बदले मे मैंने भी मुस्कुरा दिया।

“चलो पंखुड़ी हम भी चलते हैं।’’ मैंने गोदी में उसे उठा लिया।

“तुम कहाँ जा रहे हो?’’ वह एकाएक ठहर गयी।

“तुम्हें छोड़ने।’’

“संजय।’’ वह हँस पड़ी –“तुम भी बहुत जिद्दी हो, अरे कभी तो मेरी मान लिया करो।’’

“खुशबू।’’ एकाएक मैं गम्भीर हो गया। पंखुड़ी को वही फर्स पर उतार कर मैं उसके सामने खड़ा हो गया। उसकी आँखों मे झाकते हुए बोला –“खुशबू सच बताओ… तुम हकीकत बताने मे कतरा क्यों रही हो? अगर तुम अपने दोस्त के यहाँ जा रही हो तो तुम्हे मेरे साथ चलने से क्या दिक्कत है?’’

मेरे यह वाक्य उसके कानों को छुए तो जैसे एकाएक उसके अन्दर तूफान आ गया हो। उसने अपने पर्स को जमीन पर फंेका और चिंग्घाड़ती आवाज में बोली -’’संजय मुझे दिक्कत है… हाँ है मुझे दिक्कत तुम्हारे साथ चलने में । यह जिन्दगी मेरी है और इसे अपने तरीके से जीने का मुझे हक है। तुम इसमें कोई दखलअंदाजी नहीं कर सकते… समझे तुम। मैं अगर अकेली जाना चाहती हूँ तो बस चाहती हूं तुम कौन हो मुझे रोकने वाले?’’

“खुशबू।’’ मैं तड़प उठा -’’तुम पत्नी हो मेरी और इस रिश्ते से मुझे तुम्हारी जिन्दगी मे दखलअंदाजी करने का हक है।’’

“हाँ… जानती हॅू कि मैं तुम्हारी पत्नी हूँ ।’’ वह चिल्लाई –“इसीलिए तुम्हे बता रही हॅू… मैं पत्नी हॅू, गुलाम नहीं कि जो तुम कहोगे, मैं वही करूंगी। यदि तुम्हें मेरा यूँ घूमना फिरना, स्वतंत्र जिन्दगी जीना अच्छा नहीं लगता तो तुम मुझे छोड़ क्यों नही देते?’’

‘‘खुशबू।’’ एकाएक मेरे पैरो के नीचे से जमीन खिसक गयी, भर्राई आवाज मे बोला -‘‘क्या तुमने मुझसे शादी इसलिए की थी?’’ मेरी आँखें छलक पड़ी।

‘‘संजय अब औरतो की तरह आँसू मत बहाओ। मैं सचमुच तंग आ गयी है तुमसे और तुम्हारे इन आँ शुओ से।’’ वह झपट कर फर्स पर पड़े अपने पर्स को उठाया और उसे खोलने लगी। बोली -‘‘जितना तुम्हे बर्दास्त करना था कर लिया, अब और नही कर सकती। मैंने फैसला कर लिया है कि मुझे तुम्हारे साथ नही रहना।’’ उसने पर्स से कागज के कुछ पन्ने निकाले और मेरी ओर फेकते हुए बोली -‘‘इसमे हस्ताक्षर करो।’’

‘‘क्या?’’ मैंने उसके लाल हो चुके चेहरे की ओर देखा। फिर झुककर कागजो को उठाते हुए पॅूछा -‘‘ये है क्या?’’

‘‘तलाक के पेपर।’’

‘‘तलाक के पेपर?’’ बदहवास मैं थोड़ी देर तक उसे एकटक देखता रहा।

‘‘संजय, हस्ताक्षर करो इनमे।’’ मुझे खामोस देख उसने लगभग डपटते हुए से कहा।

‘‘लेकिन पंखुड़ी?’’ बड़ी मुस्किल से मेरे मुँह से आवाज निकली।

‘‘तुम उसकी फिक्र मत करो।’’ वह तेजी से पंखुड़ी की ओर बढ़ी -‘‘उसका फैसला अदालत करेगी।’’

मैं हैरान था। उसके पर्स मे तलाक के पेपर? इसका क्या मतलब था? क्या इसका मतलब यह नही कि वह यह फैसला बहुत पहले ही कर चुकी थी?

******

 खुशबू के वकील इकबाल अंसारी ने मुकदमे को जिस तरीके से तोड़ मरोड़ कर अदालत मे पेश किया उसे समझने के बाद पंखुड़ी को पाने की मेरी उम्मीदें टूट कर बिखर चुकी थी। कितनी आसानी से उसने ये साबित कर दिया कि मैंने कभी पंखुड़ी को प्यार नहीं किया। मेरा भगवान जानता है कि मेरी बेटी पंखुड़ी मेरे लिए क्या थी? मेरा उस अदालत से सवाल था कि क्या कोई मुझे बता सकता है इन चार सालो मे खुशबू ने पंखुड़ी के लिए क्या किया था? या मेरी सिर्फ इतनी गलती है कि मैं उसका पिता हॅू, माँ नही। मैं समझ नही पा रहा था कि अदालत इस निर्णय पर कैसे पहुँच गयी कि बेटी पालन पोषण सिर्फ माँ ही बेहतर कर सकती है, पिता नही? 

मैं अदालत के सामने कटघरे मे घुटनो पर बैठ कर गिड़गिड़ाया… रोया मगर मेरी आवाज किसी के कानो तक नही पहॅुच पायी। अदालत मुझे पुरुष होने की सजा सुना रही थी और न्याय की देवी आँ ख मे पट्टी बांधे हुए भरी अदालत मे अन्याय होते हुए देखती रही। मैं बता नही सकता कि उस दिन पहली बार मुझे अपने पापा की कमी कितनी महसूस हुई। अगर वे वहाँ  होते तो मैं यकीन से कह पाता कि वह पूरी अदालत मेरे सामने समर्पित हो जाती। मेरे एक एक आँ शुओ की कीमत मेरे रुलाने वालो को चुकानी पड़ती। मेरा द्रवित मन रोने लगा। मैं हाँथ जोड़ कर जज के सामने चिग्घाड़ पड़ा -’’मान्यवर यह सरासर मुझ पर गलत आरोप लगाया जा रहा है। मेरा भगवान जानता है कि पंखुड़ी को मुझसे ज्यादा प्यार और सुरक्षा दुनिया मे कोई नही दे सकता। मैं पंखुड़ी को पाने के लिए अपने घर को, अपनी सारी दौलत को छोड़ने के लिए तैयार हूँ । बस मुझे मेरी पंखुड़ी दे दीजिए।’’ 

‘‘माई लार्ड। मिस्टर संजय कौन से घर की बात कर रहे है?’’ इकबाल बीच मे ही बोल पड़ा -‘‘इनके पास लखनऊ शहर मे कोई अपना घर नही है।’’ उसने अपनी मेज से कुछ पेपर उठाये और जज साहब को थमा दिया -‘‘ये जिस घर की बात कर रहे है दरअसल वह मेरी क्लाइन्ट खुशबू के नाम पर है और उसकी मालकिन भी वही है। ये पेपर उसके सबूत हैं।’’

‘‘मगर जज साहब वह घर मेरे पापा ने हमें शादी के उपहार के रूप मे दिया था।’’

‘‘दिया होगा मिस्टर संजय मगर वह मेरी क्लाइन्ट खुशबू के नाम पर है इसलिए उस घर पर कानूनी तौर पर अब उनका अधिकार है।’’ इकबाल ने कहा।

मैं चुप हो गया।

चंद घंटो के भीतर देखते ही देखते मेरी पूरी दुनिया उजड़ गयी। मेरी पत्नी किसी और की क्लाइन्ट बन गयी, मेरी अपनी बेटी को मुझसे छीनकर उसकी माँ  को दे दी गयी और वह घर जिसे मेरे पापा ने बड़े प्यार से हमारी नयी जिन्दगी के शुरुवात के लिए हमें गिफ्ट किया था वह अब मेरा नही रहा।

इस वक्त जब मैं एक किराए के कमरे में चटाई डाले हुआ लेटा हूँ सोच रहा हूँ स्त्रियों के बारे में- सोच रहा हूं क्या वाकई पीड़ित हैं? और पंखुड़ी, उसने अदालत के सामने क्यों नही कहा कि मैं पापा के साथ जाना चाहती हूँ । मैं पापा के साथ रहूँगी, वह मुझे बहुत प्यार करते हैं?

खट्-खट्। एकाएक मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई तो मैं उठकर बैठ गया -’’दरवाजा खुला हुआ है।’’ चटाई में बैठे-बैठे ही मैंने कहा।

अगले पल दरवाजे के पट खुले तो मैं चैक गया। एक लम्बा चैड़ा इंसान मेरे सामने खड़ा था। यह वही काला कोटधारी इंसान था जो अदालत में उछल-उछल कर खुशबू की तरफ से दलीलें पेश कर रहा था।

“यहाँ किसलिए आये हो? मैं उठकर खड़ा हो गया। उसने मेरी बात सुनी तो वह मुस्करा पड़ा फिर ऐठते हुए बोला –“चलो चल कर अपनी पंखुड़ी को ले आओ। मुझे वह लड़की बिल्कुल पसन्द नहीं है।’’

“क्यों बड़ी जल्दी ऊब गये उससे? 10-12 दिनो मे ही? अदालत में तो उछल-उछल कर दलीलें पेश कर रहे थे उसकी।’’

“मिस्टर संजय।’’ वह जोर से हॅसा –“पंखुड़ी को पाना खुशबू की चाहत थी, मेरी नहीं। मेरा तो वह सिर्फ इम्तिहान था जिसे मैंने पास कर लिया। मुझे खुशबू चाहिए थी और वह मुझे मिल गयी।’’ उसने अपने आखिरी वाक्य को धीरे से कहा और वहाँ से निकल गया।

“खुशबू को पाने के लिए?’’ अन्दर ही अन्दर मेरे दिल पर हजारो शूल चुभ गये। मैं सोचने लगा -‘खुशबू के और कितनो से रिश्ते है?’

******

मैं आज कई दिनो बाद अपने घर घुसा था। लाँ न पार करने के बाद मैं पल भर के लिए ठहरा, उस वक्त पूरा घर मेरी निगाहों के सामने था। मेरी आँखें डबडबा आयी। कभी इसी घर को देखकर मैं कितना खुश होता था। इस घर के अंदर मेरी पूरी दुनिया थी मगर आज वहीं घर कितना पराया लग रहा था। ऐसा जैसे कि मैं वहाँ  पहली बार आया हूँ। उस वक्त मेरी निगाह उस छज्जे पर भी गयी जहाँ  बैठ कर कभी कभार हम चाय पिया करते थे। मैंने लाँ न में लगे फूलों को निहारा। वे कितना मुरझा से गये थे।

“क्या देख रहे है मिस्टर संजय?’’ एकाएक किसी आवाज ने मेरे कानो को छेड़ा। मैंने उघर देखा, सामने इकबाल खड़ा मुस्कुरा रहा था। अपने सर पर हाँथ घुमाते हुए बोला -‘‘दूसरों के घर में घुसने से पहले डोर बैल दबाई जाती है। पता है न आपको?’’

“सॉरी।’’ मैंने कहा।

“कोई बात नहीं, पहली दफा है। गलती हो जाती है। आइए बैठिए।’’ कहते हुए वह गेस्टरूम के दरवाजे पर जोर से लात मारी वह खुल गया। सामने वाले सोफे मे बैठते हुए बोला -‘‘अरे आप अब भी खड़े है। बैठिए बैठिए।’’

“शुक्रिया। पंखुड़ी कहाँ है?’’ मैंने वही खड़े खड़े पॅूछा।

“ऊपर खेल रही है, लेकिन इतनी जल्दी भी क्या है मिस्टर संजय?’’ उसने छुपी निगाहों से घड़ी की ओर देखा। उसके चेहरे पर लगातार एक बेहूदा हॅसी छायी रही। उसने कहा -‘‘मिस्टर संजय एक बात बतायेगे आप?

‘‘जी।’’ मैंने धीरे से कहा।

‘‘आपको ये सब करके क्या मिला?’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मेरा मतलब ये है मिस्टर संजय कि अगर आपने खुशबू को मुझसे मिलने के लिए बार बार न रोका होता तो खुशबू न सही, कम से कम आज ये घर और पंखुड़ी तो आपके पास होते। मगर आप तो हीरो बनने निकल पड़े। वैसे क्या आपको पता है कि दो प्यार करने वालो के बीच में दीवार खड़ी करना कानूनी तौर पर भी जुर्म है। और अगर प्रेमी वकील हो तब तो यह भयानक अपराध है। जानते है न आप?’’

‘‘उसने कभी बताया नही आपके बारे मे।’’

‘‘अच्छा… वैसे अगर बता देती तो?’’

‘‘जान से मार देता उसे।’’

‘‘और जेल चले जाते?’’ वह जोर से हॅस पड़ा -‘‘खैर छोड़िए।’’ उसने एक बार फिर घड़ी की ओर देखा और मुस्कुरा कर बोला -‘‘वह तमन्ना भी आपकी जल्द ही पूरी हो जायेगी फिरहाल आप अब ऊपर जाइए। पंखुड़ी आपका इन्तजार कर रही होगी।’’

मैं आखिरी बार उसकी ओर देखा और फिर लांघते कदमो से सीढ़ियो को पार करता हुआ बरामदे की ओर बढ़ गया।

‘‘पंखुडी।’’ मैंने आवाज दी मगर किसी ने कोई उत्तर नही दिया। मैं सीधे बेडरूम पहुँच गया वहाँ  भी कोई नही था। खुशबू अब भी शायद ऑफिस से नही लौटी। उस दौरान मैंने कई कमरे झाँ के थे, वह जब कही नही मिली तो दोबारा लौट कर बेडरूम मे बिस्तर के पास खड़ा हो गया। मेरी आँखें देर तक इधर उधर कुछ खोजती रही कि तभी अचानक आलमारी के पास पड़े कपड़ो के गट्ठर मे मुझे पंखुड़ी का हाँथ दिखाई दिया। मेरे हाँथ पाँ व अचानक शून्य पड़ गये। मैं लड़खड़ाते कदमो से उधर भागा मगर कदमों ने साथ नही दिया। धड़ाम से मैं फर्स पर गिर गया। मेरी आँ खो के सामने अचानक अंधेरा छा गया। वह मर चुकी थी।

मैं उसे छूता गले से लगाकर चिंग्घाड़ता। उससे पहले, एकाएक तीन-चार गाड़ियां आवाज करती हुई घर में दाखिल हुई। मैंने खुद को समेटा, उचक कर खिड़की से देखा तो मेरे होंठो से चीख निकल गयी -‘‘पु…पुलिस।’’ मैं इकबाल अंसारी की साजिश समझ गया। एक तरफ मेरी बेटी की लाश थी वही दूसरी ओर मेरे जेल जाने का रास्ता। मैं उस वक्त दोनो मे से किसी को भी चुनने के हालत मे नही था। मुझे वहाँ से भागना पड़ा था।

******

संजय को अपनी ही बेटी की लाश छोड़ कर भागना पड़ा। एक बाप के लिए इससे ज्यादा बुरा वक्त और क्या हो सकता है। संजय की डायरी तो खत्म हो गयी मगर डायरी की आखिरी पंक्ति एकबार फिर मेरी आँखों मे आँ शुओ का सैलाब छोड़ गयी।

‘‘राज।’’ मेरी आँखों के पानी की एक बूँ द शिवी के हाँथ मे गिरी तो वह एकाएक उठकर बैठ गयी। मेरी भरी भरी आँ खो की ओर देखकर बोली -‘‘आप फिर रो रहे है?’’

‘‘क्या करू शिवी? संजय की जिन्दगी सिर्फ जिन्दगी नही है… वह धरती मे बसा हुआ जीता जागता नर्क है जिसे सालो से वह भोगता आया है।’’

‘‘पंखुडी को किसने मारा था?’’ शिवी ने पूछा।

‘‘पता नही मगर जब संजय को उसकी लाश मिली थी उस वक्त वहाँ पर सिर्फ इकबाल अंसारी ही मौजूद था। मुझे लगता है कि संजय सही ही कह रहा था। क्योकि जिस तरह के हालात थे उसे देख कर मुझे भी यही लगता है कि हो न हो पंखुड़ी को उसी ने मारा होगा।’’

‘‘अच्छा।’’ कहते हुए वह अचानक उठकर खड़ी हो गयी।

‘‘कहाँ जा रही हो?’’ मैंने पूँछा।

‘‘चाय बनाने। पियेगे न आप?’’

‘‘हाँ …। मगर अभी कुछ देर और ठहर जाओ, सुबह होने वाली है।’’

‘‘अरे आप कमरे का पर्दा तो हटाइये। सुबह हो चुकी है।’’

‘‘क्या?’’ मैंने चौंक कर उसकी ओर देखा।

‘‘जी… दरअसल आप संजय भाईसाहब की डायरी पढ़ने मे इतना व्यस्त थे कि कब सुबह हो गयी आपको पता ही नही चला।’’

‘‘ओह हाँ ।’’ मैंने कमरे की खिड़की मे पड़े पर्दे को हटाया। बाहर सूरज निकल आया था। मैं बिस्तर से छलांग लगाता हुआ संजय के कमरे की ओर बढ़ गया।

संजय की नींद खुल चुकी थी। मुझसे नजरें मिलते ही उसके होंठो मे एक रूखी सी मुस्कान तैर पड़ी।

‘‘गुड माँ र्निंग।’’ मैंने कहा।

‘‘गुड माँ र्निंग, राज।’’ वह उठकर बैठ गया।

‘‘संजय…।’’ मैं कुछ कहना चाहा मगर तभी एकाएक डोरबेल चिल्ला उठी। मैं हैरान नजरो से संजय की ओर देखा। सुबह के 7 बज रहे है। इस वक्त कौन हो सकता है? पुलिस? मेरे बदन में हल्की झुनझुनी दौड़ पडी। मैं भारी कदमो से दरवाजे की ओर बढ़ा। दरवाजे पर लगभग मेरी ही उम्र की एक लडकी खड़ी थी। मुझे देखते ही उसकी आँखों मे चमक आ गयी।

‘‘कैसे हैं आप?’’ उसने पॅूछा।

‘‘मैं ठीक हॅू मगर माफ कीजिए मैं आपको पहचान नही पाया।’’

‘‘आप… आप राज ही है न?’’

‘‘जी…।’’

‘‘मैं नीतू… संजय की दोस्त। लखनऊ से आयी हॅू।’’

‘‘ओह… आइये।’’ मैंने दरवाजा खोल दिया मगर मेरी नजरे उसके चेहरे पर जाकर अटक गयी। मुहब्बत और वफा की देवी एकाएक सामने आ जाये तो कोई भी अभिभूत हो जायेगा। संजय की डायरी पढ़ने के बाद इस बात से मैं पूरी तरह सहमत था कि उसमे नीतू को जितनी जगह मिलनी चाहिए थी शायद नही मिली। किसी के लिए अपनी जिन्दगी को बेरंग बना देने वाले कितने लोग मिलेगे इस दुनिया मे? नीतू उनमे से एक थी।

उसने गली के दोनों ओर डरी-डरी निगाहों से देखा फिर अंदर आ गयी। धीरे से बोली थी -‘‘संजय कैसा है?’’

‘‘वह ठीक है। सामने वाले कमरे मे ही है आकर मिल लो।’’

‘‘नही नही राज।’’ वह झटके मे एक कदम पीछे हट गयी। उसकी आँखों मे पानी उतर आया, बोली -‘‘इस हाल मे उससे मिलने की हिम्मत नही है मुझमे। उसे इस मुस्किल से निकल आने दीजिए फिर मिलूगी।’’ उसने हॅसने की कोशिश की मगर होंठो ने साथ नही दिया। मेरी ओर एक लिफाफा बढ़ाते हुए बोली -‘‘उसकी जमानत के कागजात। उससे कहिएगा कि अब उसे पुलिस से डरने की जरूरत नही है।’’

मैंने काँपते हाँ थों से लिफाफा थाम लिया। मेरी नजरें उसके चेहरे से हटी नही।

‘‘मैं चलती हॅू।’’ उसने कहा और पलट पड़ी।

‘‘नीतू।’’ मैंने आवाज दी वह ठहर गयी -‘‘मैंने संजय की डायरी पढ़ी है। आप जैसे दोस्त नसीब वालो को मिलते हैं।’’

‘‘नसीब वाले?’’ उसने पलट कर मेरी ओर देखा। उसकी आँखों मे दर्द ही दर्द था। मैं उससे कुछ कह पाता उससे पहले वह वहाँ से निकल गयी।

‘‘आप यॅू यहाँ खडे क्यों हैं? सहसा एक जाना पहचाना स्वर मेरे कानो को छेड़ा। मैंने पलट कर पीछे देखा। मेरे सामने शिवी खड़ी थी। जो अभी अभी बाथरूम से नहा कर निकली थी। हमारी निगाहे टकरायी तो वह मुस्करा पडी -‘‘कौन आया था? उसने पूँछा।

मैं उसे क्या बताता? मैंने लिफाफा को हवा मे लहराते हुए कहा -‘‘कोई संजय की जमानत के कागजात लेकर आया था।’’

******

‘‘संजय, यहाँ अभी नीतू आयी थी।’’ सुबह का नाश्ता करने के बाद मैंने उसे बताया। उसने मेरी बात सुना तो उसके आँखों में अकस्मात ही चमक आ गयी। यह उसका यकीन ही था कि उसे शायद उससे किसी अच्छे समाचार की उम्मीद थी।

‘‘कहाँ है वह?’’ उसने पॅूछा।

‘‘चली गयी।’’

‘‘चली गयी?’’ उसने हैरानी से मेरी ओर देखा -‘‘बिना मुझसे मिले?’’

‘‘हाँ, मैंने उसे रोकने ही कोशिश की थी मगर वह रुकी नही।’’

‘‘वह आयी किस लिए थी?’’

‘‘तुम्हारी जमानत के कागजात लेकर आयी थी।’’

‘‘क्या?’’ वह चौंक पड़ा -‘‘लेकिन मैंने तो उसे इस घटना के बारे मे बताया भी नही।’’

‘‘संजय।’’ मैंने उसके हाँ थों को थामते हुए कहा -‘‘सहायता मांगने पर सहायता देने वाले इस दुनिया मे तमाम मिल जाते है मगर नीतू जैसे लोग करोड़ो मे इक्का दूक्का ही मिलते हैं।’’

‘‘तुम सही कह रह हो राज।’’ उसने मेरी हॅथेली पर दबाव देते हुए कहा –“काश मैं नीतू को पहले ही…।’’ उसने अपने होंठ भीच लिए।

‘‘कोई नही। किस्मत मे शायद यही था।’’ लिफाफा खोलते हुए मैंने कहा।

ट्रिंग ट्रिंग अचानक फोन की घंटी बज उठी।

‘‘हेलो। टाँ किंग स्विच आँ न करते हुए मैंने कहा।

‘‘राज, मैं नीतू बोल रही हॅू।’’ उधर से आवाज आयी -‘‘क्या आप संजय से बात करा सकते हैं?’’

‘‘जी बिल्कुल।’’ मैंने संजय को फोन थमा दिया। 

‘‘हेलो।’’ कहता हुआ संजय बाँलकनी की ओर चला गया।

10 मिनट बाद जब वह लौटा तो उसके आँखों मे चमक थी। उसने मुझे बताया कि -‘‘नीतू कह रही थी, अभी उसके पास उसके वकील का फोन आया था उसने कहा है कि मुझे आज ही लखनऊ लौटना होगा। कोर्ट मे सशर्त जमानत दी है। उसने कहा है कि जब तक मामले पर कोई फैसला नही आता तब तक आरोपी को लखनऊ के बाहर नहीं होना चाहिए।’’

            ‘‘नीतू कहाँ है अभी?’’ मैंने पॅूछा।

            ‘‘पता नही। उसने कहा है कि मैं चिन्ता न करूँ । वह जल्दी ही मामले को निपटा लेगी। इस समय वह कुछ जरूरी सबूतों को जुटाने में लगी हुई है।’’

            ‘‘ये अच्छी बात है संजय मगर क्या आज तुम सचमुच जाना चाहते हो।’’

            ‘‘नही राज… मगर जाना तो पड़ेगा।’’

‘‘संजय।’’ मैं थोड़ी देर तक उसकी ओर देखता रहा फिर गम्भीर होते हुए कहा -‘‘मामला इतना आसान नहीं है जितना कि हम समझ रहे है। क्या तुम शाम तक रुक सकते हो?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मै भी तुम्हारे साथ लखनऊ चलना चाहता हॅू। मगर इस वक्त मुझे कम्पनी जाना होगा। कुछ जरूरी काम है।’’

वह मेरी ओर देखने लगा। थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोला -‘‘नीतू ने कहा है कि जल्दी से जल्दी मुझे लखनऊ पहुँच जाना चाहिए। वर्ना इकवाल अंसारी, सातिर दिमांग का इंसान है वह मेरी अनुपस्थिति का फायदा उठा सकता है।’’

‘‘कोई बात नही संजय, फिर तुम अभी निकलो मैं बाद में आ जाऊँगा।’’

‘‘ठीक है।’’ उसने कहा और झुक कर बिस्तर पर रखे हुए अपने बैग को टटोलने लगा। तभी अचानक उसे कुछ याद आया तो मेरी ओर मुड़ा -‘‘राज, क्या तुम खुसबू के पास एक रात ठहर सकते हो?’’

‘‘क… क्यों?’’ एकाएक मेरी सांसे अटक गयी। पता नही वह आगे क्या कहने वाला है।

‘‘दरअसल नीतू ने कहा है कि अगर राज एक रात वहाँ ठहर ले तो काफी ऐसे सूबूत इक्ट्ठा कर सकते है जिससे कोर्ट में हमें मदद मिल सकती है।

‘‘ओह।’’ मेरी अटकी सांसे चलना शुरू कर दी।

हालाकि पूर्व मे खुशबू के घर मे गुजारी गयी रात और फिर घटी उस घटना को छिपाने का मेरा कोई इरादा नही था। दर असल मुझे ऐसे मौके की तलास थी जब मैं शिवी और संजय से उस घटना का जिक्र कर पाता। मैंने खुसबू के पास दोबारा जाने से इंकार कर दिया। संजय ने हालाकि कारण जानने की कोशिश नही की मगर मैंने खुद ही उस रात की पूरी घटना को उसके सामने रख दिया। उस वक्त शिवी भी वही थी। जिसे मैने पानी लाने के बहाने बुला लिया था।

ऐसा नही है कि मुझे उसके अंजाम की भी खबर नही थी मगर मैं उस बोझ के साथ और नही जीना चाह रहा था। उस घटना को बयान करने के दौरान मेरी निगाहे कई बार शिवी के चेहरे को छूती रही। पल-पल उसके चेहरे के बदलते भाव मुझे बता रहे थे कि वह उस घटना को निगल नही पा रही है। उस दौरान संजय के चेहरे मे कोई हलचल नही थी। वह खामोश सुनता रहा।

‘‘अच्छा मैं चलता हॅू।’’ संजय एकाएक उठकर खड़ा हो गया। उसके स्वर मे पहले की तुलना में अधिक रूखापन था।

‘‘क्या हुआ?’’ मैंने चौंककर देखा उसकी ओर -‘‘तुम कुछ देर बाद जाने वाले थे?’’

‘‘हाँ राज… लेकिन मुझे लगता है कि अब चलना चाहिए।’’ बैग उठाते हुए उसने कहा।

मै उसे रोक नहीं सका। मैंने शिवी की ओर देख कर बोला -‘‘शिवी तुम्ही कुछ कहो संजय से।’’

‘‘मुझे भी लगता है उन्हे जाना चाहिए।’’ शिवी ने कहा और तेजी से कमरे से निकल गयी।

मैं किसी से कुछ नही कह पाया शिवाये इसके कि -‘‘अपना मोबाइल आन रखना। लखनऊ के लिए मै शाम की गाडी पकडूगा।’’

‘‘ठीक है ।’’ संलय ने कहा और घर से निकल गया।

उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि रिश्ते इतने आसान नही होते जितना अक्सर हम समझ बैठते है। वफा और ईमानदारी महल ढहाने के लिए ये जरूरी नही है कि जानबूझ कर ही गलती की जाये। अनचाहे मे हुआ हादसा भी रिश्तो को तार तार कर सकता है।

******                                               

शाम को जब मै ऑफिस से लौटकर शिवी के होंठो को छुआ तो उसमे कोई सिहरन नहीं हुई। अक्सर ऐसे मौके पर वह शर्म से लाल हो जाया करती थी।

‘‘लखनऊ जायेंगे आप?’’ चाय का कप थमाते हुए उसने पॅूछा। उसके स्वर मे रूखापन छाया रहा।

‘हाँ ।’’ मैंने कहा।

‘‘अटैची तैयार कर दॅू?’’

‘‘हाँ कर दो।’’

वह अंदर जाने के लिए पलटी।

‘‘शिवी।’’ मैंने पुकारा। इससे पहले मैंने उसे ऐसे कभी नही देखा। मेरी आँखों में पानी की बॅूदे उतर आयी। वह ठहर गयी। रुवासी आवाज मे मैने कहा -‘‘वह एक हादसा था। मैंने अपनी तरफ से कुछ नही किया।’’

सुबह लगभग 5 बजे मैं लखनऊ पहुँच गया। स्टेशन से मैं जैसे ही निकला लगभग 8-9 साल का एक लडका जो मैली कुचैली भेषभूषा में खडा था, उसने मुझे आवाज दी -‘‘साहब अखबार खरीद लीजिए।’’

‘‘नहीं।’’ मैंने मना कर दिया।

‘‘अरे ले लीजिए साहब।’’

‘‘नही मुझे नही चाहिए।’’

‘‘बस दो रुपये का है।’’

‘‘तुम जाओ यहाँ से। मुझे परेशान मत करो।’’ मैंने जरा डाँ टकर कहा।

वह सहम गया। चंद क्षणो तक वह इधर उधर देखता रहा। फिर लौटने के लिए पलटता उससे पहले मैंने प्यार से कहा -‘‘अच्छा सुनो।’’

‘‘अखबार खरीदेंगे आप?’’ अचानक उसके रूखे चेहरे में चमक आ गयी।

‘‘हाँ ।’’ मैंने मुस्करा कर हाँ मे सर हिलाया।

‘‘साहब मुझसे भी ले लीजिए।’’ एकाएक एक दूसरा लड़का आकर मेरे सामने खडा हो गया। मुझे हॅसी आ गयी। दोनो के हाँथ मेरी ओर खिचे जा रहा थे। आशा-निराशा के द्वन्द्व में जूझते उनके चेहरो को मैंने गौर से देखा। रोटी की भूख मे हजारो किताबों की प्रेरणा, पूरे जमाने का दुख और सारे संसार का सुख निहित होता है। मैने दोनो अखबारो को थाम लिया था। फिर जेब से निकाल कर मैंने जैसे ही दो दो के सिक्के उनकी हॅथेलियों मे रखा तो उनके चेहरों मे जमाने भर की मुस्कराहट बिखर गयी। मैं उन्हे दूर तक साथ जाते हुए देखता रहा। मुझे लगा -अगर ऊपर वाले ने पेट का भार न दिया होता इंसान का जीवन कितना नीरस हो गया होता।

            थोड़ी दूर पर ही भइया की कार मेरा इन्तजार कर रही थी। कुछ मिनट मे ही मैं भइया के घर पहुँच गया।

******

अखबार को सोफे के सामने लगी मेज पर फेंक कर मैं बाथरूम घुस गया। जब नहा धोकर मै बाहर निकला सोफे के सामने रखी मेज पर चाय मेरा इन्तजार कर रही थी।

‘‘क्या बात है राज बिना किसी फोन या सूचना के एकाएक यहाँ आना पडा। सब कुछ ठीक ठाक है न?’’ भाभी कमरे मे दाखिल होते हुए बोली।

‘‘हाँ भाभी कुछ जरूरी काम था इसलिए चला आया। बाबी अभी सो रहा है क्या?’’

दरअसल बाबी मेरा दो साल का भतीजा था। नटखट बच्चा। मैं जब-जब भी वहा जाया करता था, उसके साथ रूम क्रिकेट खेलना नहीं भूलता। भूलता भी कैसे, वह अपनी दूसरी शैतानियों से जैसे ही फुरसत होता, किसी कोने में पडे अपने बल्ले को लेकर आ जाता और गेंद थमाते हुए अपनी तुतलाती आवाज से संकेत करता कि मै उसके लिये गेंद फेंकू।

‘‘शिवी कैसी है?’’ भाभी ने पूछा।

‘‘ठीक है।’’ मैं चाहकर अपनी चेहरे का रूखापन नही छिपा पाया।

‘‘बडे रूखे मन से बोल रहे हो।’’ भाभी हँस पडी थी -‘‘सब ठीक-ठाक तो है ना, या फिर कोई टकरार हो गयी।’’

‘‘क्या भाभी आप भी।’’ हकीकत को छुपाने की कोशिश में मुझे जबरजस्ती हॅसना पड़ा।

‘‘अच्छा तुम चाय पियो, तब तक मैं आमलेट बना लाती हॅू।’’ वह सोफे से उठकर किचेन की ओर चली गयी थी। अचानक मेरी निगाह अखबार पर पडी, तो मैंने उसे उठा लिया।

पहले ही पृष्ठ की एक पंक्ति पर नजर पड़ी तो मेरी सांसे जहाँ की तहाँ थम गयी। संजय की जमानत खारिज हो चुकी थी और पुलिस ने उसे गिरप्तार कर लिया था। नीचे छोटी धुंधली सी संजय की तश्वीर भी छपी हुई थी।

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ मैं परेशान हो गया। मैं तेजी से उठकर अपने मोबाइल की ओर बढा। तभी अचानक डोरबेल चिल्ला पड़ी।

‘‘राज थोड़ा देखोगे क्या? कौन है दरवाजे पर?’’ किचेन से तेज स्वर में भाभी ने कहा।

‘‘जी।’’ मैं सीढ़िया उतरता हुआ दरवाजे की ओर बढ़ा। दरवाजा खोला तो सामने नीतू खड़ी थी।

‘‘अरे आप?’’ मैंने चैकते हुए कहा -‘‘अभी मैं आपको ही फोन करने वाला था।’’

‘‘संजय की जमानत खारिज हो गयी है।’’ उसकी आँखों में कोई तूफान था जिसे वह थामने की कोशिश करते हुए बोली।

‘‘हाँ … मैंने अभी अभी अखबार मे पढ़ा है।’’

‘‘राज, संजय ठीक नही है। उसे बचा लीजिए।’’ उसकी आँखें एकाएक झरझरा पडी -‘‘मुझे लगता है कि आपको अपने भइया से मदद मांगनी चाहिए। पुलिस उनकी बात सुनेगी।’’

‘‘नही नीतू। भइया इस मुद्दे हमारी कोई मदद नही कर सकते।’’

‘‘क्यो?’’

‘‘क्योकि केस अदालत के पास है। और हमे फिरहाल किसी अच्छे वकील की जरूरत है।’’

‘‘इकबाल अंसारी के कहने पर खुसबू ने पुलिस को पैसा दे दिया है ताकि वे लोग संजय के साथ बुरा सलूक करे।’’

‘‘पुलिस को?’’

‘‘हाँ राज। पुलिस संजय को बडी बर्बरता से पीट रही है मुझे डर है कि उनकी मार को संजय बहुत देर तक बर्दास्त नही कर पायेगा।’’

‘‘ओह?’’ मै पल भर के लिये जैसे सोचना ही भूल गया हॅू। मेरी नजरें नीतू के चेहरे पर अटक कर रह गयी। वह देर तक कुछ कहे जा रही थी मगर मैं सुन नही पा रहा था।

‘‘राज आप सुन रहे हैं न?’’ उसने मुझे झकझोरा। मुझे होश आया तो मै बगैर कुछ बोले तीव्रता से सीढियों की ओर भागा। भाभी किसी से फोन पर बाते कर रही थी, मुझ पर निगाह पडी तो बोली -‘‘राज, शिवी का फोन है, तुमसे बात करना चाहती है।’’

‘‘मै बाद में बात करूगा, भाभी। अभी मुझे किसी जरूरी काम से बाहर जाना है।’’

‘‘कहाँ?’’ घबड़ाकर उन्होने मेरी ओर देखा।

‘‘मुझे पता नहीं है, लेकिन जाना पडे़गा, फोन पर मैं अपनी खबर देता रहूँगा।’’ शर्ट पहनते हुए मैंने कहा।

‘‘राज कहाँ जा रहे हो?’’ एकाएक भइया बाथरूम से निकल पड़े।

पल भर के लिये मैं सहम गया। फिर खुद को सम्भालते हुए कहा -‘‘दोस्त के यहाँ जा रहा हॅू।’’

बाहर आया तो नीतू अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर बैठी मेरा इन्तजार कर रही थी। मैं बगल की सीट पर बैठ गया। कार सड़क पर दौड़ पड़ी।

कई मोड़ और सड़को को पार करते हुए अचानक मुझे जोर का झटका लगा। कार खडी हो गयी। नीतू ने मेरी ओर देखा -‘‘पुलिस स्टेशन।’’ उसके होंठ लहराये।

‘‘यहाँ क्या करेंगे हम?’’ मैंने पागलों सा सवाल किया।

‘‘संजय यही है।’’ कार से उतरते हुए वह बोली।

‘‘ओह।’’ मैंने नीतू की ओर देखा फिर पुलिस स्टेशन की सीढिया चढते हुए उस लाँ क-अप रूम के सामने खड़े हो गये जिसकी मोटी दीवारो से घिरी चिथडी फर्स पर बेसुध व लहुलुहान संजय पडा हुआ था। एक बारगी उस पर निगाह पडते ही मेरा मन तडप़ उठा। एक इंसान के साथ किसी जानवर से बदतर सलूक किया गया था। मैंने छिपी निगाहों से नीतू की ओर देखा। वह संजय के उस हालत को देख नही पायी और घूम कर हो खड़ी हो गयी। उसके होंठो से दबी हुई सिसकी निकल पड़ी। जिसने मेरी पीड़ा को और भी बढा दिया।

मैं खुशबू के बारे मे सोच रहा था कि इस तरह बेरहमी से संजय को मरवाने के लिये पैसे देने वाली क्या खुद इस हालात में संजय को देख पायेगी? या फिर उसका पत्थर दिल तब भी नहीं पिघलेगा?

‘‘संजय।’’ मैने आवाज दी मगर उसने कोई प्रतिक्रिया नही दी।

‘‘संजय।’’ मैंने पुनः आवाज दी तब भी उसमे कोई हरकत नही हुई।

‘‘संजय।’’ एकाएक मैं चिग्घाड़ पड़ा। इस बार संजय की शरीर मे हरकत हुई। उसने अपने फर्स से चिपके चेहरे को उठाकर हमारी ओर देखा। उसकी सूझी हुई आँ खे ठीक से खुल नहीं पा रही थी। नीतू की निगाहे जैसे ही उसके घायल चेहरे पर पड़ी वह तीव्रता से पलटते हुए एक दीवाल से छिपट गयी।, अपने होंठो पर उसने रूमाल ठूस लिया ताकि उसकी सिसकिया मुँह के अंदर ही दफन हो जाये।

‘‘संजय… मेरे दोस्त। ये सब क्या हो गया। क्यों चले आये थे तुम दिल्ली से?’’ मैं सलाको की छड़ो को हिलाने की कोशिश करते हुए कहा -‘‘काश! मैं तुम्हे वही रोक लेता।’’

‘‘आप कौन?’’ मेरे कंघे पर हाँथ रखते हुए किसी ने पॅूछा।

मैं पीछे पलट कर देखा। मेरे पीछे बडी बडी मूंछो वाला एक वर्दीधारी इंसान फटी-फटी निगाहों से मुझे देख रहा था।

            ‘‘मेरा नाम राज है।’’ मैंने पूरे अदब के साथ जवाब दिया -‘‘मै दिल्ली से आया हॅू।’’

            ‘‘ये जालिम इंसान तुम्हारा कौन लगता है?’’

‘‘दोस्त है मेरा।’’ मैंने बिना डरे हुए उसे जवाब दिया।

‘‘तुम पर लानत है कि इतना गिरा हुआ इंसान तुम्हारा दोस्त है।’’

‘‘क्यों? ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया इसने?’’

‘‘ओह… तो तुम्हे इसका गुनाह भी नहीं मालूम?’’ वह जोर से हँस पड़ा -‘‘जानते हो?’’ अचानक गंभीर होते हुए वह बोला -‘‘‘इसने अपनी चार साल की मासूम लडकी को अपनी ही हाँ थो से गलादबा कर मार दिया। वो भी सिर्फ इस लिये कि तलाक के बाद अदालत ने उसे उसकी माँ को सौप दिया था। बोलो यकीन करोगे तुम?’’

            ‘‘और ये आपको कैसे पता कि उसका खून इसी ने किया है?’’

            ‘‘इसने खुद कबूल किया है। जिसकी रिकार्डिंग है हमारे पास।’’

‘‘कबूलनामे की यह रिकार्डिंग पीटकर भी तो करवायी जा सकती है?’’ मैंने उसकी आँखों मे आँ खे डालते हुए कहा -‘‘वैसे क्या आपको पता है कि कोर्ट मे आपके इस तथाकथित कबूलनामे को सबूत के तौर पर नही पेश किया जा सकता।’’

‘‘आप गलत आरोप लगा रहे है पुलिस पर। पुलिस किसी को ऐसे ही क्यो पीटेगी?’’

‘‘हो सकता है उसके लिये किसी ने पैसे दिये गये हो।’’

‘‘क…क्या बकते हैं आप? आप बिना वजह मुझ पर इल्जाम लगा रहे है?’’

‘‘और संजय पर?’’ मैंने संजय की ओर एक बार फिर देखा -‘‘ये मानने के लिए कि पंखुड़ी का कत्ल संजय ने ही किया है आपके पास कोई ठोस वजह है?’’

‘‘आपको पता है न कि आप एक पुलिस आँ फीसर से बेवजह बहस कर रहे हैं?’’

‘‘जी जानता हॅू।’’ मेरी पीडा कुण्ठा का रूप ले चुकी थी -‘‘लेकिन आपने बताया नही कि इसके लिये आपको कितने रूपये दिये गये थे? दस हजार…? बीस हजार…? पचास हजार या लाख?’’

वह एकटक मेरी ओर देखने लगा। मैं जानता था कि अन्दर ही अन्दर वह उबल रहा होगा। मैंने उसकी परवाह नही की।

‘‘दरोगा साहब।’’ एकाएक मेरा स्वर भारी हो गया -‘‘यदि आप पैसे लेकर किसी को सजा देते है तो एक काम करिए जिसने आपको संजय को टार्चर करने के लिये पैसे दिये थे, उसे टार्चर करने के लिए मै आपको उसका पाँच गुना पैसे दूँ गा। बोलिए आप संजय की जगह उसे टार्चर कर सकते है?’’

‘‘अ… आप मुझे खरीदने की कोशिश कर रहे हैं?’’ वह हकला पड़ा।

‘‘बिका हुआ इंसान और कितना बिकेगा? आप बस इतना बताइए कि सौदा मंजूर है आपको?’’

वह मेरी ओर एकटक देखने लगा। मैंने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और उसे थमाते हुए बोला -‘‘मैं आपके फोन का इन्तजार करूँगा।’’

पुलिस स्टेशन से लौटते वक्त नीतू बिल्कुल खामोश थी। कार की हैण्डिल घुमाती हुई भरी-भरी आँ खो से बस सड़क को देखती रही। मैं उसके दिमाग में चल रहे द्वन्द्व से अच्छी तरह परिचित था। वह आँ शुओ को रोकने की कोशिश मे बार बार अपने होंठों को दांतों तले दबा लेती।

भइया के घर के सामने कार रुकी तो वह मेरी ओर देखने लगी -‘‘राज आपको क्या लगता है?’’ उसने पॅूछा -‘‘आपके पास दरोगा का फोन आयेगा?’’

‘‘पता नही।’’ मैंने होंठ भीचते हुए कहा।

‘‘अगर आपको लगता है कि संजय के लिए मेरी कहीं जरूरत पड़ सकती है तो जरूर बताइएगा। उसके लिए मैं कुछ भी कर सकती हॅू।’’

‘‘जी ठीक है।’’ कहते हुए मैं कार से उतर गया।

घर पहुँ चा तो शिवी का फोन मेरा इन्तजार कर रहा था।

‘‘अरे राज तुम आ गये?’’ भाभी ने कहा -‘‘लो शिवी से बात करो। कह रही है उसने तुम्हे कई बार फोन लगाया तुमने उठाया ही नही।’’

‘‘हाँ भाभी कुछ बात ही ऐसी थी वक्त ही नही मिला।’’ मैंने फोन थाम लिया। शिवी मेरी आवाज सुनते ही एकाएक रो पडी।

‘‘शिवी।’’ मैंने पुकारा। फिर वह देर तक कुछ कहती रही और मैं सुनता रहा।

******         

लगभग शाम ढलते-ढलते मैं कपडे़ पहनकर जैसे ही सीढियों से उतरने लगा बाबी की नजर मुझ पर पड़ गयी और वह रोने लगा। मैं जल्दी मे था, रुका नही। मेरी कार सीधे खुसबू के खूबसूरत माकान के सामने जाकर खडी हो गयी। मैंने अपने शर्ट पर छिपे हुए कैमरे को एकबार फिर चेक किया और डोरबेल की बटन दबा दिया। संजय की लहुलुहान तश्वीर मेरी आँखों मे अब भी घूम रही थी जिसे मैंने अपने मोबाइल मे क्लिक कर लिया था। मुझे यकीन था उस तश्वीर को देखने के बाद खुसबू अपना इरादा बदल देगी। वह उसकी बीबी है जो इतनी भी क्रूर नही हो सकती।

‘‘जी आप?’’ वह दुबली पतली सी लड़की एकाएक दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयी।

‘‘घर पर मैडम हैं आपकी? मुझे मिलना है उनसे।’’ मैंने पॅूछा।

‘‘जी।’’ वह मुस्कुरा पड़ी -‘‘उनके साथ उनकी एक सहेली है।’’

‘‘तो अभी मैं लौट जाऊॅ?’’

‘‘नही नही मेरा वह मतलब नही था। आप अंदर आइए।’’

मैं उसके पीछे पीछे गेस्टरूम तक पहॅुच गया। उसने पलट कर मेरी ओर देखा और लजा कर बोली -‘‘आप यही बैठिए मैं मैडम को बुला कर लाती हॅू।’’

‘‘जी ठीक है।’’ मैंने कहा और वही सोफे पर बैठ गया।

पिछले 4-5 दिनो मे वहाँ कुछ नही बदला था। वही पेटिंग्स, वही खूबसूरत सजावट बस उस घर का मालिक बदल चुका था। मैं देर तक दीवारो को तकता रहा।

‘‘मैंडम ने आपको ऊपर बेडरूम मे बुलाया है।’’ उस लड़की ने मुस्कुरा कर कहा लेकिन इस बार मैं डरा नही। मैं उठकर खड़ा हुआ और तेजी से सीढ़ियों की ओर लपका। अभी मैं दूसरी सीढी पर पाँ व रखा ही था कि एकाएक नीतू मेरे सामने आ गयी। पल भर ठहर कर भरी भरी आँखों से उसने मेरी ओर देखा और फिर तेजी से वहाँ से निकल गयी।

‘‘ये यहाँ किस लिए आयी थी?’’ ठहर कर मैंने सोचा मगर देर तक इस बेवजह सवाल पर मैंने खुद को भटकने नही दिया।

‘‘आइए राज।’’ दरवाजे पर मेरी आहट होते ही अंदर से आवाज आयी। वह खनकदार आवाज खुसबू की थी जैसे वह मेरा ही इन्तजार कर रही थी। मैं अंदर चला गया।

‘‘बैठिए।’’ उसने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा, बोली -‘‘मुझे लगा अब दोबारा कभी आपके दर्शन नही होगे।’’

‘‘आपको सही ही लगा था मगर क्या करे, दोस्त की जिन्दगी का सवाल है इसलिए आना पड़ा।’’ मेरे शब्दो मे गुस्सा भी था और लाचारी भी।

‘‘मैं जानती हॅू राज कि आप अपने दोस्त की वकालत करने यहाँ आये हैं लेकिन हमें देखिए, ये सब जानकर भी हमने आपके साथ कोई बदसलूकी नही की।’’

‘‘खुशबू जी अगर इरादा है तो दिल पर मत रखिए, वह भी कर लीजिए।’’ मेरे गुस्से भरी लाचारी को समझना मुस्किल नही था। खुशबू ने कोई प्रतिक्रिया नही दी। हॅसकर वह बोली -‘‘आप तो बुरा मान गये मिस्टर राज। खैर बताइये मैं आपकी किस तरह सहायता कर सकती हॅू?’’

मैंने जवाब में कुछ नही कहा। जेब से अपना मोबाइल निकाला और संजय की पुलिस स्टेशन के अंदर की लहूलुहान तश्बीर निकाल कर उसके सामने रख दिया। खुशबू की नजर देर तक उस तश्बीर पर नही ठहरी। उसने सरसरी निगाह से उसे देखा और फिर नजरे उठाकर मेरी और घूरने लगी। उसके चेहरे पर कोई भाव नही पनपे। हँस कर बोली -‘‘ये सब आप मुझे क्यों दिखा रहे है?’’

‘‘इसलिए कि शायद आपके अंदर बची थोड़ी बहुत इंसानियत जाग जाये।’’

‘‘इंसानियत?’’ एकाएक उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया -‘‘इंसानियत की बात आप मुझसे कर रहे हैं मिस्टर राज? मुझे नही पता कि आपके बच्चे हैं कि नही मगर इतना यकीन है कि अगर आप भी अपनी बच्ची की लाश उस हालत में देखते तो वही करते जो आज मैं कर रही हॅू।’’

‘‘जी जरूर यही करता मगर कातिल के साथ… किसी निर्दाष के साथ नही।’’

‘‘और आपको ये कैसे पता कि वह कातिल नही है?’’

‘‘वैसे ही जैसे आपको यकीन है कि वही कातिल है।’’

‘‘मिस्टर राज वह आलमारी देख रहे हैं आप?’’ बेड से थोड़े दूर पर रखी आलमारी की ओर इसारा करते हुए वह बोली – “मुझे जब इस हादसे की खबर मिली और ऑफिस छोड़कर मैं यहाँ  आयी तो मेरी बेटी की लाश मुझे ठीक इसी आलमारी के पास पड़ी मिली थी। और उस समय ये पूरा घर लोगो से खचाखच भरा हुआ था।’’ अचानक उसकी आँखें भर आयीं। रुवासी आवाज मे वह बोली -‘‘आप यकीन नही करेगे हर किसी के मुँह पर एक ही नाम था और वह नाम था संजय पाठक।’’

‘‘मैं आपकी बात से सहमत हो सकता हॅू।’’ मैंने अपना मोबाइल जेब मे डालते हुए कहा -‘‘मगर यकीन मानिए कि जनता हमेशा वही देखती है जो हम उसे दिखाना चाहते है। इसलिए लोगो पर आँ ख बन्द करके भरोषा करना उचित नही है।’’

‘‘तो किस पर भरोषा करू मिस्टर राज? आप पर?’’ उसने मेरी ओर घूर कर देखा -‘‘जबकि मैं जानती हॅू आप संजय के दोस्त हैं जिसे मेरे दर्द से कोई लेना देना नही है।’’

‘‘ऐसा नही है खुशबू जी। शायद आप मुझे गलत समझ रही हैं। मैं आपके दर्द को समझता हॅू मगर आप भी तो संजय के दर्द को समझिए… बेटी उसने भी खोया है।’’

‘‘तो आप हम दोनो के दर्द की तुलना कर रहे है?’’ उसके आँखों से अचानक पानी की कुछ बूँ दे बिस्तर पर टपक पड़ी। अपनी आँखों को मलते हुए बोली -‘‘राज, मेरे दर्द को समझना है तो समुन्दर मे कूद जाइए और अपने दोनो हाँ थों से ठण्डे पानी को समेटिए। जितना आप समेट पाये वह दर्द आपके दोस्त का, बाकी सब मेरा है।’’

‘‘आप मेरी बातों का गलत मतलब निकाल रही है।’’

‘‘मैं गलत मतलब नही निकाल रही हॅू राज बल्कि आप लोग मेरा…।’’ कहते कहते एकाएक वह रुक गयी। अपने होंठो को उॅगलियों से दबाते हुए बोली -‘‘अभी जब आप नीचे बैठे थे ठीक उसी वक्त एक लड़की भी यहाँ  आयी थी और यही सब कुछ कह रही थी जो आप अब कह रहे है। मैं समझ नही पा रही हॅू कि पूरी दुनिया को सिर्फ संजय का दर्द दिखता है और मेरा?’’ वह अचानक सिसक पड़ी -‘‘मेरा क्या मिस्टर राज?’’

‘‘कौन थी वह लड़की?’’

‘‘आप नही जानते उसे?’’ वह हैरान होते हुए मेरी ओर देखी -‘‘मुझे लगा आपको पता होगा। संजय आपका इतना अच्छा दोस्त जो है। उसे अपनी दूसरी बीबियो के बारे मे आपको जरूर बताना चाहिए था।’’

‘‘दूसरी बीबी?’’

‘‘नही… मेरा मतलब था रखैल। रखैल का मतलब तो समझते होगे न आप?’’ गुस्से से उसका चेहरा लाल पड़ गया।

‘‘जानता हॅू।’’ मैंने नफरत से उसकी ओर देखा और उठकर खड़ा हो गया -‘‘अच्छा मैं चलता हॅू।’’

‘‘क्या? इतनी जल्दी?’’ वह भी उठकर खड़ी हो गयी। उसका गुस्सा अचानक कही गायब हो गया। रुवासे आवाज मे बोली-‘‘जानते हैं राज, मैं आपकी बहुत इज्जत करती हॅू और आपकी बात न मान कर मुझे सच मे अच्छा नही लग रहा है मगर मैं क्या करू?’’ उसने अपनी दोनो हथेलियों से अपना सर पकड़ लिया, बोली -‘‘संजय न कभी अच्छा पति बन पाया न अच्छा पिता। इसलिए मुझे लगता है आज वह जहाँ भी है उसके लिए वही जगह सही है।’’

‘‘खुशबू जी।’’ मैं चलते चलते ठहर गया। उसकी आँखों मे देखते हुए मैंने कहा -‘‘अगर मै पिछले बार की घटना को भूल जाऊँ तो मुझे यह सुन कर सचमुच अच्छा लगा कि आप मेरी इज्जत करती है। मगर एक बात और समझिए। आप इस बात पर जरूर बहस कर सकती है कि वह अच्छा पति था या नही मगर इस बात मे कोई दो मत नही है कि वह एक अच्छा पिता है।’’

‘‘और ये आप कैसे कह सकते हैं जबकि मैं जानती हॅू वह कई बार पंखुडी के साथ कठोरता से पेश आ चुका है।’’

‘‘अब आपके इस सवाल का जवाब मैं आपको कैसे दॅू? बस एक बात जान लीजिए कि पिता की कठोरता को समझना उतना आसान नही है जितनी आसानी से अक्सर लोग माँ की ममता को समझ लेते हैं।’’

‘‘लेकिन…।’’ उसने कुछ कहना चाहा मगर मैने उसे बीच मे रोकते हुए कहा -‘‘मैं अब और इस मुद्दे पर बहस नही करना चाहता। मेहमान नवाजी के लिए आपका शुक्रिया। मुझे लगता है कि अब मुझे यहाँ से निकलता चाहिए।’’

‘‘और आपके हिसाब से वह कत्ल किसने किया है?’’ मैं दरवाजे की ओर पलट पाता उससे पहले उसने रैपिड फायर किया।

‘‘आपके होने वाले शौहर -इकबाल अंसारी।’’ मैंने ठहर कर कहा।

‘‘क्या?’’ वह चौंक पड़ी। मेरी ओर बढ़ते हुए बोली -‘‘राज आप होश मे तो है? ये… ये क्या कह रहे हैं आप? आप इस बात को साबित कर सकते हैं?’’

‘‘अभी तो नही मगर हाँ, यकीन मानिए इस बात को साबित करने के लिए मैं किसी भी हद तक जाऊॅगा। क्योंकि मैं जानता हॅू मेरा दोस्त कातिल नही है।’’ मैंने कहा और फिर वहाँ से तेजी से निकल गया।

******

लगभग 12-13 दिन बाद मैं लखनऊ से दिल्ली के लिए लौटा। मेरी कार सड़क का चक्कर काटती हुई एकाएक एक सकरी गली की ओर मुड़ी और चंद मीटर की दूरी पार करते ही मेरे घर के पार्किंग मे जाकर खड़ी हो गयी। मुझे यकीन था शिवी दरवाजे पर मेरा इंतजार में कर होगी मगर मेरे सर पर कोई बोझ था कि मेरे कदम इतने भारी हो गये थे कि मैं आगे नही बढ़ पा रहा था। दरवाजे पर पहुँचने से पहले मैंने अपनी आँ खो की नमी को साफ किया, लम्बी सांसे खीची और फिर डगमगाते कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ गया। दरवाजे के करीब पहुँ चा तो मैं तो चैक पडा। दरवाजा खुला हुआ था, मगर शिवी वहाँ  नहीं थी। मैंने अपनी निगाहे इधर उधर दौडाई सांसे अटक कर रह गयी। शिवी वहाँ  से थोड़ी दूर, बरामदे में खड़ी एकटक मेरी ओर देखे जा रही थी। उसकी आँ खो में न तो मेरे आने की चमक थी और न ही होंठो पर मुस्कुराहट। मैं लखनऊ से हार कर लौटा था इसलिए उस वक्त मुझे उसका वह व्यवहार अच्छा नही लगा। मैं उसे अनदेखा करते हुए जैसे ही उसे पार करना चाहा वह एकाएक जोर से रो पडी।

            मेरे कदम वही के वही ठहर गये। मुझे लगा कि शायद किसी ने उसे लखनऊ की सारी कहानी के बारे मे पहले ही बता दिया है। मैं उसकी ओर पलटते हुए घबरा कर बोला -‘‘शिवी क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नही।’’ उसने कहा और एकाएक दौड़कर वह किसी बच्चे की तरह मुझसे लिपट गयी।

मैं चंद क्षणो तक माजरे को समझने की कोशिश करता रहा मगर जब दिमाग ने साथ नही दिया तो हैरान होते हुए पॅूछा -‘‘तुम रो क्यो रही हो? मुझसे कोई गलती हो गयी हैं?’’

            ‘‘नही। ’’ उसने अपनी लाल लाल आँखों से मेरी ओर देखा। उसके गाल आँ शुओ से भीग गये।

‘‘तो?’’

‘‘मैं अगर यहाँ मर जाती तो?’’

‘‘शिवी!’’ मैं हैरान हो उठा -‘‘तुम क्या कह रही हो?’’

‘‘कितने दिन हो गये आपने मुझे एक फोन भी नही किया।’’ उसने मुझे कस कर पकड़ लिया।

            ‘‘सॉरी।’’ अब जाकर मुझे मसला समझ मे आया। मैंने उसकी पीठ पर हाँथ फेरते हुए कहा -‘‘मगर शिवी… मैं करता भी क्या? हालात ही कुछ ऐसे बन गये थे कि मौका ही नही मिला कुछ और सोचने का। मुझे माँ फ कर दो।’’

‘‘राज।’’ वह एकाएक मुझसे अलग हो गयी। उसकी भरी भरी आँखों मे चमक लौट आयी। मुस्कुरा कर बोली -‘‘आप मुझसे माफी मांग रहे है? क्यो? आप जानते है न मैं आपको कितना प्यार करती हॅू।’’

‘‘हाँ जानते हैं मगर…।’’ मैंने भी मुस्कुरा दिया -‘‘हमने इतनी बड़ी गलती की है तो माँ फी तो मॅागनी पड़ेगी।’’

‘‘अब इतनी भी बड़ी गलती नही है।’’ मेरे हाँथ से अटैची थामते हुए उसने कहा।

हम थोड़ा आगे बढे कि एकाएक वह ठहर गयी। मेरी ओर देखते हुए बोली -‘‘राज, आपने बताया नही कि संजय भाई साहब कैसे है? उनकी जमानत तो हो गयी न?’’

‘‘तुमने पॅूछा ही कब?’’

‘‘ओह हाँ ।’’ वह लजा गयी -‘‘मैंने ही नही पूँछा। वह जेल से आजाद हो गये?’’

‘‘हाँ … वह हमेशा के लिए आजाद हो गया।’’ मेरा स्वर अचानक रुँध गया। मेरे आँसू अनियंत्रित होते उससे पहले मैं तेज कदमो के साथ अपने कमरे की ओर बढ़ गया।

‘‘राज।’’ शिवी समझ गयी कि कुछ ऐसा हो चुका है जिसके बारे मे वह नही जानती। मेरे पीछे पीछे शिवी भी उसी रफ्तार मे कमरे मे घुस आयी। मुझे पकड़ कर झकझोरते हुए बोली -‘‘राज… राज आप रो रहे हैं? संजय भाई साहब ठीक नही हैं क्या? आप मुझसे क्या छिपा रहे हो?’’

मैंने कोई जवाब नही दिया। मेरी आँखें अनियंत्रित हो गयी। मैं औंधे मुँह बिस्तर पर लेट गया।

‘‘राज मेरा दिल बैठा जा रहा है।’’ शिवी एक बार फिर रो पड़ी -‘‘बताइए न क्या हुआ है? संजय भाई साहब को कुछ हो गया क्या?’’

‘‘उस शैतान को क्या होगा?’’ मैंने तकिए से अपना सर निकालते हुए अपनी भीगी हुई आँखों से शिवी की ओर देखा। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था। मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा -‘‘उसे किसी की फिक्र होती है क्या? वह पहले भी तो सबको छोड़ता ही आया है। पहले अपने पापा को, नीतू को फिर प्रिया कोए खुशबू को और अब…।’’

‘‘अब?’’ शिवी मेरे ऊपर खुद को चादर की तरह बिछा दिया। मेरे सर को अपनी ओर खीचते हुए बोली -‘‘बोलिए न राज… अब उन्होने किसे छोड़ दिया?’’

‘‘शिवी।’’ मैं जोर से चिग्घाड़ पड़ा।

‘‘राज… राज क्… क्या हुआ आपको? आप ठीक है न?’’ वह मेरे बालो को सहलाने लगी -‘‘अच्छा सुनिए… मुझे आपसे अभी कुछ नही जानना। अ…आप उठिए, बाथरूम जाकर नहा लीजिए। मैं चाय लेकर आती हॅू। फिर बाद मे बात करते है।’’ वह उठकर खड़ी हो गयी। कमरे से निकलते हुए बोली -‘‘मैं जा रही हॅू चाय बनाने।’’

वह चली गयी तो मैंने एक बार फिर खुद को समेटा, बिस्तर से उठा और बाथरूम मे घुस गया। उस दिन मैं देर तक नहाता रहा। शिवी ने मुझे एक बार भी आवाज नही दी।

शाम को हमने खामोशी के साथ डिनर किया और बेडरूम चले गये। इस बीच भी शिवी ने उस बात का एक बार भी जिक्र नही किया। बिस्तर पर हम दोनो देर तक एक दूसरे से चिपके हुए लेटे रहे। दोनो की आँखों से नींद कही गायब थी।

‘‘शिवी।’’ काफी देर बाद मैंने आवाज दी।

‘‘हॅू।’’ वह मेरी ओर देखने लगी।

‘‘लोग सच ही कहते हैं कि आप ऐसी औरत तो खोज सकते है जिसका कभी कोई अफेयर न रहा हो पर ऐसी औरत खोजना मुस्किल है जिसका बस एक अफेयर रहा हो। और खुशबू उसकी जीता जागता उदाहरण है। उस दिन जब मैं दोबारा उसके घर गया उसने जिस तरीके से संजय और नीतू के चरित्र पर छीटाकशी की उसने मुझे परेशान कर दिया। मैं हैरान था कि कोई औरत इतने भरोषे के साथ झूठ कैसे बोल सकती है। मैं खुशबू के घर से लौटकर तो आ गया मगर मन इतना अशान्त था कि मैं अपने परिवार के साथ होकर भी उनके बीच नही था। मुझे याद है भइया मुझे देर तक देखते रहे मगर उन्होने मुझसे कुछ नही पॅूछा। जानती हो क्यो? क्योकि शायद उन्हे उम्मीद थी कि मैं खुद ही उन्हे सब कुछ बताऊॅगा। मैंने उन्हे कुछ नही बताया। मैं उन्हे परेशान नही करना चाहता था। खुशबू और इकबाल ने जितनी चालाकी से उस अपराध मे संजय को अपराधी बना दिया था मुझे उम्मीद कम ही थी कि हम संजय को कोर्ट से छुड़ा पायेगे इसलिए उसी शाम को मै इलाहाबाद जाने का फैसला किया। 

‘‘इलाहाबाद क्यों?’’ शिवी ने धीरे से पॅूछा।

‘‘मुझे लगा कि मै खुशबू के परिवार से मिलू शायद उन्हे मेरी बात समझ आ जाये और वे खुशबू को अपना केश वापस लेने के लिए मना ले। इसलिए मैं लखनऊ से उसी दिन शाम को इलाहाबाद के लिए निकल गया।’’

******

            रात लगभग 11 बजे तक मैं इलाहाबाद पहुँच गया। स्टेशन के बाहर एक होटेल की गाड़ी मेरा इन्तजार कर रही थी जो मुझे लेकर सीधा होटेल पहॅुच गयी। मैंने कमरे पर पहुँच कर नहाया और फिर डिनर के लिए लाँ बी आ गया। उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि जीवन की कुछ रातें कितनी लम्बी होती हैं। मैं बिस्तर पर लेटे हुए सुबह होने का इन्तजार कर रहा था। तभी एकाएक मेरे होटेल के फोन की घंटी बज उठी। मैंने सामने दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखा सुबह के 7 बज रहे थे। मैंने फोन उठा कर हेलो कहा।

            ‘‘आप राज बोल रहे है?’’ उधर से आवाज आयी।

            ‘‘जी बोल रहा हॅूं।’’

            ‘‘मैं किसन बोल रहा हॅू। संजय का दोस्त।। मैं कल शाम से आपका फोन लगा रहा हॅू मगर आपका मोबाइल शायद स्विच आँ फ है।’’

            ‘‘स्विच आँ फ?’’ मैंने लपक कर अपना मोबाइल उठाया। वह सच मे आँ फ था। मैंने खेद जताते हुए कहा -‘‘सॉरी, मैंने ध्यान नही दिया। आपको कोई काम था मुझसे?’’

            ‘‘दरअसल नीतू ने कल शाम मुझे फोन किया था कि आप खुशबू के पापा मम्मी से मिलने वाले है।’’

            ‘‘जी हाँ ।’’

            ‘‘दरअसल वे लोग इलाहाबाद मे नही है।’’

            ‘‘क्या?’’ मैं चौंक पड़ा -‘‘कहाँ गये है वे लोग?’’

            ‘‘इस समय उसके पापा की छुट्टियाँ चल रही है इसलिए गाँव गये हुए है।’’

            ‘‘तो अब मैं क्या करूँ?’’

            ‘‘आप तैयार हो जाइए। मैं आ रहा हॅू आपको होटेल से पिक कर लेता हॅू और उसके बाद हम दोनो उनके गाँव के लिए निकल लेगे। उनका गाँव यही कोई यहाँ से दो ढाई घंटे की दूरी पर है।’’

            ‘‘आपने अपना क्या नाम बताया था। सॉरी मैंने उस वक्त ध्यान नही दिया।’’

            ‘‘किसन।’’

            ‘‘ओह थैंक्यू मिस्टर किसन। आपने मेरी सारी मुस्किल ही हल कर दी वरना ये खबर सुन कर मेरे पैर के नीचे से जमीन ही खिसक गयी थी।’’

            ‘‘नही राज, आपको थैंक्यू बोलने की जरूरत नही है। आप शायद मेरा नाम पहली बार सुन रहे है मगर मैं आपको अच्छे से जानता हॅू। संजय आपकी अक्सर बात किया करता था।’’

            ‘‘अच्छा।’’

            ‘‘जी… दरअसल वह मेरा पड़ोसी था। हम दोनो यही अल्लापुर में पास पास ही रहते थे।’’

            ‘‘आपके बारे मे जानकर अच्छा लगा… किसन। आप निकलिए वहाँ से, मै तैयार होता हॅू।’’ मैंने फोन रख दिया।

             सुबह के लगभग साढ़े दश बजा रहा होगा हम किसन की मोटरसाइकिल से उस गाँव तक पहुँच गये। गाँव से लगे हुए एक छोटे से बगीचे में खेल रहे बच्चों से मैंने पूछा -‘‘गिरीश चन्द्र जी का घर कहा हैं।’’ गिरीश चन्द्र खुशबू के पिता जी का नाम था।

हम उनके बताये गये रास्ते से जल्दी ही उस घर के सामने पहुँच गये। मिट्टी से बने उस घर के सामने काफी जगह थी। दाहिनी ओर एक नीम का बड़ा सा पेड था जिसके नीचे तीन-चार बच्चे खेल रहे थे। हमें देखते ही एक बच्चा चिल्ला उठा -‘‘कल्लू देख तोरे घर मा गाँव से कउनो मनई आवा है।’’

मुझे उसके अंदाज पर हॅसी आ गयी। कहते वक्त वह बच्चा जोर से उछला। हालाकि मुझे पता नहीं चल पाया कि उन बच्चों में से कल्लू कौन है फिर भी मैंने उसे उसके नाम से पुकारा। मेरे सम्बोधन पर एक तीन-चार साल का नाटा सा बच्चा अपना सिर खुजलाते हुए मेरी ओर देखने लगा।

‘‘बेटा पापा है घर पर?’’ मैंने पूछा।

वह मेरी ओर अर्थपूर्ण नजरो से देखने लगा। बोला कुछ नही।

‘‘बाबू घर में है तुम्हारे?’’ किसन ने हँस कर दोबारा पूछा।

‘‘हा… भीतरे है।’’ अपने घर के दरवाजे की ओर इसारा करते हुए उसने कहा -‘‘जाके बुला लाऊॅ?

‘‘हाँ, बुला लाओं।’’

वह अन्दर की ओर तेजी से भागा था । मुस्किल से 15 सेकेन्ड भी न गुजरे रहे हो गे कि वह उसी तीव्र गति से लौट भी पड़ा।

‘‘क्या हुआ बेटा बुलाए हो?’’ मैंने पूछा। मगर उसने मेंरे बात पर बिना ध्यान नहीं दिये हुए हॅसते खिलखिलाते हुए सीधे अपने दोस्तों के बीच जा खडा हुआ। ताली बजाते हुए कहने लगा -‘‘हमरी अम्मा, हमरे बाबू को मारत है… हमरी अम्मा हमरे बाबू को मारत है।’’

मुझे उसकी नादानी पर हॅसी आ गयी। मैं थोड़ी देर तक उसकी ओर देखता रहा। फिर किसन की ओर देखते हुए मैंने कहा -‘‘किसन, ये बच्चे भी कितने मासूम होते हैं न? इन्हें दुनियादारी की अच्छाई या बुराई से कोई लेना देना नहीं होता। अब देखो न अपने पापा की इज्जत को सरे आम उछालते हुए भी उसे एहसास नही हो पा रहा है कि वह क्या कर रहा है?’’

‘‘हाँ सही कह रहे है आप।’’ किसन ने कहा -‘‘दरअसल इन्हे अपनी खुशियों से ही फुरसत नही मिलती ये सब सोचने की। बस अपने छोटे सेे संसार में मस्त रहते है।

कुछ देर तक जब उस घर से कोई नही निकला तो मैं खुद ही दरवाजे को खटखटाने के लिये आगे बढ गया। हालाकि आगे बढते हुए मैं सोच रहा था कि शायद मैं गलत दरवाजे को खटखटाने जा रहा हॅू क्योकि मुझे यकीन नही हो रहा था कि वह मासूम सा लड़का खुशबू का भाई हो सकता है। मगर मैं विकल्पहीन था। आगे बढ़ गया। दरवाजे के पास पहुँ चा तो किसी औरत की आवाज आ रही थी जो शायद किसी पर चीख रही थी।

मैंने दरवाजा खटखटाकर खुलने के इंतजार मे खड़ा हो गया। लगभग 2-3 मिनट बाद एक दुबला पतला सा इंसान, जिसकी उम्र 50-55 की रही होगी बाहर निकला। मुझ पर नजर पडते ही वह तीव्रता से अपने ऊलजलूल हो चुके शर्ट को ठीक करके अपने विखरे वालों को चिपकाने की कोशिश करने लगा। उसके चेहरे के उड़े हुए रंग को देखकर मुझे हॅसी आ गयी जिसे मुस्किल से मैं रोक पाया। मैंने खुद को गम्भीर दिखाते हुए कहा -‘‘काफी देर से मैं आपका इंतजार कर रहा हॅू।’’

कुछ पलों तक वह एकटक मुझे ऐसे देखता रहा जैसे मैंने उसे रंगे हाँ थों चोरी करते हुए पकड़ लिया हो। फिर होश सम्भला तो वह हॅसने की जबरजस्ती कोशिश करते हुए बोला -‘‘ऊ का है कि खाना खाये लागे रहवा। कउनो काम था हमसे?’’

‘‘गिरीश चन्द्र आप ही का नाम है?’’

‘‘हाँ, हमरै नाम है लेकिन हम आपको पहचान नहीं पावा।’’

‘‘खुशबू को जानते हैं आप?’’

‘‘खुशबू?’’ कुछ देर तक वह सोचता फिर कुछ याद आया तों हँस पडा -‘‘ओह तो आप शायद खुशबू बिटिया के घर जाये चाहत हौ। उहके पापा भी हमारै नावराशी है। चलिए …चलिए मै आपको उहां तक छोड़ आता हॅू। आजकल वो इंहै है। छुट्टी मा आये है न।’’

मैं और किसन उसके पीछे-पीछे चल पडे।

‘‘साहब एक बात बताएगे आप?’’ अचानक पीछे मुड कर उसने मेरी ओर देखा था।

‘‘क्या?’’

‘‘सुना है कि खुशबू बिटिया का तलाक होइगा है। आप लोगन का कुछ पता है का?’’

‘‘नही मैंने तो नही सुना।’’ मैंने धीरे से कहा।

‘‘का बात करत हौ? इहाँ तो पूरे गाँव मे चर्चा है।’’ कहते हुए वह एकाएक खड़ा हो गया। सामने एक घर की ओर इसारा करते हुए बोला -‘‘वो रहा गिरीश बाबू का घर।’’

मै गौर से देखा था उस घर को। आस-पास के घरों से अगर तुलना की जाए तो वहाँ पर सबसे अच्छा घर वही था। पूरी तरह ईटो से बना हुआ और उसके आगे छोटा सा मैदान जिसके एक कोने पर एक चितकबरी सी गाय बधी हुई थी।

मैंने किसन की ओर देखते हुए हँस कर बोला -‘‘चलिए, ये लड़ाई भी लड़कर देखते है।’’

‘‘जी बिल्कुल।’’

हम अभी घर के चबूतरें की सीढ़ियाँ ही चढ रहे थे कि एकाएक दरवाजे से एक सख्स निकला। गोरा चिट्टा बदन, बड़ी बड़ी मूँ छे, शरीर पर बनियान और कमर पर तौलिया लपेटे हुए हमें देखा तो एकाएक ठिठक गया।

‘‘आप लोग कौन है?’’ उसने पॅूछा।

‘‘गिरीश जी से मिलना है।’’

‘‘जी बोलिए। क्या काम है?’’

‘‘आप ही है गिरीश जी?’’

‘‘जी मैं ही हॅू।’’ उसने कहा तो मैं घबरा गया। उसके बात करने के अंदाज से लग रहा था कि वह सुनने मे कम और बोलने मे ज्यादा यकीन करता है। किसन की ओर इसारा करते हुए बोला -‘‘मुझे लग रहा है कि मैने कही आपको देखा हैं?’’

उसकी बात सुनी तो किसन मेरी ओर देखने लगा। उसे समझ नही आ रहा था कि वह उसकी बात का क्या जवाब दे जबकि संजय की शादी मे वह किसन ही था जिस पर शादी की सारी व्यवस्था की जिम्मेदारी थी।

‘‘यह किसन है… संजय का दोस्त। आपने इन्हे उसकी शादी मे ही देखा होगा।’’

‘‘संजय का दोस्त।’’ वह एकाएक ऐसे चौंक पड़े जैसे उनके सामने अचानक किसी ने बम्ब रख दिया हो। वह थोड़ी देर तक अजीब सी नजरों से हमारी ओर देखते रहे फिर एकाएक उनके होंठो पर हल्की मुस्कान दौड़ पड़ी। हाँथ हिलाते हुए बोले -‘‘अरे आप लोग वहाँ क्यो खड़े है? आइए बैठिए।’’ उन्होने दरवाजे के पास रखी चारपाई की ओर इसारा किया।

हम लोग बैठ गये। थोढ़ी देर तक हम सब एक दूसरे की ओर देखते रहे। शायद समझ नही पा रहे थे कि बात कैसे शुरू करे।

‘‘आप लोग चाय लेगें?’’ अचानक उन्होने पॅूछा।

‘‘जी नही। शुक्रिया।’’ मैंने मुस्कुरा कर कहा -‘‘हमें कुछ आपसे बात करनी थी… इसीलिए यहाँ तक आये है।’’

‘‘आपका परिचय?’’

‘‘मेरा नाम राज है। मैं भी संजय का दोस्त हॅू।’’

‘‘तो आप संजय की तरफ से बात करने वाले है या मेरी बेटी खुशबू की तरफ से?’’

हालाकि हम उनके इस सवाल को अजीब कह सकते है मगर वह गलत नही था। मैंने मुद्दे को बदलते हुए कहा -‘‘दरअसल हम चाहते हैं कि वे दोनो…।’’

‘‘दोनो नही…।’’ उन्होने मेरी बात बीच मे ही काट दी -‘‘आप उस लड़की के बाप से बात कर रहे है जिसने अपनी बेटी खोई है और दुर्भाग्य से कत्ल का आरोप उसके पति पर है। इसलिए फैसला करिए कि आप एक कत्ल के आरोपी के लिए मेरी सहानुभूति लेने आये है या पंखुड़ी की माँ के लिए इंसाफ?’’

‘‘इंसाफ… ।’’ मैंने कहा तो वह थोड़ी देर तक गौर से मेरी ओर देखता रहा। शायद उसे अपने कानो पर यकीन नही हो पा रहा था।

‘‘क…क्या कहा आपने?’’ वह अपने कानो पर हाँथ लगाते हुए मेरी ओर झुका।

‘‘जी मैंने कहा इंसाफ… मगर सिर्फ माँ के लिए नही, पिता के लिए भी।’’ मेरी आँखें एकाएक नम हो गयी -‘‘बेटी तो उसने भी खोया है।’’

‘‘ये कैसे कह सकते है आप?’’

‘‘इस सवाल का जवाब आप खुद से पॅूछ लीजिए। मैंने सुना है कि आप भी अपनी पत्नी से अलग रहते है? जबकि आपकी बेटी अपनी माँ के साथ थी।’’

‘‘आप मुझसे क्या चाहते है?’’ एकाएक उनके सुर बदल गये।

‘‘मैं चाहता हॅू कि आप खुशबू जी से कहे कि वह नामजद रिपोर्ट वापस लेकर सिर्फ बेटी के कत्ल की रिपोर्ट करवाये ताकि पुलिस इसकी नये शिरे से जाँच करे और पंखुड़ी के वास्तविक कातिल तक पहॅुचा जा सके। और सच कहॅू तो यही वह रास्ता भी है जिससे सही मायनो मे पंखुड़ी को न्याय मिल सकेगा।

वह मेरी ओर देखने लगा। मैंने नजरें नही झुकायी।

‘‘वैसे आपको क्या लगता है?’’ मैंने उनकी ओर झुकते हुए पूछा।

हालाकि उनकी आँखों मे सवालो का समुन्दर था मगर मै भी समुन्दर को सुखाने के इरादे से धनुष लेकर उनके सामने खड़ा हो गया। अब या तो वह मुझे मार्ग दे या फिर सेतु बनाने का रास्ता बताये।

‘‘वह मेरी बात नही सुनेगी।’’ थोड़ी देर बाद उन्होने कहा।

‘‘क… क्या कहा आपने?’’ मैंने उनकी बात सुनी तो चौंक पड़ा। चंद क्षणो तक मुझे अपने कानो पर यकीन नही हुआ। मैंने जोर देते हुए कहा -‘‘मैंने ठीक से सुना नही।’’

‘‘जी हाँ  राज… आपने अभी जो भी कहा ऐसा नही है कि मै वह सब जानता नही।’’ उन्होने अपना सर झुका लिया। मैंने उनकी आँखों को गौर से देखा। उनमे एकाएक नमी आ गयी थी। वह अपनी बात जारी रखते हुए बोले -‘‘मुझे पता है कि संजय ने अपनी शादी निभाने की भरपूर कोशिश की है मगर कोई था जो खुशबू के दिमाग पर इतना हावी हो गया कि वह सही और गलत के बीच फर्क करना भूल गयी… और पंखुड़ी के कत्ल के मामले मे भी उसने यही किया। जबकि व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि संजय निर्दोष है।’’

‘‘फिर आपको क्या लगता है कि यह कत्ल किसने किया होगा?’’

‘‘ये कत्ल किसी और ने नही, बल्कि इकबाल ने ही किया है और यकीन मानिए कि यह बात मैंने खुशबू को कई बार समझाने की कोशिश की है मगर क्या आप जानते है कि लड़कियो की सबसे बड़ी त्रासदी क्या है?’’

‘‘क्या?’’

‘‘वह हमेशा अपनी माँ की तरह बन जाती हैं… और खुशबू भी उन्ही मे सामिल हो गयी है। वह मेरी बात सुनने की बजाए अपनी माँ  की सुन रही है।’’

उनकी बात सुनी तो मैं उठकर खड़ा हो गया। उनके पैरो तक झुककर उनके चरण स्पर्श किया और अपना हेलमेट उठाते हुए कहा -‘‘अच्छा अब मुझे चलने की इजाजत दीजिए।’’

उन्होने कुछ नही कहा। उनकी भरी हुई आँखें सब कुछ कह गयी।

******

मैं एकबार फिर लखनऊ लौट आया। सबूत के नाम पर अभी तक हमारे पास कुछ खास जमा नही हो पाया। मेरे पास सिर्फ मेरे हिडेन कैमेरा से रिकार्ड की हुई दो बातचीत ही थी। एक वह जो मैंने खुशबू के घर जाकर बात की थी और दूसरी वह जो उसके पापा के साथ गाँव जाकर किया था। हालाकि उसके पापा के साथ हुई बातचीत इतना तो इसारा करती है कि संजय को राहत मिल सके मगर उसकी पूरी तरह रिहाई कराने के लिए वह पर्याप्त नही थी।

 अगली सुबह मैं जब उठा मेरा मन काफी हल्का था। पता नही क्यों मुझे ऐसा लग रहा था कि कुछ अच्छा होने वाला है । मैं सोफे मे बैठा हुआ चाय पी रहा था, कि अचानक मेरा भतीजा बाबी विस्तर पर उठ बैठा। मैंने उसकी ओर देखा तो वह हौले से मुस्करा पडा।

‘‘मेरा बेटा चाय पियेगा?’’ मैंने मुस्कुराकर उससे पॅूछा।

‘‘नही।’’ उसने कहा और बिस्तर से उतर कर मुस्कुराता हुआ सामने रखी आलमारी की ओर बढ ़गया। मैं समझ गया कि वह पहले ही आलमारी के पास रखे हुए बल्ले को देख चुका है। वह उसके पास पहुँच कर बल्ला उठाया और फिर मुस्कुराता हुआ मेरी तरफ लौट पड़ा। अपनी उॅगुलियों को गोलाइयो में मरोडते हुए कोई संकेत किया। मैं समझ गयी कि वह मुझसे गेंद के बारे में पूछ चाह रहा।

मैंने झुक कर सोफे के नीचे देखा तो वह भी झुक गया। गेंद सामने ही पड़ी थी मैंने निकाल कर उसके हाँ थों मे थमाने की कोशिश की मगर उसने लिया नही। मुझे अपनी ओर खीचते हुए गेंद फेकने का संकेत किया ताकि वह बैटिंग कर सके।

मैं उसके लिए गेंद फेकने लगा तभी एकाएक मेरे फोन की घंटी बज उठी। फोन नीतू का था।

‘‘राज, आप मेरे घर आ सकते है?’’ उसकी आवाज मे खनक थी।

‘‘कोई जरूरी काम है?’’

‘‘हाँ … कुछ सबूत इकट्ठा किये है उसे आपको दिखाना चाहती थी।’’

‘‘क्या?’’ मै एकएक उछल पड़ा -‘‘किस तरह का सबूत है?’’

‘‘मुझे लगता है कि आपको यहीं आकर देखना चाहिए। आप कहें तो मैं आपको लेने आ जाऊॅ?’’

‘‘नहीं… उसकी जरूरत नही है।’’

‘‘तो?’’

‘‘मै खुद आ रहा हूँ । भइया की कार लेकर। आप मुझे अपना पता मैसेज कर दीजिए।’’

एक घंटे बाद मै उसके घर पहॅुच गया। वह दरवाजे पर ही मेरा इंतजार कर रही थी।

‘‘आइए राज।’’ मुझे देखते ही वह हौले से हॅस पड़ी। मैंने भी हँस कर उसका जवाब दिया। उस वक्त उसकी आँखों में अभूतपूर्व चमक थी।

उसके उस छोटे से घर में मात्र दो कमरे एक किचेन था। जिसके एक कमरे पर बेडरूम था और दूसरा ड्राइंग रूम के रूप मे वह इस्तेमाल कर रही थी। दीवाल पर कई अच्छी पेटिंग के बीच वहाँ एक बडी सी तश्बीर संजय की भी लगी थी।

‘‘राज, क्या लेगे आप? ठण्डा या फिर चाय या काफी?’’

‘‘बस चाय।’’

‘‘ओ0के0।’’ वह मुस्कुराकर मेरी ओर देखी और किचेन की ओर बढ गयी। फिर जब लौटी तो उसके हाँथ मे चाय के दो कप और नमकीन की एक प्लेट थी। मेरी निगाह एकबार फिर संजय की तश्बीर पर जा टिकी। मैंने हँस कर पॅूछा -‘‘यह तश्बीर आपको कहाँ से मिली?’’

‘‘बस ऐसे ही कही से चुरा लिया था।’’ हॅसते हुए उसने तश्बीर की ओर देखा। उसकी आँखों में सपनो का समुन्दर हिलोरे खा रहा था। तभी अचानक उसे कुछ याद आया। मेरी ओर मुखातिब होते हुए वह बोली -‘‘वैसे राज, आप एक रिकार्डिंग सुनना चाहेंगे?’’

मैं उसकी ओर देखने लगा -‘‘रिकार्डिंग?’’

‘‘जी।’’ वह मुस्कुराते हुए उठी और लगभग दौड़ते हुए दूसरे कमरे मे घुस गयी। जब लौटी तो उसके हाँथ में एक छोटा-सा टेप रिकार्डर था।

‘‘इसमे क्या है?’’ मैने पॅूछा तो कुछ बताने की बजाए उसने उसे आँ न कर किया। उसमें इकबाल अंसारी और नीतू की बातचीत रिकार्ड थी जिसमे इकवाल अंसारी हँस-हँस कर बता रहा था कि उसने किस तरह खुशबू का इस्तेमाल किया। इकबाल ने नीतू को यकीन दिलाते हुए कहा कि दरअसल वह असली प्यार सिर्फ नीतू से ही करता है। खुशबू से तो इसलिए निकाह करना चाहता है क्योकि उसे खुशबू का वह खूबसूरत घर चाहिए जिसे वह निकाह के वक्त मेहर मे मांगने वाला है। उसने यह भी बताया कि वह पंखुड़ी को मारना नही चाहता था। वह बस एक हादसा था जिसमे उसने खुद को बचाने के लिए संजय को फॅसा दिया। उसने तो संजय को अपने निकाह के बीच मे न आने और उसे डराने के लिए बिस्तर मे एक स्टूल रखकर पंखुडी को उसमें खड़ा कर दिया और पंखे से बंधे हुए फंदे को उसके गले मे डाल दिया। ताकि वह संजय को दिखा सके कि अगर उसने उसकी बात नही मानी तो पंखुड़ी के साथ क्या क्या हो सकता है। फिर वह पंखुड़ी को उसी हाल मे छोड़कर जैसे ही बाँलकनी की ओर ये देखने के लिए आया कि क्या वहाँ  आस पास संजय आ चुका है? अचानक पता नही कैसे और कब स्टूल गिरा और दम घुटने से पंखुड़ी की मौत हो गयी। जिस समय वह पंखुड़ी की लाश को कपड़े मे लपेट रहा था ठीक उसी समय संजय लाँ न मे खड़ा होकर वहाँ के मुरझाये हुए फूलो को देख रहा था। अपनी इस बातचीत के दौरान इकबाल ने कई बार नीतू को डार्लिंग शब्द से भी सम्बोधन किया था। बातो से ऐसा लग रहा था कि जैसे वह दोनो एक दूसरे को सालो से जानते हो।

‘‘नीतू, आपने संजय के लिये खुद को ही दांव में लगा दिया।’’ टेपरिकार्डर को आँ फ करके मैंने नीतू की ओर देखते हुए से पूँछा।

‘‘दाँव पर?’’ वह मेरी ओर थोडी देर तक एकटक देखती रही फिर धीरे से हँस कर बोली -‘‘हाँ लगाना पड़ा मगर राज, आपको घबराने की जरूरत नही है। मुझे अपनी हद पता थी। मैने उतना ही किया था जितना आपने रिकार्डर पर सुना है। वैसे एक बात बताऊँ आपको। मैं संजय के लिये इससे भी ज्यादा जोखिम उठा सकती हॅू।’’

‘‘मैं जानता हॅूं लेकिन ये सचमुच बहादुरी की बात है कि इस काम को अंजाम देने के लिये आपको इकबाल अंसारी के घर तक जाना पड़ा?’’

‘‘नही। मैं इतनी भी पागल नही हॅू राज। दरअसल मैं उसके ऑफिस गयी थी। क्यों कि वहाँ एक बात की गारंटी थी कि तमाम स्टाफ होने की वजह से वह सिर्फ बात कर सकता था। वह भी बिना बताए ताकि वह कोई प्लानिंग भी न कर पाये।’’

‘‘लेकिन आप उससे पहली बार मिली कैंसे?’’

‘‘हमारी जान पहचान इतनी नयी नही है राज। उसे मैं 3-4 महीने से जानती हॅू।’’

‘‘तीन चार महीने से?’’ मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा।

‘‘हाँ ।’’ वह हँस पड़ी -‘‘मुझे ठीक से याद नही है मगर 3-4 महीने तो हो गये होगे जब पहली बार मैंने खुशबू को इकबाल के साथ उसके ऑफिस के पास देखा था।’’

‘‘लेकिन आप तो आलमबाग की तरफ काम करती है… है न? तो खुशबू के ऑफिस की तरफ किसी काम से गयी थी?’’

‘‘हाँ … दरअसल खुशबू के ही ऑफिस में मेरी एक दोस्त काम करती है। मैं उसी से मिलने वहाँ गयी थी तभी अचानक मेरी नजर खुशबू पर पड़ी। मैंने उसके बारे मे अपने दोस्त को बताया तो उसने कहा कि खुशबू तो उसी के साथ काम करती है। ‘और उसके साथ जो आदमी खड़ा है वह कौन है’ मेरे इस सवाल पर उसने बताया कि वह उसे नही जानती मगर हाँ वह अक्सर खुशबू से मिलने वहाँ आता जाता रहता है।’’

‘‘फिर आप उससे कैसे मिली?’’

‘‘मैं।’’ वह जोर से हँस पड़ी -‘‘आप शायद जानते नही कि मैं सिर्फ बाहर से शान्त स्वभाव की हॅू। अंदर मेरा दिमाग बहुत तेज चलता है। खुशबू के वहाँ जाने के बाद मैंने उससे लिफ्ट मांगी और उसने मुझे एक काँ मन लड़की समझकर लिफ्ट दे भी दी। फिर रास्ते मे मैने उससे उसका परिचय पॅूछा, उसने बता दिया। उतरते हुए उसने अपना कार्ड थमाते हुए हँस कर कहा कि कभी आइए हमारे गरीबखाने में। जवाब मे मैंने भी कह दिया कि ठीक है… आयेगे कभी। अब मुझे कहाँ पता था कि ऐसा वक्त आ ही जायेगा कि सचमुच जाना पडे़गा। और फिर देखिए संजय के साथ हुए इस हादसे के बाद जब मुझे सारे रास्ते बन्द दिखे तो उसका दिया हुआ वह कार्ड काम आया। मुझे उसके गरीबखाने जाना पड़ा।’’

‘‘बुरा न माने तो एक बात कहॅू।’’

‘‘जी कहिए।’’

‘‘मुझे ये समझ मे नही आ रहा है।’’ मैंने हिचकते हुए कहा -‘‘कि वह खुशबू को छोड़कर आपके साथ क्यो जाना चाहता था?’’

‘‘हिचकिए मत राज।’’ वह खिलखिला पड़ी -‘‘मैं ऐसी बातो का बुरा नही मानती क्योकि मैं जानती हॅू कि मैं खुशबू की तरह खुबसूरत नही हॅू और ये बात स्वीकार करने मे मुझे कोई हिचक नही होती।’’

‘‘फिर?’’

‘‘दरअसल बात ये है कि खुशबू जैसी खूबसूरत लड़की को छोड़कर मुझे चुनने की आदत अकेले इकबाल मे ही नही है अपितु सृष्टि के सारे मर्दाे मे है। मर्द चाहे अपनी पाँचवी शादी कर रहा हो फिर भी उसे लड़की वर्जिन ही चाहिए। और आप इतना तो जानते है कि खुशबू तो वह है नही।’’

‘‘सही कह रही है आप।’’ मैंने नजरें झुका ली -‘‘ये सचमुच मर्दो की सबसे बड़ी त्रासदी है।’’

‘‘सॉरी राज, मुझे लगता है कि शायद मैं कुछ ज्यादा ही…।’’

‘‘नही नही आपने कुछ ज्यादा नही कहा। आपने जो भी कहा, सच वही है।’’ मैंने कहा और दीवार पर लगी संजय की तश्बीर की ओर देखने लगा। उस समय नीतू की नजरें मेरे चेहरे के इर्द गिर्द घूमती रही। थोड़ी देर तक वहाँ खामोशी छायी रही।

‘‘क्या सोचने लग गये राज?’’ अचानक नीतू ने आवाज दी।

‘‘यही कि काश संजय की जिन्दगी मे खुशबू की जगह आप होती। वह कितना खुश होता। मगर कोई बात नही।’’ मैंने मुस्कुरा कर उसकी ओर देखा -‘‘तब नही तो अब सही। हमने इतने साक्ष्य जुटा लिये है कि संजय को बाहर आने मे और इकबाल और खुशबू को अंदर जाने मे देर नही लगेगी। फिर इस बार तो आप दोनो की शादी मैं नही छोड़ने वाला।’’

‘‘राज, कुछ और बात कीजिए न।’’ नीतू अचानक भावुक हो गयी।

‘‘चलिए ठीक है, कुछ और बात करता हॅू।’’ मैंने धीरे से हॅस कर कहा -‘‘आपको पता है कि संजय डायरी लिखता है।’’

‘‘हाँ जानती हॅू।’’ उसने पलके झुका ली।

‘‘मैने उसकी डायरी पढी है। उसमें आपका भी जिक्र है।’’

‘‘क्या?’’ एकाएक उसकी पलके मेरी ओर दौड़ लगाई। उसके चेहरे की असहजता को मैंने महसूस किया।

‘‘जानती हैं आप?’’ मैंने कहा -‘‘उस डायरी को पढ़ते वक्त मुझे लगा कि संजय ने जिस तरीके से आपका जिक्र किया है वह व्यवहार में संभव नहीं है मगर अब जबकि मै आपके सामने हॅू, आप से बात कर रहा हॅू तो सोचता हॅू कि मैं कितना गलत था। मुझे अब ऐसा भी लगता है कि उसने शायद आपको उस डायरी में पर्याप्त जगह नही दी। उसमे आपके व्यक्तित्व की बहुत छोटी सी अभिव्यक्ति है, जो शायद पर्याप्त नही है आपकी चाहत के लिए… आपके समर्पण के लिए… आपके प्रेम के लिए।’’

‘‘राज, मुझे यह जान कर सचमुच खुशी हुई कि संजय ने अपनी जिन्दगी में न सही, कम से कम अपनी डायरी में तो मुझे थोड़ी सी जगह दे दी है।’’ नीतू के चेहरे की चमक एकाएक गायब हो गयी। शायद एक बार फिर वह भावुक हो गयी थी।

******

            उस दिन कोर्ट लोगो से खचाखच भरा हुआ था। मेरे मन में अथाह प्रसन्नता थी। मुझे विश्वास था कि संजय अब बहुत समय तक जेल मे नही रहेगा। मगर वक्त के हर पल के साथ साथ मेरा दम घुटता जा रहा था… भरोषा धॅुआ बन कर हवा मे उड़े जा रहा था। कोर्ट की सुनवाई शुरू होने वाली थी मगर अब तक नीतू कोर्ट नही पहॅुची। इस बीच हमारा वकील कई बार मुझसे पूँछ चुका था कि नीतू सबूत के साथ कोर्ट कब पहुँ चेगी? मैं एक दो बार कोर्टरूम से बाहर निकला, इधर उधर देखा जब वह नही दिखी तो पुनः जाकर अपने वकील के पास पहुँच गया।

            उस वक्त हमसे कुछ ही दूरी पर बैठी खुशबू एकटक मेरी ओर देखे जा रही थी। उसके चेहरे की रौनक बता रही थी कि वह अपनी जीत को लेकर पूरी तरह से अश्वस्त थी। उसने मुझे चिढ़ाने के लिए इकबाल का हाँथ पकड़ कर उसकी ओर देखा। दोनो की नजरें मिली तो उनके होंठो पर मुस्कुराहट छा गयी। इस दौरान इकबाल की नजरें मुझसे टकरायी मगर हमारे चेहरों पर शून्यता बनी रही।

            ‘‘मिस्टर राज।’’ अचानक मेरी वकील ने आवाज दी -‘‘एक बार नीतू को फोन लगाइए। पॅूछिए कहाँ पर है वह?’’

            ‘‘मैं कई बार प्रयास कर चुका हॅू वकील साहब मगर उसका फोन नही लग रहा है।’’

            ‘‘फोन नही लग रहा है??’’ वह चौंक पड़ा -‘‘आप जानते हैं आप क्या कह रहे हैं? आपके दोस्त की जमानत और सजा दोनो उन्ही पर निर्भर है। अगर वह नही आयी तो आप मुझे दोष मत दीजिएगा क्योंकि बिना पर्याप्त सबूत के मैं कुछ नही कर पाऊॅगा।’’

            ‘‘मैं जानता हॅू वकील साहब मगर मैं करू भी तो क्या?’’

            ‘‘तब मैं भी कुछ नही कर सकता।’’ उसने फटी फटी नजरों से मेरी ओर देखा -‘‘ये जो आपने वीडियो सीडी मुझे दी है इससे ज्यादा ये ज्यादा ये हो सकता है कि आपके दोस्त पुलिस रिमाण्ड मे जाने से बच जाये और अगर किस्मत बहुत अच्छी रही तो उनकी जमानत हो सकती है मगर इकबाल अगर अंदर नही गया तो याद रखिएगा वह मिस्टर संजय को बहुत देर तक बाहर नही रहने देगा। क्योंकि इकबाल अंसारी सिर्फ वकील नही है, वह एक ब्रांड है जो किसी भी केस को अपने तरीके से घुमा सकता है।’’

            ‘‘लेकिन वकील साहब…।’’ मैंने कुछ कहना चाहा तभी जज साहब कोर्ट रूम मे दाखिल हुए। मुझे अपनी बात को वही पर छोड़ना पड़ा। मेरे वकील ने बहस के लिए आगे बढ़ने से पहले आखिरी बार घूरती नजरों से मेरी ओर देखा। मैंने नजरें झुका ली।

            ‘‘मिस्टर संजय…।’’ अचानक वह मेरी ओर पलटा और धीरे से बोला -‘‘वैसे आपकी दोस्त नीतू भरोषे के लायक तो है न?’’

            ‘‘ऐसा क्यों कह रहे है?’’

            ‘‘क्योंकि मुझे ऐसा नही लगता।’’ उसने कहा और दोबारा जज की ओर लौट गया। मैं हैरान नजरो से उसे देखता रह गया। सच कहूँ तो कुछ देर के लिए मुझे  भी यही लगा मगर उधर बहस शुरू ही हुई थी कि एकाएक मेरे कंधे पर किसी ने हाँथ रखा। मैंने पलट कर देखा मेरे पीछे नीतू खड़ी थी।

            ‘‘आपको इतनी देर कैसे हो गयी?’’ उसके आने पर खुश होने की बजाये मैंने सख्त लहजे मे उसकी ओर अपना सवाल उछाला।

            ‘‘वह सब बाद मे बताऊॅगी… आप ये बताओ कि सुनवाई कब शुरू हुई है?’’

            ‘‘अभी दो मिनट पहले।’’

            ‘‘ओ0के0।’’ कहती हुई वह मेरे बगल मे बैठ गयी। उसके चेहरे की चमक और होंठों की मुस्कुराहट ने जैसे फैसले को पहले ही भाप लिया हो। सुनवाई जारी रही मगर नीतू के आने के बाद पता नही क्यों खुसबू का चेहरा एकाएक उतर गया। उसने नफरत भरी नजरों से नीतू की ओर ऐसे देखा जैसे कोई अपनी सौतन को देखता है। खुशबू को उसकी खुशी निगली नही जा रही थी। तभी एकाएक इकबाल किसी कागज को उठाने के लिए अपनी मेज की ओर मुड़ा, उसकी निगाह नीतू पर गयी तो वह चंद क्षणो तक मूर्ति बना नीतू की ओर देखता रहा। वह वहाँ  पर नीतू की उपस्थिति पर हैरान था। शायद उसे नीतू का संजय के साथ किसी तरह के संबन्ध का अंदाजा नही था। उसके चेहरे के हावभाव देखकर मैं समझ गया कि नीतू सुनवाई शुरू होने से पहले कोर्टरूम मे क्यों नही आयी।

            हर मिनट के गुजरने के साथ ही हमारा वकील घनश्याम तिवारी लगातार इकबाल अंसारी पर हावी होता जा रहा था। खासकर तब से जब उसकी नजर नीतू ने चेहरे पर पड़ी। उसने कोर्ट से पॅूछा -‘‘क्या अदालत मुझे बतायेगी कि पंखुड़ी को मारने की वजह किसके पास ज्यादा थी मेरे क्लाइन्ट मिस्टर संजय के पास या फिर मेरे काबिल दोस्त इकबाल अंसारी के पास? और अगर अदालत के पास इसका जवाब नही है तो उसने पुलिस रिमाण्ड से पहले मेरे क्लाइन्ट के खिलाफ पुलिस ने याचिका कर्ता से सबूत क्यों नही मांगा? सिर्फ सन्देह के नाम पर अदालत द्वारा किसी भी इंसान को जो कि पंखुडी का पिता भी है उसे किसी बडे़ वकील की चंद दलीलो के नाम पर पुलिस रिमाण्ड मे दे देना कहाँ का न्याय है?’’

हालाकि जब मिस्टर तिवारी अदालत से सवाल कर रहे थे उस समय जज ने घूर कर तिवारी की ओर देखा। मैं घबराया हुआ था कि अदालत तिवारी के इस व्यवहार पर हमारे मुकदमें को एक पक्षीय न बना दे मगर कोर्ट की अनुमति के बाद जब मेरे और खुशबू के पापा के बीच हुई बातचीत के वीडियो को अदालत के अंदर चलाया गया तो मैंने जज की आँखों को गौर से देखा। उनकी नजरों के सवाल बदल चुके थे। उन्होने इकबाल की ओर देखते हुए पॅूछा -‘‘क्या ये सच नही है कि पंखुड़ी के कत्ल से आपको मिलने वाला फायदा संजय से कहीं ज्यादा है? और दूसरी बात आपने कोर्ट को यह क्यों नही बताया कि आप अपने क्लाइन्ट से निकाह करने वाले थे?’’

‘‘जज साहब मेरे निकाह से इस केस का कोई लेना देना नही है।’’ इकबाल अचानक असहज हो गया -‘‘इसलिए मैं अदालत का समय बर्बाद नही करना चाहता था और रही बात मेरी क्लाइन्ट के पापा से हुई बातचीत का मामला तो मैं बता दूँ  कि मिस्टर हरीश चंद्र जो कि मेरी क्लाइन्ट के पापा है वे हमारे निकाह से खुश नही है इसलिए उनका ये सब कहना अनापेक्षित नही है। अतः मेरी इस अदालत से गुजारिस है कि हमें संजय की जमानत पर बहस करनी चाहिए न कि मुझे बिना वजह अपराधी बनाने की कोशिश की जांये।’’

‘‘नही जज साहब।’’ घनश्याम तिवारी एकाएक उठकर खड़े हो गये, बोले -‘‘मैं अपने काबिल दोस्त को अपराधी बनाने की सिर्फ कोशिश नही बल्कि कर रहा हॅू योर आँ नर। क्योंकि सच यही  है कि पंखुड़ी की हत्या का गुनहगार मेरे क्लाइन्ट मिस्टर संजय पाठक नही बल्कि खुद इकबाल अंसारी है। और इसका मेरे पास पुख्ता सबूत है जिसे सुनने के बाद अदालत आज और अभी इस केस पर फैसला सुनाने के लिए बाध्य हो जायेगी।’’

‘‘तो फिर उस सबूत को अदालत के सामने पेश करिए ना।’’ कहते हुए इकबाल अंसारी एक बार फिर नीतू की ओर देखा। उसकी आँखों मे डर साफ झलक रहा था। नीतू ने उससे नजरे नही मिलायी।

मेरे वकील तिवारी ने तुरन्त टेपरिकार्डर उठाकर जज की कुर्सी की तरफ थमा दिया। उधर टेप पर इकबाल की रिकार्ड की हुई आवाज पंखुड़ी मर्डर केस की एक एक परते उधेड़ रही थी और इधर इकबाल अंसारी नीतू को ऐसे घूर रहा था जैसे की वह अभी उसे खा जायेगा। उस दौरान मैंने खुशबू के चेहरे को भी पढ़ने की कोशिश की। उसमे हैरान कर देने वाली जैसी कोई भावनाये नही थी शिवाये उस लाइन के जब इकबाल ने नीतू के साथ हुई बातचीत के दौरान कहा था कि वह खुशबू से प्यार नही करता और वह यह सब कुछ इसलिए कर रहा है ताकि वह निकाह के वक्त मेहर मे उसका घर मांग सके। मैं खुशबू के व्यवहार पर हैरान था कि रिकार्ड की गयी बातो मे इतना सब कुछ सुनने के बाद भी उसने इकबाल से सवाल नही किया। उसकी पथरायी नजरें मेरे और नीतू के चेहरे की बीच भ्रमण कर रही थी। जिनमे आँखों को पढ़ने का हुनर रखने वाला कोई भी व्यक्ति जेल जाने की घबराहट को महसूस कर सकता था।

टेप बन्द होते ही कुछ देर के लिए अदालत मे खामोशी छा गयी। जज बारी बारी से दोनो वकीलो की ओर देखता रहा। तब तक इकबाल अचानक उठकर खड़ा हो गया और अदालत से आग्रह करते हुए बोला -‘‘जज साहब मेरे खिलाफ झूठे साबूत इकट्ठा करके मुझे फसाने की कोशिश की जा रही है इसलिए मेरी अदलत से गुजारिश है कि मुझे अपना मुकदमा पेश करने के लिए अगली तारीख दी दी जाये।’’

‘‘नही योर आँनर।’’ घनश्याम तिवारी अचानक अक्रामक हो गया। अपने हाँ थों मे लिए पेपर को लहराते हुए बोला -‘‘मेरे क्लाइन्ट संजय पाठक निर्दोष होते हुए भी पहले ही पुलिस रिमाण्ड मे बहुत सी यातनाये सह चुके है इसलिए अब जबकि सारी सच्चाई अदालत के सामने आ गयी है और इस रिकार्ड की गयी आवाज की लैब रिर्पोट भी आपके सामने ह