रागिनी- द स्कूलगर्ल

मुझे अच्छी तरह याद है, उस समय मेरी उम्र महज ग्यारह वर्ष तीन माह और चौबीस दिन की थी। कौमार्य आहिस्ता-आहिस्ता मेरे बदन से खेलने लगा था। मैं अपने अन्दर अजीब-सा कौमार्य महसूस करने लगी थी। मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरी खिलखिलाहट पर ग्रहण लग रहा है या फिर उसकी ढहर तीव्र हो रही है। मैं इतना जरूर महसूस कर पा रही थी कि मेरी नज़र चुम्बक की भाँति लड़को की ओर खिंचने लग गयी थी। खासकर उस घटना के बाद।

सर्दी आहिस्ता-आहिस्ता अपने पैर फैलाने लग गयी थी। मेरा मन अभी से घबराने लग गया था। पिछले साल की कॅपकंपाती सर्दियों में सुबह-सुबह उठकर न नहाऊँ तो मां की चीख पुकार सुनना… मुझे पता था इस साल भी यही सबकुछ होने वाला था।

उस सुबह जोरों की ठण्ड थी में बिस्तर नहीं छोड़ना चाह रही थी लेकिन मां मेरे पीछे पड़ गयी। भला वह अपने उसूल से कैसे हट सकती थी।

इस साल थोड़ा उम्र बढ़ने के साथ-साथ जिद्दी भी हो गयी थी मैं। मैंने तुनक कर कहा- “तुम कुछ भी कर लो अभी तो न उलूंगी मैं। बाप रे कितनी सर्दी…। मैंने रजाई को जरा हटाकर चेहरा बाहर निकाला तो जैसे मेरा चेहरा बर्फ से लिपट गया हो। माँ कहाँ मानने वाली थी उसने मेरी रजाई को पकड़ा और झटके के साथ उसे मेरे बदन से हटाकर बाहर फेंक दिया। मैंने आँखें फिर भी नहीं खोली। हां बदन को मरोड़ कर गोला जरूर कर लिया था।

“हे राम! ये लड़की भी!” मां खीझ कर मेरे जहां के तहां हो चुके टाप और स्कर्ट को खींच-खींच कर अर्धनग्न हो चुके बदन को ढकने को प्रयास करने लगी। “बेसरम कही की!” मेरी टाँगों पर हाँथ मारते हुए बोली- “क्या ऐसे लाश बन कर सोया जाता है। वो तो अच्छा है जो अक्सर तुझे जगाने में आती हूँ। कहीं तुम्हारा बड़ा भाई आ जाए तो उसके लिए तो चेहरा छुपाने की भी जगह न मिले।”

मैं फिर भी न उठी बदले में चेहरे पर मुस्कान दौड़ गयी। जैसे मां की बातें मुझे पागलपन लग रही हो। और में पलटकर कहना चाह रही थी कि सोते वक्त क्या मेरे पास यही एक काम बचा है कि मैं अपनी छाती या टांगों को लकती फिरूं। वैसे भी यह मेरा कमरा है, मैं नंगी सोती हूँ या खुद को कपड़ों में लपेट कर इसप्ते किसी को क्या लेना देना। मैंने अपने होठों को हिलने नहीं दिया।

मां तेजी से बाहर निकल गयी। फिर में रजाई पुनः ओढ़ पाती उससे पहले वह लौटी और पानी से भरा गिलास मेरे ऊपर उलेड़ दिया। मेरा बदन जैसे एकाएक हिमालय के नीचे दब गया हो। मैं छटपटा कर बिस्तर से बाहर आ गयी।  मैं रुक कर कुछ वाद-विवाद करती उससे पहले मेरी नज़र घड़ी पर गयी तो जैसे मेरे पंख उग आए हो। मैं समझ न पाई कब बाथरुम गयी और तैयार होकर बाहर आ गयी। उस दिन मैंने खाना नहीं खाया, मां ने कहा तब भी नहीं। मुँह विचकाकर मैंने मां को एहप्ताप्त दिलाया कि उसका सुबह का व्यवहार उसे बिल्कुल पसन्द नहीं आया।  मां ने टिफिन ले जाने को कहा तो मानो मेरी जुबान कट पड़ेगी। मैंने खुद को सम्भाला और सीधे स्कूल चली गयी।

“हे नीलम!” कक्षा में घुसते ही कल्पना ने अपनी हर रोज की अदा में अपना भारी हाँथ दे मारा मेरी पीठ पर। मैंने पलट कर उसकी ओर देखा तो सकपका गयी। आज मेरी नज़रों में मुस्कुराहट नहीं थी। गुस्सा आ गया मुझे।

“क्या बात है आज कुछ उखड़ी-उखड़ी-सी लग रही है।” उसने मुझे बहलाने की कोशिश की। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। बैग लेकर सीट की ओर चली गयी। उसने पीछा नहीं छोड़ा- “अरे नीलम! तुमने सुना कुछ…?” मेरी बाँह पकड़ते हुए उसने अपनी ओर खींचा।

“रागिनी की बात कर रही हो?” बेरुखी से जवाब दिया मैंने।

“हाँ, लेकिन तुझे कैसे मालूम।” वह हैरानी से मेरी ओर देखती रही।

“तुम हर रोज़ उसी की तो बात करती हो।”

“तुम सच कह रही हो क्या? खैर…” वह आहिस्ता से मुस्कुरायी- “आज मेरे पास बिल्कुल ताज़ा ख़बर है, सुनोगी?”

“कल्पना” मैंने पूरी शिद्दत से उसे घूरा -”तुम किसी न्यूज़ चैनल के लिए काम क्यों नहीं करती।”

सच कहूं तो रागिनी की सबसे अच्छी दोस्त होकर भी उसकी आँखों को पढ़ना मुझे ठीक से नहीं आता था मगर बाद में उसने जिस अन्दाज़ में कल्पना के बारे में अपनी राय दी उस बात से उसकी नज़रों की उस प्रतिक्रिया का अन्दाज़ा लगाने में सफल रही। उसका मानना था कि कल्पना के अन्दर जितनी मासूमियत और चंचलता दिखती है उससे कहीं ज्यादा शातिर दिमाग़ है उसमें।

“क्या कहती हो तुम? क्या सचमुच मैं काम कर सकती हूँ?”

“हाँ… सौ फीसदी! वो भी टाप रिपोर्टर बनकर।” वह जोर से हँस पड़ी- “तुम मुझे बना रही हो ना?”

“क्यों?”

“मुझे लगता है लोग हर रोज़ रागिनी की खबर सुनते-सुनते ऊब जाएगें।” उसने पूरी मासूमियत के साथ अपनी बात रखी मेरे सामने।

“नहीं ऐसा नहीं है। आज कल लोगों में काफी बदलाव आ गया है। वे बालीवुड स्टार के प्रेम प्रसंगों से ज्यादा स्कूल गर्ल के प्रेम प्रसंगों पर दिलचस्पी दिखाने लगे हैं।”

“मुझे यकीन नहीं हो रहा है।”

“रागिनी आ रही है।” मैंने उसे हाँथ मारकर कहा।

“रागिनी!” वह चौंक कर पलटी। उसके होठों पे सिकुड़न बढ़ गयी।

“आज जल्दी आ गयी?” रागिनी ने मुस्कुरा कर कहा।

“मुझे लगता है तुम देर से आई हो?” मै कुछ बोलती उससे पहले ही कल्पना बोल पड़ी।

“सचमुच।” रागिनी की बिफरती नज़रों में उसके लिए इज़्ज़त नहीं थी। “हाँ…।” कल्पना की मुस्कुराहट कम नहीं हुई।

रागिनी ने सीट पर अपना बैग फेंका, मेरा हाँथ पकड़ा और बाहर लेकर चली गयी मुझे।

लंच होते-होते मेरे पेट में चूहे दौड़ने लगे। ‘गलती माँ ने की थी तो गुस्सा भी उस पर ही उतारना चाहिए था ये क्या बात हुई कि खुद खाना ही न खाया जाए। अच्छा है ये फैसला तेरा था तो अब मर।’ ऐसे ही न जाने और क्या-क्या खुद को कहती रही। फिर वैग उठाया और घर के लिए निकल पड़ी।

पापा की कार घर के बाहर खड़ी थी। मैं हैरान हो उठी- पापा… घर में वो भी इस वक्त?  जी चाहा पापा…पापा… चिल्लाती हुई घर के अन्दर दौड़ जाऊँ ताकि वे मुझे गले से लगाकर प्यार करें मगर न जाने क्यों मैं ऐसा नहीं कर पायी। मैं दबे पाँव घर में घुस गयी।

विल्कुल सत्राटा…

‘पापा कहाँ है?’ मैंने हैरानी से इधर उधर देखा। सामने लगी घड़ी की चहलकदमी स्पष्ट सुनाई दे रही थी। मैंने ड्राइंग रूम टटोला, बाथरूम का दरवाजा खोला। कीचेन भी गयी, छत के गलियारे को भी झाँका मगर न पापा नजर आए, न मम्मी। आखिर थक-हार कर सीढ़ियाँ उतरने लगी कि सहसा पापा के बेडरुम से दबी हुई आवाज़ सुनाई दी मुझे। जी मचल उठा कि मैं दौड़कर उधर भागूं मगर कोई कारण था कि मैं वहीं पर बुत बनकर खड़ी हो गयी। मैंने अपने आपको ज्यादा एकाग्र किया। आवाज़ अब ज्यादा स्पष्ट थी। मेरी साँसे थमने लग गयीं। पूरे बदन पर अजीब सी व्याकुलता होने लगी थी। मैं आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियाँ उतरती हुई खिड़की की ओर चली गयी। कुछ पलों तक खड़ी कुछ सोचती रही फिर स्वतः ही मन मचल उठा कमरे के अन्दर झाँकने के लिए। माध्यम मुझे मिल गया। मैं अपनी आँखों को उस सुराख से सटाया तो जैसे एकाएक मेरे सामने दुनिया का एक और सच खुलकर सामने आ गया हो जिससे अब तक अनभिज्ञ थी मैं- पूरे ग्यारह साल दो महीने और चौबीस दिन।

लगभग दस मिनट तक सांसे थामें हुए मैं निश्चल खड़ी रही लेकिन फिर मुझे हटना पड़ा। मेरी इस चोरी का राज कहीं बेपर्द न हो जाए, इसलिए मैं घर पर विल्कुल नहीं ठहरी। जाते-जाते घर के गेट कीपर को कहती गयी कि वह मेरे मम्मी-पापा को न बताए कि मैं घर आयी थी।

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उस दिन के बाद वह दृश्य जैसे मेरी आँखों के अन्दर बस गया हो। मैं लाख कोशिश करती भूलने की मगर भूल नहीं पाती। आज जब सोचती हूँ तो संदेह होता है अपनी शख्सियत पर- क्या वाकई में भूल नहीं पा रही थी या फिर भूलना नहीं चाहती थी। खैर, जो भी हो मगर इतना ज़रूर था कि उस दृश्य से जुड़ी हुई हर भूमिकाएं मेरी नज़रों के सामने आतीं तो जैसे यादें नहीं बल्कि खुद दृश्य चल कर मेरे मस्तिष्क पटल पर आ गया है। मां को देखती तो, पापा पर नजर जाती तो… हद ये थी कि पापा के बेडरूम के सामने से गुजरती तब भी।

एक दिन चोरी से मैं उस बेडरूम पर भी पहुंच गयी और उस पर उन निशानों को बेड पर खोजती रही जिन्हें उस घटना के बाद बन जाना चाहिए था। मेरे लिए यह निष्कर्ष निकालना बेहद मुश्किल था कि मैं अपने इस द्वंद्व भरी दुनियाँ के एक ऐसी हकीकत को किसके साथ बांटू? क्या अपने दोस्तों के साथ? नहीं-नहीं, एकाएक बदन तप उठा उनसे बताने का मतलब है तूफान में बारूद घोल देना।

‘तो क्या रागिनी से?’ लेकिन उसका भी क्या भरोसा। दोस्ती की शर्तों को तोड़ बैठे तो? यद्यपि वह मेरी सबसे अच्छी सहेली थी जिससे मैं तिनका उड़ने से लेकर भारी भरकम जहाज के डूबने जैसे बातें बॉटती थी।

आखिर रहा न गया मुझसे। मैंने उससे बता दिया मगर बताने के बाद उसकी प्रक्रिया इतनी सहज होगी मैंने कल्पना में भी कल्पना नही की थी। यद्यपि बाद में मुझे काफी अफ़सोप्त हुआ कि मैं भी अजीब शख्स हूँ- राई को पर्वत बनाने चली थी। रागिनी बड़े सामान्य ढंग से बाते सुनी और उससे कही ज्यादा सहजता के साथ मेरी ओर देखी, और चल दी। मैं हैरान थी मैंने उससे इतनी बड़ी बात बता डाली और वह….। शायद इस समय वह सोचने समझने के मूड में नहीं है? खैर जब अकेले में सोचेगी तब देखुंगी इसे, कितनी सहज रहती है?  घोड़े की तरह दौड़ती हुई आएगी मेरे पास या फिर मेरे मम्मी पापा को उस रूप में दोबारा देखने की जिद करेगी मगर मैं क्या करूँगी? मैं अपने सर को खुजलाने लगी। क्या पता वह पहला और आखिरी इत्तेफ़ाक़ रहा हो?

अगले दिन भी वह उस बात में उतनी उतावली नही दिखी आख़िर बात मुझे ही छेड़नी पड़ी।

“ओह नीलम!” वह लगभग खीझते हुए पलटी मेरी ओर- “तुम बेवज़ह अपनी मां को इस नजर से देख रही हो। तुम्हे पता होना चाहिए कि इस दौर से न सिर्फ तुम्हारी मां बल्कि दुनिया की हर मां गुज़रती है।”

“क्या… क्या कहा तुमने?” में फटी-फटी नज़रों से उसे देखती रह गयी। “हाँ दुनियां की हर मां इन पलों को जीती है और एक दिन शायद तुम भी…।”

“क्या बकती हो?” मैं लगभग झगड़ने की अंदाज़ में उस पर चिल्लाई। बिल्कुल मुझे अंदाजा नहीं था कि आखिर लोग ऐसा क्यों करते होंगे मगर फिर मैं लगभग दस मिनट तक खिड़की से सिर्फ इसलिए झांकती रही क्योंकि मैं चाहकर भी वहाँ से नज़रें हटा नहीं पाई जबकि वह काम बेहद बोरिंग भरा था और घृणित भी।

हम देर तक खामोश बैठे, दूर पड़े किसी तिनके को तकते रहे। “रागिनी!” मैंने आवाज़ दी उसे। वह अपने  हाँथ में फंसे कंकण को फेंकने वाली थी मगर मेरी आवाज़ ने उसे रोक दिया। वह अजनबी अंदाज़ में मेरी ओर देखने लगी।

“क्या ये सारी बाते तुम पहले से जानती थी?”

“तुम ये सब क्यों पूँछ रही हो?”

“क्या तुम पहले से जानती थी?” मैंने अपना सवाल पुनः दोहरा दिया। “हाँ।”

“क्या तुमने कभी अपने पापा-मम्मी को इस रूप में देखा है?”

“नहीं! मेरी मम्मी नहीं है।”

“सॉरी!” पल भर के लिए मैं खामोश हो गयी मगर उतावलापन अपने चरम पर था, मैं बोली – “फिर तो ज़रूर तुम्हे किसी ने इन सारी बातों को बताया होगा।”

“नहीं।”

“तब कैसे जानती हो?”

“बस ऐसे ही।” कहने को तो वह कह गयी थी, मगर उसके चेहरे का उड़ा रंग और होठों की खामोशी बता रही थी कि वह खुद हैरान है कि उसे ये सारी बातों की जानकारी कहाँ से मिली है? जबकि उसे अंदाज़ था कि इतनी महत्वपूर्ण भाषा को लिखित रूप में सीखने के लिए वह वर्षों स्कूल गयी थी।

“रागिनी!” मैंने आसानी से उसका पीछा नहीं छोड़ा -”क्या तुम्हें यकीन है कि ये सारी बातें तुम्हें किसी ने नहीं बताई। वैसे तुम चाहो तो थोड़ा वक्त ले सकती हो। सोचने की कोशिप्त करो। मुझे लगता है तुमने ये सारी बाते जरूर किसी न किसी से जानी होगी।”

वह थोड़ी देर चुप रही।

“नहीं, मैंने ये बातें किसी से नहीं जानी।” इस बार उसका आत्मविश्वास ज्यादा दृढ़ था।

“मुझे लगता है तुम्हे अब भी कुछ वक्त की ज़रूरत है।” मैं उठकर खड़ी हो गयी – “मैं कल मिलूंगी तुमसे।”

“नीलम! नीलम!” उसने मुझे रोकना चाहा। मैं नहीं रुकी।

“हम कल इस बारे में बिल्कुल बात नहीं करेंगे समझी तुम।” चिल्ला कर उसने कहा।

मैंने कुछ नहीं सुना, कुछ कहा भी नहीं।

अगले दिन फिर हमने अपनी चर्चा के लिए स्कूल के किनारे टूटे हुए खण्डहर को चुना।

आज मैंने अपनी बात नहीं शुरू की क्योंकि मुझे पता था कि रागिनी इतनी गवार लड़की नहीं थी। वह किसी बात को जानती तो जड़ से जानती थी और उसे जब तक इस बात का पता नहीं हो जाएगा कि ये सब बाते किसने बताई तब तक उसे नीद नहीं आएगी।

“रागिनी क्या तुम गुरुत्वाकर्षण के बारे में गहराई से जानती हो?”

“हाँ काफी कुछ जानती हूँ मगर सब कुछ नहीं।”

“मैं पिछली क्लास अटेण्ड नहीं कर पाई थी। क्या तुम उसके बारे में मुझे कुछ बता पाओगी?”

अगर लौटते हुए कदमों का पीछा करना छोड़ दिया जाए तो इस बात की काफी गुंजाइश बन जाती है कि वे पलट कर तुम्हारा पीछा करना शुरु कर दे। पापा अक्सर कहा करते थे। मेरी बात सुनी तो वह मेरी ओर देखने लगी, मैं जानती थी कि उसे इन बातों पर कम से कम आज तो बिल्कुल दिलचस्पी नहीं होगी फिर भी मैंने जिद किया- “बोलो रागिनी क्या तुम मुझे बता पाओगी।”

“नीलम!” वह हँस पड़ी क्या तुम वाकई इसी बारे में बात करना चाहती हो?

“ओह पापा लव यू” मेरा मन अन्दर ही अन्दर उछल पड़ा, मगर शर्त बड़ी थी तो खुशी को अन्दर ही दफन करना पड़ा। पापा का कहना था कि लौटते हुए कदमों का पीछा सच में छोड़ देना चाहिए न कि छोड़ने का नाटक मात्र किया जाए। और मैंने सौ फीसदी उनकी बात को उस हालात पर उतारने की कोशिश की।

“हाँ … लेकिन क्या तुम किसी और बारे में बात करना चाहती हो?”

“नहीं… नहीं मैं किसी और के बारे में बात क्यों करना चाहूंगी। हाँ इसी… इसी बारे में बात करते हैं। वैसे भी एक्जाम्स भी करीब है।” उसका चेहरा एकाएक शुष्क पड़ गया था। मैं उसके चेहरे को गौर से देख रही थी।

हम थोड़ी देर तक खामोश बैठे रहे। “रागिनी।” मैं और देर तक उसे उलझाना नहीं चाहती थी। “तुमने सोचा?” “किस बारे में?” अजनबी अंदाज़ में मुझे उसने घूरा। मैं मुस्कुरा पड़ी।

“हाँ…।” मेरी मुस्कुराहट ने जैसे उसे याद दिला दिया हो।

“किसने बताया था तुम्हें?”

“शायद किसी ने नहीं।”

“ऐसा तो तुमने कल भी कहा था।”

“शायद सच वही था। वैसे रात में मैंने काफी सोचने की कोशिश की थी मगर कोई फायदा नहीं हुआ और आखिर में मुझे मानने के लिए विवश होना पड़ा कि वाकई में, शायद मुझे किसी ने नहीं बताया।

मैं हैरान थी! कुछ कह न सकी। बस एकटक उसकी ओर देखती रह गयी।

“हे… तुम लोग यहाँ…” एकाएक कल्पना आ खड़ी हुई सर पर- “मैं कब से तुम्हें खोज रही थी यार।”

“कोई न्यूज देने वाली हो?” मैंने मुस्कुरा कर देखा उसकी ओर।

“ओह… नीलम। तुम हर वक्त मेरा मज़ाक उड़ाती रहती हो। मैं तुमसे मिलने आयी हूँ यार। अच्छा बताओ क्या मैं बैठ सकती हूँ।”

“जरूर! मगर हमे जाना है।”

“अरे ऐसे कैसे! उसके होंठ मुस्कुराहट में फैल पड़े- जानती हो, मैं तुम्हें एक बात बताने वाली थी यार।”

“कल सुनूंगी।” मैंने उठकर चल दिया।

“अरे रागिनी तुम तो सुनो।” उसने रागिनी को हाँथ पकड़ कर रोक लिया -”मुझे यकीन है सुनकर तुम्हे अच्छा लगेगा।”

“तो जल्दी बोलो!” रागिनी ने पलट कर देखा उसकी ओर।

“तुमने मर्डर फ़िल्म देखी है?”

“नहीं।”

“क्यों नहीं?” उसने बड़ी-बड़ी आँखों से घूरा उसे। “ओह… रागिनी तुमने बहुत कुछ मिस कर दिया यार। मुझे लगता है तुम्हे देखना चाहिए था।”

“क्यों?”

“कैसे बताऊँ यार मैं तो फ़िल्म देखकर पागल हो गयी। क्या फिल्म थी। यार सारे फ़िल्मी लोग ऐसी फिल्म क्यों नहीं बनाया करते।”

“लेकिन तुमने उसमें देखा क्या?”

“उसमें… उफ! क्या किप्त किया है यार इमरान हाशमी ने मल्लिका को। मैने तो सोच लिया है। मेरा ब्यॉय फ्रेण्ड होगा तो बस इमरान की तरह… क्या होंठ है यार उसके! बिल्कुल… ।”

रागिनी में, उसकी बात को लेकर मैंने कोई दिलचस्पी नहीं देखी मगर मेरे अन्दर कोलाहल मच गया। न जाने क्यों मैं इन पहलुओं पर अब कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी दिखाने लगी थी।

“कौन-सी फ़िल्म बताया तुमने?” मैंने बेचैन अंदाज में उससे पूँछा।

“अरे छोड़ो न नीलम। तुम भी इसकी बातों पर आ गयी।” रागिनी मेरा हाँथ पकड़ कर खींच लाई वहाँ से।

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मेरी छातियाँ भरने लग गयी थी। गालों पर ढलान तथा आँखों पर अजीब-सा आकर्षण जन्म लेने लगा था। यकीन मानिए यह मेरा ख़याली पुलाव तो बिल्कुल नहीं था। अपने कमरे में लगे फुल साइज के आइने के सामने खड़े होकर घण्टों अपने आपको निहारना मुझे अच्छा लगता था। मै हैरान थी- कि आइना भी इतना अच्छा दोस्त बन सकता है। मैं अपने हाँथो को जहाँ-तहां फेरती। कभी इस भुजा को तो कभी उस भुजा को ऊपर उठाती, तिरछी होती, किसी एक टांग को उचकाती और फिर अपने यौवन को इस तरह सम्भलते हुए देख मुस्कुरा पड़ती।

अजीव दौर था मेरी उम्र का। इस बार मेरी दसवीं की परीक्षा थी। मैं काफ़ी कुछ समझने लग गयी थी। मगर अब भी काफी कुछ ऐसा था जिससे अनभिज्ञ थी मैं। मैं समझ नहीं पा रही थी- इतना तीन परिवर्तन भी हो सकता है इंसान में। मैं अपनी मम्मी को वर्षों से वैसी ही देखती आयी हूँ जैसे पहले थी और में… कली से फूल कब बनती गयी समझ ही नहीं पाई।

उस दिन में स्कूल से लौट रही थी-ढहराती खिलखिलाती मुझे कोई देख भी रहा है, मुझे नहीं पता था। रागिनी मेरे साथ थी मैं बातों में उलझी हुई थी, गर्मी कुछ इस कदर थी कि लग रहा था कि अभी के अभी सारे कपड़े उतार कर फेंक दूं लेकिन कोई कारण था कि मैं ऐसा नहीं कर पायी। काश! ये जगह भी केप-डि-आगड़े लोती’ मन में विचार आया- मैं तो कभी कपड़े नहीं पहनती। मैंने अपने स्कर्ट को हल्का-सा ऊपर उठाया हवा का हल्का झोंका हुआ टागों के तो मन मचल उठा, मैंने पुनः उठा दिया… थोड़ा ज्यादा।

अचानक एक मोड़ आया जहां से रागिनी को मुड़ना पड़ा मैंने उसे ‘बाय’ कहा। अब मैं अकेली थी-सीधे कैसे देख सकती थी। एकाएक  मैंने पीछे घूम कर देखा तो जैसे मेरी जान निकल गयी हो- हे भगवान वह जाने कब से मेरी उस हरकत की वजह से खुली टांगे देख रहा होगा। मैं घबराहट में लगातार दो-तीन बार मुड़-मुड कर उसकी ओर देख गयी और हर बार उसके मुस्कुराते होठों ने मुझे शर्म से पानी-पानी कर दिया। मैं इस इन्तज़ार में और भी पीछे देखने से न मानती कि शायद अब वह न मुस्कुरा रहा होगा लेकिन बेरहम को मुझ पर रहम न आया।

आख़िरकार मुझे अपने घर की ओर जाने वाली गली से एक गली पहले से ही मुड़ना पड़ा मगर मेरी बदनसीबी तो देखो- वह लड़का उसी गली का निकला जो मेरे साथ मेरे स्कूल में पढ़ता था।

उस रात देर तक मुझे नींद नहीं आयी। वह हरकत, जिसकी वजह से उस वक्त शर्मसार हो गयी थी। उसी हरकत पर इस वक्त हँसी आ रही थी।

अगले दिन मैं स्कूल पहुंची तो रागिनी से ज्यादा आँखें उसकी तलाश में थी। कहना मुश्किल था क्यों? मगर शायद इसलिए कि मैं उसकी नज़रों से बच सकूँ या फिर इसलिए कि उसकी नज़रों में आ सकूँ।

“हे नीलम!” एकाएक मेरे पीछे से किसी ने  हाँथ मारा। मैं थरथरा गयी उस छुअन से। पलट कर देखी तो जैसे देर तक पहचान ही न पायी। मेरे चेहरे पर वह भाव न था जिप्त तरह एक परिचित व्यक्ति से मिलने के बाद होना चाहिए।

मैं उसे देर तक घूरती रही। “अरे तुम ऐसे क्या देख रही हो? मैं हूँ मैं…!” उसने मेरे कंधे पर जोर से हाँथ मारा- “अरे कल से आज तक में तुम इतना बदल गयी कि मुझे पहचान भी नहीं पा रही हो?” मैं अपने मस्तिष्क पर लगातार जोर दे रही थी।

“ओह नीलम! मेरी तरफ देखो मैं यहाँ हूँ, तुम मेरे पीछे कहाँ देख रही हो?” कहते हए अचानक वह पीछे घूम गयी- “ओह…तो ये बात है।” उसके होठ मुस्कुरा पड़े, मेरे आँखों में झांकते हुए बोली- “अगर में ग़लत नहीं हूँ तो यह वही लड़का है न जो कल हम लोगों के पीछे-पीछे आ रहा था।”

“क्या!” एकाएक मेरे मस्तिष्क की नसों में लहू दौड़ पड़ा -”ओह… रागिनी! तुम?”

“जी हाँ मैं… लेकिन क्या तुम्हे पता है क्लास शुरु होने वाली है।”

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मैं लंच करके लौट रही थी। रागिनी मेरे साथ थी सहसा मेरे दिल की धड़कन बढ़ गयी। मैं हैरान थी- जिन्दगी ऐसे भी एकाएक इतने राज मेरे सामने कैसे खोल सकती है। में पहली बार महसूस कर पायी उन भावनाओं को।

वह मेरे सामने आता तो भी उलझन होती, न आता तो भी। फिढहाल में चुपचाप नज़रें बचाकर उसके सामने से गुजर गयी।

उस रात को भी मैं देर तक कमरे की रोशनी नहीं बुझाई। आइना बेक़रार था मेरे नंगे बदन को देखने के लिए। मैंने हर कोण से अपने आपको देखा। मेरे कमर के नीचे का हिस्सा पहले की अपेक्षा भारी हो गया था। मैंने अपने हाँथो को उठाकर सर पर रखे। गौर से देखा खुद को नीचे से ऊपर तक। मैं हैरान हो गयी।

मेरा ज्ञान तेजी से बढ़ रहा था। मुझे लग रहा था कि जैसे कोई मुझे मेरे ही जरिए कुछ बता रहा हो। मैं कई नए एहसास का अनुभव कर रही थी जो मेरे लिए बिल्कुल अंजान से थे।

“रागिनी! क्या तुम कभी आइने के सामने अपने कपड़े उतारे हैं?” अगले दिन वह मुझे मिली तो मैंने सीधे सवाल कर बैठी। वह हैरानी से मेरी ओर देखती रही। मेरी इस हद तक की बेशर्मी पर भी उसके होठ न खुले और शायद खुलते तो कोई नसीहत दे डालती जैसे –‘नीलम! आजकल तुझे क्या हो गया है। तू पागल हो गयी है क्या?’

“नहीं।” काफ़ी देर बाद बेहद सहजता के साथ उत्तर दिया उसने। मुझे लगा जैसे उससे मैंने भौतिक या रसायन का सवाल पूँछ बैठी हूँ। 

“क्या तुम्हे यकीन है कि तुम सच कह रही हो?” “नीलम!” उसने मुझे घूरा।

“ओह नीलम’ सहसा पीछे कोई स्वर गुंजा- “तुम भी किससे सवाल कर बैठी। ऐसे सवाल पूँछना हो तो हमसे पूँछिए न।”

मैं तेजी से पीछे की ओर पलटी। कल्पना दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थी -”हमने कपड़े उतारे हैं वो भी एक बार नहीं, हजार बार, मगर बाथरूम में।”

“ओह… कल्पना।” मैं माथा पीटते हुए पलटी उसकी ओर- “तुम्हें किसने खबर कर दी जो तुम यहाँ तक भी आ धमकी?”

“अजी ऐसे भी क्या नीलम? ये अच्छा नहीं है। हमसे तुम्हारी ये बेरुखी अब निगली नहीं जाती। एक तो कोई लड़का हमें पसन्द नहीं करता और उस पर जब हम तुमसे बाते करके मन बहलाना चाहते हैं तो तुम खफा हो जाती हो। ये कहाँ का न्याय है यार?”

“उस दिन तो कह रही थी कि आजकल तीन-तीन तुम्हारे मेरे आगे पीछे घूमते है।”

“अजी वो मुँह था हमारा, जो कह गये। साले सबके सब भोंदू हैं। उनसे बातें करवा लो बस…”

“इसे इमरान हाशमी चाहिए…” रागिनी मुस्कुरा कर देखी मेरी ओर- “चलो क्लास होने वाली है।”

“रागिनी!” उसका चेहरा फीका पड़ गया। हमारी क़िस्मत तुम्हारी तरह कहाँ है यार। हम तो बस कहानी बनकर रह गये।”

“कहानी…!” मैंने चौंककर देखा उसकी ओर -”कौन सी कहानी है यार तुम्हारी जरा हमें भी तो सुनाओ।”

“अजी अब हमारी कहानी मत सुनो जानेमन…आँखों में आँसू आ जायेंगे।”

“ओह… लगता है बड़ी दुःखभरी कहानी है?”

“अजी छोड़ो भी।” अगले पल उसका चेहरा खिल उठा -”दुःख भरी कहानी हो हमारे दुश्मनों की, बस यूं समझ लो कि हम प्यासे रह गये।”

“क्यों?”

“अजी तीन मिले मगर तीनों नाकाम।”

“उफ़!”

“एक कम्बखत मिला सुधाकर, जो न जाने हमारी किस खूबी पर फ़िदा हो गया। यूं समझ लो कि मर मिटा हमपे।”

“और तुम?”

“अजी हमारा क्या, लड़का अच्छा था अपने दिल पर हथकड़ी तो नहीं लगाने वाले थे। वह हमसे मिलने को बेचैन था और कसक हमारे अन्दर भी थी मगर…।” अचानक उसके होठ भिच गये।

“मगर…?” मैं बेचैन हो उठी अगली पंक्ति को सुनने के लिए।

वह एक पल तक खमोश, बारी-बारी से मेरी और रागिनी की ओर तकती रही।

“कल्पना… आगे भी कुछ बोलोगी।” मेरा धैर्य जवाब दे गया।

“अरे क्या बोलूँ यार, तब तक ये नाचीज़ दिल पलटी मार गया और हम किसी और पे मर मिटे।

“किस पर?”

“था एक कमीना इंसान- ‘राज’। कम्बख्त कहीं का, अपने आपको जाने क्या समझता था।” उसने नाक सिकोड़ ली, बोली -”उसके सामने अपना दिल चीर कर रख दिया मगर कम्बख्न रास्ते पर नहीं आया और जब आया तो काफी देर हो चुकी थी।”

“तब?” दिलचस्प अन्दाज़ में पूँछा मैंने।

“अजी तब क्या?” वह जोर से खिलखिला पड़ी –”दिल है कोई दीवार नहीं जो ज़िन्दगी पर एक ही जगह गड़ा रहेगा, उसकी छिछोरी बातों से कब तक अपना दिल बहलाते। कभी मिल पाए नहीं तो आख़िर दूसरा रास्ता देखना पड़ा। और तब जाकर मिला संदीप बेचारा।”

“वाह कल्पना, तुम कमाल के हो यार, आखिर में तुमने हैट्रिक मार ही दी।” “अजी ऐसे भी मत उड़ाओ हमें आसमान में। काश हम हैट्रिक मार पाते।” “अरे भाई, तीन का मतलब हैट्रिक होता है।”

“देखो नीलम, हमें हैट्रिक का मतलब मत समझाओ, हम जानते हैं। दरअसल तीसरा हमारे बलबूते नही, उसे मेरे काबिल बाप ने मेरे लिए ढूंढ कर लाया है।

“ओह…। सो सैड डियर… तुम्हारे बाप ने तुम्हारी हैट्रिक रोक दी। तुम अपने बाप को कभी माफ मत करना।” मेरे होठों पर मुस्कान बिखर गयी।

“अच्छा तुम ये सब छोड़ो- अचानक बीच में रागिनी बोल पड़ी- “कभी कुछ हो भी पाया है या फिर बस यूं ही ख्वाबों में गुजर गये।”

“क्या?” कल्पना के होठ फैल गये, जैसे वह कुछ जानती न हो।

“इतना अंजान मत बनो… सीधे-सीधे बताओ।”

“ओह… तो तुम…? अजी होता भी खाक। सुधाकर बेचारा हमसे मिलने के सपने देखते-देखते समय सीमा पार कर दी कि कम से कम उसके अन्दर की तपन देख पाते और दूसरा उससे मिलने के सपने देखते-देखते मेरे बाप ने तीसरे को लाकर खड़ा कर दिया मेरे सामने, सो दूसरे को अपनी तपन का एहसास न करा पायी। रही बात तीसरे की तो मजबूरी है… देखनी भी पड़ेगी और दिखानी भी पड़ेगी।”

“ओह… तो कितना वक्त लगेगा?”

“कल अपने बाप से पूँछ कर बताऊंगी कि कब कर रहा है वह मेरी शादी।”

“लेकिन अभी उमर तो शादी लायक नहीं दिखती।” मैंने पास भीचते हुए कहा।

“अजी शादी की भी कोई उमर होती, जब दिल करे, कर लो, सोढह की उमर या फिर छत्तीस की उमर में।”

“अच्छा चलो छोड़ो ये सब क्लास शुरु होने वाली है। रागिनी पलटते हुए बोली।”

उस दिन क्लास में खास मन न लगा। अध्यापक बोलते रहे मैं सुनती रही।

अगले दिन रागिनी मुझे स्कूल के गेट के बाहर मिल गई। वह मुझे देखकर  जिस अंदाज़ से मेरी ओर भागी थी उससे यह समझना मुश्किल बात न थी कि उसके अन्दर भी तूफ़ान है। मुझे यकीन था कल के सवाल को उसने तत्काल तो सहजता से ले लिया था मगर हकीकत में वह उसके तह तक जाने की न सिर्फ कोशिश की होगी बल्कि गयी भी होगी। मैं चाह रही थी कोई मेरी पीठ थपथपा दे- मैं ग़लत अंदाज़ा कभी नहीं लगा सकती थी। उसने न सिर्फ एक बार बल्कि कई बार कपड़े उतारी होगी- आईने के सामने।

“नीलम!” मेरे कंधे पर हाँथ मारती हुई झुक गई मेरे सीने तक।

“आज बहुत खुश हो?”

“तुम्हें ऐसा लग रहा है?”

“हाँ, एहसास तो कर रही हूँ।”

“नीलम!” उसने ख़ामोशी से मेरी ओर देखा- “अगर आज हम स्कूल न जाएँ तो?”

“क्या मतलब?” मेरी फटी नज़रे ताकती रहीं उसे।

“अगर आज हम स्कूल न चले तो?” उसने अपने सवाल को नहीं बदला।

“मगर उसका कारण? कही और लेकर चलती हूँ।” उसके होठों पर अजीब सी मुस्कान विखर गयी।

मैंने ज्यादा टीका-टिप्पणी नहीं की, शायद वजह यह थी कि मैं सवाल-जवाब करती उससे पहले उसने अपनी बात छेड़ दी।

“नीलम!” वह बेसब्र अन्दाज़ में बोली –”कल मैंने अपने कपड़े उतारे थे… पहली बार…. आईने के सामने।”

“क्या…!” मैंने उसे घूरा- “तुम सच कह रही हो?”

“हाँ…”

“क्या महसूस किया तुमने? क्या यह नहीं कि तुम बदल रही हो। है ना? मुझे यक़ीन है  कि तुमने अपनी छाती और कमर के नीचे के भाग पर तीव्र परिवर्तन देखे होंगे। बोलो रागिनी, मैं सच कह रही हूँ ना?” मैं पागल हो उठी वह सुनने के लिए जो वह आगे बोलने वाली थी।

“शायद काफी हद तक मगर पूरी तरह नहीं।” उसके स्वर में शरारत थी।

“क्यों?” मैं उतावली थी। मैं रागिनी से इस बारे में ज्यादा से ज्यादा बाते करना चाहती थी। मैं जानना चाहती थी इस अजीब रहस्य के बारे में। जिसे हमारी ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हुए भी जिन्दगी से बेदखल कर दिया गया है।

“क्योंकि छाती और कमर के अलावा टांगे भी बदली हुई नज़र आयी थीं मुझे।”

“टाँगे!” मुँह फाड़ते हुए मैंने टांगों की ओर नजरे दौड़ाई।

“हाँ, टॉगे! तुम्हें नहीं लगता कि ये अब उतनी भद्दी नहीं रही जितना कि बचपन में दिखा करती थीं।

मेरा जी चाहा में अभी-अभी अपनी स्कर्ट या तो उतार कर फेंक दूं या फिर छाती तक समेट लूँ ताकि मैं उसमें आए परिवर्तन पर बारीकी से गौर कर सकूँ, मगर मैं ऐसा नहीं कर पायी। ऐसा न करने के भी अपने कारण थे- फिलहाल मैंने अपने उतावलेपन पर ठण्डा पानी डाल दिया।

लोग स्कूल के पीछे जा रही गली की ओर मुड़ गये। यद्यपि वह कोई और वक्त होता तब में उस गली में घुसने से या तो साफ़ मना कर देती या फिर ढेरों सवाल कर बैठती मगर चर्चा का रुख कुछ ऐसे मोड़ पर था कि मैं रागिनी के साथ जहन्नूम में भी जाने को तैयार बैठी थी।

“नीलम!” एकाएक रागिनी ठहर गयी।

“क्या हुआ?” मैंने पूँछा।

“कुछ नहीं।” मेरी ओर देखकर आहिस्ता मुस्कुराई वो- “तुम मेरा बैग थामो, मैं आ रही हूँ।” मैं उसे अपने सवालों से परेशान करती उससे पहले लगभग दौड़ती हुई वह फोन बूथ में घुस गयी। लगभग दो मिनट बाद वह बाहर आयी। उसके चेहरे पर अजीब-सी चमक थी। अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं था कि उसकी मुँह मांगी मुराद पूरी हो गयी थी।

“किससे बाते कर रही थी?” हालाँकि मेरा पूँछने का पहले से कोई इरादा नहीं था, मगर उसके निकलने के अंदाज ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं उसकी खुशी में शामिल हो जाऊँ।

“जानती हो मैं तुम्हे किससे मिलाने वाली हूँ।”

“किससे?”

“वह घर पर अकेला है। उसने बताया है कि उसकी मम्मी किसी काम से बाहर चली गयी है। शाम तक नही लौटने वाली है।”

“तुमने ये नहीं बाताया कि वह है कौन?” मैंने उसका कन्धा झकझोरते हुए पूँछा।

“ये भी जान जाओगी मेरी जान। तुम्हे सीधे उससे मिला ही दूंगी। वैसे काफी दिलचस्प चीज है वो। खासकर तुम्हारे लिए।” उसके होठों पर शरारत बिखर गयी।

“मेरे लिए क्यों?” मैंने उत्सुकतापूर्ण अंदाज़ में पूँछा।

“इसलिए कि वह मेरे लिए पुराना विषय बन चुका है।” शरारत का सैलाब होठों से चेहरे तक बिखर गया। मैं काफी दिनों से उसके पास जाती रही हूं।”

“क्या!” मेरा मुँह फटा रह गया- “तुमने इसके बारे में कभी नहीं बताया मुझे।”

“कुछ चीजें रहस्य बन कर ही रहें तो अच्छा होता है खासकर वक्त के पहले तक।”

यद्यपि रागिनी मेरी सबसे विश्वसनीय दोस्त थी मगर उसकी ये बातें न जाने कहीं न कहीं खटकने लगी थी मुझे। मैं हैरान भी थी- कल्पना को मैं हमेशा नजरंदाज़ करती रही मगर वह सही थी।

“इधर घूमो।” रागिनी ने कहा तो मैं घूम गयी।

वह गली बिल्कुल सूनसान थी। गली पर पसरा सन्नाटा मुझे परेशान करने लगा मगर कोई बात थी जो मुझे उसकी बात मानने के लिए विवश कर रही थी।

“रुको।” सहसा उसने मुझे रुकने के लिए कहा, मैं रुक गयी। सामने एक छोटा गेट था। मैला इतना कि जैसे राजस्थान की रेत और कलकत्ता का सारा कीचड़ उसी पर थोप दिया गया हो।

“हम किससे मिलने वाले हैं।” मेरे होठ बुरी तरह सूख रहे थे मगर वह मुस्कुरा रही थी। सच कहूं तो मुझे पहली बार उसकी मुस्कुराहट के पीछे फ़रेब नज़र आ रहा था। दरवाजे की हालत चीख-चीख कर कह रही थी कि हम किसी छोटे तबके के इंसान से मिलने आए हुए हैं। उस समय मुझे रागिनी बहुत छोटी और गिरी हुई नज़र आयी। छि: ऐसे लोगों से भी कोई वास्ता रखता है। मगर मैं कुछ कह न पायी क्योंकि मैं इतना तो जानती थी कि रागिनी एक अमीरजादे परिवार की बिगड़ी हुई शहज़ादी थी।

दरवाज़ा खटखटाए हुए लगभग दो मिनट गुज़र गये थे मगर दरवाज़ा नही खुला और जब खुला तो एक पल के लिए लगा, जैसे मुझे किसी ने ऊँचाई से एकाएक नीचे फेंक दिया हो। मैने रुक कर गहरी सांस भरी और गौर से रागिनी की ओर देखा। सारा माजरा में समझ चुकी थी। रागिनी इतनी शातिर खिलाड़ी है पहली बार मैं एहसास कर पायी। कितनों को ऐसी ग़लत फहमी होती होगी- ऊपर से सफेद दिखने वाली चीज़ों को हर कोई सफेद समझ बैठता है।

उम्र लगभग अट्ठारह साल, बौना कद, भद्दा-सा चेहरा मगर बदन पर कीमती लिबास। मैं विस्मय में थी। क्या समयूँ उसे? राजसी घराने का बदनसीब लड़का या फिर बदसूरत चेहरे वाला खुशनसीब लड़का।

“हे रागिनी! कैसी हो तुम?” उसने तीव्रता से अपने हाँथो को रागिनी की ओर बढ़ा दिया और अगले पल रागिनी का हाँथ उसके हाँथो में था। फिर झटके के साथ वह उसके सीने में समा गयी।

मैंने नज़रें शुका ली।

“सॉरी… दरवाजा खुलने में जरा देर लगी।” मुस्कुराकर उसने मेरी तरफ देखा -”मुझे लगा था तुम लोग आगे के दरवाजे से आओगे।” आख़िरी बात कहते वक्त उसने अपनी नज़रें मेरी छाती पर टिका दी। मैं कुछ न कर पायी।

“अरे नीलम! तुम बाहर क्यों खड़ी हो, अन्दर आ जाओ।” रागिनी ने उससे अलग होते हुए बोली- “इसे अपना ही घर समझो।”

मैं अन्दर चली गयी।

फिर जैसे ही वह दरवाजा बन्द हुआ और हम घर की रोशनी में दाखिल हुए तो ऐसे लगा कि किसी राजमहल में आ पहुंचे हो।

मैं देर तक इधर उधर देखती रही। वह लड़का जाने किस लिए अन्दर चला गया।

“नीलम!” रागिनी ने कोहनी मारी मुझे -”कैसा लगा?”

“वण्डरफुल।”

“ओह थैक्स नीलम। मैं डर रही थी कि तुम कही… वैसे सच कहूँ तो मुझे यकीन भी था कि तुम पसन्द ज़रूर करोगी।”

“अच्छी चीज़ हो तो हर कोई पसन्द करता है, खासकर  झुमर मुझे बहुत पसन्द है।”

“तुम इस घर की बात कर रही हो?” रागिनी ने गौर से मेरी ओर देखा।

“तुम किसकी बात कर रही हो?”

“शेखर की?”

“कौन शेखर?”

“इस लड़के की!”

“ओह रागिनी! सॉरी”। मैंने अपनी नाक सिकोड़ ली –”वह मुझे पसन्द नहीं है खासकर उसका कद और सूरत।”

“बहुत पैसा वाला है।”

“मुझे उसकी दौलत से फ़र्क नहीं पड़ता। सच कहूँ तो उन कीमती लिबास में वह और भी भद्दा लगता है।”

“नीलम।” रागिनी मेरे आँखों में झाँकती हुई बोली -”मैं तुम्हारे नज़रिए का सम्मान करती हूँ मगर एक बात बताओ?”

“क्या?”

“अगर तुम्हें कभी जंगल में पानी की जरूरत पड़ जाए तो क्या तुम तालाब का पानी पीने से कतराना चाहोगी? मुझे तो नहीं लगता कि तुम उसकी गन्दगी से घबरा कर मर जाना पसन्द करोगी।”

मैं रागिनी की ओर एकटक देखती रही। फिलहाल मैं कुछ खास समझ न पायी। मगर जब वह मेरे ही सामने बैखौफ उसके साथ कमरे में बन्द हो गयी तो किताब का एक और पन्ना पलट कर मेरे सामने आ खुला। जी चाहा सलाम कर लूँ उसे।

मैं लड़की थी मगर लड़कियों की इस फ़ितरत का नया रूप पहली बार सामने आया था मेरे। मैंने सर झुका कर इस पैग़ाम को भी क़बूल कर लिया।

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मैं दुविधा में थी- क्या हर वह लड़की जो बाहर से रागिनी होती है वह अन्दर से भी रागिनी होती है?

उस रात देर तक मैं रागिनी के बारे में सोचती रही। उसके साथ बिताए हर पल, हर बातें घूम-घूम कर मेरे मस्तिष्क की नसों में दौड़ लगा रहे थे। उस दिन रागिनी ने क्या किया था। मैं अपने मस्तिष्क की नसों में जोर दे रही थी- ओफ्फोह! याद नहीं रहा है… ओह, हाँ शायद यही… हाँ हाँ विल्कुल यहीं, यही तो कहा था उसने ‘ओफ्फोह नीलम! तुम बेवजह अपनी माँ को इस नज़रों से देख रही हो। तुम्हें पता होना चाहिए कि इस दौर से न सिर्फ तुम्हारी मां बल्कि दुनियां की हर मां गुजरती है और शायद एक दिन तुम भी।

उस दिन कितना अजीब-सा लगा था मुझे। मैं और इस रूप में… निर्वस्त्र! नहीं नहीं कभी नहीं, मैं कभी किसी पुरुष के सामने निर्वस्त्र नहीं हो सकती वो भी इस हद तक।

वक्त ने करवट बदल ली थी। कम से कम उस रात तो जरूर पछतावा हुआ था। मैंने रागिनी को जिप्त रूप में कमरे के अन्दर जाते हुए देखा था लौटते वक्त वह ज्यादा आजाद और आत्मविश्वास से भरी नज़र आयी थी। उसके होठों पर वह मुस्कुराहट मैंने काफ़ी कम देखा था जिस अदा में वह बाहर आते हुए मुस्कुराई थी। हालांकि उसने मुझे भी साथ कमरे में चलने को कहा था, मगर मैंने मना कर दिया था पर अब सोचती हूँ- काश! मैं रागिनी के निवेदन को स्वीकार कर लेती… कितने ढेर सारे एहसास होते मेरे पास। मैंने बिस्तर पर जरा नीचे सरक कर अपने पैरों को दीवार से सटा दिए। कमरे पर रोशनी बिखरी रही।

खैर जाने दो… मैंने खुद ही खुद को तसल्ली दी। वह लड़का भी तो अजीब था। उसको देखकर काफ़ी कम लड़कियाँ उसके साथ वक्त गुजारना पसन्द करेंगी। खासकर अकेले कमरे में तो बिल्कुल नहीं।

मैं बेहद घुटन में थी न इधर किनारा था न उधर। सहसा फोन बज उठा। कोई और वक्त होता तो मैं अपने उन पलों से जागना पसन्द न करती मगर रात थी मुझे फोन उठाना पड़ा।

“हेलो!” मैंने कहा।

“ओह… तो जनाब अभी तक जाग रहे हो?” उधर से आवाज़ आयी।

“और तुम…?”

“अजी हमारी छोड़ो, हम तो दूसरों की बेचैनी से बेचैन हो उठते हैं। शायद इसीलिए अब तक जाग रहे हैं। वैसे नीलम! आज तो तुमने भी जन्नत की सैर कर ली होगी?”

“कल्पना!” मैं बिगड़ उठी- “तुम हर वक्त बेलगाम क्यों हो जाती हो?”

“चलो-चलो इतना भी गुस्सा मत दिखाओ। हमें पता है कि तुम्हे हमारी ये बातें अच्छी लगती हैं। बोलो सच है न… बोलो… बोलो।”

मैं थोड़ी देर चुप रही। हकीकत स्वीकार नहीं कर पा रही थी।

“कल्पना।” में जरा आहिस्ता मुस्कुराते हुए बोली- “तुम जानती हो आज क्या हुआ?”

“महीनों से जानते है डियर। अक्सर ऐसा होता रहता है, हाँ आज नयी बात सिर्फ इतनी थी कि साथ में तुम थी।”

“ओह कल्पना… तुम्हे सचमुच किसी चैनल के लिए काम करना चाहिए।”

“अजी हमारा भी इरादा कुछ ऐसा ही बनने लगा है।” वह जोर से खिलखिला पड़ी।

“तुम्हारे दीवानों का क्या हुआ?” मैंने बात का रुख मोड़ दिया।

“उनकी बात मत करो। कम्बख्त एक नम्बर के फंटूस है। फोन पर तो ऐसी बाते करते हैं जैसे अभी के अभी बिजली गिरने वाली है मगर…। कम्बख़्त बस आग लगा देते हैं।”

“उफ! बड़ी नाइंसाफ़ी है!”

“तुम मुझ पर तरस खा रही हो या फिर मजाक उड़ा रही हो?”

“तुम्हें क्या लगता है?”

“कुछ समझ नहीं आया।”

“मुझे लगता है अब सोना चाहिए, बॉय।” मैंने फोन रख दिया।

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जब इन्तज़ार करो तो घड़ी की सुइयाँ थम-सी जाती है। कहीं जल्दी पहुंचना चाहो तो रास्ता लम्बा होता चला जाता है और कहीं देर से पहुंचना चाहो तो जैसे पंख उग आए हों। जाने ऐसा क्यों होता है? मेरे पास वक्त होता तो ज़रूर सोचती।

कॉलेज की इमारत नज़र आने लगी मगर बेरहम वह न दिखा। मैंने अपने कदमों को जितना धीमा किया रास्ता उतनी ही तेजी से गुजरता चला गया आख़िर में उतर गयी।

ओह गाड! इस बार पीछे मुड़कर देखी तो जी चाहा माथा फोड़ लूँ। वह आया भी और गुजर भी गया मैं खड़ी-खड़ी बस देखती रह गयी।

पूरी रात यह सोचने में मैंने लगा दी थी कि इस तरह मिलूँगी, उस तरह मिलूँगी। ये कहूँगी वो कहूँगी। मगर हुआ कुछ भी नहीं। बेरहम पूरी फ़ौज के साथ आया था। चार इस कोने चार उस कोने। मैं पीछे-पीछे उसके स्कूल चली गयी। हद यहाँ तक हुई उसने घूमकर एक बार भी नहीं देखा।

लंच के बाद में पानी पी कर जैसे ही पलटी -”अंकुर!” अनायास ही मेरे जुबान से निकल गया। वह मेरे पीछे खड़ा था। वह मुझे देखकर कोई प्रतिक्रिया करता उससे पहले मुझे वहाँ से भगना पड़ा।

उस दिन में देर तक रागिनी के साथ घूमती रही। जब घर पहुंची तो मां ने बताया कि तुम्हारे स्कूल के किसी लड़के का फोन आया था- क्या तुम उसकी कोई किताब लेकर आयी थी।”

“मैंने… और किताब!” मैंने हैरानी से मां की ओर देखा -”नहीं मैंने किसी से कोई किताब नहीं ली। नाम बताया है उसने?”

“मैंने पूँछा नहीं।”

मैं अपने कमरे की ओर पलट पड़ी।

“सुनो!” मां ने पुकारा। मैं खड़ी हो गयी -”उसने अपना फोन नम्बर नोट करा दिया है। कहा है कि जब आए तो फोन कर लेगी।”

“कहाँ है?”

“वहीं फोन के पास एक कागज का टुकड़ा पड़ा हुआ है। मुझे डायरी नहीं मिली तो मैंने उसी पर नोट कर दिया था।”

मैं देर तक उस फोन नम्बर को देखती रही। जी नहीं कर रहा था नम्बर डायल करने को। उस कागज के टुकड़े को उंगलियों में मरोड़ते हुए कमरे तक ले गयी और फर्श के किप्ती कोने में फेंककर आलमारी को टटोलने लगी। शायद में किसी की किताब लायी होऊँ। जब न मिली तो उस कागज के टुकड़े को ढूढ़ने लग गयी। वह मिल गया। मैंने नम्बर डायल कर दिया।

“हैलो।” किसी ने उधर से कहा।

“देखो मिस्टर मेरे पास तुम्हारी कोई किताब-उताब नहीं है, समुझे तुम। और हाँ आइन्दा ऐसे बगैर जाने पहचाने फोन मत कर दिया करो। पता है मेरी मम्मी…।”

“नीलम! मुझे पता है तुम्हारे पास मेरी कोई किताब नहीं है।” सहसा फोन पर कोई जानी पहचानी-सी आवाज गूंजी मगर मेरे दिमाग का पारा इतना ऊपर था कि सोचकर भी कुछ सोच न पायी।

“अच्छा तो ये पता है आपको, और मेरा नाम भी। क्या मैं जान सकती हूँ कि आज कौन-सी तारीख़ है? जहाँ तक मुझे लगता है कि आज एक अप्रैल तो बिल्कुल नहीं है।” मैं बोलती चली गयी -”आपका क्या ख़याल है? क्या मैं सच नहीं कह रही हूँ?”

“मैं अंकुर बोल रहा हूँ।” उसका अगला शब्द था।

“आप कोई भी बोल रहे हों मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। मगर आपको… अ…अंकुर।” एकाएक मैं रुक गयी। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे सर पर जोर का हथौड़ा मार दिया हो। मुझे कुछ समझ न आया सिवाय उसके नाम के। मैंने झट से रिसीवर रख दिया।

“कौन था नीलम?” कही दूर से मां की आवाज़ आयी, मैंने कोई जवाब नहीं दिया। सीधे-कमरे की ओर भाग गयी। दरवाजे बन्द किए रोशनी जलाई और आइने के सामने खड़े होकर कपड़े बदलने लगी।

कुछ ऐसा हुआ था जिससे मेरे बदन का रोम-रोम उत्तेजित हो उठा था। मैंने पलट कर अपने बिस्तर की ओर देखा। मन कल्पनाओं में बह उठा।

XXX

अगले दिन में स्कूल पहुंची तो माथा ठनक उठा। मेरी नज़रें जहां की तहां दौड़ती रही मगर अंकुर नज़र नहीं आया। में बेहद परेशान थी- जहाँ तक याद था मैंने फोन पर उसे ऐसा कुछ नहीं बोला जो उसे इतना बुरा लग जाए।

मैं अपनी बेचेनी किससे बताऊँ? रागिनी से, कल्पना से, शिवी… नहीं नहीं वह तो वेचारी गाय है गाय। शिवी का नाम आते ही जेहन में एक ऐसी मूर्ति उभर कर सामने आ जाती थी जिसे फिजिक्स, कमेष्ट्री के अलावा कोई विषय आता ही नहीं। वह बेहद टैलेण्टेड और खूबसूरत होते हुए भी बिल्कुल अकेली थी। कहना मुश्किल था कि वह किसी से बात करना पसन्द नहीं करती थी या फिर कोई उससे।

शिवी और कल्पना नदी के दो किनारे थे। एक से कोई बात करना पसन्द न करे भी तो भी वह बात करने से नही मानने वाली थी और दूसरी कोई बात करने को उतावला भी हो तब भी होठ न खोले।

“नीलम!” रागिनी ने मेरे कंधो पर हाँथ मारा, बोली – “क्या जो मैं देख रही हूँ वह सच है?”

“क्या?”

“तुम्हारी नज़रें आज कुछ ज्यादा ही बेकाबू है।”

“काश में इंकार कर पाती।” मैंने जरा भावुक होकर कहा -” रागिनी! क्या तुम्हें मेरी बेचैनी का कारण पता है?”

“इतना जानती हूँ तुम्हारी नज़रें किसी को खोज रही हैं… शायद अंकुर को।”

“मगर आज वह नहीं आया।”

“वह तो दो-दिन पहले भी नहीं था लेकिन तब तो तुम्हारे अन्दर इतनी बेचैनी नहीं थी।”

“रागिनी!” मैंने उसे घूरा- “दो दिन पहले की बात और थी। कल उसने मुझे फोन किया था। मैं पागल थी जो उल्टा सीधा बोल गयी। मुझे लग रहा है उसे मेरी किसी बात से चोट पहुँची हो।”

“और मुझे लग रहा है ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है। हो सकता है वह किसी और कारण से न आया हो।”

“अजी गुस्ताखी माफ हो तो आपकी न्यूज़ रिपोर्टर हाजिर हो जाए रिपोर्ट लेकर।”

हम दोनो ने पलट कर देखा। सामने कल्पना खड़ी थी। “ओह कल्पना तुम आ गयी!”

“नहीं आना चाहिए था… अजी हमें उल्टा सीधा बोलने की ज़रूरत नही है क्योंकि आज हम स्वाभिमान को साथ लिए घूम रहे हैं। कहो तो हम अभी के अभी लौट सकते हैं।”

“नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है, सचमुच इस समय मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत थी। मुझे यकीन है कि तुम्हें पता होगा।” मैंने मुस्कुराने की कोशिश की -”ऐसी ही थोड़े तुम्हे चैनल में काम करने की सलाह दिया करती हूँ।”

“आज वह अपने परिवार के साथ फिल्म देखने गया है।” कल्पना ने बेहद सहज अन्दाज़ में कहा, मगर बात कुछ ऐसी थी कि हम हैरान हुए बिना न रह पाये। ओह कल्पना! जी चाहा उससे लिपट जाऊँ।

“कल्पना!” रागिनी ने पुकारा- “अब ये भी बता दो कि तुम्हे ये जानकारी मिली कहां से।”

“अजी आम खाया करो, गुठलियाँ गिनने से कोई फायदा नहीं।” कल्पना ने हँसते हुए कहा।

“लेकिन मैं गिनना चाहती हूँ, बोलो तुम बता पाओगी?”

“अब ज़िद कर रही हो तो इस पहलू को सार्वजनिक करना ही पड़ेगा। मगर हाँ, हम अच्छे रिपोर्टर बन सकते हैं इस बात पर शक मत करना।”

“नहीं करेंगे यार!” मैंने उसके गालों को छूते हुए कहा।

“दरअसल उसके पापा और मेरे पापा एक ही ऑफिस में काम करते हैं।” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“ओह…”

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उस दिन जैसे ही मैं घर में घुसी कि चौंक उठी! सबके सब मेरे इन्तज़ार में थे। कुछ पलों तक तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया मगर जल्दी ही पापा ने बताया कि हम फ़िल्म देखने सिनेमा जा रहे हैं। इसलिए मैं जल्दी से कपड़े बदल लूं।

“क्या!! सिनेमा?” मेरे माथे पर सिकुड़न आ गयी। मैंने गौर से मां की ओर देखा। उनके चेहरे पर चमक थी। जहाँ तक मैं जानती थी वह फिल्मों की दीवानी थी मगर सिनेमाहॉल के लिए। उनका मानना था कि टी.वी. अच्छी खासी फिल्मों की खाल निकाल लेती है। सच! वह टी.वी. के सामने काफी कम बैठा करती थी।

मैं दौड़ती हुई बाथरूम में घुस गयी। चेहरा धुला, कपड़े उतारे और आईने के सामने खड़ी हो गयी। मैंने गौर से देखा आईने की ओर, मेरे हुस्न की रौनक पर वह भी शरमा गया था।

“नीलम जल्दी करो।” बाहर से मां की आवाज़ आयी।

“आ रही हूँ।” मैं बाथरूम से निकलते हुए चिल्लाई।

“ओह… ये क्या किया तुमने?” मां के सामने पहुंची तो वह मुझ पर चिल्ला पड़ी – “तुम घर में पहनने वाले कपड़े क्यों पहन रखी हो। क्या इन्हें ही पहनकर चलने का इरादा है?”

“मैं नहीं जाऊंगी।” मेरे चेहरे की खुशी गायब हो चुकी थी।

“क्या हुआ बेटी?” पापा हैरान होकर पूछे।

“कुछ नहीं पापा। दरअसल आज मुझे ढेर सारा होमवर्क मिला हुआ है। आज मैं कही नहीं जा पाऊँगी।” मैंने दुनिया की सारी मासूमियत अपने चेहरे पर समेट लायी।

“लेकिन मैं तो चार टिकटें लेकर आया हूँ।”

“तो लाइए एक मुझे दे दीजिए, समझिएगा मैं आपके साथ ही थी।”

“ओह नीलू तू तो काफ़ी बड़ी हो गयी।” पापा बढ़कर मुझे सीने से लगा लिये। कौन कम्बखन कहता है तू पढ़ती लिखती नहीं है…।” पापा की बाहों का कसाव बढ़ गया। मेरा यौवन बड़ी बेरहमी से पापा के सीने के बीच पिस गया। मेरे लिए यह बिल्कुल नया एहसास था, सालों बाद किसी ने मुझे सीने से लगाया था। बदन की उस चरमराहट में भी कितना मीठा एहसास छुपा हुआ था। यद्यपि मुझे पता होना चाहिए था कि यह मेरे मस्तिष्क का हरामीपन था जिसने मुझे रिश्ते की दीवारों के परे सिर्फ शारीरिक जिजीविषा तक ही सीमित कर दिया था।

पापा की कार दरवाज़े से अभी हिली ही थी कि मैं दौड़ती हुई सीधे फोन पर आ खड़ी हुई।

“अंकुर!” मेरे काँपते होठों ने बेरहम का नाम ले ही डाले।

अंकुर ने मेरे घर आने से मना किया तो भभककर रो पड़ी में। मेरे प्यासे होठों से जैसे किसी ने पानी से भरा गिलास छीन लिया हो। मैं अब सोचती हूँ तो हैरानी होती है। ऊपर वाले ने भी क्या-क्या चीजें बना डाली है। भला रोना भी कोई चीज़ है और ऑसू उससे भी घटिया। मगर उस पल लग रहा था कि अगर ऊपर वाले ने इन्हें न बनाने की ग़लती कर बैठता तब तो मैं अधूरी ही रह जाती। मेरे रोने की आवाज उसके कानों पर पड़ी तो ज़ालिम पिघल गया। हड़बड़ा कर बोला- ठीक है मैं आ रहा हूँ मगर कम से कम काम तो बता सकती हो। वैसे तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं अपनी उस दिन के ग़लती के लिए माफ़ी मांग चुका हूँ। मैंने बस यूं ही किताब का बहाना बनाकर उसदिन फोन कर दिया था।

“तुम आ जाओ, मैं काम बता दूंगी।”

“मां से डॉट तो नही खिलाने वाली न? वैसे नीलम!” उसके स्वर में मैंने हल्की उग्रता महसूस की -”अगर तुम ऐसा करती हो तो तुम्हें खयाल रखना चाहिए कि तुम स्कूल भी जाती हो।” यह सरासर उसकी धमकी थी मगर उस समय न जाने क्यों मैंने बिल्कुल बुरा नहीं माना।

“मम्मी घर पर नहीं है।” मैंने स्पष्ट बता दिया।

“तो पापा से।”

“नहीं वो भी नहीं है।”

“भाई होगा?”

“कोई नहीं है मैं अकेली हूँ।”

“अकेली!” वह एकदम चौंक पड़ा जैसे किसी ने उसे मेरे इरादों का एहसास करा दिया हो – “तुम सचमुच घर पर अकेली हो?” उसकी आवाज़ में भारीपन आ गयी जैसे वह थूक निगलना भूल गया हो- “सब लोग कहाँ गये हुए हैं?”

“सिनेमा।”

“तुम क्यों नहीं गयी?”

“मुझे पसन्द नहीं है।”

“तुम झूठ बोल रही हो, मैं जानता हूँ तुम्हे फ़िल्मों में काफी दिलचस्पी है।”

“छोड़ो इन बातों को, बस तुम आ जाओ।” मैं उतावली हुई जा रही थी। एक ही पल में मेरे सामने रागिनी और शेखर का एक साथ उस कमरे में घुसना और थोड़ा वक्त गुजारने के बाद मुस्कुराते हुए निकलना बिजली की तरह घूम गया। काश! मैं अपने उस वक्त के एहसास को कागज पर पूरी तरह से उतार पाती। मैं समझ नहीं पा रही थी मेरे बदन के अंग-अंग में कैसी हलचल थी। जो शायद जिन्दगी में पहली बार और इतनी उम्र गुजारने के बाद हुई थी। मैं हड़बड़ाहट में फोन के रिसीवर को एक कान से दूसरे कान में ले गयी- न जाने क्यों, उस वक्त मुझे यकीन नहीं था कि यह वह सब कुछ सुन पायेगा जो कहने वाला है।

“मैं नहीं आऊँगा… हरगिज़ नहीं आऊँगा।” उसने फोन पटक दिया।

उफ! मैं पागल हो उठी उसकी अगले चन्द लफ्ज सुनकर। बचपन से आज तक मैंने जो भी चाहा था मुझे आसानी से मिल गया था और जो नहीं मिला, उसके लिए मैंने जमीन-आसमान एक कर दिया और उसे किसी भी हाल में छीन लिया, ये बात और थी कि हर बार मेरे कदमों के नीचे मेरे पापा के कन्धे या फिर उनकी बेसुमार दौलत हुआ करती मगर आज न जाने क्या था? ये कैसी जरूरत थी मेरी? कि मैं न चीख पायी, न चिल्ला पायी, न ही हँस पायी और न ही रो पायी सिवाए अपने आपको बुरा भला कहने के। कितनी पागल हो गयी थी उस दिन? रागिनी के साथ शेखर के कमरे में चली गयी होती तो आज इस जरा से एहसास के लिए इतना आडम्बर न करने पड़ते मुझे। ओह रागिनी तुम सचमुच महान हो। आइसक्रीम भी खाती हो, तोहफ़े भी लेती हो।

मैं परेशान थी कम्बत को कैसे समझाऊँ? किस तरह उसे यकीन दिलाऊँ कि उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। मुझे लगा था अकेली सुनकर दौड़ता हुआ आएगा मगर मैं नादान निकली। समझ न पायी उसे।

मैंने पुनः फोन लगा दिया। उसे यकीन भी दिलाया खुशामद भी की, रोई भी… तब कहीं जाकर पिघला। मैंने बिस्कुट लाने के बहाने होमगार्ड को बाहर भेज दिया। पैसा भी इंसान को किस तरह पालतू कुत्ता बना डालता है। मैं उसके बेटी की उम्र की थी मगर अदब इतनी कि मां भी शरमा जाए।

Xxx

बहुत मुश्किल से कटी मेरी वो रात। सुबह जल्दी-जल्दी मैं उठी तैयार हुई और स्कूल भाग गयी।

मुझे देखते ही रागिनी दौड़ती हुई आ लिपटी मुझसे। आनन-फानन उसके होठ मेरे गालों को चूमते चले गये। मैं उसे रोक नहीं पायी ।

बेचैन कौन है? मैं या रागिनी! मुझे सोचने का वक्त न मिला।

“रागिनी! रागिनी!” मैं चिल्लाई। उसके इस पागलपन ने घबराहट पैदा कर दी मेरे अन्दर।

“नीलम जानती हो, ये अंगूठी किसने दी है?” अपनी अंगूठी बढ़ाते हुए खिलखिलाई वो।

“नहीं… मैं नहीं जानती।” मैने सीधे बोल दी- “सोने की है?”

“सौ फीसदी सोना है?”

“किसने दी है? क्या शेखर ने…?”

“ओह… नीलम!” रागिनी के एकाएक जैसे पंख लग गये हों वह जमीन से दो फिट ऊपर उछली और सीधे मेरे सीने से आ लगी- “तुमने पहचान लिया… सचमुच तुमने…”

“ओह गाड…” मैं कराह उठी। उसकी खुशी तो मेरी जान ही ले लेती अगर सीने की हड्डियाँ टकराती। नारीत्व काम आया। हट्टियों के बीच फासला बरकरार रहा।

रागिनी के आँखों में अजीब-सी चमक थी। मैं हैरान थी- रागिनी जैसी खूबसूरत लड़की उस लड़के के बिगड़े हुए चेहरे पर फ़िदा थी या फिर उसकी अमीरी पर। मैंने अपने दिमाग को ज्यादा दौड़ लगाने के लिए आज़ाद नहीं किया।

रोड की ओर आ रहे गलियारे को जैसे ही हम पार किए मेरी ऊपर की साँसें ऊपर और नीचे की साँसें नीचे रह गयी।

“क्या हुआ नीलम! तुम चौक क्यों पड़ी?” रागिनी ने अजीब नजरों से मुझे देखते हुए बोली।

“कुछ नहीं।” कहने को तो मैंने कह दिया मगर नज़रें वहीं पर थीं।

“ओह…” रागिनी हँस पड़ी। वह इन मामलों में काफ़ी चौकन्नी रहा करती थी। उसकी नज़रों से अंकुर बच नहीं पाया- “उसके सामने जाने से डरती हो क्या?”

“नहीं!” पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया मैंने।

अंकुर की जैसे ही मुझ पर नजरें पड़ी वह तीव्रता से दरवाजे के पीछे छुपा लिया खुद को। कौन किससे डर रहा था? कहना मुश्किल था।

अब मैं उसकी नज़रों से आजाद थी। रागिनी का हाँथ पकड़ी और तेजी से खींचते हुए कैम्पस के दूसरे किनारे निकल गयी।

आमने-सामने दो पत्थर और उन पर बैठे हम। पथरीली नज़रों से एक दूसरे के पत्थर बने चेहरे को देखते रहे।

“अंकुर ने मेरे घर फोन किया था।” खामोशी से मैं ऊब गयी। मुझे बात शुरू करनी पड़ी ।

“किसलिए…?” सहजता के साथ पूँछा उसने।

“मैं नहीं जानती मां ने बताया था।”

“तुम तीन-चार दिन पहले की बात कर रही हो?”

“हाँ… तुम जानती हो?”

“तुम बता चुकी हो मुझसे।”

“अच्छा!” मैं चुप हो गयी।

“नीलम!” थोड़ी देर बाद रागिनी बोली -”क्या तुम शेखर के घर चलना चाहोगी?”

“शेखर!” मैं उठकर खड़ी हो गयी- “मुझे उसकी शक्ल पसन्द नहीं है।”

“नीलम! एक बात बोलूँ?” उसकी आँखें मुझे घूरने लगी। काश! उस समय मैं इस बात का एहसास कर पाती कि अपने दिल की पसंदीदा चीज पर किसी भी बदमिजाज़ दिमाग़ की छीटाकशी बर्दाश्त नहीं होती।

“बोलो?”

“तुम जब शेखर के बारे में ऐसा कहती हो तो बुरा लगता है मुझे।”

“तो मैं क्या करूँ? तुम ही बार-बार उसका जिक्र करके मुझसे ऐसा बोलवाती हो।”

रागिनी चुप हो गयी। मैं उसके चेहरे पर गुस्सा बखूबी पढ़ सकती थी।

“मैं जा रही हूँ।” रागिनी बिना मेरी ओर देखे हुए उठी और चल पड़ी- “मुझे लगता है कि शेखर के बारे में तुम्हें कुछ बताना ही नहीं चाहिए था।”

“रागिनी!” मैंने पुकारा उसे -”मैं तुम्हें एक बात नहीं बता पाई। क्या सुनना चाहोगी तुम?”

“नहीं में जा रही हूँ।”

“कल अंकुर मेरे घर आया था।”

“तो मैं क्या करूं?”

“घर पर कोई नहीं था। मैं अकेली थी।”

रागिनी फिर भी नहीं ठहरी।

“मैं और अंकुर देर तक एक कमरे में बन्द रहे।”

इस बार अपने आपको पलटने से वह रोक नहीं पाई। मुस्कुरा कर बोली- “तुम सच कह रही हो?”

“हाँ।”

“ओह… नीलम।” वह दौड़कर लिपट गयी मेरे सीने से- “तुम्हारा मतलब तुम और अंकुर…।”

मैं देर तक उसके चमकते चेहरे को देखती रही। उसे इन्तज़ार था आगे जो कुछ मैं कहने वाली थी।

“क्या किया था उसने?” रागिनी ने मुस्कुराकर पूँछा। हालाँकि मैं जानती थी कि उसका उतावलापन मेरे बन्द होठों की खामोशी को खरोच रहा है मगर न जाने क्यों मेरे होठ जल्दी खुले नहीं।

“बोलो नीलम!” उसने मुझे जोर से धक्का दिया -”उसने क्या किया तुम्हारे साथ?”

“कम्बख्त शरमा गया।” मेरी नज़रें झुक गयीं- “उसने कपड़े नहीं उतारे।

“ओह…।” एकाएक रागिनी का चेहरा नीला पड़ गया। अफसोस के छींटे उसके चेहरे पर आसानी से देखे जा सकते थे।

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उम्र की रफ्तार तेजी से बढ़ रही थी मगर उससे भी तेज़ बढ़ रही थी मेरी बेचैनी। मैं उतावली थी किसी अद्भुत एहसास के लिए। मैं कई बार शेखर के बारे में सोचती पर उसका चेहरा मेरे उतावलेपन पर ठण्डा पानी उलेड देता।

अंकुर अगर एक उम्मीद थी तो निराशा भी काफ़ी थी उसमें। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मुझे क्या करना चाहिए।

वक्त का एक लम्बा दौर गुज़र गया इन्हीं आशाओं और निराशाओं के बीच।

वह ठण्डी की कँपकँपाती सुबह थी मैं स्कूल अकेले ही जाया करती थी क्योंकि रागिनी आजकल अक्सर खफ़ा रहती मुझसे। उसे शेखर की बुराई सुनना पसन्द नहीं था और मुझे उसकी अच्छाई सुनना पसन्द नहीं था।

यह वही जगह थी जहाँ पर मैं अक्सर अंकुर का इन्तजार किया करती थी। मैं पत्थर के टुकड़े पर बैठी हुई कंकड़ों को जहाँ तहाँ उठाती और फेंकती जैसे मुझे इन कंकणों को अपनी जगह से विचलित करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी हो। वहां से गुजरता हुआ राही अगर मेरे बारे में ऐसा ख़याल रखता रहा होगा तो आश्चर्य की बात नहीं थी।

मैं बीच-बीच में कई बार पीछे मुड़कर देखती भी रही शायद अगली शख्स रागिनी होगी।

आखिर बेरहम आयी भी, मुझे देखकर मुस्कुराई भी, मगर न तो उसने कुछ कहा और न ही वह उम्मीद करती थी कि मैं कुछ बोलूं। उसे डर था कि अगर मैं कुछ बोलूँगी तो जरूर शेखर के बारे में होगा।

“रागिनी!” मैं उठकर खड़ी हो गयी। “चलो स्कूल चलते हैं। वैसे भी हम देर से पहुंचने वाले हैं।”

“रागिनी आज शेखर…. |” मैंने कुछ कहना चाहा।

“नीलम!” उसने घूरकर देखा मेरी ओर- “मैंने कहा न कि देर हो गयी है।”

“लेकिन रागिनी।”

“तुम्हें देर से पहुंचने का शौक हो तो तुम बेशक रुक सकती हो।”

“नहीं मुझे ऐसा कोई शौक़ नहीं है मगर तुम मेरी बात तो सुन सकती हो।” मैं दौड़कर उसके पास पहुँच गयी- “रागिनी!” मैंने कहा –”मेरी बात सुनो।”

“सुन सकती हूँ मगर शेखर के अलावा…। बोलो तुम शेखर के अलावा बात कर सकती हो?” उसके चेहरे पर गुस्सा की लकीरें साफ देखी जा सकती थी।

“मैं दरअसल शेखर के बारे में ही बात करना चाहती थी, मगर… ।”

 “बाय नीलम… मैं चलती हूँ।” वह दौड़ते कदमों से आगे बढ़ गयी।

“रागिनी! रागिनी!” मैं उसके पीछे दौड़ी -”क्या हम आज भी शेखर के घर चल सकते हैं।”

“क्या!” रुक कर उसने घूरा मेरी ओर -”क्या तुम उसके सामने उसे कुछ कहने वाली हो, ओह नीलम… सचमुच तुम बहुत बेअदब हो गयी हो। तुम समझ नहीं सकती कि किसी को भी अपने सामने अपनी बुराई सुनना पसन्द नहीं है खासकर सूरत को लेकर।”

“रागिनी… मैं बुराई करने के लिए नहीं जाना चाह रही हूँ।” मैं उसका हाँथ पकड़ते हुए बोली -”मैं तो… खैर तुम इतना बताओ क्या तुम चल सकती हो?”

रागिनी पलट कर खड़ी हो गयी। “क्या मैं कारण जान सकती हूँ?”

“हाँ शौक से।” मैने मुस्कुरा दिया।

“लेकिन आज मैं नहीं जाना चाहती, क्या तुम मुझे माफ़ कर सकती हो?” मैंने कुछ नहीं कहा। देर तक हम खामोश रहे।

“नीलम!” रागिनी ने पुकारा।

“हूँ…।” अजनबी-सा मैंने उसकी ओर देखा।

वह मुस्कुरा पड़ी थी, बोली -”क्या तुम वाकई शेखर को पसन्द करोगी?”

 “नहीं…।” मैंने अपनी ज़िद बरकरार रखी।

“तो फिर…?”

“मैं तुम्हें एक बार उसके साथ देखना चाहती हूँ। उसके कमरे में… एकदम नंगी।”

“ओह नीलम! तुम….. खैर मैं तुम्हें बता दूं आज मैं उतनी उतावली नहीं हूँ। समझी तुम और मुझे पता है कि तुम आजकल किसी अध्ययन में जुटी हुई हो। बोलो कि मैं झूठ हूँ।

“नहीं मैं तुम्हें झूठ नहीं कह सकती… पर यह सत्य भी शायद नहीं है।”

“मैं तुम्हें पढ़ सकती हूँ नीलम।” रागिनी मुस्कुराई तुम द्विअर्थी बातें करके मुझे झुठला नहीं सकती।”

“क्या तुम वाकई आज नहीं जाना चाहोगी?” मैंने पुनः प्रश्न किया।

“तुम उतनी शर्म का सामना नहीं कर पाओगी।”

“रागिनी!” मैंने गहरी नज़रों से उसे देखा।

“मैं अक्सर सोचा करती हूँ नीलम।” उसने मिट्टी के टुकड़े को उठाते हुए कहा”कुछ प्राकृतिक प्रक्रियाए उतनी सहज क्यों नहीं होती जैसे कि भूख लगने पर खाना खा लिया जाता है। प्यास लगी तो पानी पी लिया जाता है।”

मैं रागिनी की ओर देखने लगी।

“ऐसा क्यों होता है?” उसने अपनी बात जारी रखी –”कई ज़रूरी चीज़ों को शर्म की चादर में लपेट कर रख दिया जाता है। मसलन मुझे शारीरिक जिजीविषा की ख्वाहिश है मगर मैं उसके लिए स्वतंत्र नहीं हूँ। मुझे कई दौर और रीतिरिवाजों से गुजरना पड़ेगा सिर्फ चंद पलों को पाने के लिए। काश! ये सबकुछ बिल्कुल आसान होता…। उसने लम्बी सांसे भरी।

“रागिनी!” मेरी नजरें उसके चेहरे पर टिकी रही -”इतनी बड़ी हो गयी।”

उसने मुझसे नजरें नहीं मिलाई। शायद वह खुद हैरान थी कि उसका बचपना वयस्कता की दीवारों में तीव्रता से पिसता जा रहा था।

वैसे मैं इतना कुछ सोचने समझने वालों में से न थी मगर मन न जाने क्यों? जीवन के इस अजीब किन्तु महत्वपूर्ण पहलू पर कुछ और… बहुत कुछ जानने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

“रागिनी!” मैंने उसे पुकारा। वह मेरी ओर देखने लगी। “तुम्हें लगता है कि अभी तुम्हारी उम्र उतनी नहीं है जहाँ तुम पहुंचना चाहती हो। अभी तुम्हारा बचपना है।”

“बचपना!” वह आहिस्ता हँस पड़ी। उसकी हँसी में मासूमियत कम, कटुता ज्यादा थी -”लोगों ने मुझे बचपन जीने का मौका ही नहीं दिया। जब से होश सम्भाला, औरत बन कर जी रही हूँ।”

“तुम्हारा मतलब मैं औरत नहीं हूं।”

“नहीं!” दृढ़ता से उत्तर दिया उसने।

“तो क्या मैं तुम्हें पुरुष नजर आ रही हूँ?” मजाक उड़ाने के अंदाज़ में मैंने पूँछा उससे।

“रहने भी दो नीलम।” उसके चेहरे पर गम्भीरता आ गयी। मैंने उसकी आँखों की गहराई को नापने की कोशिश की।

“तुम नहीं समझोगी औरत का मतलब। तुम बस इतना जान लो तुम अभी बस लड़की हो, औरत नहीं!”

रागिनी मेरे सामने खड़ी थी। एकदम नंगी… खुली किताब की तरह मगर में पढ़ नहीं पा रही थी। न जाने क्यों उसकी आँखों में मुझे आज पहली बार दर्द का कोई समुन्दर उफ़ान भरता हुआ नज़र आ रहा था। ऐसा कुछ था जिसे वह छुपाने का प्रयास कर रही थी।

“काश! होश सम्भालने के बाद दो पल ही सही में लड़की बनकर जी पाती।” रागिनी की पलकें झुक गयीं तभी ऑप्सू का एक कतरा छलक गया आँखों से।

हम थोड़ी देर तक खामोश बेठ रहे। नज़रे किसी उड़ते हुए तिनके का पीछा करती रही।

“तुम्हें पता है नीलम?” एकाएक रागिनी की भीगी आँखों ने मुस्कुराकर देखा मेरी ओर -”हमारी परीक्षाएँ जल्दी ही शुरु होने वाली हैं।”

“हाँ! कल्पना ने बताया था मुझे।” मैं भी मुस्कुरा पड़ी।

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मैं घर लौट आयी मगर मस्तिष्क साथ नहीं था। उसमें द्वंद्व था, हलचल थी, खुशी थी और निराशा भी… मैं सोच रही थी- रागिनी क्या महसूस करती होगी। जब वह शेखर के सामने होती होगी। कैसे विचारों का तूफान उठता होगा, जब वह उसे छूने वाला होता होगा। अजीब हालात होते होंगे जब वह उसे अपनी बाहों में…उफ़। कैसे होते होंगे? काश! रागिनी मेरे मस्तिष्क को उन एहसासों का सीधा संचार कर पाती।

मैं हैरान थी। कितना कुछ जानकर भी अभी कितना कुछ नहीं जान पायी में। मुझे पता है स्त्री-पुरुष का मतलब। मैं जानती हूँ रागिनी को शेखर की ज़रूरत क्यों है। मैं महसूस कर सकती हूँ उस बरसते पल को जब रागिनी शेखर के नीचे पिस रही होती होगी मगर अब भी काफी एहसास है जिन्हें नहीं जानती मैं। काश! मैं सब कुछ वैसे ही सीख पाती जैसे कि मैंने अंको को जोड़ना सीखा है, अक्षरों को पढ़ना सीखा है।

मैं काफ़ी हद तक निराश थी।

मैं खुश हुआ करती थी कि मैं आखिर मैं हूँ, रागिनी नहीं। मगर अब लग रहा था काश! मैं रागिनी होती-कितने एहसास होते मेरे पास। वह पहला सम्मोहन जब वह शेखर के प्रति आकर्षित हुई होगी। वह जज़बात जब उससे बात की होगी। वह शर्म जब उसके प्रति समर्पित हुई होगी और वह प्यार भी जब अपना सब कुछ लुटने के लिए छोड़ दी होगी। उफ़! कैसे होते होंगे वे सारे पल? अचानक मेरे सामने मम्मी की वह बदहाल तश्वीर मेरी आँखों पर उतर आयी जिसे मैंने छपकर देखा था।

अंकुर की शेखर से तुलना करते-करते अकस्मात में भाव में बह गयी। मेरी नज़रें एकटक फोन पर टिक गयी। मैंने अगुलियों को रोकना चाहा मगर उन्होंने बग़ावत कर डाली। घण्टी भी बजी, फोन भी उठा और आवाज भी आई।

मैं क्या उत्तर दूं, मैं कुछ नहीं समझ पायी बस सुनती रही।

अंकुर देर तक हैलो-हैलो कहते हुए खामोश हो गया। मैंने उसकी निराशा को बखूबी महसूस किया।

“मुझे पता है फोन पर कौन है?” उसने कहा। मेरे तो प्राण ही सूख गये। क्या वाकई उसे पता है? नहीं, नहीं शायद मुझे बना रहा होगा ताकि मैं बोल दूं।

“नीलम।” उसने नाम ले लिया। मेरे दिल की धड़कन सहसा रफ्तार पकड़ ली। अब और भी मुश्किल था निर्णय लेना कि मैं क्या करूं? बोलूँ… खामोश रहूँ… या फिर फोन रख दूँ…।

“तुम्हें पता है अक्सर फोन मेरी मां के पास होता है।” उसने कहा- “अच्छा बताओ कोई काम था?”

“नहीं।” मुझे बोलना पड़ा।

“तो…”

“बस ऐसे ही…”

“तब मैं सोने जा रहा हूँ। क्या तुम्हें नींद आ रही है? अगर हाँ तो सो जाओ अगर नहीं तो तारे गिनो।” उसने तेजी से फोन रख दिया। मैं बस रिसीवर को देखती रही। काश! कमरे में रोशनी होती।

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अगली सुबह मैंने रागिनी को फोन किया तो वह चौंक उठी! “नीलम! तुम रो रही हो?” मेरे शब्दों का पहला अक्षर सुनते ही उसने मेरे दर्द को पहचान लिया।

“नहीं।” मैंने अपने आँसुओं को सम्भालते हुए कहा- “तुम अभी मेरे घर आ सकती हो?”

“और स्कूल?”

“मैं स्कूल को नहीं जानती, बोलो तुम आ रही हो या नहीं?” मैंने दृढ़ता के साथ पूँछा उससे।

“मगर बात क्या हुई?”

“तुम मुझे जानबूझकर रुला रही हो रागिनी।”

“नीलम!”

“तुम मेरे घर आ जाओ।” मैंने फोन काट दिया।

रागिनी एक अच्छी दोस्त की तरह लगभग आधे घण्टे में आ पहुंची। मैं उसे लेकर सीधे कमरे में घुस गयी।

“क्या तुम दोनों चाय लोगी?” मां ने दूर से आवाज दी।

“नहीं… ज़रूरत नहीं है। मैंने चिल्लाकर कहा।

“रागिनी से तो पूँछ लो।”

“वह भी नहीं पियेगी, बस तुम हमें अकेले रहने दो।” कमरे में घुसते ही मैंने तेज़ी से दरवाजा बन्द किया और रोशनी जला दी।

“नीलम!” वह मेरे पागलपन से हैरान थी। उसके चेहरे पर घबराहट के धब्बों में भी नज़र गयी मेरी। शायद उसे पता नहीं था मैं क्या कर रही हूँ। मुझे खुद नहीं पता था मैं क्या करने वाली हूँ।

“रागिनी…।” मेरी आँखें भर आयी।।

“हूँ…” वह न तो मुस्कुरा पायी न रो पाई।

“क्या तुम मेरे सामने कपड़े उतार सकती हो?”

“नीलम!” “मैंने पूँछा क्या तुम अपने कपड़े उतार सकती हो?”

“मगर कारण तो…!”

“मैं कुछ नहीं सुनना चाहती। बस तुम इतना बताओ, तुम उतार सकती हो या नहीं?”

वह पागल हो गयी मेरे इस अटूट पागलपन में। उसकी फटी-फटी नज़रें मेरे रुवांसे चेहरे पर ठहर गयी। मैं जानती थी कि वह बेहद उलझन में है। कोई खुद कपड़े उतारना चाहे तो बात और होती है और उससे कपड़े उतरवाए जाएं यह बात और…। उस समय इस सूक्ष्म विश्लेषण को समझने की मुझमें सामर्थ्य बिल्कुल नहीं थी। मैं बस इतना समझ रही थी कि वह अगर उस बदसूरत लड़के के सामने सहजता से कपड़े उतार सकती है तो मेरे सामने भी उतार देना चाहिए।

मेरी नज़रें इन्तजार में थी कि वह कपड़े उतारने वाली है वह इन्तज़ार में थी शायद मैं अपना इरादा बदल दूं। देर तक संवाद नहीं हुआ हमारे बीच। बस आँखों से प्रवाह बहता रहा। आखिरकार उसके हाँथ टाप के निचले दोनों किनारों को छू लिये मगर नजरों में अब भी वही सवाल था- “क्यों उतारूँ!”

“उतारो…।” मैंने विवश कर दिया उसे। उसके हाँथ ऊपर उठ गये और अगले ही पल छातियाँ नंगी हो गयी।

“ट्राउजर!” मैंने कहा।

उसने कुछ नहीं कहा। अब वह नीचे से ऊपर तक नंगी खड़ी थी मेरे सामने। मैं तीव्रता से उसके पीछे गयी। दो पल गुजरे और खुद को भी नंगा कर दिया।

“सामने देखो आइने में।” मैं बड़ी बेरहमी से पेश आयी। अपने साथ भी और उसके साथ भी।

“देखो।”

“क्या?” उसके होठ काफी देर बाद खुल पाए।

“खुद को और मुझे।”

“क्यों…?” उसकी आवाज में भारीपन था।

“रागिनी! तुम सवाल बहुत करती हो।”

वह नजरें उठाकर आइने की तरफ देखी। उसका चेहरा शर्म से पागल हो गया। मेरे चेहरे पर कुण्ठा छायी रही।

“क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारा बदन मुझसे कही ज़्यादा बदसूरत है।” मैंने अपनी नाभि को छूते हुए कहा।

रागिनी कुछ नहीं बोली।

“बोलो, क्या मैं सच नहीं कह रही हूं। मेरे आँखों को देखो। क्या तुम उनकी सुडौलता को महसूस कर रही हो?”

“हॉ… तुम खूबसूरत हो… मुझसे ज्यादा।” उसके सूखे हुए होठों में कम्पन्न हुआ।

“तुम मानती हो ऐसा, है ना?”

“हाँ…”

“फिर ऐसा क्यों होता है कि हर कोई तुम्हें पसन्द करता है…? और वो कम्बख्त, उसने मुझे क्या समझ रखा है। सो जाओ या तारे गिनो… उसने ऐसा कहा मुझे। हरामी खुद को क्यों नहीं कहता कि वह मेरे लायक नहीं है… नपुंसक कही का।” मेरा स्वर अनियंत्रित हो उठा। मैं जाने और क्या-क्या कहती उसे, उससे पहले मेरी नज़र रागिनी के आँसू से भीगे हुए चेहरे पर जा पड़ी। एकाएक मेरी साँसें थम गयीं।

“रागिनी…।” मेरा पागलपन हवा हो गया- “तुम रो रही हो।”

“मैं जाऊँ?” मैं कुछ बोलती उससे पहले रागिनी बढ़कर अपने कपड़े उठा ली, पहनी और तेजी से बाहर निकल गयी।

मेरे होठों से एक शब्द भी न निकला।

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रागिनी! मेरी ज़िन्दगी का सबसे अनसुलझा पहलू था- जितना मैं समझने की कोशिश करती वह उतनी ही अजनबी बनती चली जाती। मुझे याद है… बचपन में जब मैं उसके बारे में काफी कम जानती थी तब शायद ज़्यादा समझती थी।

स्कूल में लड़कों को छेड़ना काफी सहज काम था उसके लिए वह उन लड़कियों में थी जो रास्ते पर जा रहे किसी अजनबी लड़कों को भी नहीं छोड़ती थी। यह मेरे शर्म की चादर है जो कई पहलुओं को छुपा रखी है जिन पर यकीन नहीं किया जा सकता फिर भी सौ फीसदी सच है, जिसका एक हिस्सा शेखर भी है।

मेरी मम्मी, पापा के साथ बेडरुम में जाने से पहले सावधानी पूर्वक गौर करती थी कि देखने वालों में कौन है। जब किसी के न होने की पूरी तरह तसल्ली हो जाती तो मुस्कुराती हुई अन्दर चली जाती मगर रागिनी शेखर के साथ अकेले रूम में घुसते हुए भी पूरी बेशर्मी से मुझसे नज़र मिलाती थी। मुझे भारी संदेह था कि यह वहीं रागिनी थी जो कपड़े उतारने मात्र में रो पड़ी।

मैं धीरे से बिस्तर से उठी ट्यूबलाइट की स्वीच ऑन किया। पूरा कमरा दूधिया रोशनी से नहा उठा। मैं देर तक दीवार से सटी आलमारी को देखती रही। मुझे कुछ जरुरत थी मगर क्या? मैं सोच नहीं पा रही थी। मैंने आलमारी को खोला और कपड़ों के बीच कुछ खोजने लगी। मिला कुछ नहीं मैं पुनः लौटकर बिस्तर पर बैठ गयी। आलमारी खुली रही।

“ओह… ये तो सामने रखा है।” सहसा मेरी निगाह उस पर जा पड़ी। में बढ़कर उसे उठा ली। कैमरा अब मेरे हाँथ में था, मैंने अपने आपको नंगा किया और आईने के सामने खड़ी होकर अपनी फोटो उतार ली।

बिस्तर पर बैठी हुई में घूम-घूमकर उसे देखती रही। मुझे यकीन था मैं सौ साल बाद भी उस फोटो को देगी तो खुद को पहचान सकती हूँ। काश! रागिनी की फोटो उतारी होती। तब मैं यकीन से कह पाती कि वह रोती हुई नंगी लड़की, रागिनी तो बिल्कुल नहीं हो सकती। रागिनी उनमें से थी जिससे दस बार कपड़े उतरवाए जाए तब भी न रोए।

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‘रागिनी स्कूल नहीं आयी’ इस दर्द से मैं तब उबर आयी जब मैंने कल्पना के साथ शिवी को देखा -”आज सूरज किधर निकला है जनाब?” मैंने कल्पना की ही भाषा में कल्पना से सवाल किया –”लगता है कि रात भर नींद नहीं आयी जनाब को, इसलिए सुबह तक सोना पड़ा।”

“अजी सूरज तो पूर्व से ही निकला है मगर…!” कल्पना खिलखिला पड़ी, बोली -”कैन्टीन चल रही हो?”

“क्यों आज लंच लेकर नहीं आयी क्या?” मैने पूँछा।

“लेकर तो आयी थी मगर शिवी आज कैन्टीन पर कुछ खाना चाहती थी।”

उफ, शिवी का नाम सुना तो दिमाग में खलबली मच गयी। अब तो सच में यकीन नहीं हो रहा था कि सूरज पूर्व में ही उगा होगा। शिवी और कैन्टीन का खाना। ओह ये तो नदी के दो किनारों को जोड़ने वाली बात हुई।

खैर हम कैन्टीन चले गये। शिवी मेरे सामने बैठी थी। नज़र मिलते ही वह मुस्कुरा पड़ी।

“नीलम!” शिवी ने आज पहली बार इस अदा से पुकारा मुझे- “एक बात पूँछू तुमसे?”

“हाँ पूछो?” मैं उतावली होते हुए बोली। न जाने क्यों मुझे उसके अंदाज से लगा कि वह आज कुछ खास सवाल करने वाली है।

“उफ़! हिम्मत नहीं कर पा रही हूँ। न जाने तुम क्या सोचोगी मेरे बारे में।” उसके चेहरे पर संवेदनाएँ उभर आयी।

“शिवी!” मैंने उसका हाँथ थामते हुए कहा- “अगर तुम वाकई मुझे दोस्त समझती हो तो भरोसा भी करना होगा।”

“नहीं, नहीं ऐसी बात नहीं है, मैं तुम पर भरोसा करती हूँ, मगर मेरा सवाल ही इतना उलझा हुआ है कि डर लगता है।”

उसने मेरे हाँथो को दृढ़ता के साथ थाम लिया।

“यहाँ ढेर सारी लड़कियाँ है।” उसने कहना शुरू किया- “लड़के भी काफी हैं। खूबसूरत चेहरे भी हैं मगर बदसूरत चेहरों की भी कमी नहीं है। मैं नहीं जानती कि मैं खूबसूरत हूँ या बदसूरत, मगर मेरे जानने वाले कहते हैं कि मैं काफी खूबसूरत हूँ। दिमाग़ भी अच्छा खासा है मेरे पास।”

मैं एकटक उसके चेहरे के बदलते रंग को देखती रही। कल्पना की चंचलता आज बेकाबू नहीं थी। वह गम्भीरता के साथ खामोश बैठी थी।

“तुम्हारा क्या मानना है?” शिवी ने मुझसे सवाल किया।

“नि सन्देह तुम खूबसूरत हो शिवी। मैं क्या कोई भी इस सच को अस्वीकार नहीं कर सकता।” मैं पूरी ईमानदारी से पेश आयी।

“है ना…।” शिवी के होठों पर हल्की मुस्कान तैर पड़ी -”मैं ज़्यादा बात करना पसन्द नहीं करती मगर यह समस्या मेरी अपनी नहीं है। ये मेरी परवरिश है जिसने मुझे इस तरह बना दिया है। मगर इसका मतलब ये नहीं है कि मैं लोगों को पसन्द नहीं करती। मुझे लोगों से हमदर्दी है, प्यार भी करती हूँ मैं उनसे।”

मैं बेहद सावधानी पूर्वक उसकी बातों पर गौर कर रही थी।

“लड़कों को ज़रूर शिकायत होगी मुझसे।” उसने अपनी बात जारी रखी- “सच मैं… मैं उनसे ज़्यादा बात करना पसन्द नहीं करती मगर उन्हें पसन्द करती हूँ।” कहते-कहते शिवी ने पलकें झुका ली।

मैंने कल्पना की ओर देखा। एकदम खामोश। चेहरा संवेदनाओं से भर गया था।

“शिवी!” थोड़ी देर की खामोशी के बाद मैंने उसे पुकारा। उसने गहरी नज़रों से मेरी ओर देखा।

“मैं अंदाजा लगा सकती हूँ।” गहरी साँसें भरते हुए मैं बोली- “तुम क्या कहना चाहती हो, मगर हो सकता है में ग़लत हो जाऊँ। क्या तुम मुझे बता पाओगी कि तुम क्या चाहती हो?”

“मैं क्या चाहती हूँ?” उसके होठों पर सिकुड़न आ गयी।

“मैं नहीं जानती, मैं क्या चाहती हूँ? सच! नीलम में नहीं जानती मगर जिस तरह सब मुझसे पेश आते हैं वह तो में बिल्कुल नहीं चाहती।”

“अगर मैं तुम्हें समझ सकती हूँ और ग़लत नहीं हूँ तो तुम्हारा मतलब लड़कों से है… है ना?”

“शायद हाँ।”

“तुम चाहती हो तुम्हे भी कोई प्यार करे…?”

“नहीं नीलम। मैं इतनी बड़ी उम्मीदें किसी से नहीं कर सकती। अगर उम्मीद करती हूँ तो बस इतनी कि कोई मुझे भी पसन्द करे। प्यार न करे तो कम से कम जरा खयाल करे, तब भी मुझे लगेगा कि मैं खूबसूरत न सही मगर लड़की हूँ किसी को मेरी भी परवाह है, कोई मेरा भी इन्तज़ार करता है।”

“शिवी!” मेरे होठ खुल नहीं पा रहे थे। मैं हैरान थी।

“कभी-कभी अपने नसीब पर हैरानी ज़रूर होती है।” वह सबकुछ उगल देना चाहती थी- “अगर मैं अपनी खूबसूरती को लेकर गलत नहीं हूं तो सोचा करती हूं कि आखिर आज तक किसी लड़के ने मुझे प्यार क्यों नहीं किया। क्यों किसी की तृष्णा भरी नज़रें मेरे बदन से नहीं टकराई और अगर टकरायी तो मैं महसूस क्यों नहीं कर पाती।”

“शिवी!” मेरे धैर्य का बाँध टूट गया- “तुम जानती हो तुम क्या कह रही हो?”

“हॉ…बखूबी!” उसने मुस्कुरा कर देखा मेरी ओर- “जानती हो नीलम! मेरी एक दोस्त है कुमकुम, मेरे पड़ोस में रहती है। वह अक्सर अपने प्रेमी के साथ बिताए गये अंतरंग सम्बन्धों के बारे में विस्तार से मुझे बताया करती है, शायद इसलिए कि वह जानती है मैं किसी से बात करना पसन्द नहीं करती, खासकर इन मुद्दों को लेकर तो बिल्कुल नहीं।” उसके चेहरे पर उत्तेजना थी- “तुम यकीन नहीं करोगी नीलम! उस पल पूरी तरह से पागल हो उठती हूँ मैं। मेरे बदन का रोम-रोम उत्तेजना से भर जाता है। लगता है बस अभी कोई आए और मुझे निचोड़कर रख दे।

काश! वह दौर देर तक चल पाता। घन्टी बजते ही हमें वहाँ से जाना पड़ा। कक्षाएं शुरु होने वाली थी।

Xxx

शिवी ने मुझे लंच पर जो कुछ बताया वो मेरी कई ग़लतफहमियों को दूर करने के लिए काफी था। मैं लड़कियों के बारे में काफी कुछ समझने लग गयी थी।

मैंने सड़क पर शिवी की तरह घूमती हुई लड़कियों को अब नये अंदाज़ में देखना शुरु कर दिया। हद ये थी कि मैं अपनी परिभाषा को भी नये अंदाज़ में परिभाषित करने लगी थी।

उस दिन मेरा पहला पेपर था। सुबह जल्दी-जल्दी उठी, तैयार हुई और स्कूल के लिए निकल पड़ी। सारे रास्ते में अपनी धड़कनों को थामती रही।

कारण- एक साथ तीन ऐसे शख्स से मिलना था जिनसे या तो मैं नहीं मिलना चाहती थी या फिर वो मुझसे।

अंकुर ने मुझे मिलने लायक नहीं छोड़ा था। उसने मेरे जज़बातों की होली खेली थी। मैंने रागिनी को उस लायक नहीं छोड़ा उसके जज़बातों से दीवाली मनाई थी और पेपर अब मेरे इज्ज़त से खेलने वाले थे, पापा की अपेक्षाओं की उपेक्षा करने वाले थे।

मैंने जैसे ही विद्यालय के मुख्य द्वार को पार किया अंकुर सामने आ गया। धड़कनों ने तहलका मचा दिया। जैसे तैसे मैंने उनसे समझौता किया और आगे बढ़ गयी।

पेपर शुरू होने के पहले घण्टे में मैंने पेपर के सवालों को उतना नहीं देखा जितना कि रागिनी की खाली पड़ी सीट को देखती रही। मुझे हैरानी थी कि वह परीक्षा कैसे छोड़ सकती है। काश! मैं ग़लत होती। घर लौटी तो मां ने मुस्कुराकर पूँछा- “पेपर कैसा हुआ है?” मैं बगैर किसी उत्तर के फोन की ओर बढ़ गयी। घण्टी जा रही थी मगर फोन किसी ने नहीं उठाया।

‘इंसान वो है जो असफलताओं से हार नहीं मानता।’ पापा अक्सर कहा करते थे। उस वक्त मैं इंसान बनना चाहती थी… वहादुर इंसान । मैं लगातार नम्बर डायल करती रही।

“हैलो!” आखिर फोन उठाना पड़ा। आवाज पुरुष की थी। रागिनी के पापा की आवाज को में पहचानती थी।

“कौन है उधर?” मैंने पूँछा- “मुझे रागिनी से बात करनी है।”

“वह घर पर नहीं है। देर तक रटा रटाया वाक्य वह शख्स दोहराता रहा। मुझे यकीन हो गया कि वह बुद्धिमान तो बिल्कुल नहीं है और न ही वादकुशल। “कहीं गयी है?” इस सवाल पर कई झटके खाए उसने। कई बार हकलाया भी। बाजार, गाँव, बाहर, पापा के साथ… और न जाने एक सवाल के कितने उत्तर दे डाले उसने। मैं अपना अंदाज़ बदलती उसका उत्तर बदल जाता।

“फोन रागिनी को दो।” मैंने डॉट कर कहा। वह सहम गया। भर्राई आवाज में बोला- “अ… आप कौन?”

“तुम कौन हो?” “मैं… मैं काम करता हूँ यहाँ?”

“क्या काम करते हो?”

“सबकुछ।”

“ओह तो रागिनी के पापा का आफ़िस भी सम्भालते हो?”

“हाँ।”

“तुम्हारा मतलब तुम कम्प्यूटर चलाना भी जानते हो?”

“नहीं… मैं आफिस की सफ़ाई पर ध्यान देता है।” वह घबरा गया था। मैं हँसी रोक न पायी। मुझे फोन काटना पड़ा।

मेरा सवाल अभी बाकी था मैंने पुन नम्बर डायल कर दिया।

“हैलो!” फोन उसी ने उठाया। मैंने इस बार बिल्कुल लापरवाही नहीं की। तीखे अंदाज़ में बोली- “फोन रागिनी को दो, समझे तुम।”

“म… मेम साहब!” उसकी डरी हुई आवाज सुनाई दी मुझे।

“हैलो!” फोन पर रागिनी को आना पड़ा।

“हेलो रागिनी…. रागिनी प्लीज फोन मत काटना।”

“आप कौन?” उलझे हुए अंदाज़ में पूँछा उसने।

“मैं… मैं नीलम हूँ। तुम…?”

“नीलम ओह…। शायद आपने ग़लत नम्बर डायल कर रखा है।” उसने फोन काट दिया। मैं देर तक रिसीवर को हाँथ में थामे हुए देखती रही उसे। मैं आवाज़ पहचानती थी- सौ फीसदी रागिनी थी वो। “काश! मैं शेखर से इतनी घृणा न करती। तब मुझे परवाह भी नहीं होती रागिनी की। मेरी आँखें बोझिल हो गयीं। पानी की चंद बूंद गालों तक उतर आयीं। में एक गुनाहगार के रूप में आईन के सामने बैठी इंसाफ़ मांगती रही।

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वह खूबसूरत शाम थी। पार्क में लगी लगभग सारी लाइटें जल उठी थी। हम दोनों फव्वारे के पास लगी बेंच पर बैठे हुए थे। रागिनी की नजरें फव्वारे के उड़ते रंगीन पानी पर टिकी थी। मैं व्याकुल थी।

काश! मेरे चारों ओर कोई परदा गिर जाए। मैं किसी के नज़रों में न आऊँ। मगर ऐसा नहीं हुआ। सामने की बेंच पर बैठे वे लड़के हम दोनों को पूरे जा रहे थे। मैं चाहकर भी अपनी नजरें फव्वारे पर नहीं टिका पा रही थी। लड़कों की नज़रों की हरकतें मुझे विवश कर देती अपनी ओर देखने के लिए। मैंने रागिनी को कोहिनी मारी।

 “क्या है?” उसकी नजरे फव्वारे से नहीं हटी। मैं भी ठीक से कुछ कह न पायी। कुछ देर और मेरी धड़कनें उबलती रहीं। मैंने आख़िरकार कोहनी फिर मारा। “क्या है यार!” रागिनी तेजी से पलटी मेरी ओर- “तुम्हे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है? देखो, फव्वारे की ओर देखो…। इसकी खूबसूरती देखो…। जी करता है क़यामत तक देखती रहूँ इसे।”

“रागिनी!” मैंने अपनी आँखें नचाई- “उधर देखो!”

“किधर!” रागिनी की नजरें उधर गयी मगर ठहरी नहीं।”

“उन लड़कों को देखो।”

“उन्हें!” वह हँस कर बोली- “फब्बारे को देख रहे हैं।”

“फब्बारे को नहीं वो हमें घूर रहे हैं, समझी तुम!”

“सच!” उसने अपना मुँह फाड़ा- “मुझे नहीं पता था कि हम फब्बारे से भी खूबसूरत है।”

“रागिनी!” मैं होठ भींचते हुए चिल्लाई।

“जरा मेरी ओर देखकर बताओ तो, क्या सच में में इतनी खूबसूरत दिखती हूँ।” रागिनी इठला पड़ी। उसके स्वर में शरारत थी।

“रागिनी! मैं परेशान हो रही हूँ और तुम हो कि हर बात को मजाक में ले बैठती हो।”

वह थोड़ी देर तक मुझे एक टक देखती रही। चेहरों को पढ़ने में महारथ हासिल थी उसे। उसने खड़े होते हुए कहा- “उठो!”

“क्यों?”

“उठो तो!”

मैं उठकर खड़ी हो गयी। उसने मेरा हाँथ पकड़ा और खींचते हुए ले गयी लड़कों के बेंच तक।

“बैठो!” उसने कहा।

“कहाँ?” मैने नज़रों ही नजरों में सवाल किया उससे।

“अरे यहीं बेंच पर और कहाँ।”

मैं खड़ी देखती रह गयी उसे।

“क्यों जगह नहीं है क्या?” उस दौरान उन लड़कों के बिगड़े हुए चेहरे को देखा मैंने। उनके रंग उड़े हुए थे।

“एक्यूज मी।” उसने एक लड़के की ओर देखते हुए बोली- “जरा आप उधर खिसकेंगे।”

वह लड़का चंद पलों तक उसकी ओर हैरानी से देखता रहा फिर पलटते हुए अपने दोस्तों से खिसकने के लिए कहा।

जगह मिलते ही टपाक से रागिनी बैठ गयी। “अब तो बैठ जाओ।” बेंच के किनारे की ओर जगह देते हुए उसने कहा।

मैं बैठ गयी। मेरे सूखे होठों में कहीं न कहीं घबराहट छिपी रही।

“नीलम!” उसने पुकारा- “तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ से देखने पर फव्वारे की खूबसूरती और निखर गयी है।

मैं चुप रही।

“जानती हो यह फव्वारा इतना खूबसूरत क्यों दिख रहा है?”

“क्यों?”

“क्योंकि…।” वह अपना जवाब अधूरा छोड़कर जोर से खिलखिला पड़ी।

मैं हैरान हो उठी उसकी इस अदा पर। जी चाहा झुक कर सलाम करूँ उसे। न जाने उस हॅसी में ऐसा क्या हुआ कि लड़के उठकर ऐसे चल पड़े जैसे उनके पीछे सॉप छोड़ दिया गया हो।

मेरी आँखों में ऑसू तैर पड़े। काश! वर्षों पुराना गुजरा हुआ वह वक्त एक बार फिर आता। मैंने अपनी आँखें खोली आईने की ओर गौर से देखा। लगा दुनिया की सबसे कमजोर लड़की हूँ मैं और रागिनी सबसे बहादुर।

“नीलम!” मां ने पुकारा।

“क्या है?” मैं उधर दौड़ गयी।

“खाना खा लो, कल तुम्हारा अगला पेपर है। पढ़ाई भी तो करनी है।”-

मैं रसोई की ओर बढ़ गयी।

XXX

मैं ठीक से अंदाजा नहीं लगा पा रही थी। एक लम्बा वक्त गुज़र गया था रागिनी से मिले हुए और अंकुर से भी….। एक का साथ मिला तो इस कदर कि चरम पर आकर बिखरने लगा और दूसरे का… अभी शुरुआत भी नहीं हो सका।

मैं अपनी ज़िन्दगी के पुराने पन्ने पलट रही थी। रागिनी तुझे सलाम। अपने आप से उसकी तुलना की। इतने लम्बे वक्त में शायद इतने पल भी न रहे होंगे जितने कि रागिनी के पास एहसास थे, मगर मैं…। मैंने पलके झुका ली।

आईना झूठ नहीं बोलता। आजमाकर देख लिया। जैसे तैसे मैंने पेपर दिया और सीधे शेखर के घर पहुंच गयी।

“किससे मिलना है?” गेट कीपर ने पूँछा मुझसे।

“घर में कौन-कौन है?” मेरा सवाल था।

“आपको मिलना किससे है? क्या आपने मेरे सवाल को सुना?” लगभग मेरा मजाक उड़ाने के अंदाज में उसने कहा।

“बहुत बत्तमीज हो तुम।” मैंने पूरी दृढ़ता के साथ झाड़ा उसे- “क्या तुमने मेरे सवाल को सुना?”

वह चंद पलों तक मुझे नीचे से ऊपर तक देखता रहा। मैं उसके उड़े हुए रंग को महसूस कर सकती थी। जी चाहा खुद की पीठ थपथपा लूँ क्योंकि मुझे लग रहा था- मैंने अपनी उम्र के हिसाब से ज्यादा हिम्मत दिखाई थी।

“घर पर कोई नहीं है।” उत्तर दिया उसने।

“क्या तुम्हें यकीन है?”

“जी हाँ सौ फीसदी। आपको पता होना चाहिए कि गेट पर मैं ही बैठता हूँ क्योंकि मेरा दूसरा साथी आजकल बीमार है।”

“अच्छा अच्छा रहने दो, मैं जा रही हूँ।” मैं पलटकर चल पड़ी।

“अजी सुनिए।” उसने आवाज़ दी। मैं पलट कर खड़ी हो गयी- “मैं अपने मालिक से क्या कहूँगा?”

“तुम्हारा मतलब?” मैंने मुँह सिकोड़ा।

“मेरा मतलब आपका नाम क्या है, ताकि मैं आपके आने की सूचना दे सकूँ उन्हें।”

“सूचना देने की ज़रूरत नहीं है। मैं बाद में आऊँगी।” मैंने तेज आवाज़ में कहा।

“ठीक है।” मैंने उसके होठों पर मुस्कुराहट देखी। मुझे यकीन था मैंने कोई हास्य व्यंग्य नहीं सुनाया। मुझे बुरी लगी उसकी मुस्कुराहट। ‘बदतमीज कहीं का!’ मन ही मन फुसफुसाई में। ‘मेरे घर का होता तो अभी पापा से बोल कर बाहर करवा देती।’ मैंने पलटकर देखा उसे वह देर तक मुझे देखता रहा। मैं लौट पड़ी उसकी ओर- “क्या तुम ये कहना चाहते हो कि घर पर एक भी शख्स नही है। मेरा मतलब शेखर भी नहीं है…।” मैं उसके सर पर खड़ी होते हुए बोली।

“आप शेखर साहब से मिलना चाहती है?”

“हाँ!” मेरे बिगड़े चेहरे पर चमक आ गयी- “क्या वह घर पर हैं?”

“हैं तो मगर सो रहे हैं।”

“ओह… तुम वाकई काफ़ी बद्तमीज हो। तुमने देर तक मुझसे बेवज़ह सवाल करते रहे मगर मुद्दे पर नहीं आए। मैं अभी जाकर तुम्हारी शिकायत करती हूँ। शायद तुम जानते नहीं वह मेरा अच्छा दोस्त है।” कहते हुए मैंने तेजी से दरवाज़ा पार करना चाहा तो वह चीख पड़ा।

“नहीं, आप अन्दर नहीं जा सकती।”

“क्यों?” मैंने घूर कर देखा उसकी ओर- “अभी तो तुमने बताया है कि शेखर अन्दर है।”

“जी हाँ मगर आप उनसे नहीं मिल सकती।”

“तो तुम झगड़ना चाहते हो मुझसे?”

“नहीं, ऐसा मेरा इरादा नहीं है। मैं ड्यूटी पर हूँ और साहब का आदेश है कि मैं अजनबी लड़कियों को शेखर से मिलने की अनुमति न दूं। समझी आप।” उसने दृढ़तापूर्वक कहा।

“तब तुम मुझे क्यों रोक रहे हो। मैं अजनबी नहीं हूँ शेखर मुझे जानता है।”

“मगर में नहीं जानता।”

“ओह… तो तुम्हें ये नौकरी पसन्द नहीं है। तुम्हें पता नहीं है कि मैंने अगर तुम्हारी इस बदसलूकी के लिए शेखर से शिकायत कर दी तो वह तुम्हारा क्या हाल करेगा?”

“मुझे परवाह नहीं। ये मेरी ड्यूटी है और मैं अपनी ड्यूटी से समझौता नहीं करता। आप लौट सकती हैं।”

मैं खड़ी बेबस उसे देखती रही। मेरी दुआ हकीक़त बन पाती तब ज़रूर मैं उस छोटी-सी इमारत को ढहने की दुआ करती जिसके नीचे वह बैठा हुआ मुझे घूर रहा था।

“मैं तुम्हारा फोन इस्तेमाल कर सकती हूँ?” मैं अपने गुस्से को नियंत्रित करते हुए बोली।

“नहीं, पब्लिक बूथ बाहर है।” उसने अपनी बदसलूकी नहीं छोड़ी।

हारकर मुझे वहाँ से लौटना पड़ा। मेरे अरमानों की चिता मेरे सामने ही जल कर खाक हो गयी। मैं आग में जलती हुई आगे बढ़ती रही।

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“अभी तक कहाँ थी। पेपर तो दो घण्टे पहले तक ही था।” घर में घुसते ही मां ने लगभग डाटने के अंदाज़ में पूँछा।

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं सीधे कमरे की ओर चली गयी। मां ने पीछा नहीं छोड़ा, बोली -”मैंने तुमसे कुछ पूँछा है?

मैं ठहर गयी। मां की ओर गहरी नज़रों से मैंने देखा, कहा कुछ नहीं।

“क्या हुआ? ऐसे क्या देख रही हो। मैंने तुमसे कुछ पूँछा है।” मां का मिज़ाज आज बिल्कुल बदला हुआ था- “तुमने सुना नहीं या फिर जवाब नहीं देना चाहती।

“क्या पूँछा है तुमने?” मेरे शब्दों में अदब बिल्कुल नहीं थी।

“अभी तक कहाँ थी तुम?”

“स्कूल से आते-आते देर हो गयी।”

“आते-आते देर हो गयी या फिर कुछ और बात है?”

मैंने गौर से मां की ओर देखा, उसका चेहरा बिफरा हुआ था। वह कुछ भी करने के मूड में थी शायद पीट भी सकती थी।

“मैं रागिनी के साथ…. ।” मैंने अपने वाक्य को अधूरा छोड़ दिया।

“आज के बाद तुम उससे नहीं मिलोगी। समझी तुम।”

“मैं उससे मिलने नहीं गयी थी।”

“मुझे पता है और मैं ऐसा बिल्कुल पसन्द नहीं करूंगी कि तुम उसकी तरह बनने की कोशिश करो।”

“क्या!!” मेरे होठ अन्दर ही अन्दर फड़फड़ा उठे। मैं हैरान थी कि मां सब कुछ जानते हुए अंजान बनने की कोशिश कर रही है या फिर इस अदा से जानने की कोशिश कर रही है।

“चलो अब खाना खा लो।” मां किचेन की ओर चली गयी और मैं बाथरूम की ओर।

“अब मैं और रोटियाँ नहीं लेने वाली।’ मैंने जिद्दी अंदाज़ में कहा।

मां ने मुझसे नजरे नहीं मिलाई- “मैं जानती हूँ तुम्हारी खुराक क्या है। ये रोटी खा लो।” उसने मेरी थाली में रोटी रख दी। मैं चुप रही।

“नीलम! उसने मेरी ओर देखा- “तुम रागिनी को कब से जानती हो?”

“मुझे याद नहीं।” मैंने बात को टालना चाहा।

“क्या 7-8 साल से ज़्यादा।”

“नहीं।”

“मैं 17 साल से जानती हूँ उसे, जब वह पैदा हुई थी।”

मैंने विस्मित नज़रों से मां की ओर देखा। मुझे समझते हुए देर नहीं लगी कि बात दरअसल उतनी छोटी नहीं है जितना कि मैं समझ रही थी।

“रागिनी ने बताया है वह 18 की होने वाली है।” मैंने कहा।

“वह सही कह रही है। मैं 17 साल से भी ज़्यादा वक्त से उसे जानती हूँ।” माँ फ्रिज की ओर पलटती हुई बोली।

“मेरे पानी की गिलास में थोड़ा गर्म पानी मिला देना। मेरा गला ठीक नहीं है।”

“मैंने महसूस किया था। मैंने इरादा भी बना लिया था कि तुम्हे ठण्डा पानी तो हरगिज़ नहीं दूंगी।” वह फ्रिज की ओर से मेरी ओर पलटी- “तुम्हे नहीं लगता कि मां होने की हैसियत से मुझे ये बात पता होनी चाहिए थी।”

मैं मुस्कुरा पड़ी, मगर क्यो? मैं खुद नहीं जानती। हाँ शायद उसके मातृत्व पे।

“मुझे तुम्हारी मुस्कुराहट पसन्द है।” मां ने मुस्कुराते हुए कहा- “तुम हमेशा ऐसे ही मुस्कुराया करो।”

“ध्यान रखूगी आगे से।” मैंने रोटी चबाते हुए कहा- “तुमने खाना खा लिया?”

मां देर तक मुझे देखती रही। शायद हैरान थी मेरे सवाल पर। वह आकर सामने की कुर्सी पर बैठ गयी।

“नीलम!” उसने पुकारा- “रागिनी जब पैदा हुई थी उसकी मां उसकी सूरत नहीं देख पायी। आपरेसन के दौरान ही वह मर गयी थी।”

मैंने रोटी चबाना बन्द कर दिया।

“रागिनी के पापा उसकी मां से बहुत प्यार करते थे, उन्हें काफी दुख हुआ। उनका मानना था रागिनी को नहीं बचना चाहिए था। क्योंकि उसकी वजह से उनकी पत्नी मरी है। बहुतों ने समझाया तो घर ले आए उसे। मगर बेटी नहीं मान पाए कभी।

“रागिनी ने ऐसा बताया है मुझे।”

“अच्छी बात है, दोस्ती भी यही होती है। मां ने मेरे खाली गिलास में पानी डालते हुए बोली- “तुम्हारी नजर में रागिनी कैसी लड़की है?”

“वह मेरी अच्छी दोस्त है। बहादुर भी है।”

“तुम उसकी बहादुरी सावित कर सकती हो?”

“नहीं…”

“मैं कर सकती हूँ, बेशक वह तुम्हारी दोस्त है।”

“कैसे?” मैंने सवाल किया।

“वह अब तक जिन्दा है काफ़ी है उसकी बहादुरी को साबित करने के लिए।” मां उठकर खड़ी हो गयी।

“क्या!!”

“हाँ, दूसरी लड़कियां अब तक मर गयी होती।” मैं मां के अभिप्राय को ठीक से समझ नहीं पायी मगर दौर कुछ ऐसा था कि मैं कोई सवाल भी नहीं कर पायी। मां टेबल के पास खड़ी मेरी ओर देखती रही और मैं प्लेट की ओर। हम देर तक चुप रहे।

“नीलम!” मां बोल पड़ी- “रागिनी जो भी कर रही है वह शायद मेरी और दूसरों की नज़रों में ठीक नहीं है मगर उसके पास इसके अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है।”

“मां!” मेरी फटी नजरे तेजी से मां के चेहरे की ओर दौड़ लगाई।

“ओह… तो तुमने रोटी खत्म कर ली।” मां की नजरें मेरी प्लेट की ओर गयी तो वह मुस्कुरा पड़ी- “अच्छी बात है। और हाँ एक बात और, तुमने आज पहली बार मुझसे ये पूँछा है कि मैंने खाना खाया या नहीं, सुनकर काफी अच्छा लगा, मगर नीलम घबराहट भी बहुत होती हैं ऐसे सवाल सुनकर। डर -सा लगता है तुम्हारी बढ़ती उम्र देख कर। मैं चाहती हूँ तुम हमेशा यूं ही बच्ची बनी रहो। जमाने की बदमिज़ाज नज़रों से दूर।

मैं उठकर खड़ी हो गयी- “मैं थक गयी हूँ, अब सोना चाहती हूं। मुझे रात को पढ़ना भी है।”

“ठीक है जाओ।” मां प्लेट उठाने लगी।

“नीलम!” मैं कमरे तक पहुँचती उससे पहले मां की आवाज़ ने मुझे रोक लिया। मैं खड़ी होकर मां की ओर देखने लगी।

“वह लड़का दोस्ती के भी लायक़ नहीं है। मैं उम्मीद करती हूं कि अब दोबारा उसके पास नहीं जाओगी।”

“किसके?” मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गयी!

“तुम जानती हो, में किसकी बात कर रही हूँ!” मां प्लेट लेकर रसोई में घुस गयी। मेरे सामने था बस अथाह सूनापन, उफ़ान भरती उलझनें और मेरी ख़ामोशी।

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ज़िन्दगी और रिश्तों से जुड़ा हुआ एक और रहस्य मेरे सामने नंगा हो चुका था। मैं शर्म से पानी-पानी थी। मैं जान गयी थी कि मां के लिए मैं एक खुली किताब हूँ जिसका हर पन्ना उसके सामने खुला पड़ा है, यह सहुलियत उसकी है कि वह उसे पढ़ती है या नहीं। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कई बार पढ़कर भी न पढ़ने का नाटक करती हो। मैंने जितनी बार अपने आपको देखा, नंगी खड़े हुए देखा, मां के सामने भी और शायद पापा के भी।

अगर मैं जानती थी कि मां रात में पापा के साथ क्या करती होगी तो उसे भी था कि मैं क्या करने वाली हूँ। मैं बेहद हैरान थी कि हम सब जानते हैं कि परदे के पीछे क्या किया जाता है फिर भी न जानने का बेहतर अभिनय करते हैं।

‘रागिनी!’ मेरी आँखों के सामने उसका मासूम चेहरा आ गया। मेरी मां उसे वहादुर लड़की कलती है, क्यों? मैंने कई पहलुओं को नये सिरे से सोचने की कोशिश करती तो बात शखर पर आकर अटक जाती। अगर सच में यही एक कारण हे तो मेरी मां मुझे बहादुर क्यों नहीं बनाना चाहती? मैं खुद से जितने सवाल करती उलझनें उतनी ही गहराती चली जाती।

मैंने घड़ी की ओर देखा। रात के एक बज रहे थे। मेरी आँखों में नींद का एक भी कतरा नहीं था। मैंने फोन उठाया और नम्बर डायल कर दिया। फोन किसी ने उठाया।

“कौन है?” लगभग नींद से भीगी हुई आवाज छुई मेरे कानों को- “क्या तुम्हें नींद नहीं आ रही है?”

“शेखर!” मेरे ज़ुबान से निकल गया।

“देखो मुझे अपना नाम याद नहीं आ रहा है। क्या तुम सुबह बात कर सकती हो?” उसने फोन पटक दिया। मैं कुछ न कह पायी।

अगले दिन में परीक्षा देकर लौट रही थी। एकाएक मेरे सामने एक भारी मोटर साइकिल आ खड़ी हुई। मैं चौक पड़ी।

“तुम मुझसे मिलना चाहती थी।” मुस्कुरा कर देखा उसने मेरी ओर।

मैं न हॅंस पायी न रो पाई। देर तक उसे यूं देखती रही जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हूँ।

“नीलम!” उसने पुनः आवाज दी।

“मैंने तुम्हें फोन किया था, क्या तुम्हें याद है?” अचानक मेरे सामने रात की उसकी वह बेरुखी तैर पड़ी।

“हॉ… थोड़ा-थोड़ा।” उसने सर हिलाया- “मैं यकीन से नहीं कह सकता कि फोन पर तुम थी।”

“मुझे पता है वह सोने का वक्त था।” मैंने अपना गुस्सा जाहिर किया- “मगर शेखर तुम…।”

“तुम उस समय जाग रही थी!”

“हॉ…।”

“क्या तुम हर रोज देर तक जागती हो। मेरा ख़याल है रात के दो या तीन बजे रहे होंगे, है ना!”

“नहीं, तुम ग़लत हो। एक बजा था उस समय मैंने घड़ी देखकर फोन किया था तुम्हें।”

“खैर छोड़ो, मुझे उम्मीद है तुम माफ कर दोगी।”

“अच्छा ये बताओ तुम यहाँ रोड पर किसलिए?”

“नो नो नो… मैं खुद नहीं आया। तुमने बुलाया था इसलिए।”

“शेखर!” मैं चौंक पड़ी- मैंने तुम्हे सच में बुलाया था?”

“मेरा मतलब था तुम मेरे घर गयी थी! क्या तुम्हे मेरा यहाँ आना पसन्द नहीं?”

“ओ हां याद है मुझे! तुम्हारे गेट कीपर ने काफी बद्तमीजी की थी मेरे साथ। क्या उसे तुमने आज भी ड्यूटी पर बुलाया है?”

“क्यों? उसने फटी नज़रों से मेरी ओर देखा।”

“मेरा ख़याल है उसे बदल देना चाहिए। मेरे घर का गेटकीपर इस हद तक बद्तमीज नहीं हो सकता। तुम आकर देख सकते हो।”

“हाँ मुझे सुनकर तकलीफ़ हुई थी, मैंने उसे काफी भद्दी-भद्दी गालियाँ भी दी थी। सच। तुम मेरे पापा से बात कर सकती हो, मैंने उनसे भी इस बारे में बहस की थी।”

“क्या तुम सच बोल रहे हो? अच्छा बताओ तुम अब क्या कहना चाहते हो?” मैंने बात के रूख को मोड़ा।

“मैं क्या कहूं… मुझे लगा तुम कुछ कहना चाहती हो।” वह बाइक से उतर कर खड़ा हो गया।

“ओह… सॉरी, हाँ में मिलना चाहती थी तुमसे।” मैंने अपने बैग को कंधे पर सम्भालते हुए कहा।

शेखर मेरी ओर एकटक देखने लगा। आज मुझे उसकी बदसूरती से ज्यादा शिकायत नही थी।

“कैसे हो तुम?” मैंने पूँछा।

“ठीक हूँ और तुम?” उसके भदे होठ मुस्कुरा पड़े।

“ठीक हूँ।” मैं चुप हो गयी।

“क्या तुम यही जानने के लिए घर गयी थी?” उसने मेरी नज़रों पर झांकते हुए पूँछा।

“नहीं…। मैं रागिनी के बारे में पूँछने गयी थी।” असली मुद्दा मुझे छुपाना पड़ा।

“रागिनी कैसी है?”

“शायद ठीक ही होगी?”

“शायद… तुम्हारा मतलब!”

“मैं काफी दिनों से उससे नहीं मिला।”

“क्या!!” मैं चौंक पड़ी -”तुम सच कह रहे हो?”

“हाँ… तीन-चार महीने हो गये होंगे।”

“तीन-चार महीने!!!” मेरी आँखों पर हैरानी उफान भरने लगी- “मुझे लगता है तुम सही अंदाज़ा नहीं पा रहे हो, है ना।”

“क्यों?”

“मुझे लगता है ये काफ़ी लम्बा वक्त होता है।”

“मुझे पता है मगर हक़ीक़त यही है।” उसने दृढ़ता के साथ कहा।

“तुमने फोन किया है कभी?”

वह चंद पलों तक मेरी ओर देखता रहा फिर सांसे खींचते हुए बोला- “नहीं, मैं लौटते हुए कदमों का पीछा नहीं करता।”

“मैं चलूँ!” मेरी नज़र घड़ी की ओर दौड़ गयी थी।

“बाय!!” उसकी बाइक सड़क पर दौड़ पड़ी।

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रात के करीब 11 बज रहे थे। फोन घन-घना उठा।

“नीलम!” मां के बेडरूम से आवाज आयी- “जरा देखो तो इतनी रात के किसे नींद नहीं आ रही है।”

उसी दिन फोन मेरे कमरे से लगे बरामदे में रखा हुआ था। मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि में उसे उठाऊं। मैं देर तक उसकी कर्कश आवाज़ सुनती रही।

“नीलम!” मां फिर चिल्ला पड़ी।

“जा रही हूँ।” मुझे जाना पड़ा।

“हैलो…!”

“हैलो नीलम!” छूटते ही आवाज़ आयी।

“हां, आप कौन?” मैं आवाज़ पहचान नहीं पायी। मुझे यकीन था इस आवाज़ को मैंने पहले कभी नहीं सुना। चंद पलों तक कोई स्वर नहीं आया मुझ तक।

“क्या आप सुन पा रहे हैं? मैं पूँछ रही हूँ आप कौन हैं?”

“तुम नाराज़ हो मुझसे?” आवाज़ में करुणा थी।

“माफ़ कीजिएगा मैंने पहचाना नहीं।”

“मैं भी नहीं पहचानती खुद को।” स्वर की पीड़ा बढ़ गयी। मेरा अन्तर्मन दब गया उस पीड़ा के नीचे- “क्या तुम अब भी नाराज़ हो?”

“रागिनी!” आवाज़ पहचान चुकी थी मैं- “तुम! तुम ठीक तो हो!” मेरे ऊपर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो।

“हो… शायद।” दबी आवाज़ में कहा उसने- “अब अच्छे बुरे का कोई मतलब नहीं रहा मेरे लिए। सबकुछ एक जैसे ही लगता है।”

“द… देखो, पहेलियां मत बुझाओ मुझे ठीक-ठीक बताओ!” मैं फोन को उठाकर कमरे की ओर चली गयी- “तुम ठीक हो ना।”

“हां अच्छी हूँ।” धीरे से हँसी वह।

“कौन है नीलम!” मां की आवाज़ आयी।

“कोई नहीं…।”

“तुम्हारी मां शायद बुला रही है।”

“नहीं वो बस… खैर तुम बताओ। तुमने एकज़ाम भी छोड़ दिया?”

एकज़ाम!” वह हँस पड़ी- “कोई अर्थ नहीं रहा अब इस शब्द का नीलम।”

रागिनी!”

“हाँ, सच कह रही हूँ।”

“आज, मैं शेखर से मिली थी।”

“कैसा है वह?”

“दिख तो ठीक ही रहा था, हां कुछ….”

“जहाँ तक मुझे याद है तुम्हें उसकी सूरत पसन्द नहीं थी।”

“अब भी नहीं पसन्द है।”

“तुम कुछ भी कह सकती हो उसे। अब में झगड़ा करने वाली नहीं हूँ, समझी तुम।” फोन पर अर्थहीन हँसी बिखर पड़ी।

“वह तुम्हारी तारीफ़ कर रहा था।”

“मजाक उड़ा रही हो मेरा?”

“नहीं, बिल्कुल नहीं।” मैंने तीव्रता से अपने आपको सम्भाला- “अगर तुम्हे ऐसा लगा तो माफ़ी चाहती हूँ।”

“तुम्हे याद नहीं कि दोस्तो से माफी नहीं मांगी जाती।”

“हाँ, याद है। तुम मेरे ही वाक्यों को मुझ पर आजमा रही हो। बोलो क्या मैं झूठ बोल रही हूँ।”

“मैं इन्कार नहीं करती, बेशक ये तुम्हारे ही वाक्य हैं।”

“रागिनी!” मैंने गहरी सांस खीची।

“मुझे लगता है रात काफ़ी हो गयी है, अब फोन रखना चाहिए और हां मैं अपनी उस दिन की बद्तुमीजी के लिए माफ़ी नहीं मांगने वाली, समझी तुम। दिल पर नाराजगी हो तो तुम बेशक मुझ पर अपनी हसरत निकाल सकती हो। बोलो निकालना चाहोगी?”

“तुम मुझसे मिल सकती हो रागिनी?”

“कल सुबह फोन करूंगी।”

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सुबह बार-बार मैं घड़ी की ओर देखती रही। वे तेज़ी से दौड़ती रही मगर रागिनी का फोन नहीं आया। मैं स्कूल चली गयी।

“पेपर कैसा हुआ?” पेपर छूटते ही अंकुर मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी! मैं देर तक अपनी आँखों पर भरोसा न कर पायी।

“मैंने पूँछा पेपर कैसा हुआ?” उसने दोबारा मुस्कुराते हुए पूँछा!

“ठ… ठीक हुआ है और तुम्हारा?” जैसे तैसे उत्तर दे गयी मैं।

“मेरा भी ठीक ही हुआ है। तीसरा सवाल समझ में नहीं आया मुझे। मैंने उसे खाली छोड़ दिया है।”

“हाँ थोड़ा उलझा हुआ सवाल था। मैंने कर लिया है।”

“और पाचवाँ?”

“उत्तर लिखा है मैंने मगर यकीन नहीं है।” मैं अपने पेनबाक्स को सम्भालते हुए बोली।

“पानी पियोगी?”

“नहीं… मैंने पी लिया है।” |

“भीड़ बहुत है नल पर, है ना।”

“हाँ, अभी-अभी पेपर छूटा है न इसलिए।” मैंने उससे नज़रें नहीं मिलाई।

“अच्छा अब में चलूँ।”

“पैदल हो?”

“हाँ, तुम तो शायद अब साइकिल से आते हो!”

“पापा ने अभी कुछ दिन पहले ही नयी साईकिल खरीदा है। मैंने जिद की थी।”

“अच्छी है। मैंने देखा है।”

“तुम सच कह रही हो?” वह खुश होते हुए झुका मेरी ओर।

“मैं चलती हूँ।” मुझे पलटना पड़ा फिर मैं जैसे ही आगे बढ़ी तो लगा जैसे कुछ छोड़कर आ गयी हूँ। मैंने अपने बैग को टटोला, सबकुछ था उसमें, मगर अधूरापन अब भी था। मैंने पीछे घूमकर देखा, अंकुर जा चुका था।

काश! थोड़ी देर और बात कर पाती। अब मैं अपनी बेचैनी को समझ चुकी थी। लेकिन मैं भी क्या करती, कम्बख़्त आया भी कुछ इस तरह। मौका ही नहीं मिला कुछ सोचने समझने का।

“नीलम!” एकाएक पीछे से आवाज आयी। मैंने पलटकर देखा तो  हाँथ पाँव फूल उठे।

“तुम!”

“हॉ… तुम्हे एक बात बतानी थी सो यहाँ तक चला आया।”

“क्या यह बात हम फोन पर कर सकते हैं।” मैंने उलझी हुई इस बात को बेहद सुलझे हुए तरीके से कहा- “तुम कहो तो मैं घर पहुंचते ही तुम्हें फोन करूं।”

“हाँ कर सकती हो, मगर तुम चाहो तो यहां भी सुन सकती हो, यकीन करो में ज्यादा वक्त नहीं लूंगा।”

“अच्छा बोलो।” मैं सड़क के किनारे खड़ी होते हुए बोली।

“तुमने कल रागिनी के बारे में पूँछा था न….”

“शेखर…!” मैं धीरे से मुस्कुराई।

“जानती हो, उसने मुझसे रिश्ता क्यों तोड़ा?”

“क्यों?”

“क्या तुम अंदाज़ा लगा सकती हो?”

“हाँ, मगर तुम कहोगे तो बेहतर रहेगा।” मैं उसे निराश नहीं करना चाहती थी। मुझे पता था किसी भी शख्स को अपनी शक्ल को लेकर बुरे शब्दों को सुनने का शौक नहीं होता, खासकर इस हद तक के बदसूरत चेहरे वाले लोगों को। बुरा कहोगे तो बुरा लगेगा मगर अच्छा भी कहोगे तो बुरा ही लगेगा क्योंकि उसे आशंका होती है कि कहीं उनका मजाक तो नहीं उड़ाया जा रहा है।

“मैं तुमसे कुछ भी छुपाना नहीं चाहता तुम जानती हो वह मेरे पास क्यों आया करती थी? मगर अब उसे मेरी जरूरत नहीं रही क्योंकि उसे कोई दूसरा मिल गया।

“कौन?” मैंने हैरानी से देखा उसकी ओर।

“उसके पापा के ऑफिस में काम करता है।”

“क्या!!” मैं चंद पलों तक फटी-फटी नज़रों से उसे देखती रही- “तुम जानते हो, तुम क्या कह रहे हो?”

“हाँ, मगर सच यही है।”

“शेखर!” थोड़ी देर के लिए मेरा बदन पत्थर बन गया।

“नीलम!” उसने बात जारी रखी- “मुझे भी बेहद हैरानी हुई थी इस बात को जान कर। सोचता हूँ- काश यह सच न होता।”

“तुम साबित कर सकते हो? मेरा मतलब तुम कैसे कह सकते हो?”

“मैं कल उसके घर होकर आया हूँ।”

“तुम्हारा मतलब तुम उससे मिलकर आये हो?”

“नहीं, उससे मिलना में कत्तई पसन्द नहीं करूंगा, ख़ासकर इतना कुछ जानने के बाद। मैंने उस आदमी से बात की थी।”

“तो तुम कहना चाहते हो कि उस आदमी ने तुम्हे सबकुछ अपनी जुबान से बता दिया है।”

“ओह माई गाड! लेकिन ये सब कुछ हुआ कैसे? मेरा मतलब है ये सब…?” मेरी जुबान जैसे अकड़ गयी हो- “रागिनी सचमुच तुम एक अलसुलझा रहस्य हो, जिसे कभी सुलझाया नहीं जा सकता।”

“नीलम!” उसकी ओर बढ़ते हुए उसने कहा- “बुरा मत मानना मगर हक़ीक़त यही है। अब तो हर लड़की में मुझे रागिनी की छाया नज़र आने लगी है। फिलहाल मैं चल रहा हूं बाद में फोन करूंगा।”

“शेखर!” मेरे होठ खुले रह गये। काश मैं तुम्हे ग़लत साबित कर पाती।

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वह वेहद खूबसूरत शाम थी। मेरे सारे पेपर हो चुके थे। अब में पूरी तरह आजाद थी। कम से कम दो महीने के लिए।

अगले साल तो बारहवीं की परीक्षा है। एकाएक मेरा माथा ठनक उठा। उफ़! ये पढ़ाई भी… | मैंने अपनी नाक सिकोड़ ली जब देखो मुंह उठाए चली आती है।’

“नीलम!” सहसा मां की आवाज़ सुनाई दी मुझे।

“क्या है?” मैं मां की ओर दौड़ी।

“ये लो तुम्हारे लिए गिफ्ट!” मां ने मुस्कुराते हुए एक किताब मेरी ओर बढ़ाई –”पापा, लेकर आए थे कल, ख़ासकर तुम्हारे लिए।”

“ओह… फिर किताब!” मैंने फटी हुई नज़रों से मां की ओर देखा। “मैंने पापा से कम्प्यूटर के लिए कितनी बार कहा, उसे आज तक नहीं लाए।”

“इसे पढ़ो तो! मुझे यकीन है तुम्हें पसन्द आयेगी।”

मैंने किताब तो थाम लिया “क्या है ये?” मैंने बेरुखी से पूँछा।

“आनन्द का नाम सुना है तुमने?”

“नहीं मैं किसी आनन्द को नहीं जानती।”

“ओह तो तुमने काफ़ी कुछ मिस कर दिया है। अब तो तुम्हें इस किताब को पढ़नी ही चाहिए।”

मैं उसे लेकर अपने कमरे की ओर चली गयी।

“रेड प्लैनेट” किताब का नाम था। मैंने आलमारी में फेंक दिया उसे। मगर दिल न माना, लगा मां ने कहा है तो पढ़ना चाहिए। मैं उसे उठाकर पढ़ने लगी।

“ओह इंसान इस हद तक बदल सकता है। मेरा मन मचल उठा, मैं चाहती थी बस अब आखिरी लाइन पर जाकर दम लूं। मगर ऐसा न हो सका। फोन की घंटी बज उठी। जी चाहा अभी उसे उठाकर फेंक दूं।

“नीलम!” मां ने पुकारा। मुझे फोन उठाना पड़ा।

“आज तो सारी दुनियां तुम्हीं से होगी, है ना।” फोन पर आवाज आयी।

“रागिनी तुम!” मैं बेरुखी से पेश आयी उसके साथ- “काश… तुम थोड़ी देर बाद फोन करती।”

“किसी काम पर व्यस्त हो?”

“पढ़ रही थी।”

“क्या!” वह चौंक पड़ी। मैं उसकी हैरानी को समझ सकती थी। क्योंकि मैं उनमें से थी जो परीक्षा के समय भी कभी किसी से ये न कहा होगा कि अभी वह पढ़ रही हे तो उसको डिस्टर्ब न करें और रागिनी इस बात को अच्छी तरह से जानती थी।

“हां, पढ़ रही थी।” मेरे शब्दों में उसके लिए सम्मान बिल्कुल नहीं था। मगर क्यों? मैं जब इस बात को सोचने की कोशिश करती हूँ तो सवाल गले में फंसकर रह जाता है। कौन जाने वह किताब इतनी दिलचस्प थी जिसे मैं पढ़ रही थी या फिर रागिनी की वह हकीकत इतनी घृणित थी जिसे शेखर ने मुझे बताया था।

“क्या अभी कोई पेपर बाकी है?”

“नहीं, एक किताब हाँथ लग गयी है, क्या तुमने इसे पढ़ा है।” मेरे शब्दों में रुखापन छाया रहा।

“क्या नाम है?”

“रेड प्लैनेट- मुझे यकीन है तुमने न पढ़ा होगा।”

“माई डियर, पढ़ चुकी हूँ मैं।” उसके स्वर में मैंने उत्तेजना महसूस की।

“कैसी है?”

“काफी संवेदनशील किताब है। मुझे यकीन है इसे पढ़ने के बाद, इंसान अपने आपको बाहुबली नहीं कह सकता।”

“सच, रागिनी। काफी अच्छी किताब है!” मैं मुस्कुरा पड़ी। या फिर यूं कहें कि मुझे मुस्कुराना पड़ा।

“अच्छा ये बताओ तुम्हारे पेपर कैसे हुए हैं? उम्मीद है अच्छे हुए होंगे है ना।”

“ख़ाक अच्छे हुए हैं, तुम्हारी तरह होशियार थोड़े ही हूँ।”

“चलो-चलो अब जूते मत मारो। ये बताओ कही दूर जाने का कोई प्रोग्राम बनाया या नहीं।”

“फ़िलहाल तो नहीं।”

“अजी छुट्टियां मिली है तो कहीं न कहीं तो तुम्हें जाना ही चाहिए।” रागिनी खिलखिलाई।

“सबसे पहले तो मैं तुम्हारे पास आना चाहती हूँ, बोलो आ जाऊँ?”

“ओह नीलम! तुमने भी खूब कहा। मुझे नही लगता कि तुम्हे अपनी छुट्टियों को इस तरह बर्बाद करना चाहिए।”

“तो तुम कहना चाहती हो कि मुझे नहीं आना चाहिए।”

“मैंने ऐसा नहीं कहा, समझी तुम ये भी तुम्हारे घर की ही तरह है जब चाहो आ सकती हो।”

“शुक्रिया।”

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दरवाजे खुले हुए थे जैसे वह जानती थी कि मैं हवा की तरह वहाँ पहुँच जाऊँगी। मैं तीथे उसके कमरे में जा पहुंची। वह टी.वी. के सामने बैठी हुई थी।

“तो तुम टी.वी. देख रही हो?” मैंने मुस्कुराकर पूँछा।

“इससे बेहतर साथी और कोई मुझे नहीं समझ आता। इसलिए अपना ज्यादा वक्त इसके साथ ही गुज़ार लिया करती हूँ।”

“पापा ऑफिस में होंगे।”

“हो….।” उसने टी.वी. बन्द कर दिया।

“अरे तुमने टी.वी. क्यों बन्द कर दी?”

वह मेरी ओर देखकर मुस्कुरा पड़ी। “टी.वी. मेरी अच्छी दोस्त है मगर तुमसे अच्छी नहीं।”

“तुम सच कह रही हो? मैं तार-तार हो उठी। पता नही मुझे गर्व हो रहा था, कि मैं उसकी सबसे अच्छी दोस्त हूँ या फिर घुटन कि वह मेरी दोस्त है। मैंने ऐसी मनोदशा पहले कभी महसूस नहीं की थी। जिन्दगी में काफी लोग ऐसे होते हैं जिनके बिना हम खुद को अधूरा महसूस करते हैं, मगर फिर भी उनके साथ मिलकर पूरा होने की इच्छा भी नहीं रखते।

“यकीन दिलाऊं?” “जरूरत नहीं है।” मैंने हँस दिया। “क्या खाना पसन्द करोगी?” फोन उठाते हुए बोली वो।

“कुछ नहीं में खाकर आयी हूँ। बत तुमसे मिलने की तुमन्ना थी, काफ़ी दिन से हमने बक-बक नहीं की न।”

“लगता है आजकल तुम्हें खाने का कम, बात करने का कुछ ज्यादा ही शौक हो गया है।”

“शायद… मगर यकीन से नहीं कह सकती।” उसने अपने पापा के आफिस का नम्बर डायल कर दिया।

“रागिनी।” मैंने घूरते हुए उसकी ओर देखा।

“चुप!” वह मुस्कुरा पड़ी “हेलो!” फोन पर आवाज़ सुनाई दी। उसके पापा थे शायद लाइन पर। “घर पर कुछ नाश्ता नहीं है, जल्दी से कुछ भेज दो।” उसने फोन रख दिया।

“तुमने माना नही न।” हँसते हुए कहा मैंने।

“चुप बैठ, समझी। मुझे पता है तुम्हे क्या पसन्द है।” में थोड़ी देर चुप बैठी रही। उसने भी कुछ नहीं कहा। फिर एकाएक नज़र मिली, दोनों के होंठ मुस्कुरा पड़े।

“और बताओ, क्या कुछ चल रहा है ज़िन्दगी में?” मैंने उसकी जांघ पर साथ मारते हुए पूँछा। हालांकि यह उस पर की गयी मेरे घायल मन की छीटाकशी थी मगर मैंने उसे महसूस नहीं होने दिया, होठों पर मुस्कान सजाए रखी।

“ज़िन्दगी में…।” मजाक उड़ाने के अंदाज़ में हँसते हुए वह खड़ी हो गयी – “अब जिन्दगी ही नहीं रही तो चलेगा क्या? खैर मैं तेरे लिए पानी लेकर आती हूं।”

वह अन्दर चली गयी। मैंने सरसरी निगाहों से कमरे के चारो तरफ नजरे दौड़ाई तो लगा जैसे अभी-अभी तूफान आया रहा है। सबकुछ बिखरा-बिखरा सा।

“क्या देख रही हो?” सहसा रागिनी कमरे में दाखिल हुई।

“कु…कुछ नहीं, वो बस…।” मैं मुस्कुराने की कोशिश करती हुई बोली।

“मम्मी के जाने के बाद, अब इस घर को सजाने वाला कोई नहीं है अब तो यह… । “ पानी का गिलास रखने के लिए वह मेज की तरफ झुकी।

“तुम तो सजा सकती हो?”

“मुझे इन कामों में कोई दिलचस्पी नहीं है।” उसने तिरछी नज़रों से देखा मेरी ओर “मैं खुद को सम्भाल लूँ, इतना काफी है।”

“मेम साहब नाश्ता।” एकाएक कमरे में एक युवक दाखिल हुआ।

“मेज पर रख दो।” रागिनी ने रुखे स्वर में कहा।

वह नाश्ते को टेबल पर सजाने लगा।

“नहीं नहीं इसकी जरूरत नहीं है।” रागिनी टी.वी. के रिमोट को उठाती हुई बोली- “मैं कर लूंगी।”

“और कुछ चाहिए आपको?” वह पलटते हुए बोला।

“नहीं अब तुम जाओ।” रागिनी के स्वर में बेरुखी छायी रही। युवक तेजी से कमरे से निकल गया। मैं बस उसे जाते हुए देखती रही।

“सुनो!” एकाएक रागिनी ने आवाज दिया उसे। अगले ही पल वह युवक सामने खड़ा था। -”उन्होंने कुछ कहा है?”

“कौन?”

“ये नाश्ता किसने भिजवाया है?” रागिनी चिल्ला पड़ी।

“आपके पापा ने।” युवक का चेहरा सहम गया।

“तो फिर ये कौन शब्द कहां से आया तुम्हारे जुबान पर। तुम चाहते हो कि मैं उन्हें…।” सहसा वह रुक गयी- “खैर तुम जाओ, मैं खुद बात कर लूंगी।”

युवक ने कुछ नहीं कहा। पलटते वक्त उसने मेरी तरफ देखा मैं मुस्कुरा पड़ी।

“कैसा है?”

“क…कौन?” रागिनी के अकस्मात इस सवाल पर मैं चौंक पड़ी। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी चोरी पकड़ ली हो।

“बहुत गौर से देख रही थी उसे। इसलिए पूँछ लिया। खैर, अच्छा नहीं लगा तो कोई बात नहीं, वैसे भी उसके साथ तुम्हें कुछ करना थोड़े है…।” रागिनी के होंठो में मुस्कान तैर पड़ी।

“रागिनी!” मैं झेंप गयी।

“मुझे बहुत पसन्द है।” रागिनी बोली।

मैंने कुछ नहीं कहा मगर एकाएक शेखर की सूरत सामने उछल पड़ी। शेखर उन लड़कों में से था जो किसी भी लड़की के उतावलेपन पर ठण्डा पानी डाल दे और वह है कि बुझी हुई चिनगारी पर आग लगा दे। मैं यकीन से तो नहीं कह सकती मगर सोचती जरूर हूँ कि अगर उस वक्त रागिनी मुझे इस बात के लिए जरा भी दबाव डालती कि मैं उसके साथ कमरे में बन्द हो जाऊँ जैसे कि उसने शेखर के साथ अकेले कमरे में जाने को कहा था तो शायद मैं मना न कर पाती। उसके लौटते कदमों को देख कर न जाने क्यों दिल पर दबाव सा पड़ रहा था। मैं चाह रही थी कि काश! रागिनी उसे अभी रुकने के लिए कह दे और वह देर तक मेरे सामने यूं ही बैठा रहे। किसे पता है कि हमारे अन्दरुनी अंगों की प्रतिक्रियाएं कब दिमाग के ईमान की दीवार गिरा दे और मैं वह सब कुछ पा लूं जिसके लिए में तरसती रही।

रागिनी ने टी.वी. ऑन कर दी।

“अच्छा लो, अब नाश्ता करो।” रागिनी सोफे से उठकर प्लेट में नाश्ते को सजाने लगी। मेरी नजरें टी.वी. के परदे पर जम गयी। चित्र चलते फिरते नजर आ रहे थे मगर बिल्कुल भावहीन । मेरा मस्तिष्क किसी उलझन को सुलझाने में व्यस्त था। बीच-बीच में मेरी निगाहें रागिनी के चेहरे को भी छूती रही।

“नीलम!” रागिनी ने आवाज़ दी- “क्या जो मैं सोच रही हूँ, तुम भी वहीं सोच रही हो?”

“क्या?” मेरी नज़रें टी.वी. के परदे से हट गयी।

“यही कि यहाँ धारावाहिक इतना पापुलर क्यों है?”

“कौन-सा?”

“अरे….!” वह हँस पड़ी- “जिसे तुम इतने गौर से देख रही हो।”

“ओह….।” मैंने हँसने का अभिनय किया- “हाँ, बिल्कुल… बिल्कुल यही सोच रही थी।”

“कभी-कभी मुझे हैरानी हुआ करती है, हम दोनों में इतनी भिन्नता होते हुए भी कितनी समानता है, है ना…?” वह नाश्ते की प्लेट को मेरी ओर बढ़ाते हुए बोली -”अक्सर हम दोनों एक ही विषय वस्तु को एक ही तरीके से सोचा करते हैं।”

मैं एकटक उसके बनते बिगड़ते भावों को देखती रही। “तुम्हे ऐसा नहीं लगता?”

“क्या?” पूरी मासूमियत से पूँछा मैंने।

“अरे…।” उसने गौर से मेरे चेहरे की ओर देखा- “तुम यहीं हो ना?”

मैं कुछ नहीं बोली बस आहिस्ता मुस्कुरा पड़ी। मेरी मुस्कुराहट ने जैसे सब कुछ बता दिया हो उसे। उसने मुझे और परेशान नहीं किया। बोली- “नाश्ता करो।”

हम देर तक चुप रहे। मेरी नज़रें टी.वी. पर जा ठहरीं।

“पापा इसे नौकरी से निकालने वाले हैं।” काफ़ी देर बाद रागिनी बोली। मैंने अपनी नज़रें एक बार फिर उसके चेहरे पर टिका दी। उसके स्वर में उदासी थी।

“क्यों?” मैंने उसी भाव में पूँछा। हाँ दिल में तूफ़ान ज़रूर उठ गया था।

“मैं नहीं जानती।”

“तुम्हारे यहाँ कब से काम कर रहा है?”

“यही 4-5 महीने हुए होंगे।”

“क्या यह वही शख्स है जिसने मेरा फोन रिसीव किया था?”

“हां, उस दिन यह घर पर ही था, मेरे पास।”

“तुम्हारे पास मतलब?” मैं प्रश्नवाचक नज़रों से देखी उसकी ओर!

“मेरे पास मतलब…। मैं उस दिन भी घर पर अकेली ही थी।”

“यानी सिर्फ तुम और वो… तुम दोनों अकेले, और एक छत के नीचे!”

“हे नीलम।” उसकी नज़रें तीव्रता से मेरी ओर दौड़ लगाई- “तुम शायद अपने दिमाग में घोड़े-घोड़े दौड़ा रही हो। मेरे अकेले होने का मतलब था कि मैं अकेली थी समझी तुम। और घर पर इतना ज़्यादा काम था कि उसे यहां आना पड़ा।”

मैं रागिनी को एकटक देखती रह गयी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या अर्थ निकालूं उसकी इस सफाई देने के तरीके का। रागिनी मुंह चलाती रही जबकि मुंह पर शायद ही कुछ बचा रहा हो।

“रागिनी।” मैंने पुकारा “हूँ…।” उसने मेरी ओर नहीं देखा। “तुम्हारे फोन आने के दूसरे दिन भी शेखर मुझे मिला था।”

“अच्छा!”

“उसने बताया कि तुम पिछले लगभग चार महीने से उससे नहीं मिली… फोन तक नहीं किया।”

रागिनी की नज़रें घूमी मेरी ओर। चेहरे पर सलवटें उभर आयीं। नज़रों ही नज़रों में काफ़ी कुछ पूँछ डाला उसने, कुछ बताया भी।

“क्या यह सच है?” मैंने सुलझे हुए अंदाज़ में पूँछा।

“हूँ…।” उसने भी छिपाया नहीं। अब मैं क्या कहूँ। मुझे कुछ नहीं सूझा। मैं चुप हो गयी।

“नीलम!” थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद उसे मेरी ओर हल्की-सी हॅसी उछालते हुए बोली- “क्या तुम्हें नहीं लगता है कि मैं अब बड़ी हो गयी हूँ अब मुझे आइसक्रीम की जरूरत नहीं है… तोहफे में तो बिल्कुल नहीं।”

“तो फिर किसकी की जरूरत है?” यह गुस्ताखी भरा सवाल था मेरा। वह हँस पड़ी- “क्या तुम्हें लगता है कि इसे भी बताने की जरूरत है।”

“नहीं… तुम जाने अंजाने में काफी कुछ बता चुकी हो।” शरारती अंदाज में कहा मैंने। उसने बुरा नहीं माना, मेरी ओर देखकर हँस पड़ी।

“रागिनी।” मैंने कहा- “क्या सच में तुम्हारे पापा उसे नौकरी से निकालने वाले है?” अपने दिल के अन्दर उठे तूफ़ान को मैं सम्भाल न पायी।

“क्यों?” उसने घूरा मुझे- “तुम उसे अपने यहाँ रखना चाहती हो क्या?”

“नहीं मेरे कहने का मतलब था कि तुम्हारा ऑफिस कौन सँभालेगा। ऑफिस… उसकी सफ़ाई…?” मेरे शब्दों में तारतम्यता बिल्कुल नहीं थी। मैं हैरान थी, रागिनी के बदमिज़ाज दिमाग़ पर। काश! मेरी भी कुछ प्रतिक्रियाएँ ऐसी हुआ करती जिसे रागिनी कभी भी समझ न पाती।

“नहीं, तुम्हें ग़लत फ़हमी है। वह सफाई नहीं करता। वह हमारे ऑफिस का केयर टेकर है।”

“वही बात हुई, मेरे कहने का मतलब था कि तब कौन…?”

“वही बात नहीं हुई डियर, सफ़ाई करना अलग बात है और सफाई करवाना अलग, समझी तुम। और हाँ रही ऑफिस सम्भालने की बात, तो पापा चाहते हैं कि अब मैं ऑफिस जाया करूं।”

“क्या!!” मैं चौंक पड़ी- “तुम और ऑफिस…।”

“हाँ…!”

“ओह… बधाई हो माई डियर रागिनी।” मैंने खुशी में उसके हथेली को थाम लिया- “तुम्हें तो नौकरी मिल गयी। तभी तो कहूँ कि तुम पढ़ाई क्यों छोड़ रही हो। अच्छा बताओ अब शादी-वादी कब कर रही हो?”

“जल्दी ही।” वह आहिस्ता मुस्कुराई।

“सच! मगर किससे?”

“लड़का देखा हुआ है?”

“ओह तो बात इतनी बढ़ गयी और हमें खबर भी न हुई। खैर झगड़ा मैं तुमसे बाद में करुंगी फ़िलहाल ये बताओ उस लड़के की तस्वीर है कोई तुम्हारे पास?”

“तस्वीर का क्या करोगी?”

“अरे…. अजीब लड़की हो तुम, वे मेरे जीजा जी बनने वाले हैं और तुम…

देखो रागिनी अब मुझसे रहा न जाएगा, तुम जल्दी से उनकी तस्वीर दिखा दो।”

वह थोड़ी देर तक मेरे उतावलेपन को देखती रही फिर आहिस्ता मुस्कुराते हुए बोली- “सोच रही थी बाहर किसे खोजंगी घर पर ही कर लूँ किसी से।”

“घर पर…!” मैं चौंक कर देखी उसकी ओर- “किससे?”

“पापा से।”

“हट!!” मैं चौंक पड़ी -”तुम सच कह रही हो? ओह रागिनी! तुम बहुत बेशर्म हो गयी हो, चलो अब बता भी दो कौन है वह खुशनसीब आदमी, वैसे फोटो तो रखी होगी उसकी, जरा दिखाना तो।”

“हाँ, है न तुम्हारे सामने।”

“मेरे सामने!”

“उधर दीवार पर।”

मैंने तीव्रता से उधर नज़र दौड़ाई। तस्वीर पर नज़र गयी मगर ठहरी नहीं -”रागिनी!” मैं पलटते हुए उसकी ओर घूरी। उसने पलकें झुका ली। मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा। कुछ था जो अब बदल चुका था।

“नीलम।” उसने नज़र नहीं उठाई, भर्राई आवाज में बोली -”मुझे कुछ ज़रूरी काम याद आ गया है तुम अब जाओ मैं तुम्हें बाद में फोन करुंगी।”

मैं उठकर खड़ी हो गयी। उसने झटके से पलकें उठाईं, आँसू की चंद बूंदे उसके गालों को भिगोती हुई फर्स पर टपक पड़ी। एक पल के लिए मेरा बदन बर्फ बन गया।

वह आगे-आगे दरवाज़े तक आई, दरवाज़ा खोला। मेरी हिम्मत न हुई उसकी ओर देखने की। मैं दरवाज़ा पार की, पल भर के लिए ठहरी और फिर तीव्रता से आगे बढ़ गयी। इस दौरान मैंने तेजी से बन्द होते हुए दरवाजों की आवाज़ भी सुनी।

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“सोचती हूँ पापा से शादी कर लूं” रागिनी का यह वाक्य मैं निगल नहीं पा रही थी। क्योंकि वह पागल नहीं थी कि मजाक की हद को भी न समझ पाए। शायद वह मुझे भगाना चाह रही थी? और उसके वो आँसू? लेकिन… उफ़ मैं कुछ सोच नहीं पा रही थी।

घर पहुंचते ही मां सामने खड़ी मिली मगर कुछ बोली नहीं। मैं सीधे कमरे में चली गयी। रात के लगभग ग्यारह बजे मुझे कार की आवाज सुनाई दी। मैं समझ गयी पापा आ चुके हैं। मैं उस दिन पापा को दरवाजे पर खड़ी मिली।

“ओह… आज तो हमारी नीलम अभी तक जाग रही है।” उन्होंने बढ़कर मुझे खुद से चिपटा लिया- “कैसी हो बेटी?”

“अच्छी हूँ।” मैंने मुस्कुरा दिया।

“तुम्हारी परीक्षाएं तो हो गयी न, फिर भी अब तक जाग रही हो! कुछ पढ़ रही थी?”

“हाँ, वो अगली कक्षा की किताबें देख रही थी। बहुत मोटी-मोटी हैं। मुझे तो देखकर ही घबराहट होती है।”

“ओह… कम-ऑन डियर।” पापा मेरे सर पर हाँथ रखते हुए मुस्कुराए- “मुझे पता है तुम उनसे भी मोटी किताबें पढ़ सकती हो। वो तो तुम्हारा भाई है जिसे किताबें जहर-सी लगती हैं। वैसे वह आलसी इंसान है कहां?”

“अपने कमरे में, लेकिन पापा!” मैं झेंपते हुए बोली- “आप मेरे भाई को आलसी मत कहा करो।”

पापा हँस पड़े- “तुम अपने भाई को बहुत प्यार करती हो?”

“हाँ।” मैं आहिस्ता शर्मायी।

“शिवानी, सुना तुमने?” पापा ने मां की ओर देखा- “लड़कियाँ इसीलिए पसन्द है मुझे।”

मां मुस्कुरा पड़ी- “आपके लिए खाना लगा दूं?”

“नहीं मां।” मैं उछलते हुए बोली- “आज तो पापा के लिए खाना मैं लगाऊँगी, आप आराम कीजिए।”

“वाह… लग रहा है तुम बड़ी हो गयी। मेरे सामने खड़ी तो हो, जरा देखें तो…”

पापा दो कदम पीछे हट गये -”ओह… सचमुच तुम काफ़ी बड़ी हो गयी हो।”

“मुझे लगता है कि कोई काम निकलवाने वाली है आपसे।” मम्मी ने हँसते हुए कहा।

“ऐसी बात है क्या?” पापा चौंक कर मेरी ओर देखे, मैं लजा गयी।

“नहीं पापा।”

“चलो-चलो शर्माओ मत। अगर सचमुच कोई फ़रमाइश है तो कर सकती हो हमें तुम्हारा ये अंदाज़ पसन्द आया।” पापा ने मेरे हाँथो को थाम लिया।

“चलूं खाना लगा दूं? मैं हाँथ खींचते हुए बोली।

“ठीक है, मैं फ्रेश होकर आ रहा हूँ।” मैंने मेज पर खाना सजा दिया।

“खाने में क्या-क्या है आज?” कुर्सी पर बैठते हुए पापा ने पूँछा।

“आप जो पसन्द किया करते हैं।” मैंने प्लेट ऊपर उठाते हुए बोली। “ओह…।” पापा ने हँसकर देखा मेरी ओर।

पापा खाना खाने लगे, मैं सामने की कुर्सी पर बैठ कर उसकी ओर देखने लगी। “तुम कुछ कहना चाहती हो?” सहसा पापा पूँछ पड़े।

“न… नहीं।” मैंने मुस्कुरा दिया। पापा खाने में व्यस्त हो गये। मुझसे रहा न गया।

“पापा!” मैंने धीरे से पुकारा उन्हें। वे मेरी ओर अधीरता से देखने लगे। उनका मुंह बन्द था- “आप बता रहे थे कि आपको किसी लड़के की ज़रूरत है?”

“कब?”

“मेरा मतलब… आपको ज़रूरत है क्या?”

“क्यों? तुम्हारे किसी दोस्त को नौकरी की ज़रूरत है?”

“नहीं… नहीं पापा मेरे किसी दोस्त को नहीं, दरअसल बात ये थी कि एक लड़का है बहुत ग़रीब है मेरा मतलब काफ़ी ग़रीब है। उ… उसे नौकरी से निकाल दिया गया है तो… तो मैं चाह रही थी कि…।”

“तो इसमें परेशानी क्या है उसे मेरे ऑफिस भेज दो। मैं देखता हूँ कि वह क्या कर सकता है। मैं उसे कोई न कोई काम दे दूंगा।”

“ओह… थैंक्यू पापा।” मैंने मुस्कुराकर उनकी हथेली को पकड़ लिया- “आप रोटियाँ और लेंगे?”

एक…।

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मैं उस रात बेहद रोमांचित थी। मुझे मेरी मंजिल बिल्कुल पास नज़र आ रही थी। मैं हमेशा रागिनी की किस्मत से जलती रही लेकिन अब बारी रागिनी की थी। मुझे उस वक्त अंकुर का भी खयाल आया था। बहुत इतराता था वह। अब जाए तालाव में डूबे या समुन्दर में मरे मुझे परवाह नहीं। अब तो, वह फोन भी करेगा तब भी बात न करूंगी उससे।

सच कहूँ तो भगवान से भारी शिकायत थी मुझे। काश! वह उसे मेरी ज़रूरत की चीज़ न थमाई होती। वह इतना खूबसूरत नहीं है कि मैं उसके लिए रोती फिरती और वह शेखर उसकी तो सूरत ही इतनी भद्दी है कि देखकर तरप्त आता है फिर भी उसकी कइयों को जरूरत थी।

उस दिन पहली बार मुझे बेचैनी हुई थी- काश! मैं केपड़ि-आगड़े में पैदा हुई होती तब हर पल को… हर एहसास को कितने करीब से देखती और महसूस करती। अंकुर को मुझमें दिलचस्पी नहीं है तो शेखर का सहारा मिलता और अगर उसकी सूरत भद्दी है तो किसी तीसरे का सहारा ले लेती। आख़िर सब कुछ तो खुला है वहां पर। मैं… तुम… वह… वे सब… हर कोई बेपर्द बेपरवाह, बेरोक। तुम अच्छे लगे तो तुम्हें सबकुछ सौंप दिया वह अच्छा लगा तो उसको, फिर घंटे दो-घंटे साथ में वक्त बिताया फिर किसी भीड़ में वह खो गया और किसी भीड़ में हम। न दोबारा उसने मुझे खोजने की ज़रूरत समझी और न तो मैं उसे… क्योंकि मुझे अपने अरमानों को पूरा करने के लिए कोई और मिल गया और उसे कोई और। उसमें भी ख़ास बात यह कि न मैंने कुछ खोया और उसने। न अपनी नज़रों में, न दुनियां की नज़रों में। जो भी हुआ महज़ प्राकृतिक क्रिया और नियम समझ कर भूल गये।  फ्रांस के मेडिटेरियन समुद्र के किनारे स्थित एक प्रकृतिवादी साम्राज्य केपड़िआगड़े’ जहाँ पर रहने वाले लोग खुद को प्रकृतिवादी कहते हैं। वहाँ पर कपड़ा पहनना पूरी तरह से वर्जित है।

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अजीब घुटन थी। मम्मी घर नहीं छोड़ती और मुझे खाली घर की ज़रूरत थी। मैं हर रात किसी नये-नये बहाने को सोचती कल मम्मी को इस बहाने… नहीं, नहीं इससे तो वह समझ जाएगी, उस बहाने… हाँ यह ठीक रहेगा, उन्हें बाज़ार भेज दूंगी और तब किसी न किसी जरूरत को बताकर पापा से उस लड़के को घर भेजने को कहूंगी। सोचते सोचते एकाएक मेरे होठों पर मुस्कान विखर जाती- मैं कितने करीब थी अपनी मंजिल के, बस एक वजह मात्र की दूरी थी। हर सुबह सारी योजनाएं कांच की तरह टूट कर बिखर जातीं। कई बार मुझे आश्चर्य होता पापा इतने सजग कैसे रह सकते हैं। उन्हें हर रोज की खबर होती कि नाश्ते में क्या-क्या है और क्या नहीं। मैं हर रोज फ्रिज को कई बार खोलकर देखती, काश! कोई बेहद महत्वपूर्ण चीज खत्म हो जाए और मम्मी उसे लेने बाजार चली जाए। मैंने कई बार उन्हें बाहर घूमने के फायदे भी बताए मगर हर बार उल्टे वह मुझे पाठ पढ़ाने लग जाती।

“तुम नहीं जानती बाजार में कितनी दकियानूसी है और फिर घर को इस तरह गेट कीपर के सहारे छोड़कर जाना भी तो सरासर बेवकूफी है।”

“मैं हूं न घर पर।” मैं कहती तो झेंप पड़ती- “अरे तू घर पर रहेगी? मैं भला आजकल तेरे बगैर घर से बाहर निकली हूँ। तू दो साल की थी तब से कहीं भी जाती हूँ तुझे साथ लेकर जाती हूँ। तब तू बोल नहीं पाती थी तब भी मैं तुझसे बात करती थी और अब तो तेरे बक-बक के सामने पता ही नहीं चल पाता कि रास्ता कब गुजर गया।”

“भाई क्या कम बक-बक करता है उसे साथ ले लो।”

“उसको…? तू पागल तो नहीं हो गयी है। तुझे लगता है कि उसका भरोसा किया जा सकता है? निकलेगा तो मेरे साथ मगर लौटेगा दोस्तों के साथ। कम्बख़्न कहीं न कहीं कोई न कोई उसे मिल ही जाता है, वह झट पार्टी बदल लेता है। पता नहीं कितने दोस्त बना रखा है इस शहर में। मुझे तो लगता है सारा शहर ही उसका दोस्त है।” इस तरह मां कई बार इतने ठोस सबूत मेरे सामने पेश करती कि मुझे ही अपनी बात वापस लेनी पड़ती।

मैं हैरान थी-कैसे निपटू अपनी इस समस्या से? सामने समन्दर है सात कदम की दूरी है मगर फिर भी रेत पर प्यासी बैठी हूँ। इतने मील की दूरी तय करने के बाद सात कदम नहीं पार कर पा रही हूँ।

एक दिन उकता कर मैंने फोन उठाया और पापा के ऑफिस का नम्बर डायल कर दिया।

“ओह नीलू तुम!” पापा ने चौक कर सांसे भरी -”मैं अभी-अभी तो घर से आया

“हूँ, सब ठीक तो है ना?”

“हाँ, यहाँ सब ठीक है मगर आपसे एक शिकायत है, बोलूँ?”

“ये तो तुम्हारा हक है… बोलो?” उनके शब्दों से प्यार छलक पड़ा।

“पापा, छुट्टियां समाप्त होने को हैं और आप हैं कि इस बार एक बार भी सिनेमा नहीं लेकर गये हमें। आज तो आपको चलना ही पड़ेगा।”

“लेकिन…।”

“मैं कुछ नहीं जानती। आप कैसे भी करो मगर आज आपको चलना ही होगा। बोलिए चलेंगे…? मैंने जिद्दी अंदाज़ में कहा।

“तुमने पहली बार सिनेमा के लिए ज़िद की है तो मैं कैसे टाल सकता हूँ।” “ओह … पापा थैंक्यू। आप कितने अच्छे हैं।”

“नहीं, इतनी तारीफ़ की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हमारी नीलू हमसे भी अच्छी है।” उन्होंने फोन रख दिया।

पापा के आने का वक्त हो रहा था मैं दौड़ती हुई बाथरूम में घुस गयी।

“क्या हुआ नीलम?” मां की निगाहें मुझ पर पड़ी तो वह बेतहाशा मेरे पीछे दौड़ी।

“कु…कुछ नहीं, वो जरा मिचली आ रही है।”

“ओह… मैं तो डर ही गयी थी तुम्हारी हालत देखकर, वैसे तुमने कल तो कुछ खाया नहीं था फिर…?”

“शिवानी!” एकाएक पापा की आवाज गूंजी। मैंने मम्मी को बाहर जाने को कहा।

“न जाने अचानक नीलम को क्या हुआ वह उल्टियाँ कर रही है?” मम्मी ने मेरी बिगड़ी हालत को और बिगाड़ दिया। पापा बिल्कुल नहीं राजी हो रहे थे सिनेमा के लिए।

उन्होंने तीनों टिकट को फाड़ना चाहा। मैंने उन्हें समझाया कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे आप आराम करने दो और आप दोनों चले जाइये।

पापा देर तक मेरी ओर देखते रहे और मैं उनके हाँथ की अंगुलियों के बीच पिस रहे टिकटों की ओर…।

“पापा आपको मेरी कसम, प्लीज, मम्मी का बहुत मन है अतः आप उन्हें लेकर चले जाइए। में ठीक हूँ और में अपना ख़याल भी रख सकती हूँ।”

पापा को मेरी मासूमियत के सामने हारना पड़ा।

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उनके घर से निकलते ही मैं सीधी फ्रिज के पास पहुंची दूध निकाला और फर्स पर गिरा दिया। अब दूध मेरे घर पर नहीं रहा और मुझे चाय पीनी है… तो?

मैंने पापा के ऑफिस फोन लगा दिया खुराना अंकल फोन पर थे।

“अरे नीलम बेटी तुम!” वे चौक पड़े- “बोलो बेटा क्या काम है?”

“अंकल घर पर जो दूध था फर्स पर गिर गया है क्या आप किसी तरह यहां दूध भिजवा सकते हैं?” मैंने बिगड़ी हुई आवाज़ में कहा।

“फर्श पर गिर गया मगर कैसे?”

“मैं नहीं जानती कैसे? बस गिर गया और आप दूध भेजवा दीजिए प्लीज।”

लेकिन ऑफिस में तो कोई नहीं है।”

“आपका मतलब आप ऑफिस में अकेले हैं?”

“नहीं मेरा मतलब यह नहीं है। ऑफिस में तमाम लोग हैं मगर सब व्यस्त हैं, मेरे कहने का मतलब था चपरासी कोई नहीं है।”

“मैं कुछ नहीं जानती, मेरी तबियत ठीक नहीं है, आपको कुछ न कुछ तो करना होगा, वैसे जो ऑफिस में नया लड़का आया है उसे ही भेज दीजिए। क्या वह भी खाली नहीं है?”

“वह तो खाली है मगर…।”

“उसी को भेज दो बस। मगर जल्दी, प्लीज।”

“अच्छा, अच्छा तुम परेशान मत हो, मैं कुछ करता हूँ।”

“मैं इन्तज़ार कर रही हूँ।” मैंने फोन रख दिया।

मैं दौड़ती हुई अपने कमरे में पहुंची, आईने के सामने खड़ी हुई और मुस्करा पड़ी। फिर अचानक याद आया कि हमारे उन हसीन पलों को कोई और क्यों देखे। मैं बिस्तर पर कुछ खोजने लगी, मिला कुछ नहीं। मैं बाहर निकली तौलिया तार पर सूखने के लिए टंगा हुआ था मैंने उसे निकाला और जाकर आईने के ऊपर डाल दिया।

“सॉरी डियर।” मैंने मुस्कुरा कर उसकी ओर देखा- “तुम्हें आज इज़ाज़त नहीं मिलेगी मेरे नंगे बदन को देखने के लिए।”

मैं विस्तर सँवारने लगी, अपने कपड़ों को भी बदला। नये कपड़े काफी दरियादिल थे मैंने बदन के काफी हिस्सों को छोड़ दिया खुला दिखने के लिए। मैंने हैरानी से अपनी आधी खुली छातियों की ओर देखा। काफी बड़ी हो गयी थी। मैं सोफे पर बैठ गयी। वक्त आहिस्ता-आहिस्ता रेंगता रहा। पापा ने मां के साथ क्या-क्या किया था? धूमिल-धूमिल-सी तस्वीर मेरे आँखों के सामने से गुजर रही थी। मैं क्या करने वाली हूँ इस बारे में काफी अनिश्चितता थी। यह ठीक रहेगा नहीं, नहीं एकाएक ऐसा ठीक नहीं रहेगा। तब ऐसा तो ठीक ही रहेगा। तमाम विचार हवा की तरह मस्तिष्क में दौड़ रहे थे।

“बेटी नीलम!” सहसा कोई स्वर मेरे कानों को छुआ। मैं उठकर बाहर की ओर दोड़ना चाही मगर मस्तिष्क वक्त पर जाग उठा। मेरे बदन पर पड़े कपड़े काफी नहीं है बाहर जाने के लिए।

“नीलम!” दोबारा आवाज़ आयी।

“हां आ रही हूँ।” मेरे स्वर का कम्पन्न तीव्र था- कुछ डर, कुछ संदेह और कुछ असहजता का मिला जुला रूप। मैंने तीव्रता से आईने के ऊपर पड़े तौलिये को खींचा बदन पर डाला और बाहर की ओर दौड़ पड़ी।

खनखन मैंने आवाज सुनी। शायद आईना टूट चुका था।

“अरे अंकल आप!” मैं खुराना अंकल के सामने खड़ी गयी। आँखों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था।

“हाँ बेटी। दरअसल उस लड़के को घर नहीं पता था इसलिए मुझे आना पड़ा। खैर लो थामो दूध।”

मैं मूर्ति बनी एकटक देखती रही उनकी ओर।

“क्या हुआ बेटी?” वे एकदम आगे बढ़कर मेरी ओर हाँथ बढ़ाए- “क्या तुम्हें ठण्ड लग रही है?”

मैंने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने मेरे माथे को छुआ।

“माथा तो ठण्डा है… खेर ये बताओ तुम खुद चाय बना सकती हो या फिर मैं बना दूं। तुम्हे पता है नीलू! अपनी पढ़ाई के समय जब मैं इस शहर में अकेला आया था तो खाना खुद ही बनाया करता था।”

मैं उनकी ओर बस देखती रही। मेरे होंठ एक दूसरे में चिपक गए थे।

“नीलम!” उन्होंने आहिस्ता से धक्का दिया मुझे। मैं जैसे नींद से जाग उठी होऊ।

“अ.अंकल!”

“क्या हुआ तुम्हें?”

“कु… कछ नहीं लाइए दूध में ले लेती हूँ।”

“मुझे लगता है कि तुम्हारी…?”

“नहीं, नहीं अंकल में बिल्कुल ठीक हूँ। आप… आप जाइए, ऑफिस में ढेर सारा काम होगा।”

“हाँ वो तो है मगर… अच्छा बताओ तुम्हें कुछ और चाहिए?”

“न… नहीं, बस दूध की जरूरत थी।”

“ठीक है तो मैं जा रहा हूँ। वैसे मैं उस लड़के को साथ लेकर आया था सोचा था कि शायद कुछ और काम हो तो कर देगा और साथ ही साथ घर भी देख लेगा।”

“क… कौन लड़का?”

“अभी नया आया है हमारे ऑफिस में।”

“कहाँ है?”

“बाहर खड़ा है कार के पास।”

“ब… बाहर।”

“नीलम! मुझे लगता है कि…”

“हॉ… हॉ… अंकल मुझे कुछ बिस्किट भी चाहिए था, सॉरी मुझे बताने के लिए याद नहीं रहा। आप उससे कह दो कि वह ले आए।”

“बस बिस्कुट!”

“हां…।”

“याद कर लो और तो कुछ नहीं चाहिए।”

“नहीं।”

“तो फिर वह बगल की दुकान पर ही मिल जाएगा मैं खुद लाए देता हूँ।”

“अरे अंकल आप… आप क्यों तकलीफ़ कर रहे हैं?”

“इसमें कौन-सी तकलीफ़ की बात है। तुम्हें पता है तुम्हारे पापा ऑफिस के बाहर मेरे अच्छे दोस्त हैं। तुम तो मेरी बेटी की तरह हो और बेटी की देखरेख…।”

“लेकिन अंकल!”

उन्होंने कुछ नहीं सुना। बस बाहर निकल गये। मैं लाचार बनी उन्हें जाते हुए बस देखती रही। मेरे सपनों का महल मेरी ही आँखों के सामने ढह गया और मैं कुछ न कर पायी।

“खूसट कहीं का…।” जी में आ रहा था खुराना अंकल को और भी गालियां दूं ।

मैं दौड़ती हुई छत पर गयी। दरवाज़े की तरफ देखा। वह लड़का कार पर टेक लगाए हुए खड़ा था।

“लो बेटी बिस्कुट।” बाहर से आवाज़ आयी।

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मैं अपने हारे हुए कदमों से कमरे में दाखिल हुई। मेरा चार फुट का आईना छोटे-छोटे टुकड़ों में तब्दील होकर पूरे फर्श पर बिखर चुका था। मैंने हर टुकड़े को उठाया, सब में अपने रुवांसे चेहरे को देखा। मेरी आँखें आँसुओं से भर गयीं थी।

मुझसे दर्द बर्दास्त नहीं हुआ, मैंने रागिनी को फोन लगा दिया।

 ‘हेलो…हैलो।’ रागिनी चिल्लाती रही, मैं ख़ामोशी के आगोश में समाई रही। मेरे होठ चाहकर भी खुल न पाए। वह एक बार फिर अच्छी दोस्त साबित हुई, उसने पहचान लिया।

“क्या हुआ नीलम?” वह घबराई-सी बोली -”तुम बोलती क्यों नहीं। देखो मैं कॉप रही हूँ, तुम…तुम चुप नहीं रह सकती। तुम मुझे बेवकूफ भी नहीं बना सकती तुम्हें पता है कि मैं पहचान सकती हूं कि फोन पर तुम्हीं हो। तुम्हारी सांसें पहचानती हूँ मैं।”

मैं खुद को रोक न पायी। मैं रो पड़ी।

“तुम रो रही हो?”

“और कर भी क्या सकती हूँ।” मैंने ऊँवांसे स्वर में कहा।

“क्या मैं जान सकती हूँ कि…।”

“रागिनी…।” मैंने उसकी बात बीच में ही काट दी- “मैं तुम्हारी तरह क्यों नहीं बन सकती। मेरी किस्मत तुम्हारी तरह क्यों नहीं हो सकती।”

“लेकिन हुआ क्या? तुम बताती क्यों नहीं हो?” रागिनी की घबराहट बढ़ गयी थी।

“रागिनी क्या तुम जानती हो मैंने उस लड़के को अपने पापा के ऑफिस में नौकरी क्यों दिलाई थी?”

“नहीं।”

“दे… देखो, तुम… तुम बेशर्म बन रही हो। तुम चाहती हो मैं बेशर्मी भरे शब्दों का इस्तेमाल करूं… है न?”

“मैं सचमुच नहीं जानती नीलम! मेरा यक़ीन करो।”

“क्या तुम मुझे बताओगी कि तुमने उसे अपने पापा के ऑफिस में क्यों रखवाया था?” मैंने दृढ़ता के साथ कहा।

“तुम ग़लत सोच रही हो नीलम! मैंने कोई सिफ़ारिश नहीं की थी उसके लिए। पापा खुद कही से ढूढ़ कर लाए थे उसे।”

“लेकिन तुमने उसके साथ….। खैर छोड़ो में इतनी बेशर्म नहीं बनने वाली, क्योंकि तुम्हें पता है कि तुमने उसके साथ क्या-क्या किया है।” मेरे स्वर का कम्पन्न तीव्र हो गया। मेरी आँखें सूख गयीं।

“मैंने उसके साथ नहीं बल्कि उसने मेरे साथ किया है समझी तुम।” उसके स्वर में एकाएक उत्तेजना भर गयी।

“तुम मज़ाक कर रही हो?”

“क्यों?”

“क्योंकि दोनों एक ही बात है, तुम उसके साथ करो या फिर वह तुम्हारे साथ। किया तो तुम दोनों ने ही है न?”

वह चुप हो गयी।

“रागिनी।” मैंने पुकारा- “बोलो, क्या मैं ग़लत कह रही हूँ।”

“नहीं,… तुम सच कह रही हो मगर एक बात तुम्हे भी पता होना चाहिए कि यह सब किसी योजना के तहत नहीं हुआ।” रागिनी का स्वर क्षीण हो गया, बोली –”सबकुछ खुद-ब-खुद होता चला गया। क्योंकि वह शायद हम दोनों की जरूरत थी।”

“नहीं, तुम झूठ बोल रही हो रागिनी। वह सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत थी क्योंकि मैं इतना तो जानती हूँ कि उस लड़के जैसे तबके वाले लोगों की यह जरूरत नहीं होती, उन्हें सिर्फ रोटियाँ चाहिए होती हैं और अगर उन्हें यह मिल गया तो उसे वे लोग या तो किस्मत मानते हैं या फिर अपनी नौकरी जो वे हम जैसी तमाम लडकियों के लिए करते हैं।”

“तुम्हारा मतलब वे लोग ये सब नहीं करते?”

“करते हैं मगर शादी के बाद, वो भी बच्चा पैदा करने के मकसद से।” मैं अनियंत्रित होती चली गयी- “और रागिनी मैं काफी कुछ सीख चुकी हूँ।  मैं  जानती हूँ कि शादी से पहले उन्हें न तो इस काम के लिए फुरसत है और न ही इज़ाज़त। उनका समाज इसे आज भी गिरी हुई नज़रों से देखता है।”

“देखो नीलम!” रागिनी ने लम्बी साँसें खींची- “मैं इस बारे में तुमसे कोई बहस नहीं करना चाहती मगर एक दोस्त होने के नाते तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ, बोलो कह सकती हूँ?”

“बोलो!”

“देखो इस बात को में मानती हूँ कि उसके साथ मैंने कई बार यह काम किया है मगर एक ज़रूरतमन्द की तरह। शौक कभी नहीं रहा मुझे।” उसका स्वर रुवंसा हो गया- “शायद सच ये भी है कि शौक रखने का कभी मौका ही नहीं मिला मुझे।”

“क्या तुम मुझे समझा सकती हो कि किस तरह तुम जरूरतमन्द थी जो कि मैं नहीं हूँ।” मैंने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा।

वह थोड़ी देर खामोश रही- “नीलम! फिर उसने कहा- “मुझे लगता है कि हम इस बारे में बात न करें तो अच्छा है।”

“क्यों?”

“मैं चाहती हूँ कि ऐसे राज को मेरी कब्र के साथ ही दफन हो जाने चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो कई रिश्तों से लोगों का भरोसा उठ जाएगा।” उसका स्वर रो पड़ा।

“चलो-चलो बस भी करो अब। इतनी गहरी बातें मत समझाओ मुझे। मुझे तैरना नहीं आता।” मैं लगभग उसका मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में हँसते हुए बोली।

वह चुप हो गयी।

“देखो रागिनी!” मैंने गम्भीर होने का दावा किया- “मैं तुमसे उलझना नहीं चाहती और न ही किसी बात का तुम पर आरोप लगा रही हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि जो तुमने किया है या कर रही हो यह न सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत है बल्कि हम सबकी जरूरत है। फिर किस्मत अकेले तुम्हारे ही साथ क्यों है?”

“नीलम!” उसका गला भर आया- “किस्मत का तो तुम जानो… मुझे यह भी नहीं पता कि यह किस्मत है या बदकिस्मत। मैं बस इतना बताना चाहती हूँ कि मैंने किया जरूर था, मगर अब नहीं कर रही हूँ।”

“ओह, रागिनी…।” एक बार फिर उस पर मेरा गुस्सा फूटा- “अब तुम और कितने झूठ बोलोगी। तुमने शेखर को छोड़कर इसे पकड़ा फिर मैं कैसे मान लूं कि तुम इसे छोड़कर दूसरे का सहारा नहीं लोगी।”

“नीलम!”

“रागिनी।” मेरे स्वर में शालीनता दौड़ पड़ी- “मैं कभी-कभी बहुत हैरान होती हूँ … क्या तुम्हें अपना यह वाक्य याद है? याद करो रागिनी, तुमने… मुझसे कहा था न कि कुछ प्राकृतिक प्रक्रियाएं उतनी सहज क्यों नहीं होती जैसे कि हमें खाने की जरूरत पर खाना मिल जाता है… बोलो रागिनी क्या तुमने ऐसा नहीं कहा था?”

रागिनी चुप हो गयी। मैंने बस उसकी गहरी सांसों की खलबली सुन पायी।

“रागिनी।” मैं चुप होने वाली नहीं थी- “क्या तुम्हारा वह अभिप्राय नहीं था जो अब मैं सोचने लगी हूँ। मुझे बस कुछ पलों की जरूरत है और उसके लिए तुम देख रही हो क्या-क्या करना पड़ रहा है। मैंने सौ झूठ पापा से बोले हैं…ऑफिस फोन किया मगर क्या हुआ, खुराना अंकल दौड़े चले आये। क्या यह मेरी बदकिस्मती नहीं जबकि…” मेरे स्वर की तीव्रता एक बार फिर बढ़ गयी- “जबकि तुम्हें भी पता है मुझे भी पता है कि सभी करते हैं। यहाँ तक कि मेरी मां भी… पापा भी, मेरे पड़ोसी खुराना अंकल सब… हर कोई…।”

“नीलम…..नीलम….।” रागिनी चिल्ला उठी- “तुम इस समय सही और ग़लत के बीच, अन्तर नहीं महसूस कर पा रही हो। काश! मैं अपने ज़ख़्मों को तुमसे बॉट पाती।”

“रहने दो रागिनी, इसकी ज़रूरत नहीं है। बचपन से तुम्हारे साथ रही हूं। अच्छी तरह समझती हूँ तुम्हें।”

“चलो तब रहने दो। हम बाद में बात करते हैं।” उसने फोन रख दिया।

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मेरा जी नहीं चाह रहा था कि मैं अब कभी रागिनी से बात करूं। अन्दर ही अन्दर में गुस्से में तड़प रही थी। खुशी भी किसी कोने में मचल रही थी शायद इसलिए कि आज एक ऐसी लड़की को मेरी किस्मत पर जलन हो रही है जिसकी किस्मत पर कभी न सिर्फ मैं बल्कि स्कूल की दूसरी तमाम लड़कियां भी जला करती थी। मेरे दोस्तों की लिस्ट में से रागिनी के अलावा शायद ही दूसरी लड़की रही हो जिसे उसके मन चाहे लड़के का सहारा मिला हो।

अचानक मुझे अपने उस हारे हुए दिन की याद आयी तो खुद पर हँस पड़ी खाक। जलन होती होगी किसी को मेरी किस्मत पर। मैं ऐसी बदनसीब लड़कियों में से थी जिसे उसके घर पर काम कर रहे मैले नौकरों तक की हमदर्दी नहीं मिली।

तभी अचानक पता नहीं किधर से एक हवा का झोंका आया और मेरे स्वाभिमान को उड़ा लेकर चला गया। में एकदम नंगी खड़ी थी कोई पानी नहीं बचा था।

मैं रागिनी के घर चली गयी।

मैं गलत नही हूँ इस बात को साबित करने के लिए, मैंने खुद से तर्क किया कि अगर वह फोन नहीं उठाती तो इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम दोस्ती तोड़ दें।

“नीलम तुम!!” सहसा किसी स्वर ने मेरे कानों को छेड़ा मैं चौंक कर पलटी “तुम!”आँखें फटी रह गयी मेरी।

“यहाँ? लेकिन तुम यहाँ क्या कर रही हो?” उसने मुस्कुरा कर कहा।

“मैं तो रागिनी से मिलने आयी थी क्या तुम भी…?”

“तुम्हें यकीन नहीं हो रहा होगा न?”

“हॉ… शायद इसलिए कि तुम्हारा वह वाक्य मेरे कानों पर आज भी रह-रह कर गूंज उठता है।” मैं आहिस्ता से मुस्कुरायी -”अच्छा वाक्य था। काफ़ी पसन्द भी आया था मुझे।”

“जानता हूँ तुम मेरा मज़ाक उड़ा रही हो।”

“शेखर!”

“नीलम…!” वह नज़रें गिराते हुए बोला -”इसमें तुम्हारा क़सूर नहीं है। शायद तुम यकीन कर पाओ कि मैं रागिनी को… खैर जाने दो अब उस बात का कोई मतलब भी नहीं है।”

मुझे उसके उतरे हुए चेहरे पर तरस तो आया मगर रहा भी न गया बिना बोले। मैंने हँसकर कहा -”शेखर! क्या तुम एक बार फिर उस वाक्य को दोहरा सकते हो?”

“नीलम!” उसने कुंठित स्वर में पुकारा तो मैं हँस पड़ी।

“मैं लौटते हुए क़दमों का पीछा नहीं करता…। यही कहा था न तुमने। ओह शेखर सच में काफी अच्छा वाक्य था ये… नाइस… वेरी नाइस ।”

“अब मुझे यकीन हो गया नीलम, तुम मेरा सच में मज़ाक उड़ा रही हो…काश! तुमसे मुलाकात न हुई होती।”

“नहीं शेखर! ऐसी कोई…।”

“बाय नीलम।” उसने कहा और चला गया मगर मेरे क़दमों की थिरकन बढ़ गयी। मेरे सामने एक और सच नंगा हो चुका था। बेहिचक रागिनी के घर में घुस गयी। रागिनी टी.वी. देख रही थी।

“तुम! अचानक!” उसने घूर कर देखा मेरी ओर मगर मेरे होठों की मुस्कान कम नहीं हुई शायद इसलिए कि कहने के लिए काफी बात थी मेरे पास।

“कैसी हो रागिनी?” मैंने बेहाल कर देने वाली मुस्कान उछाली उसकी ओर।

“तुम बताओ?” उसके स्वर में थोड़ी नरमी लौटी।

“क्या में बैठ सकती हूँ” मैंने सोफे की ओर बढ़ते हुए पूँछा।

“मैंने कब मना किया है।”

“फिर भी कहना तो चाहिए था…।

“दोस्तों की इतनी मेहमाननवाज़ी अच्छी नहीं होती। दोस्ती में कमी का एहसास होता है।”

मैं थोड़ी देर उसे देखती रह गयी। वह मुस्करा पड़ी, बोली -”कुछ लोगी?”

“तुम मुझे दोस्त मानती हो इतना काफ़ी है मेरे लिए। हां पानी पिलाना चाहो तो पिला दो वर्ना में खुद लेकर पी सकती हूँ।”

“मैं ला देती हूँ।” वह उठ कर फ्रिज की ओर बढ़ी, पानी की बोतल निकाली, और पलट कर मेरी और बढ़ा दिया । मैं पानी पीने लगी।

“रागिनी!” काफ़ी देर बाद पुकारा मैंने। “हूँ…।” उसकी पलकें ऊपर उठी। “शेखर यहां आया था?” मैंने पूँछा।

“हॉ…।” उसकी फटी नज़रें तीव्रता से दौड़ी मेरे चेहरे की ओर। शायद ही उसे यक़ीन रहा हो कि मैं इतनी शातिर भी हो सकती हूँ।

“तुमने तो कहा था कि मैं शेखर… ।”

“नीलम!” वह चिल्ला पड़ी- “प्लीज…।”

मैं पल भर के लिए कॉप उठी। मगर उस मुद्दे पर ऐसा कुछ था कि मैं देर तक चुप भी न रह पायी।

“शेखर मुझे बाहर मिला था वह कह रहा था कि… ।”

“देखो नीलम!” उसकी आँखों में कठोरता आ गयी- “तुम बिना समझे बूझे, आसमान को सर पर उठाने के लिए तैयार बैठी रहती हो। मैं चाहती हूँ हम अब इस मुद्दे पर बात न करें तो ही अच्छा है।” उसका तमतमाया चेहरा मेरी आँखों के सामने था मगर न जाने क्यों, आज मुझे उस पर न तो तरस आया और न ही प्यार। दिल पर जितनी आग थी सब उगल देना चाहती थी मैं।

“लेकिन मैंने….”

“नीलम!” वह उठकर खड़ी हो गयी- “तुम अब जा सकती हो।”

“रागिनी!” मेरे होठों की मुस्कुराहट उसकी कठोरता के बीच कही गुम हो गयी। अब में सीधे मुद्दे पर आना चाही- “तुम मेरी किस्मत से जलती हो।”

“क्या!” उसकी फटी नज़रें एक बार फिर दौड़ लगाई मेरे बिगड़े चेहरे के ईर्दगिर्द।

“हाँ… तुम मेरी किस्मत से जलती हो क्योंकि वह लड़का जिसके ख़ातिर तुमने शेखर जैसे अमीरजादे लड़के को ठुकरा दिया वह अब मेरे  हाँथ की कठपुतली बन चुका है। उसे अब मैं जब चाहूँगी जैसे चाहूँगी, बुला सकती हूं।” मैं उठकर खड़ी हो गयी- “और हाँ अब मैं जा रही हूँ मगर याद रखना तुम्हारी ज़िन्दगी में न तो शेखर आने वाला है और न हीं वह…। बदन पर ज्यादा गरमी चढ़े न, तो ठण्डे पानी में कूद जाना।” मेरे गुस्से की गर्मी में मेरे शब्दों का नियंत्रण खो गया।

मैं तीव्रता से पलट पड़ी।

“नीलम!” आखिरी स्वर सुना था मैंने- “तुम्हें इस रास्ते को छोड़ देना चाहिए।”

मैं घर लौटी तो जैसे नसीब मेरे इन्तज़ार में था। पूरा घर खाली था। मैं पलट कर दरवाजे की ओर आयी। गेट कीपर अदब में खड़ा हो गया -”सब लोग कहाँ गये हैं क्या तुम्हे पता है?” मैंने पूँछा।

“खुराना साहब के लड़के का एक्सीडेंट हो गया है, उसी को देखने अस्पताल गये हैं।”

“खुराना अंकल के…?” मैंने घूरते हुए देखी उसकी ओर।

“जी।”

मैं पलट कर भागी अन्दर की ओर जी चाहा सारा आसमान-सर पर उठा लूं और जोर-जोर से नाचूं।

“किसी के अरमानों पर आग लगा कर आप कैसे खुश रह सकते हैं खुराना अंकल!” मैंने आसमान की ओर देखते हुए सलाम किया ऊपर वाले को- “तू बहुत नेक है भगवान, तेरा लाख-लाख शुक्रिया।”

मैं दौड़ती हुई फोन के पास पहुंची “हेलो पापा, कहाँ हैं आप?”

“ओह…सॉरी बेटा, दरअसल तुम थी नहीं और अचानक खबर मिली कि खुराना जी के बेटे का एक्सीडेंट हो गया तो सबकुछ छोड़कर उसी हालत में अस्पताल भागना पड़ा।”

“कब तक आप आएगें? मैं मिस कर रही हूँ आप लोगों को।”

“वी ऑर आलसो मिसिंग यू डियर बट सॉरी, यहाँ पर काफी समय लग जायेगा, लड़का काफी सीरियस कण्डीसन में है। मुझे पता है तुम बहादुर लड़की है खुद को सम्भाल सकती हो।”

“यस पापा!”

“बेटा, घर पर अभी खाना नहीं बन पाया था इसलिए मैं अभी फोन किए देता हूँ कोई न कोई तुम्हें खाना पहुँचा देगा।”

“थैंक्स पापा बट, मुझे लग रहा है, आफिस का डिस्टर्ब होगा। आप रहने दीजिएगा, आज के दिन में कुछ भी खा लूंगी।” मेरे शब्द-शब्द में फ़रेब था।

“ओ कमान बेबी! पागलों की तरह बात मत करो।” पापा का पितृत्व तड़प उठा, बोले -”भला तुमसे महत्वपूर्ण कभी ऑफिस का काम हो सकता है। मैं अभी किसी न किसी को तुम्हारे पास भेजता हूँ।”

“ठीक है पापा में इन्तज़ार करूंगी। वैसे आप उस नये लड़के को भेज दीजिएगा वह अभी उतना काम भी न करता होगा। आई थिंक हमारा नुकसान कम होगा।”

“ओह लव यू डियर। लगता है तुम काफ़ी केयर करती हो अपने पापा के बिजनेस का।” हालांकि सच कहूँ तो मुझे पापा पर तरस आया था। काश, वे इतने भोले न होते।

“मैं नहीं करूंगी पापा तो कौन करेगा?” मैं हँस पड़ी।

आज मैंने अपने आईने के ऊपर तौलिया नहीं डाला। मैं जानती थी वह उस दिन खफा हो गया था।

आधे घण्टे बाद वह आ ही गया।

“मेम साहब आपका पीजा।” लगभग शरमाते हुए सा देखा मेरी ओर। मैंने उसकी चौड़ी छाती की ओर देखा, जी चाहा अभी जाऊं और चिपक चाऊं उससे। मैंने जल्दबाजी से काम नहीं लिया।

“उधर टेबल पर रख दो।” मेरे शब्दों में ऐठन कूट कूट कर भरी हुई थी।

उसने रख दिया। “मैं जाऊँ?” उसने पलटते हुए पूँछा।

“जल्दी में हो?”

“नहीं… दरअसल ऑफिस में…”

“तुमने ही सम्भाल रखा है क्या सारे ऑफिस को?” मेरी ऐठन कम नहीं हुई।

“कोई और काम है?” वह सकपका गया। उसकी नज़रें झुकी और चेहरा घबराया हुआ था।

“मेरा बिस्तर गन्दा है उसे साफ़ करना है।”

“बिस्तर…?” उसकी आँखों पे हैरानी थी… शायद अपनी औकात पे या फिर मेरे पागलपन पे?

“क्यों…नहीं कर सकते?”

“क… कर सकता हूँ मगर…”

“मेरी कापियाँ बिखरी पड़ी हैं, उन्हें तो रख सकते हो ना?”

“कहाँ है?” वह झुकी नज़रों से मेरी ओर देखता रहा।

“अन्दर कमरे में… ।”

उसकी नज़रें मेरे चेहरे से नहीं हटी। मैं महसूस कर सकती थी कि उसकी नजरों में मैं बेहद घमण्डी या बेवकूफ लड़की के रूप में रही होऊंगी।

“कमरा उधर है… जाओ।”

वह आखिरी बार मेरी ओर देखा और कमरे के दरवाजे पर खड़े होकर कमरे के अन्दर झाँकने की कोशिश कर रहा था।

“लाइट की स्विच दरवाजे के बगल में है।”

वह अन्दर चला गया। स्विच दबाते ही सारा कमरा दृधिया रोशनी से नहा उठा।

“मेम साहब! किताबें तो ठीक से रखी हुई है।”

“अच्छा ।” मैं मुस्कुराती हुई कमरे में दाखिल हुई, दरवाजे का टेक लेती हुई मुस्कुराकर बोली -”ठीक से रखी हुई है तो बिखरा दो ना।”

“क्या!!” उसने एक बार फिर अपनी हैरान नज़रों को मेरे इर्द-गिर्द दौड़ाया।

“हां विखरा दो।”

वह मुझे देखता रह गया। मेरे होठों की मुस्कुराहट बढ़ती चली गयी।

आज बिल्कुल आजाद थी में कुछ भी करने के लिए, किसी भी हद तक जाने के लिए।

“अच्छा रहने दो, में तुम्हें दूसरा काम बताती हूँ… ।” मैं घूमकर खड़ी हो गयी। अब मेरी पीठ उसकी तरफ थी दो फीट की दूरी पर, बोली -”चलो मेरे कपड़े उतारो।”

“क्या?” वह भर्राई हुए आवाज़ में बोला।

मैं तेजी से पलटी, मेरी आँखों से गुस्सा झलक रहा था -”क्या! हर बात में क्या क्या कर रहे हो? आखिर तुम्हे आता क्या है?”

उसका चेहरा सिकुड़ गया। आँखों में डर था। मैं कुछ देर तक खड़ी उसे देखती रही।

“तुमने सुना नहीं मैंने क्या कहा।”

“सु… सुना है…..”

“तो फिर खड़े क्यों हो?”

“लेकिन मेंम साहब….।” वह कॉप रहा था।

“लेकिन लेकिन कुछ नहीं, जो कह रही हूँ वह करो… या फिर पापा को फोन लगाऊँ?” मैंने अपनी सहेलियों द्वारा बताए गये अनुभवों को बखूबी इस्तेमाल किया। प्यार भी जताया, धमकी भी दी, अपनी ज़रूरत का एहसास भी दिलाया।

कुछ देर लिए वह पत्थर की मूर्ति बन गया था… मगर उसके होठ कॉप रहे थे… आँखे भर आयी । अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि वह अपनी खुशनसीबी पर डरा हुआ है या फिर अपनी बदनसीबी पर।

एक अमीरजादी लड़की बेखौफ़ बड़ी सहजता के साथ उसे सबकुछ समर्पित करने के लिए तैयार थी या फिर वह अमीरजादियों के लिए महज़ इस्तेमाल की चीज़ बन चुका

उसने अपने काँपते हाँथो को मेरी तरफ बढ़ाया। मैं कसमसा उठी। उसके हाँथ मेरे बदन के करीब आकर ठिठक गये थे।

“देखो कमल!” मैंने उसका हौसला आफजाई करने की कोशिश की -”मुझे पता है तुम घबरा रहे हो। मैं तुम्हें यकीन दिलाती हूँ कि तुम्हारी तनख्वाह पापा से कहकर बढ़वा दूंगी बशर्ते तुम मुझे खुश कर दो।”

उस पल को आज जब सोचती हूँ तो खुद ही शर्म से पानी-पानी हो उठती हूँ। मैंने भी कितने सस्ते शब्दों का इस्तेमाल किया था, मगर सच तो ये भी था कि उम्र और हालात के लिहाज़ से शायद दूसरे शब्द उतने प्रभावी भी न होते।

वह चुप रहा।

हलाकि मैं समझने की कोशिश कर रही थी कि जो हो रहा है उस पर वह यकीन नहीं कर पा रहा था या फिर वह इन शब्दों को सुनने का अभ्यस्त हो चुका था।

“कमल!” मैंने पुकारा -”ये वक्त बार-बार नहीं आयेगा तुम्हारी ज़िन्दगी में। एक लड़की खुद तैयार है तुम्हारे सामने अपना सब कुछ समर्पित करने के लिए, इसलिए अपने हाँथ आगे बढ़ाओ और कस लो मुझे बाहों में, जी भर के खेल लो मेरे बदन से।” यह मेरी वेशर्मी, अहंकार, और पागलपन की हद थी।

उसने हाँथ बढ़ा दिये।

उफ़! अगले पल मैं नंगी होने वाली हूँ… बिल्कुल बेपर्द! इस एहसास पर मैं तड़प उठी।

ट्रिंग-ट्रिंग

फोन की घंटी बज उठी। उसके हाँथ जहाँ के तहाँ थम गये। हम दोनों की नज़रें टकराई, मेरे होठ मुस्कुरा पड़े।

“मैं देखती हूँ किसके घर पर आग लग गयी है जो इस वक्त मुझे फोन कर रहा है।” मैं फोन की ओर बढ़ गयी।

फोन पर रागिनी थी।

“तुम्हे और कोई वक्त नहीं मिला फोन करने के लिए?” फोन उठाते ही मैं बिफर पड़ी।

“मैं तुम्हे इतना बताना चाहती थी कि कल का अख़बार ज़रूर पढ़ना।” उसने जख्मी आवाज़ में कहा।

“मुझे नफ़रत है अखबारों से, समझी तुम। चलो अब फोन रखो।”

“तब टी.वी. देख लेना, रखती हूँ।” उसने फोन रख दिया।

“क्यों?” मैंने पूँछना चाहा मगर….. मै देर तक रिसीवर को थामें उसे देखती रही। तभी एकाएक कमल का ख़याल आया तो उसकी ओर दौड़ पड़ी।

“कौन था?” कमल ने घबराई हुई आवाज में पूँछा।

“कोई नहीं!”

“आप मेरी तनख्वाह के लिए सचमुच साहब से बात करोगी?”

“हाँ, ज़रूर।”

उसकी आँखों में चमक आ गयी। इस बार उसने ज्यादा उत्सुकता दिखाई। उसके स्पर्श पर में पागल हो उठी।

ट्रिंग ट्रिंग एक बार फिर फोन बज उठा।

“ओह… रागिनी तुम सचमुच बहुत ही बदतमीज लड़की हो। मैं लगभग खीझते हुए फोन की ओर बढ़ी। फोन उठाया और चिल्ला पड़ी -”अब क्या चाहिए तुम्हें? क्यों तुम मेरी क़िस्मत पर जलती हो?”

“क्या हुआ नीलम? तुम, तुम ठीक तो हो?” पापा की आवाज़ कान पर पड़ी तो सारा बदन थरथरा उठा- “प… पापा आप…।”

“हाँ, लेकिन तुम इस तरह…।”

“क… कुछ नहीं पापा, वो जरा….”

“कोई फोन पर तंग कर रहा था क्या?”

“नहीं, ऐसी बात नहीं है। वैसे आप… आप कब तक आ रहे हैं?”

“बस पाँच मिनट में।”

“प… पाँच मिनट में?” मेरे बदन का गर्म लहू एकाएक बर्फ बन गया। मैंने मुश्किल से रिसीवर सम्भाला- “आप हैं कहाँ?”

“यहीं बाहर गाड़ी पार्क कर रहा हूँ।” मैंने तुरन्त फोन पटक दिया।

“क… कमल।” घबरा कर उसकी ओर देखा- “त… तुम बाहर निकलो कमरे से…. और हां अपनी शर्ट ठीक कर लो।

“क्या हुआ? कौन है?” उसके उड़े हुए चेहरे को मैंने देखा। कोई और वक्त होता तो जी भर के हँसती मगर उस वक्त होठों पर हँसी नहीं आयी। मैं दौड़ती हुई बाहर निकली, टेबल के ऊपर रखे पीजा को उठाया और फर्श पर बिखरा दिया। कमल पागलों सा मेरे पागलपन को देखता रह गया। मैं पटकते हुए क़दमों से दरवाजे की ओर भागी।

“अरे क्या हुआ बेटा?” पापा मुझे दरवाजे पर ही मिल गये। मम्मी उनके पीछे खड़ी थी- “तुम बहुत गुस्से में नजर आ रही हो?”

“फिर क्या करूं? आप भी न जाने ऑफिस में कैसे-कैसे पागल इंसानों को रख लेते हैं, जिनके पास तमीज़ नाम की चीज ही नहीं है।” मैंने अपने आपको कमजोर नहीं होने दिया। मेरे चेहरे पर गुस्सा तमतमा रहा था।

“लेकिन हुआ क्या?” मां ने पूँछा।

“पापा ने जिस आदमी को मेरे लिए खाना लाने के लिए कहा था उसने बिना मुझसे पूँछे पीजा लेकर चला आया अब तुम्ही बताओ मां इस वक्त मैं पीजा खाऊंगी?”

सब लोग कमरे में दाखिल हुए तो हैरान रह गये। पीजा पूरे फर्श पर बिखरा पड़ा था। कमल अब भी उसी जगह पर मूर्ति बन खड़ा था।

“तुम पीजा लेकर आए थे?” पापा ने उससे पूँछा।

“हॉ…।”

“मगर क्यों? क्या तुम्हें कुछ और नहीं मिला?”

“लेकिन आपने तो पीजा के लिए कहा था।” भारी आवाज़ में कमल ने कहा।

“क्या पापा!” मैं पापा की ओर घूमी- “आपने कहा था?”

“हाँ कहा तो मैं ही था मगर कम से कम इसमें तो इतनी अक्ल होनी चाहिए थी कि तुम्हे फोन करके खुद पूँछ लेता। वैसे भी उस एक्सीडेंट के कारण मैं काफ़ी परेशान था।”

“पापा! आप ऐसे लोगों को आफिस में रखते क्यों हैं जिन्हें इतनी भी समझ नहीं है।”

“लेकिन सिफ़ारिश तो तुमने ही की थी।” मां बीच में बोल पड़ी।

“म… मैंने!” मैंने चौककर मां की ओर देखा। मेरा माथा ठनक उठा। मैं समझ गयी कि जल्दी ही मां मुझे लपेटे में लेने वाली है। मैंने अपने रुख को ज्यादा निर्मम और स्पष्ट किया -”हां मैंने की थी लेकिन मुझे थोड़ी पता था कि यह इतना बेवकूफ होगा। मैंने तो बस मदद की थी।”

“तब अब इतना गुस्सा क्यों कर रही हो?” पापा ने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा।

“नहीं पापा, अब इसे मैं देखना नहीं चाहती, मुझे ऐसे पागलों से बहुत नफ़रत है।” मैं तेज़ी से उसकी ओर घूमी- “अब तुम यहाँ खड़े-खड़े क्या कर रहे हो? चलो भागो यहां से और हां दोबारा दिखाई मत देना, समझे तुम।”

“नीलम।” पापा ने मेरे सर पर हाँथ रखते हुए कहा- “चलो छोड़ो, अभी लड़का नया है, धीरे-धीरे सब कुछ समझ जाएगा।”

“अरे ऐसे कैसे समझ जाएगा।” मैंने अपनी निर्दयता नहीं छोड़ी मुझे पता था कि मेरी जरा सी सहानुभूति मुझे शक के कटघरे में लाकर खड़ा कर देगी। क्योंकि मुझे इतना तो पता था कि इन मामलों में मेरी मां इतनी पागल नहीं है। वह एक औरत है जिसने मेरी उम्र को भी जिया है। मैं गुस्से में लाल होती हुई बोली- “पापा ऐसे लोग कभी नहीं समझ सकते। आप इसे अभी और इसी वक्त नौकरी से निकाल दीजिए। इस पागल शख्स की मैं शक्ल भी नहीं देखना चाहती।”

मैंने तिरछी नज़रों से मां की ओर देखा। मां के चेहरे को मैं पढ़ सकती हूँ। फ़िलहाल उनकी नज़रों में मैं बेकसूर जिद्दी और बेहद गुस्सैल लड़की के रूप में खड़ी थी जो किसी की भी ग़लती माफ करना नहीं जानती।

“तुमने सुना नहीं इसने क्या कहा?” पापा ने मेरा पक्ष लेते हुए कमल पर बरसे। मां मूर्ति बनी देखती रही बाप और बेटी की निर्दयता को… शायद ही वह निगल पा रही होगी कि इतनी मामूली-सी बात के लिए किसी को नौकरी से कैसे निकाला जा सकता।

कमल धीरे से मुड़ा दरवाज़े की ओर।

“अब इसे साफ़ कौन करेगा?” मैंने आखिरी वक्त को भी अपने पक्ष में खींचना चाहा- “इसे साफ़ करते जाओ।”

“नीलम!” मां उबल पड़ी- “तुम पागल तो नहीं हो गयी हो। इतना गुस्सा अच्छा होता है क्या? उसे जाने दो… मैं साफ़ कर लूंगी।

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मैं सारी रात सो नहीं पायी। सुबह जाकर कहीं नींद आयी तो मां ने सोने न दिया। सुबह सात बजे ही चाय लेकर आ गयी।

मैं गुस्से में बिफर पड़ी- “अगर तुम दो-तीन घण्टे बाद आती तो कौन सी कयामत आने वाली थी। ओह मम्मी तुम बहुत बुरी हो। जानते हुए भी कि स्कूल की छुट्टियां चल रही हैं फिर भी सुबह-सुबह ही आ गयी जगाने।

“लो अखबार देखो नींद भाग जाएगी।” मां को शायद मेरा यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा। उसने मेरे सर पर अख़बार को पटका, चाय मेज पर रखी और तेजी से कमरे से निकल गयी। मुझे कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ा। मैंने अखबार को उठाया और मेज की ओर फेंक दिया –‘पता नहीं मां को किसने बताया कि मुझे अख़बार में दिलचस्पी है।’ मैंने मुँह को बिगाड़ा और लेट गयी। मगर नींद तुरन्त नहीं आयी। कमल एक बार फिर मेरी आँखों के सामने नाचने लगा। काश! मैं कुछ कर पाती। लेकिन कैसे कर पाती- बीच में तो वह टपक पड़ती है, कभी ऐसे कभी वैसे, कुछ न मिला तो फोन ही घुमा दिया।

ओह रागिनी… । मैं गुस्से में अपना बाल नोच लेना चाहा मगर तभी  रागिनी का ख़याल आते ही माथा ठनक उठा- “क्या तुम कल का अखबार पढ़ना चाहोगी?” रागिनी का यह वाक्य मेरे मस्तिष्क में बिजली की तरह दौड़ा। मैं उठकर बैठ गयी। अखबार की ओर  हाँथ बढ़ाया, झटके में चाय का कप मेज से गिर गया। पूरी चाय फर्श पर बिखर गयी। मैं जल्दी-जल्दी अख़बार पलटने लगी। कुछ ख़ास न दिखा जिसके लिए मैं इतनी उतावली हो सकती हूँ। हो सकता है आँखें चूक गयी हों, एक बार उसे फिर पलटने लगी मगर तब भी मिला कुछ नहीं। मैंने उसे मेज पर पुनः रख दिया। एकाएक मेरी नज़र मुख्य पृष्ठ पर गयी तो सांसें अटक गयीं। मैं पागल थी जो अख़बार के भीतरी पन्नो को तलासती रही। अखबार का मुख्य पृष्ठ तूफ़ानी ख़बर से भरा हुआ था।

“बाप के हाथो 18 साल से लुटती रही बेटी की अस्मता!” “वासना तेरा नाश हो…” अखबार की प्रमुख पंक्तियां थी। 

उफ़! तो ये हकीकत थी रागिनी की ज़िन्दगी की…। आत्मा की पीड़ा में मैं सुलग उठी। कोई बेटी इतनी बदनसीब हो सकती है? दिल मानने को तैयार ही न था। एकाएक में जिन्दगी और उसकी हकीकत के कई सवालों में घिर गयी। न जाने क्यों? आज वह सबकुछ झूठा-सा लग रहा था, जो में देख और महसूस कर रही थी। मैंने अपने कमरे में सजी तमाम चीजों को गौर से देखा-क्या सचमुच ये वही थी जो दिख रही हैं या फिर वह है जो दिख नहीं रहा है। मैंने अपनी मेज पर रखे फूलदान से फूल निकाला और उसे हाथो में मसलने लगी- काश! ये सचमुच फूल होता।

मैंने अखबार को सीधा किया। पृष्ठ के बड़े हिस्से में रागिनी के आँसू भरे चेहरे की तस्वीर छपी हुई थी साथ ही उसके ज़िन्दगी की कई कड़वी यादें। मैंने एक कोने में छपे उसके पापा की तस्वीर की ओर नफरत से देखा-जी चाहा अभी के अभी उसकी तस्वीर के इतने टुकड़े कर दूं कि क़यामत गुज़र जाए उन्हें समेटने में।

मैं कमरे से बाहर निकली। मां सामने खड़ी थी। चेहरे पर न हँसी थी न दर्द। बिल्कुल भावहीन चेहरा मेरी ओर देखता रहा। मैं दौड़कर उससे चिपक गयी। मेरी आँखें उबल पड़ी।

“बेटी!” मां की आँखें अपने आँसू न सम्भाल पायी। वह भी रो पड़ी- “समझ में नहीं आ रहा है।” रुवाँसी आवाज़ में मां बोली- “तुम्हे क्या सलाह दूं, जिन्दगी की किस हकीक़त से रु-बरू करावाऊँ तुम्हें।”

वह फर्श पर बैठ गयी। मैंने उसकी गोदी में सर रख दिया।

“सोचती हूँ…।” मां ने भरी-भरी नज़रों से मेरी ओर देखा- “तुमसे कहूं कि तुम रागिनी से अब कभी मत मिलना, उसकी परछाईं तक को मत छूना। मगर जब अपने इस निर्णय पर दोबारा ग़ौर करती हूँ तो सवाल उठता है क्यों? तब मैं हैरान रह जाती हूँ अपने इस फैसले पर!”

“मां!” मैंने पुकारा- “तुम्हें याद है तुमने एक बार उसे बहादुर लड़की कहा था।”

“वह बहादुर लड़की है मां, वह बहादुर है।”

“बहादुर।” मां कुछ सोचने लगी, उसकी कॉपती उगलियाँ मेरे बालों से खेलती रही- “हाँ बेटी, उसे शायद बहादुर कहना ही ठीक है परन्तु…।” वह अपनी बात बीच में ही रोक कर मेरी ओर देखने लगी- “उसने…. ओह नीलम, सचमुच उसे लेकर मैं काफी संदेह में हूँ लेकिन बेटी, मुझे एक बात पर फ़क्र ज़रूर है कि वह तुम्हारी दोस्त थी।”

“थी नहीं मां. वह आज भी मेरी दोस्त है और शायद अब सबसे अच्छी दोस्त।” मैंने अपने ऑप्तुओं को पोछा- “मुझे नाज़ है उस पर उसकी बहादुरी पर।”

मां मेरी ओर देखती रही।

एकाएक फोन की घण्टी बज उठी। में देर तक फोन की ओर देखती रही, न मां ने कुछ कहा, न मैंने।

“मैं जाकर देखती हूँ।” मां ने उठते हुए कहा।

“नहीं, मैं देखती हूँ।” मैने फोन उठा लिया। देर तक सिसकियाँ सुनती रही में। शायद फोन पर खड़ा शख्स रो रहा था।

“हैलो…।” मैंने एक बार फिर उसकी आवाज़ सुनने की चेष्टा की।

“ह… हलो!” इस बार उसने निराश नहीं किया मुझे।

“ओह… क… कल्पना तुम!” मेरे हाँथ से रिसीवर छूटते छूटते बचा- “तुम रो रही हो?”

“क्या तुमने अख़बार पढ़ा आज?” कल्पना खुद को सम्भालते हुए बोली।

“हाँ…”

“नीलम! क्या सचमुच ज़िन्दगी ऐसे ही होती है?”

मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

xxx

सारा दिन गुज़र गया मैं कमरे से बाहर नहीं निकली इन्तज़ार था रागिनी के फोन का, वह नहीं आया। मैं कमरे से निकली और छत पर चली गयी।

“नीलम! नीलम!” सहसा कोई स्वर मेरे कानों को छेड़ा। आवाज मां की थी।

“क्या है?” मैंने ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखाई।

“देखो फोन पर कौन है… कुछ बोलता ही नही।”

“क…. क्या!” में बेतहाशा भागी-भागी नीचे की ओर।

“ह… हेलो! हेलो कौन? किसी ने कुछ नहीं बोला। मैंने कहा –”मैं जानती हूँ तुम रागिनी हो है न?” मेरे आँखों में आँसू छलछला पड़े। मैं उसकी सांसों को महसूस कर सकती थी- “रागिनी! प्लीज कुछ बोलो! देखो…. देखो चुप रह कर तुम मुझे  झुठला नहीं सकती ! मैं तुम्हारी सांसों को पहचानती हूँ ।”

बावजूद इसके कई पल गुज़र गये खामोशी के बीच मगर आवाज़ नहीं आयी। मैं रिसीवर थामे खड़ी रही। मेरा यकीन नहीं टूटा।

“नीलम!” काफ़ी देर बाद बुझी-बुझी-सी आवाज़ छुई मेरे कानों को -”क्या तुम अब भी कहोगी कि मैं तुम्हारी किस्मत से जलती हूँ?”

“क…कभी नहीं रागिनी, कभी नहीं । तुम… तुम मेरी किस्मत से कभी नहीं जल सकती क्योंकि तुम…”

“नीलम…!”

“रागिनी! क्या मैं दोस्त होने के नाते एक बात पूँछ सकती हूँ तुमसे?”

“क्या?”

“क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि तुम अपनी इस बदनसीबी के लिए काफ़ी हद तक खुद जिम्मेदार हो।”

“कारण जान सकती हूँ?”

“तुम्हें अपने पापा को ऐसा करने से रोकना चाहिए था।”

“नीलम!” उसने सांसे भरते हुए कहा- “मुझे तो याद ही नहीं है कि उसने मेरे साथ पहली बार यह हरकत कब की थी। शायद तब, जब आवाज़ उठाने के लिए भी मेरे पास आवाज़ नहीं थी।”

“लेकिन बाद में तो…।”

“कर सकती थी… मुझे पता है नीलम कर सकती थी, मगर उस समय तक मेरी परवरिश, जिन्दगी और सुरक्षा सामने आ गयी थी। मैं इनका मतलब भी बखूबी समझने लग गयी थी। मेरी मां मर चुकी थी। वह बाप ही था जो मुझे पाल रहा था। अपनी नज़रों में न सही, दुनियां की नज़रों में बाप की बदौलत ही इज़्ज़त मिल रही थी, आम लड़की की तरह रुतबा हासिल था।

“ओह रागिनी… तो तुमने रोटियों के लिए इतना बड़ा समझौता कर डाला अपने आप से।

“शायद सच यही था नीलम! उसने लम्बी सांस भरते हुए कहा- “क्योंकि मुझे पता था कि मुझे दो में से एक को चुनना है…. या तो मैं अपने बाप को ऐसा करने दूं या फिर पूरी दुनियां को।”

“तो तुमने बाप को चुना?”

“हाँ…।”